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बुधवार, 2 जून 2010

मेरे लेखन का सफर : स्मृतियाँ कुछ तिक्त कुछ मधुर (३) !

                     कभी फिल्मी पत्रिका के लेख और कभी कोई और आलेख चर्चा का विषय बनाये ही था.  लेखन में  समाज और अन्याय  के प्रति आक्रोश शुरू से ही था और मेरी सारी रचनाएँ ऐसी ही होती थी. मैं कोई बहुत बड़ी तो थी नहीं और न ही बड़े शहर की रहने वाली एक क़स्बा  है ( अब नहीं रहा क़स्बा)  सब एक दूसरे को जानने वाले , फिर मेरे पापा उरई में सम्मानित व्यक्तियों में थे और भाई साहब भी B .Sc . करके इंटर कॉलेज में अध्यापक हो गए थे. वह भी बड़े सिद्धांतवादी थे क्या,  आज भी वैसे ही हैं? उन्हें कोई बात गलत पता चलती तो कहते -  'रेखा इस पर ऐसा लिखो कि पढ़ कर ये ऐसे काम करना भूल जाए.'
                    जो आलेख मेरे को लगते कि कोई वबाल खड़ा हो सकता है वह मैं 'भावना' नाम से लिखने लगी. सिर्फ मेरी बहनों बाकी किसी को नहीं. उस समय कुछ विषय ऐसे थे जिनपर सबके सामने बात नहीं होती थी और उन पर लिखना भी अच्छा नहीं समझती थी . इस लिए ऐसे हॉट विषय पर उस समय ये हॉट कि श्रेणी में ही आते थे.


उसी समय भोपाल  के प्रतिष्ठित लेखक जगदीश किंजल्क से संपर्क हुआ. उनहोने एक परिचर्चा आयोजित की.
"विवाह में वैदिक रीति अधिक उचित या अन्य" ऐसा ही कुछ विषय था . मैंने वैदिक रीति का समर्थन किया और आज भी करती हूँ, वैदिक मन्त्रों की महत्ता को मैं बहुत मानती हूँ और इसको अनुभूत किया है. बस उसका छपना था की शादी के प्रस्ताव आने शुरू हो गए. हर दूसरे पत्र में प्रस्ताव. हम भाई बहन मजे ले लेकर पढ़ते और फिर रख देते.
                 अब तो मोहल्ले वालों को भी चिंता होने लगी की लड़की के नाम इतने सारे ख़त आते हैं, जरूर कुछ गड़बड़ है इसकी शादी हो जानी चाहिए. अब मोहल्ले की महिलाओं ने आकर मेरी माँ को समझाना शुरू किया कि  अगर कहीं बदनाम हो गयी तो कोई शादी भी नहीं करेगा. कहीं कुंवारी लड़कियों के नाम इतने ख़त आते हैं. मेरे घर में भी तो हैं, रिश्तेदारों  के भी इनके ही नाम आते हैं. मैं उस मंडली में कोई रूचि नहीं रखती थी. हाँ माँ ने कहा तो चाय नाश्ता बना कर दे दिया . मेरी छोटी बहने ये काम करती थी. पहले सुनती और फिर जाकर मुझे बताती. मेरी माँ भी गाँव की थी फिर इन सबसे उनका कोई वास्ता नहीं था. फिर एक दिन ऐलान हुआ कि ये लिखना  विखना बंद करो. ये सब अपने घर में जाकर करना. वो ऐसे कह रही थी, वो ऐसे कहती है. मुझे इज्जत से शादी कर लेने दो मेरी अभी और भी लड़कियाँ हैं. मेरे बाद मेरी ३ बहने छोटी थी. बात पापा के पास तक गयी क्योंकि माँ के हथियार तो वही थे.
                       पापा मेरे प्रबुद्ध व्यक्ति थे और वे खुद भी लिखते थे. उन्होंने माँ को समझाया की ऐसा नहीं होता है, ये औरतें तो बिना  पढ़ी लिखी हैं तो क्या तुम भी ऐसे ही करोगी? वो जो कर रही है उसको करने दो. शादी भी हो जायेगी अभी उसको पढ़ने दो.
इस समय तक मेरे आलेख  मनोरमा में छपने लगे थे. मनोरमा ऐसी पत्रिका थी कि महिलाओं की पत्रिका करीब सभी के घर तो नहीं आती लेकिन हाँ आम घरों तक आती ही थी और उसमें लिखा हुआ सब पढ़ते थे.  उस समय भी नारी, सामाजिक मुद्दे ही मेरे लेखन के  विषय थे.
            मनोरमा में "आपके पत्र' नाम से कालम आता था और मैं उसी में अपनी बात कह पाती थी , सब उसको चाव से पढ़ते थे. मेरे एक बहुत दूर के रिश्तेदार थे, उनकी तीन बहुएं जलकर  मरी और दो बेटों की.  एक दिन बताने चली आई कि उसकी शादी वाले आ रहे हैं लोग भड़का देते हैं, अगर हमारे पास पैसा है तो हम अभी चार शादियाँ और कर लेंगे. मुझे सुनकर बहुत बुरा लगा कि एक तो जल कर मार डाला और फिर ये तुर्रा. मैंने उनको लक्ष्य करके मनोरमा में भेज दिया और जब प्रकाशित हो गया तो समझा ही जा सकता कि वो दनदनाती  हुई मेरे घर आ गयी कि कैसे रिश्तेदार हो तुम ? बात को ऐसे फैलाया जाता है, हम भी देख लेंगे अभी तुम्हें ४-४ लड़कियों की  शादी करनी है. मेरी माँ तो बैठ कर रोने लगी , मुझे भी डर लगा कि कहीं पापा कुछ न कहें. भाई साहब आये तो पता चला. मैंने अन्दर कमरे में जाकर लेट गयी. मुझे बुलाया गया. माँ इस आशा में कि भाई साहब अब मुझे डांट लगायेंगे बिल्कुल एलर्ट बैठ गयी.
    'हाँ , रेखा किसपर लिखा था तुमने?'
    'उन्हीं की बहुयों के जलाने पर लिखा था.' मैं डांट पड़ने के डर से बहुत धीमे धीमे बोल रही थी.
    'ये तो तुमने बहुत अच्छा किया , ऐसे लोगों को चौराहे पर खड़ा करके जूते भी लगाये जाएँ तो कम है.'
    मेरी तो आँखे चमक उठी और माँ शांत हो गयीं की अब तो ये मानने वाली नहीं. पापा और भाई साहब की शह मिल रही है.


