कभी फिल्मी पत्रिका के लेख और कभी कोई और आलेख चर्चा का विषय बनाये ही था. लेखन में समाज और अन्याय के प्रति आक्रोश शुरू से ही था और मेरी सारी रचनाएँ ऐसी ही होती थी. मैं कोई बहुत बड़ी तो थी नहीं और न ही बड़े शहर की रहने वाली एक क़स्बा है ( अब नहीं रहा क़स्बा) सब एक दूसरे को जानने वाले , फिर मेरे पापा उरई में सम्मानित व्यक्तियों में थे और भाई साहब भी B .Sc . करके इंटर कॉलेज में अध्यापक हो गए थे. वह भी बड़े सिद्धांतवादी थे क्या, आज भी वैसे ही हैं? उन्हें कोई बात गलत पता चलती तो कहते - 'रेखा इस पर ऐसा लिखो कि पढ़ कर ये ऐसे काम करना भूल जाए.'
जो आलेख मेरे को लगते कि कोई वबाल खड़ा हो सकता है वह मैं 'भावना' नाम से लिखने लगी. सिर्फ मेरी बहनों बाकी किसी को नहीं. उस समय कुछ विषय ऐसे थे जिनपर सबके सामने बात नहीं होती थी और उन पर लिखना भी अच्छा नहीं समझती थी . इस लिए ऐसे हॉट विषय पर उस समय ये हॉट कि श्रेणी में ही आते थे.
उसी समय भोपाल के प्रतिष्ठित लेखक जगदीश किंजल्क से संपर्क हुआ. उनहोने एक परिचर्चा आयोजित की.
"विवाह में वैदिक रीति अधिक उचित या अन्य" ऐसा ही कुछ विषय था . मैंने वैदिक रीति का समर्थन किया और आज भी करती हूँ, वैदिक मन्त्रों की महत्ता को मैं बहुत मानती हूँ और इसको अनुभूत किया है. बस उसका छपना था की शादी के प्रस्ताव आने शुरू हो गए. हर दूसरे पत्र में प्रस्ताव. हम भाई बहन मजे ले लेकर पढ़ते और फिर रख देते.
अब तो मोहल्ले वालों को भी चिंता होने लगी की लड़की के नाम इतने सारे ख़त आते हैं, जरूर कुछ गड़बड़ है इसकी शादी हो जानी चाहिए. अब मोहल्ले की महिलाओं ने आकर मेरी माँ को समझाना शुरू किया कि अगर कहीं बदनाम हो गयी तो कोई शादी भी नहीं करेगा. कहीं कुंवारी लड़कियों के नाम इतने ख़त आते हैं. मेरे घर में भी तो हैं, रिश्तेदारों के भी इनके ही नाम आते हैं. मैं उस मंडली में कोई रूचि नहीं रखती थी. हाँ माँ ने कहा तो चाय नाश्ता बना कर दे दिया . मेरी छोटी बहने ये काम करती थी. पहले सुनती और फिर जाकर मुझे बताती. मेरी माँ भी गाँव की थी फिर इन सबसे उनका कोई वास्ता नहीं था. फिर एक दिन ऐलान हुआ कि ये लिखना विखना बंद करो. ये सब अपने घर में जाकर करना. वो ऐसे कह रही थी, वो ऐसे कहती है. मुझे इज्जत से शादी कर लेने दो मेरी अभी और भी लड़कियाँ हैं. मेरे बाद मेरी ३ बहने छोटी थी. बात पापा के पास तक गयी क्योंकि माँ के हथियार तो वही थे.
पापा मेरे प्रबुद्ध व्यक्ति थे और वे खुद भी लिखते थे. उन्होंने माँ को समझाया की ऐसा नहीं होता है, ये औरतें तो बिना पढ़ी लिखी हैं तो क्या तुम भी ऐसे ही करोगी? वो जो कर रही है उसको करने दो. शादी भी हो जायेगी अभी उसको पढ़ने दो.
इस समय तक मेरे आलेख मनोरमा में छपने लगे थे. मनोरमा ऐसी पत्रिका थी कि महिलाओं की पत्रिका करीब सभी के घर तो नहीं आती लेकिन हाँ आम घरों तक आती ही थी और उसमें लिखा हुआ सब पढ़ते थे. उस समय भी नारी, सामाजिक मुद्दे ही मेरे लेखन के विषय थे.