 मेरा काम अपनी गति से चलने लगा. अब मुझे किसी कि भी परवाह नहीं थी. मेरी अभिव्यक्ति और विचारधारा वैसे ही आज भी है, आदर्शों और सिद्धांतों पर चलाने वाली अगर कुछ गलत है तो गलत है चाहे उसके करने वाला मेरा अपना खास ही क्यों न हो. मेरी लेखनी के शिकार मेरे अपने बहुत करीबी भी बने और मैंने बेबाकी से ही लिखा. वह बात और है कि उ सा बात का उलाहना मेरे पापा या भाई साहब को सुनने को मिला हो. मिलता रहता था और वे अपने ढंग से उससे निपटते रहते थे. बस मुझे बता देते कि आज तुम्हारे इस लिखने से ये हुआ.
          इन्हीं के साथ एक कटु अनुभव ये भी हुआ कि मेरी एक शिक्षिका थी अब रिटायर हो चुकी थी लेकिन उन्होंने मुझे बचपन में पढ़ाया था और हम उनको 'चाची बहनजी ' कहते थे. घर से बहुत दूर नहीं रहती थी. पता चला कि उनकी पुत्रवधु उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार करती है. सबसे बुरी बात जो मेरे दिल को लगी वो ये थी. कि चाची बहनजी हमेशा एकदम सफेद साड़ी पहनती थी. अब सुना कि बहू अपने कपड़े धो कर उससे निकले साबुन में कहती कि अब अपनी साड़ी इसमें धो लेना. हो सकता है कि ये आपको कहानी लगती हो लेकिन ऐसा ही था और इससे भी बहुत अधिक सुना. मेरा मन तो रो दिया. हमेशा स्मार्ट रहने वाली मेरी वो शिक्षिका आज इस हाल में. फिर क्या था मेरी वेदना बह निकली और निकल कर इस रूप में आ गयी.
              मनोरमा आई नहीं कि ये खोज शुरू हो गयी कि ये रेखा श्रीवास्तव है कौन? मेरा घर बहुत दूर नहीं था और सब आपस में परिचित भी थे. इत्तेफाक से उनके पुत्र मेरे भाई साहब के कालेज में ही टीचर थे.  कैर उनको पता चल गया कि ये रेखा श्रीवास्तव है कौन? फोटो उसमें बहुत साफ नहीं छपा था फिर भी पता चलना कोई बड़ी बात नहीं थी . फिर क्या था? एक दिन कॉलेज में स्टाफ रूम में भाई साहब से बोले - 'विनोद तुम्हारी सिस्टर ने ये ठीक नहीं किया?'
'क्या ठीक नहीं किया? क्या किया है उसने? ' भाई साहब को पता था लेकिन उन्होंने भी नाटक किया.
'यही जो मनोरमा में निकाला है, कितनी बदनामी हो रही है?' वे गुस्से में थे.
उसमें उनका नाम कहीं भी नहीं दिया था. लेकिन कहानी अपनी हो तो सबको पता चल जाता है.
'देखो, मेरी सिस्टर लिखती है, और वह क्या लिखती है इससे मेरा कोई सरोकार नहीं. वह लिखने के लिए फ्री है. अगर तुम्हें लगता है तो जाकर उस पर मानहानि का मुकदमा कर दो.' भाई साहब ने दो टूक जबाव दिया था.
                      अब तो स्टाफ रूम में सभी टीचर ' अरे विनोद रेखा ने क्या लिखा है? यहाँ लाओ हम भी पढ़ें?' लोगों को तो मजा आता है किसी कि बात का बतंगड़ बनाने. भाई साहब ने आकर मुझे बताया मैंने कहा - ' ये स्टाफ रूम में नहीं जायेगी , अगर उनमें जरा सी भी गैरत होगी तो वे अपने व्यवहार को सुधारने का प्रयास करेंगे.'                                                                     (क्रमशः)

मंगलवार, 1 जून 2010

मेरे लेखन का सफर : स्मृतियाँ कुछ तिक्त कुछ मधुर (२)

          माधुरी जैसी फिल्मी पत्रिका में कुछ भी छप जाना इतना महत्वपूर्ण होता है, ये मुझे पता नहीं था. कुछ और बहुत प्रसिद्ध तो नहीं लेकिन फिल्मी पत्रिकाओं से लेख लिखने के प्रस्ताव आने लगे. मैं कोई फिल्मी दुनियाँ से तो जुड़ी नहीं थी  बस रूचि थी उसमें और जानकारी भी बहुत अच्छी थी. मेरठ से प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका ने लेख माँगा और मैंने " फिल्मों में महिलाओं कि भागीदारी " विषय पर लेख लिखा और भेज दिया. प्रकाशित होने के बाद पत्रिका मेरे घर आ गयी. मेरठ में मेरे भाई साहब के एक मित्र थे , उन्होंने पढ़ा होगा और तुरंत ही उनका पत्र आया कि मैंने रेखा का लेख और फोटो देखी. मुझे ये कुछ जंचता नहीं है कि लड़की ऐसे फिल्मी दुनियाँ पर लेख लिखे. खैर फतवा जारी हुआ कि फिल्मी विषयों पर नहीं लिखना है और विषय चुनो. तब फ़ोन और मोबाईल तो होते नहीं थे कि घर आम घर में लगे हों. सो पत्र एक सशक्त माध्यम था. उस समय न भाई साहब बहुत बड़े थे लेकिन बड़े भाई का रुतबा होता था. सो बंद कर दिया. पर कलम तो कहीं न कहीं रास्ता खोज ही लेती है उस पर तो फतवा जारी नहीं किया जा सकता है. 
                       अपनी पत्र मित्रों में एक रोचक घटना याद है , लखनऊ  की एक लड़की थी (वास्तव में वह लड़का था)  कृष्णा लाठ  ने मेरे लेखों से प्रभावित हो कर पत्र लिखा और मित्रता की बात हुई. लखनऊ मेरी हद में था सो मैंने दोस्ती कर ली. करीब ३ साल तक हम सहेलियों की तरह सब बाते शेयर करते रहे. मेरे चाचा लखनऊ आ गए और मुझे जाना हुआ तो मैंने उसको लिखा . बस उसके बाद उसने पूछा कि क्या मैं किसी लड़के से दोस्ती करना पसंद करूंगी तो मैंने मना कर दिया. उसके बाद उसने स्वीकार किया कि वह वास्तव में लड़का है लेकिन उसे मेरी दोस्ती अच्छी लगी इसलिए वह लड़की के नाम से पत्र लिख रहा था. अब आगे से नहीं लिखेगा लेकिन वह एक अच्छी दोस्त खो रहा है.  मुझे उसका पता अभी भी याद है , कहीं गणेश गंज में रहता था. 
                     प्रतिमा मेरी कविता की प्रेरणा बनी हम लोग अपने पत्रों में शेर और कविताएँ लिखा करते थे. हमारे पत्र १२ -१४ पन्नों के होते थे. सभी के चाहे उमा हो या प्रतिमा या कृष्णा.  मुझे अपना पहला शेर  याद है और मुझे आज भी बहुत पसंद है.

         मैयत उठ दी दो अश्क भी गिरा न सके
         दफनाया इतना गहरा कि  आवाज भी आ न सके
         कब्र पर फूल चढाने से क्या फायदा

         मेरे जनाजे के साथ तुम दो कदम भी  आ  न सके. 


                मैंने एक डायरी बना रखी थी, उसके बाएं पेज पर  चार लाइनों  के शेर या कवित्त  और दायें पेज में कविता लिखती थी. बाद में इस डायरी का जो हश्र हुआ - इस राज को आगे बताएँगे. मैं मेज पर बैठ कर नहीं पढ़ती थी. बस काम सेफ्री होकर अन्दर कमरे में जमीं में दरी डाली और एक तकिया लिया अपनी डायरी और कॉपी लेकर चले गए . पेट के नीचे तकिया लगा लिया और उलटे लेट कर ही लिखना और पढ़ना करती थी. मेरा ट्रांसिस्टर पास में होता था और साथ साथ गाने सुनने का सिलसिला भी चलता रहता था.
               एक दिन तो हद हो गयी मुझे अपने पर शर्म भी आई. मेरी छोटी बहन की सलेहियाँ आई तो कमरे में मेरी डायरी रखी थी. वे उठ कर पलटने लगी तो उन लोगों ने कविताएँ देखी.  फिर वे बहन से बोलीं , " गीता ये किस फिल का गाना है?"
बहन ने कहा कि 'ये फ़िल्म का गाना नहीं है मेरी दीदी की कविता है वो कविता लिखती हैं. ' 
वह तुरंत बोली कि 'क्या तुम्हारी दीदी पढ़ी लिखी भी हैं?' 
                   मैं उस समय बी. ए. में पढ़ रही थी. मुझे अपने पर बड़ी शर्म आई कि क्या मैं बिल्कुल बिना पढ़ी लिखी नजर आती हूँ?  लेकिन मैं तो जैसी आज हूँ, वैसे ही थी. दिखावे से कोई मतलब नहीं था. मैं तो ऐसी ही हूँ. 
                                                                                                                                                    (क्रमशः)

सोमवार, 31 मई 2010

मेरा लेखन का सफर : स्मृतियाँ कुछ तिक्त कुछ मधुर !

                            जब ब्लॉग तक पहुंची हूँ, तो मन हुआ कि संस्मरण की एक श्रृंखला जो यादों में बसी है और मेरे लेखन से जुड़ी है सब से बाँट लूं. बहुत कुछ सीखा और बहुत कुछ पाया इस लेखन से , किन्तु कैसे शुरू हुआ और कैसे कैसे लोगों से निपट कर यहाँ तक हूँ, यह भी एक रोचक दास्ताँ है.