मनोरमा में "आपके पत्र' नाम से कालम आता था और मैं उसी में अपनी बात कह पाती थी , सब उसको चाव से पढ़ते थे. मेरे एक बहुत दूर के रिश्तेदार थे, उनकी तीन बहुएं जलकर मरी और दो बेटों की. एक दिन बताने चली आई कि उसकी शादी वाले आ रहे हैं लोग भड़का देते हैं, अगर हमारे पास पैसा है तो हम अभी चार शादियाँ और कर लेंगे. मुझे सुनकर बहुत बुरा लगा कि एक तो जल कर मार डाला और फिर ये तुर्रा. मैंने उनको लक्ष्य करके मनोरमा में भेज दिया और जब प्रकाशित हो गया तो समझा ही जा सकता कि वो दनदनाती हुई मेरे घर आ गयी कि कैसे रिश्तेदार हो तुम ? बात को ऐसे फैलाया जाता है, हम भी देख लेंगे अभी तुम्हें ४-४ लड़कियों की शादी करनी है. मेरी माँ तो बैठ कर रोने लगी , मुझे भी डर लगा कि कहीं पापा कुछ न कहें. भाई साहब आये तो पता चला. मैंने अन्दर कमरे में जाकर लेट गयी. मुझे बुलाया गया. माँ इस आशा में कि भाई साहब अब मुझे डांट लगायेंगे बिल्कुल एलर्ट बैठ गयी.
'हाँ , रेखा किसपर लिखा था तुमने?'
'उन्हीं की बहुयों के जलाने पर लिखा था.' मैं डांट पड़ने के डर से बहुत धीमे धीमे बोल रही थी.
'ये तो तुमने बहुत अच्छा किया , ऐसे लोगों को चौराहे पर खड़ा करके जूते भी लगाये जाएँ तो कम है.'
मेरी तो आँखे चमक उठी और माँ शांत हो गयीं की अब तो ये मानने वाली नहीं. पापा और भाई साहब की शह मिल रही है.
मेरा काम अपनी गति से चलने लगा. अब मुझे किसी कि भी परवाह नहीं थी. मेरी अभिव्यक्ति और विचारधारा वैसे ही आज भी है, आदर्शों और सिद्धांतों पर चलाने वाली अगर कुछ गलत है तो गलत है चाहे उसके करने वाला मेरा अपना खास ही क्यों न हो. मेरी लेखनी के शिकार मेरे अपने बहुत करीबी भी बने और मैंने बेबाकी से ही लिखा. वह बात और है कि उ सा बात का उलाहना मेरे पापा या भाई साहब को सुनने को मिला हो. मिलता रहता था और वे अपने ढंग से उससे निपटते रहते थे. बस मुझे बता देते कि आज तुम्हारे इस लिखने से ये हुआ.
इन्हीं के साथ एक कटु अनुभव ये भी हुआ कि मेरी एक शिक्षिका थी अब रिटायर हो चुकी थी लेकिन उन्होंने मुझे बचपन में पढ़ाया था और हम उनको 'चाची बहनजी ' कहते थे. घर से बहुत दूर नहीं रहती थी. पता चला कि उनकी पुत्रवधु उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार करती है. सबसे बुरी बात जो मेरे दिल को लगी वो ये थी. कि चाची बहनजी हमेशा एकदम सफेद साड़ी पहनती थी. अब सुना कि बहू अपने कपड़े धो कर उससे निकले साबुन में कहती कि अब अपनी साड़ी इसमें धो लेना. हो सकता है कि ये आपको कहानी लगती हो लेकिन ऐसा ही था और इससे भी बहुत अधिक सुना. मेरा मन तो रो दिया. हमेशा स्मार्ट रहने वाली मेरी वो शिक्षिका आज इस हाल में. फिर क्या था मेरी वेदना बह निकली और निकल कर इस रूप में आ गयी.
मनोरमा आई नहीं कि ये खोज शुरू हो गयी कि ये रेखा श्रीवास्तव है कौन? मेरा घर बहुत दूर नहीं था और सब आपस में परिचित भी थे. इत्तेफाक से उनके पुत्र मेरे भाई साहब के कालेज में ही टीचर थे. कैर उनको पता चल गया कि ये रेखा श्रीवास्तव है कौन? फोटो उसमें बहुत साफ नहीं छपा था फिर भी पता चलना कोई बड़ी बात नहीं थी . फिर क्या था? एक दिन कॉलेज में स्टाफ रूम में भाई साहब से बोले - 'विनोद तुम्हारी सिस्टर ने ये ठीक नहीं किया?'
'क्या ठीक नहीं किया? क्या किया है उसने? ' भाई साहब को पता था लेकिन उन्होंने भी नाटक किया.
'यही जो मनोरमा में निकाला है, कितनी बदनामी हो रही है?' वे गुस्से में थे.
उसमें उनका नाम कहीं भी नहीं दिया था. लेकिन कहानी अपनी हो तो सबको पता चल जाता है.
'देखो, मेरी सिस्टर लिखती है, और वह क्या लिखती है इससे मेरा कोई सरोकार नहीं. वह लिखने के लिए फ्री है. अगर तुम्हें लगता है तो जाकर उस पर मानहानि का मुकदमा कर दो.' भाई साहब ने दो टूक जबाव दिया था.