                                
                  पढ़ना मेरे परिवार में एक व्यसन की तरह से था. पापा , माँ और दादी सभी पढ़ने के शौक़ीन थे. सबसे बड़ी बात ये थी कि मेरी दादी पढ़ लेती थी लेकिन अगर पृष्ठ शेष हो तो उसे नहीं ढूढ़ पाती थी हमसे कहती कि इसका पृष्ठ ढूढ़ दो. मेरे पापा के एक मित्र के पास पत्रिकाओं की एजेंसी थी सो वे सारी पत्रिकाएं मुफ्त में दिया करते थे और उस समय जो आज भी मेरी स्मृति में हैं - साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका, माया, मनोरमा,कादम्बिनी, नवनीत, हिंदी डाइजेस्ट, साथी, अरुण थी जो साहित्यिक और स्तरीय पत्रिकाएं थी. फिल्मी दुनियाँ में पहले सुचित्रा ( जो बाद में "माधुरी" के नाम से आई), फिल्मी कलियाँ, सुषमा, रंगभूमि, फिल्मफेयर थी,  जो मुझे याद हैं. इनको चाटते चाटते अच्छे खासे ज्ञानी हो गए थे. अपनी उम्र से अधिक समझदार और दुनियादार.वैसे पढ़ना तो पता था की खानदानी रोग था , लेकिन लेखन पापा से मिला और तारीफ की बात ये हैं कि  हमें ये बात बहुत बाद में पता चली , लेकिन पापा का लिखा हुआ कभी पढ़ने को नहीं मिला। 
                              मेरी लेखनी चली जब मैं १० साल की थी. मेरी पहली कहानी "ऋण " दैनिक जागरण के बाल जगत स्तम्भ में छपी थी, गरिमियों कि छुट्टी में हम सभी ननिहाल चले जाते थे. वहाँ से लौट कर आये तो पापा ने मुझे वह अखबार दिया और मेरी पीठ थपथपाई क्योंकि ये काम मैं बिना बताये ही किया करती थी. फिर मुझे भी बहुत ख़ुशी हुई. फिर इसी तरह से कई कहानियां निकलीं. जिनमें शेष स्वतंत्रता सेनानियों पर अधिक थी, जिनमें उसके महत्वपूर्ण संस्मरण मैंने बाल जगत के लिए ही लिखे थे.
                            जब स्कूल में पहुँची तो आदत तो नहीं छूटी थी, १५ अगस्त को स्कूल में डिबेट प्रतियोगिता रखी गयी. उस समय खाद्य समस्या एक बहुत बड़ा प्रश्न था. यही विषय रखा, मेरी जितनी पत्रिकाएं तो किसी के यहाँ आती नहीं थी, मैंने एक लेख तैयार किया और अपने क्लास कि मोनिटर को दे दिया कि तुम इसको बोल देना. उसे पढ़कर नहीं बोलना था. इत्तफाक से १५ अगस्त बारिश होने लगी और घोषणा की गयी कि हाल में हो रहे कार्यक्रम में वही क्लास आयेंगे जो कि इस में भाग ले रहे हैं. अब इज्जत का प्रश्न था. सब ने कहा चलते हैं देखेंगे. मेरी क्लास से किसी ने मेरा नाम वहाँ दे दिया. जब नाम बुलाया गया तो मुझे तो काटो खून नहीं , लेकिन मैंने पढ़ा था और लिखा था सो सब पता था, लड़कियों ने ठेलठाल कर स्टेज पर भेज दिया और  मैं वहाँ  बोल कर आ गयी , फिर नीचे बैठ कर खूब रोई तुम लोगों ने मेरा नाम क्यों दिया? लेकिन इससे मेरा नाम कॉलेज में हो गया. फिर तो हर डिबेट में भाग लेना ही होता था.
                          उन दिनों आज की तरह से कंप्यूटर तो थे नहीं , सो ऑरकुट, फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया के साधन होते ही नहीं थे . हाँ पत्र ही सबसे बड़े साधन थे. मेरे यहाँ उस समय "नेशनल हेराल्ड" पेपर आता था और उसमें एक कालम होता था "पेन फ्रेंड" का उसमें रूचि आने लगी और उसे ही मेरी एक फ्रेंड बनी "प्रतिमा श्रीवास्तव" जो कानपुर की थी. मेरे पत्रों के लिखने के ढंग से उसने मुझसे कहा कि "तुम कविता लिखो, तुम कविता लिख सकती हो", वह आज भी मेरी बहुत अच्छी मित्र है और लेखिका भी है. इस विधा के बारे में मैंने पहले नहीं सोचा था. फिर लिखने की कोशिश की. और लिख लिख कर डायरी में इकठ्ठा करती जाती. वह हर साल दिसंबर कि छुट्टी में उरई मेरे पास जाती थी. फिर उनमें करेक्शन करती.
                         मेरा  पूरा घर फिल्मों के भी उतने शौक़ीन थे, शायद ही बचपन में कोई फ़िल्म जाती हो , जो हम न देखते हों. जो न देख पाते फिल्मी पत्रिकाओं में उनकी पूरी कहानी नाट्य रूप में दी जाती थी और उनसे काम चला लेती. मीनाकुमारी मेरी पसंदीदा अभिनेत्री थी. ३० मार्च १९७२ को उनका निधन हुआ और इससे मैं बहुत ही दुखी थी. मैंने माधुरी में एक संवेदना पत्र लिखा और वह पत्र छपा. उसमें पता भी छपा था फिर क्या था? बहुत सारे पत्र आने शुरू हो गए. किसी को बहन बनाना था कोई दोस्ती करना चाहता था. हम सब भाई बहन के लिए ये नया अनुभव था सब मिलकर बैठकर पत्र पढ़ते . उनमें से चार लड़के सबने चुने . एक अमर जो मथुरा का था, एक योगेन्द्र जो बीकानेर का था, एक विनोद वह भी बीकानेर का था और एक अजय जो बसंतपुर , बिहार का था.  चारों वही किशोरों वाली उम्र के, मैं ही कहाँ बड़ी थी।  लेकिन वे सब मुझसे भी छोटे थे.  एक लड़की भी फ्रेंड बनी "उमा श्रीवास्तव" जो दोहद गुजरात से थी. जिससे वर्षों पत्र व्यवहार चला. एक बार वह सपरिवार मुझसे मिलने उरई भी आई क्योंकि उसके पापा रेलवे में थे. इसी तरह से भाइयों से भी मेरी कई साल तक राखी भेजना और पत्र व्यवहार  चलता रहा. लेकिन भाइयों से कभी मिली नहीं. उनमें से जिनके फोटो मेरे पास थे आज भी मेरे पुराने अल्बम में लगे हुए हैं. वे सब भूल गए होंगे लेकिन मुझे आज भी याद हैं.
                                                                                                                                                    { क्रमशः }

रविवार, 30 मई 2010

31 मई तम्बाकू निषेध दिवस !


                                    आज तम्बाकू निषेध दिवस - हर वर्ष आता है और हर वर्ष इसी तरह से चला जाता है, लोग अखबार में आलेख देखते हैं और रख देते हैं. 
                              पर आज ये क्रांति दिवस ब्लॉग की दुनियाँ में भी छाएगा. ऐसा नहीं है कि हमारे ब्लॉगर बन्धु इस शौक से दोस्ती न रखते हों और रखने वाले इन बातों को बेकार की दलीलें  न मानते हों  और कहते हों  कि देखो अमुक तो कुछ भी नहीं खाता था और उसको मुंह या गले का कैंसर हो गया. ये आप किसे झुठलाने की कोशिश करते हैं , खुद को या घर वालों या अपने शुभचिंतकों को. अगर आग पर चलेंगे तो आज नहीं कल पैर जरूर जलेंगे और छाले भी आपको ही पड़ेंगे उसकी तपिश आप अकेले नहीं झेलेंगे अपितु आपके घर वाले भी उसमें झुलसेंगे. अभी भी देर नहीं हुई है - जो इसके सेवन में लिप्त हैं छोड़ने का मन बना लें तो दुनियाँ में असंभव कुछ भी नहीं है. 
                            मैंने इस विभीषिका को झेला है इसलिए जानती हूँ, मेरे ससुर जी तम्बाकू खाते थे और उससे ही उन्हें कैंसर की शुरुआत हुई थी. उनके कष्ट को मैं नहीं झेल सकती थी लेकिन मैंने बहुत कुछ झेला. इस लिए यही चाहती हूँ कि कोई और क्यों झेले? अगर मेरे इस जानकारी भरे आलेख से कुछ लोगों ने भी इस का सेवन छोड़ दिया तो मेरा लेखन सार्थक हो जाएगा. इसीलिए मैं इसको आज कई ब्लॉग में डालूंगी.
                    तम्बाकू धूम्र सहित और रहित दोनों से तरीके से सेवन की जाती है. सिगरेट, बीडी, सिगार , चिलम, हुक्का आदी धूम्रपान के साधन है और तम्बाकू, चाहे उसे सीधे खाएं या पान में या पानमसाले के रूप में सब घटक हैं. इस तरह से इस बारे में अपनी जानकारी के अनुरुप आपको बतलाने की कोशिश कर रही हूँ.


आँख और कान - जब धूम्रपान करते हैं तो उसका धुंआ पूरे श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है. जिसका प्रभाव अन्धपन और श्रवण ह्रास के रूप में प्रकट हो सकता है. 
मुँह और दाँत -  इसका सीधा सम्बन्ध मुँह से ही होता है, इससे दांतों में विकार, मसूड़ों में विकार और मुख कैंसर होने की पूरी पूरी संभावना बन जाती है. अब भी देर नहीं होती है, अगर आप इसका उपयोग करते हैं और अपने मुँह को खोल कर देखें अगर वह पूरा नहीं खुल रहा है तो उसके लिए तुरंत डॉक्टर के पास जाकर सलाह ले सकते हैं. अगर मुँह के अन्दर दोनों ओर सफेद लाइने या फिर सफेदी आ रही हैं तब भी आप कैंसर की ओर कदम बढ़ा रहे हैं लेकिन रोका जा सकता है. 


फेफड़े - सिगरेट और इसी श्रेणी की तमाम चीजें सीधे फेफड़ों को प्रभावित करती हैं और इससे खांसी, टी बी, कैंसर , ब्रोंकाइटिस , इन्फैसेमा आदी रोग हो सकते हैं.

मांसपेशियां और जोड़ - धूम्रपान मांसपेशियों से आक्सीजन खीचकर आपको कमजोर बनाता है और साथ ही जोड़ों के लिए दर्द युक्त संधि शोथ के खतरे को बढ़ा सकता है.

मष्तिष्क - मानव शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग, जिससे कि सम्पूर्ण शरीर का सञ्चालन होता है. निकोटिन इन पदार्थों में होता है और ये मनुष्य को अपना आदी बना लेता है. ये जब मष्तिष्क में प्रवेश करती तो आपको लगता है की आप बहुत ही अच्छा अनुभव कर रहे हैं , तनाव मुक्त हो रहे हैं जब कि वह आपके मष्तिष्क को शिथिल कर देती है. इसके पश्चात की स्थिति में आप व्यग्र , उत्तेजित और हतोत्साहित हो जाते हैं. 

गला - सिगरेट , तम्बाकू, पानमसाला गले और स्वरयंत्र के कैंसर का कारण हो सकता है क्योकि यही से होकर तम्बाकू अंदर प्रवेश करती है या धुआं अंदर जाता है. 

ह्रदय - धूम्र  सहित या धूम्र रहित तम्बाकू की निकोटीन रक्त नलिकाओं को संकुचित करती है और जो आपके हृदय को अधिक कार्य करने के लिए मजबूर करती हैं. धूम्रपान धमनियों को भी अवरुद्ध कर सकता है जो की हार्ट अटैक तथा स्ट्रोक्स का कारण बनाता है. धूम्रपान शिराओं में जमकर उन्हें संकुचित और अवरुद्ध करता है जो की हृदयाघात का कारण बनाता है. 

अन्य रोग - धूम्रपान या अन्य वस्तुएं गुर्दे, पैन्कियाज, पेट, प्रजानना अंगों के कैंसर के खतरे को बढ़ता है इससे प्रजनन क्षमता भी क्षीण होती है कभी कभी समाप्त तक हो जाती है. 

                    मेरी करबद्ध प्रार्थना है की इसको पढ़ाने वाले सभी बन्धु अगर खुद इसके ग्रसित नहीं हैं तो जो उनके मित्र हों उनके इस बारे में जरूर अवगत कराएँ तभी मेरे इस आलेख की सार्थकता सिध्ध होगी.
 

बुधवार, 26 मई 2010

जहाँ डाल डाल पर सोने की............... !



 जहाँ  डाल डाल पर  सोने  की  चिड़ियाँ करती हैं  बसेरा  ..............

        इस सोने की चिड़िया वाले देश में अब इंसान माटी के मोल बिक रहे हैं. मध्य प्रदेश में ९ आदिवासी ने ५० हजार में खुद को बेच दिया . कभी सोचा है किसी ने क्यों?
                         पेट की आग ऐसी  होती है कि कभी अपने और कभी बच्चों के पेट की आग शांत करने के लिए - माँ खुद को बेचती है और कभी बाप अपने ही बच्चों को बेच देता है. नाबालिग लड़की किसी बूढ़े के हाथ बेच दी जाती ताकि बाकी बच्चों के लिए वे रोटी जुटा सके. ये गरीबी उनकी नियति है और हमारे देशमें विश्व के पटल पर बड़े बड़े कीर्तिमान स्थापित किये जा रहे हैं. हमारे सांसद अक्सर विदेश यात्राओं का सुख उठाते रहते हैं और लाखों रुपये खर्च करते रहते हैं. क्या किसी को अपने ही क्षेत्र की इस बात का ज्ञान नहीं है कि लोग क्यों बिक रहे हैं? और जो खरीदेगा वह उनके लिए कालीन बिछा कर नहीं बैठा है कि तुम आओ और सो जाओ. खून की बूँद तक निचोड़ लेते हैं तब मुहैया होती है रोटियां. कितने बच्चे किसी हलवाई की दुकान के आगे या पीछे खड़े होते हैं कि खाने  वाला दोने फेंके और वे उसे उठ कर चाट लें और कुछ तो पेट की आग शांत होगी.  ऐसा भूखा और नंगा है हमारा देश - हम इस सत्यता से मुंह क्यों चुराना चाहते हैं?  वे जो गद्दी लिए बैठे हैं, उनकी आँख का चश्मा उतर चुका है .
                           उन्हें न देश में पानी की त्राहि त्राहि नजर आती है और नहीं बिजली की कमी से बंद होते रोजगार के अवसर. कितने श्रमिक सडकों पर आ चुके हैं. किसी प्रदेश में इन रोजमर्रा की जरूरतों से अधिक जरूरी पार्कों और मूर्तियों की जरूरत है. एक गैर जिम्मेदार सरकार जिस पर निजाम की तरह कोई अंकुश नहीं है. अपने हाथ हम पहले ही कटवा चुके हैं और काटने वाले अब उसमें सुधार के इच्छुक भी नहीं है क्योंकि वे सब हैं एक ही थैली के चट्टे -बट्टे. देश की राजधानी में बैठे सांसदों को अपने वेतन और भत्तों में तीन गुनी बढ़त चाहिए क्योंकि उनका खर्च नहीं चल पा रहा है. अरे इन लोगों से पूछो कि जो खुद को बेचकर परिवार पालने जा रहे हैं और एक तुम हो तुम्हारा पेट सिर्फ पैसों से ही भरता है और उसमें भी कम नजर आता है.
                            इतनी बड़ी संसद में कौन सा सांसद ऐसा है जिसने कभी कहा हो की हमारे वेतन और भत्तों के कुछ प्रतिशत देश की दशा सुधारने में लगा दिया जाय. उनके वेतन और भत्तों की फेहरिस्त देख ली जाए तो लगता है कि ये धंधा अच्छा है, साम दाम दंड भेद बस एक बार संसद में पहुँच जाओ फिर तो सात पीढ़ियों के पौ बारह. कुछ तो वहाँ सिर्फ पार्टी के नमूने बने बैठे रहते हैं और कभी कभी मतदान में संख्या बढ़ाने के लिए ही होते हैं. जिस देश को चूस कर खाने के लिए इतने सारे विधायक और सांसद होंगे वहाँ इंसान खुद को बेचेगा नहीं तो क्या इन जैसों की भूख कभी शांत होगी? कभी नहीं, इनके पास कोई विकास का प्रश्न नहीं होता है ? बस संसद में बैठ कर हंगामा करने के लिए सत्र बुलाये जाते हैं .
                          इस सोने की चिड़िया देश में कुछ नौकरशाह और सांसद ही करोड़ों की संपत्ति के मालिक होते हैं.  वर्ना आम आदमी तो देश की जनगणना के लिए है और रात दिन मेहनत करके दो जून की रोटी कमाने के लिए है. ये सरकार में बैठे हुए लोग - करों के नाम पर रिक्शे वाले, छोटी दुकान वाले, पालिश वाले , सब्जी वाले सब से तो सेवाकर  उगाही कर रहे हैं. ये बेचारे सारे दिन के बाद शाम को नमक रोटी ही खा लें बहुत है क्योंकि देश की बढती मंहगाई ने इन्हें पहले से ही भूखे मारने की ठान रखी है. उन्हें कुछ देने के बजाय उनकी कमाई से छीन लेने के लिए क़ानून बनाये जाते हैं और जिन्हें लाखों में मिल रहे हैं - वे बेचारे और लाखों की जुगाड़ में भूखें हैं पता नहीं कितनों की रोटी छीन  कर ये खायेंगे तब इनका पेट भरेगा. ये सोने की चिड़िया वाला देश अपने ही नौनिहालों को भूखा मरता देख कर रो रहा है क्योंकि सोने की चिड़िया तो खाई नहीं जा सकती और खाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं है.
      वे बिक रहे हैंं और हम खरीदार हैं
    बिकाऊ तो हम भी हैं 
लेकिन हमारी कीमत करोड़ों की होती है
ये बेईमानो!  भारत माँ अपनी किस्मत रोती है. 
ऐसे लालों से तो वो निपूती ही होती.
दूसरे के लालों को अपना कह कर 
मुस्कराते चेहरे को देख
चैन से सोती तो होती. 
    लाखों शहीद  देख कर 
  अपने बलिदान की दुर्दशा 
सोचा न था कि उनकी क़ुरबानी को
तुम इस तरह से भुनाओगे. 
देश को ही तुम बेच कर खा जाओगे.

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

पृथ्वी दिवस आज है !



आज पृथ्वी दिवस है - २२ अप्रैल !  ये जीवन दायिनी धरती माँ हमें सब कुछ देती रही है और आज भी दे रही है. लेकिन जब हम उसके पास कुछ बचने दें. उसके श्रृंगार वृक्षों को हमने उजाड़ दिया, उसके जल स्रोतों को हमने इस तरह से दुहा है कि वे भी अब जलविहीन हो चले हैं. इसके गर्भ  में इतने परीक्षण  हम कर चुके हैं कि उसकी कोख अब बंजर हो चुकी है. अब भी हम उसके दोहन और शोषण से थके नहीं हैं. अब भी हम ये नहीं सोच पा रहे हैं कि जब ये नहीं रहेगी तो क्या हम किसी नए ग्रह  की खोज करके उसपर चले जायेंगे. जैसे की गाँव छोड़ कर शहर आ गए. वहाँ अब कुछ भी नहीं रह गया है - खेतों को बेच कर मकान बनवा लिए. अब खाने की खोज में शहर आ गए. कुछ न कुछ करके गुजारा कर लेंगे.
                                 हम क्यों रोते हैं कि अब मौसम बदल चुके हैं, तापमान निरंतर बढ़ता चला जा रहा है. इसके लिए कौन दोषी है? हम ही न, फिर रोना किस बात का है? हमारी अर्थ की हवस ने , धरती जो कभी सोना उगला करती थी, केमिकल डाल डाल कर बंजर बना लिया. फसल अच्छी लेने के लिए उसको बाँझ बना दिया. ये कृत्रिम साधनों से जो उसका दोहन हो रहा है उससे हमने गुणवत्ता खोयी है.
                              हर साल २२ अप्रैल को धरती को बचाने के लिए और उसके बचाव के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए इस दिवस का आयोजन किया जाता है.  पूरी दुनियाँ इस धरती को माँ नहीं कहती, कालांतर में आदमी सुबह उठकर  उस पर पैर रखने से पहले उसके स्पर्श को अपने मस्तक पर लगता था. ये मैंने अपने घर में ही देखा है. खेतों की पूजा होते देखी है. विश्व में इसको एक ग्रह  ही माना जाता है और फिर भी विश्व के किसी और देशवासी ने इस ग्रह को बचाने के लिए ये मुहिम शुरू की थी. ये व्यक्तित्व है जो अपनी दृढ इच्छाशक्ति के लिए विख्यात है - अमेरिका के पूर्व सीनेटर गेलार्ड नेल्सन.

                इस दिवस के आरम्भ करने की मुहिम के पीछे क्या अवधारणा थी ?  इस बारे में कुछ बातें  उन्हीं की जुबानी मिली है, जो मैं  दैनिक जागरण के साभार यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ.


" पृथ्वी दिवस का मकसद क्या था? कैसे हुई इसकी शुरुआत? ये प्रश्न हैं जिन्हें लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं. वास्तव में  पृथ्वी दिवस का विचार मेरे दिमाग में १९६२ में आया और सात साल तक चलता रहा. मुझे इस बात से परेशानी थी की हमारे पर्यावरण संरक्षण हमारे राजनीतिक एजेंडे में शामिल नहीं है. नवम्बर १९६२ में मैंने इस विचार से राष्ट्रपति कैनेडी को अवगत करने और मुद्दे को उठाने के लिए उनको राष्ट्रीय संरक्षण यात्रा करने के लिए मनाने की सोची. एटार्नी जनरल राबर्ट कैनेडी से इस प्रस्ताव के बारे में बात करने के लिए मैं वाशिंगटन  गया. विचार उनको पसंद आया. राष्ट्रपति को भी यह पहल पसंद आई . सितम्बर १९६३ में राष्ट्रपति ने ग्यारह प्रान्तों की अपनी पांच दिवसीय संरक्षण यात्रा शुरू की. लेकिन कई कारणों से इसके बाद भी मुद्दा राष्ट्रीय एजेंडा नहीं  बन सका. इस बीच मैं पर्यावरणीय  मुद्दों पर लगातार जनता के बीच आवाज उठाता रहा. पूरे देश में पर्यावरण में होने वाले नुकसान को स्पष्ट देखा जा सकता था. लोग पर्यावरण सबंधी मुद्दों पर चिंतित थे लेकिन राजनीतिज्ञों के कानों पर जून नहीं रेंग रही थी. १९६९ की गर्मियों के दौरान वियतनाम युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन कालेजों के कैम्पस तक पहुँच चुका था. यही मेरे जेहन में यह ख्याल आया कि क्यों न पर्यावरण को हो रहे नुकसान के विरोध के लिए व्यापक जमीनी आधार तैयार क्या जाए. सितम्बर १९६९ में सिएटल में एक जनसभा में मैंने घोषित किया की १९७० के वसंत ऋतू में पर्यावरण मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रदर्शन किया जाएगा. भागीदार बनाने के लिए सबका आह्वान किया. अख़बारों में इस खबर को अच्छी तरीके से कवर किया गया. इसके बाद खबर फैलते देर नहीं लगी . टेलीग्राम, पत्र और टेलीफ़ोन के माध्यम से इस विषय में अधिक जानकारी के लिए देश भर से तांता लगा गया. जन-जागरण शुरू हो चुका था. मैं अपने मिशन में कामयाबी की ओर बढ़ रहा था अंततः २२ अप्रैल १९७० को २ करोड़ के विशाल जाना समुदाय के बीच पहला पृथ्वी दिवस मनाया गया."
                              जब ये काम ४० वर्षों से चल रहा है तब हमारी पृथ्वी की ये हालत है अगर हम अब भी नहीं चेते तो ये ज्वालामुखी, भूकंप , सुनामी और भूस्खलन - जो इस पृथ्वी के पीड़ा के प्रतीक हैं, इस पृथ्वी को नेस्तनाबूद कर देंगे. ये मानव जाति जो अपने शोधों पर इतरा रही है, कुछ भी शेष नहीं रहेगा. इस लिए आज ही और इसी वक्त संकल्प लें कि पृथ्वी को संरक्षण देने के लिए जो हम कर सकेंगे करेंगे और जो नहीं जानते उन्हें इससे अवगत कराएँगे या फिर अपने परिवेश में इसके विषय में जागरूकता फैलाने के लिए प्रयास करेंगे.  जब धरती माँ नहीं रहेगी तो उसकी हम संताने होंगे ही कहाँ? इस लिए हमें भी रहना है और इस माँ को भी हरा भरा रखना है ताकि वह खुश रहे और  हम भी खुश रहें.

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

झंडा ऊँचा रहे हमारा!


    तिरंगा - एक तीन रंग के कपड़े के टुकड़ों से बना और उस पर एक चक्र.
                  राष्ट्रीय त्योहारों पर बड़ी शान से फहराया जाता है और राष्ट्रीय शोक पर झुकाया जाता है. 
--ये क्या मायने रखता है? 
--एक भारतीय के लिए, 
-- हमारे सैनिकों के लिए , 
ये हमारे दिल से पूछो - वह भी अगर हम सच्चे भारतीय हैं तो? 
              इस आलेख में कुछ चित्रों को मैंने लगाया है और ये चित्र मुझे मेरे कुछ प्रिय बच्चों ने भेजे इस शीर्षक के साथ:

Fwd: I wish this mail reaches right ppl .....!!

मैंने इसे अपने कुछ और परिचितों को फॉरवर्ड किया क्योंकि ये सवाल और अपमान एक कपड़े के टुकड़े का नहीं है बल्कि इस तिरंगे की शान के लिए बर्फ की चोटियों पर हाड़  कंपकंपा देने वाली सर्दी में हमारे सैनिक सीमा की निगहबानी कर रहे हैं. उनके लिए ये तिरंगा एक जज्बा है, आत्म सम्मान है और जान की कीमत से अधिक इसकी कीमत है. अपने घरों से , घरवालों से दूर महीनों अपनी देश की रखवाली के लिए तैनात रहते हैं . इन चित्रों को शायद वे देख भी नहीं पायें. 
            कहाँ गए वे लोग जिन्होंने इस तिरंगे के लिए -
           
          झंडा ऊँचा रहे हमारा
         विजयी विश्व तिरंगा प्यारा . 

 ये गान लिखा था, और स्कूल में इसी गान के साथ हम अपनी पढ़ाई शुरू करते थे. आज कुछ अलगाववादी इसको लेकर शर्मनाक व्यवहार करने में भी नहीं चूक  रहे हैं. इस  जमीं  पर  रहना  इसी के हवा और पानी से जीवन लेना फिर इसकी सरहद को घायल  करने की साजिश से बाज क्यों नहीं आते? क्या मिलता है इनको इस बेसबब काम करने से. अगर नहीं रास आता है तो मत रहो इस तिरंगे की छाँव में. 
अनुमान लगाइए कि ये  कहाँ का चित्र हो सकता है? 
पूरे भारत में एक ही जगह है, जहाँ देश में रहकर भी भारतीय न होने का दावा करते हैं.  झंडे का अपमान करते हैं. क्या कभी इन चित्रों को हमारी मीडिया ने दिखाया है?
अगर दिखाया भी हो तो आम आदमी इन तस्वीरों से रूबरू शायद ही हुआ हो. हम किस के धर्म की बात करें?  राष्ट्र धर्म की बात - ये उसके भी विरुद्ध है और उससे अधिक गुनाहगार है हमारा प्रशासन. इन दृश्यों को सिर्फ इस भीड़ ही ने नहीं देखा है बल्कि उसने भी देखा है जो इन तस्वीरों का गवाह है. ये प्रश्न कभी नहीं उठाया गया? सानिया ने निकाह किया तो सौ सवाल उठे--
-सानिया किस देश का प्रतिनिधित्व करेगी? 
-सानिया ने शोएब से निकाह करके अच्छा नहीं किया? 
-क्या भारत में युवकों की कमी आ गयी थी? 
                    मीडिया ने भी हर पल की खबर रखते हुए  पूरे पूरे दिन यही खबरें प्रसारित की. वो उनका धर्म है, किन्तु अगर देश जल रहा है, देश अपमानित हो रहा है, भारत माँ का आँचल जलाया जा रहा है तो उसको खबर नहीं लगी या फिर इस बेमतलब की खबर में मसाला नहीं है कि लोग उसकी ओर आकर्षित हों.  पत्रकारिता धर्म भूल गयी, अभिव्यक्ति के अधिकार कि बात भूल गयी. सच के  बेबाक प्रस्तुति की बात भूल गयी. कश्मीर में अमरनाथ तीर्थ यात्रियों के हाथ से छीन कर कश्मीर पुलिस तिरंगा जला देती है और कोई खबर नहीं होती है. कश्मीर के कुछ हिस्से में स्वतंत्रता दिवस १४ अगस्त को मनाया जाता है, यहां तक की सरकारी भवनों पर झंडा फहराया जाता है और १५ अगस्त को तिरंगा जलाया जाता है. फिर भी सब खामोश हैं. न मीडिया और न ही सरकार किसी को इसकी खबर नहीं होती है या फिर अपने अपने पद के छिनने के भय से चुप्पी साधे रहते हैं.
                        अगर सचिन तेंदुलकर  तिरंगा केक काट देते हैं तो विवाद उठ खड़ा होता है, मंदिरा बेदी तिरंगे के रंगों की साड़ी पहन लेती हैं तो विवाद होता है लेकिन तिरंगा आग के हवाले कर दिया जाता है तो मीडिया अनदेखी कर देती है कोई भी 'ब्रेकिंग न्यूज ' नहीं बनती है. 
                        इस तिरंगे के अपमान के लिए मैं तो देश के जिम्मेदार लोगों की निंदा करती हूँ. जो इस विषय को जान बूझ कर उजागर नहीं करते हैं. क़ानून के दायरे में लाना तो बहुत बड़ी बात है. इस स्वतन्त्र देश में तिरंगे को अपमानित करना एक अक्षम्य अपराध होना चाहिए. 
ये तस्वीरें इस बात की गवाह हैं कि पाकिस्तान की किसी भी हरकत को यहाँ पूरी तरह से समर्थन मिलता है और इस बात के लिए कश्मीर की सरकार भी दोषी है , जिसे इस तरह की घटनाओं के घटित होने पर कोई भी कार्यवाही न करने पर शर्म नहीं आती है. ये वो भारतीय हैं जो देश के नाम पर कलंक हैं.