अब तो स्टाफ रूम में सभी टीचर ' अरे विनोद रेखा ने क्या लिखा है? यहाँ लाओ हम भी पढ़ें?' लोगों को तो मजा आता है किसी कि बात का बतंगड़ बनाने. भाई साहब ने आकर मुझे बताया मैंने कहा - ' ये स्टाफ रूम में नहीं जायेगी , अगर उनमें जरा सी भी गैरत होगी तो वे अपने व्यवहार को सुधारने का प्रयास करेंगे.' (क्रमशः)
जो आलेख मेरे को लगते कि कोई वबाल खड़ा हो सकता है वह मैं 'भावना' नाम से लिखने लगी. सिर्फ मेरी बहनों बाकी किसी को नहीं. उस समय कुछ विषय ऐसे थे जिनपर सबके सामने बात नहीं होती थी और उन पर लिखना भी अच्छा नहीं समझती थी . इस लिए ऐसे हॉट विषय पर उस समय ये हॉट कि श्रेणी में ही आते थे.
उसी समय भोपाल के प्रतिष्ठित लेखक जगदीश किंजल्क से संपर्क हुआ. उनहोने एक परिचर्चा आयोजित की.
"विवाह में वैदिक रीति अधिक उचित या अन्य" ऐसा ही कुछ विषय था . मैंने वैदिक रीति का समर्थन किया और आज भी करती हूँ, वैदिक मन्त्रों की महत्ता को मैं बहुत मानती हूँ और इसको अनुभूत किया है. बस उसका छपना था की शादी के प्रस्ताव आने शुरू हो गए. हर दूसरे पत्र में प्रस्ताव. हम भाई बहन मजे ले लेकर पढ़ते और फिर रख देते.
अब तो मोहल्ले वालों को भी चिंता होने लगी की लड़की के नाम इतने सारे ख़त आते हैं, जरूर कुछ गड़बड़ है इसकी शादी हो जानी चाहिए. अब मोहल्ले की महिलाओं ने आकर मेरी माँ को समझाना शुरू किया कि अगर कहीं बदनाम हो गयी तो कोई शादी भी नहीं करेगा. कहीं कुंवारी लड़कियों के नाम इतने ख़त आते हैं. मेरे घर में भी तो हैं, रिश्तेदारों के भी इनके ही नाम आते हैं. मैं उस मंडली में कोई रूचि नहीं रखती थी. हाँ माँ ने कहा तो चाय नाश्ता बना कर दे दिया . मेरी छोटी बहने ये काम करती थी. पहले सुनती और फिर जाकर मुझे बताती. मेरी माँ भी गाँव की थी फिर इन सबसे उनका कोई वास्ता नहीं था. फिर एक दिन ऐलान हुआ कि ये लिखना विखना बंद करो. ये सब अपने घर में जाकर करना. वो ऐसे कह रही थी, वो ऐसे कहती है. मुझे इज्जत से शादी कर लेने दो मेरी अभी और भी लड़कियाँ हैं. मेरे बाद मेरी ३ बहने छोटी थी. बात पापा के पास तक गयी क्योंकि माँ के हथियार तो वही थे.
पापा मेरे प्रबुद्ध व्यक्ति थे और वे खुद भी लिखते थे. उन्होंने माँ को समझाया की ऐसा नहीं होता है, ये औरतें तो बिना पढ़ी लिखी हैं तो क्या तुम भी ऐसे ही करोगी? वो जो कर रही है उसको करने दो. शादी भी हो जायेगी अभी उसको पढ़ने दो.
इस समय तक मेरे आलेख मनोरमा में छपने लगे थे. मनोरमा ऐसी पत्रिका थी कि महिलाओं की पत्रिका करीब सभी के घर तो नहीं आती लेकिन हाँ आम घरों तक आती ही थी और उसमें लिखा हुआ सब पढ़ते थे. उस समय भी नारी, सामाजिक मुद्दे ही मेरे लेखन के विषय थे.
मनोरमा में "आपके पत्र' नाम से कालम आता था और मैं उसी में अपनी बात कह पाती थी , सब उसको चाव से पढ़ते थे. मेरे एक बहुत दूर के रिश्तेदार थे, उनकी तीन बहुएं जलकर मरी और दो बेटों की. एक दिन बताने चली आई कि उसकी शादी वाले आ रहे हैं लोग भड़का देते हैं, अगर हमारे पास पैसा है तो हम अभी चार शादियाँ और कर लेंगे. मुझे सुनकर बहुत बुरा लगा कि एक तो जल कर मार डाला और फिर ये तुर्रा. मैंने उनको लक्ष्य करके मनोरमा में भेज दिया और जब प्रकाशित हो गया तो समझा ही जा सकता कि वो दनदनाती हुई मेरे घर आ गयी कि कैसे रिश्तेदार हो तुम ? बात को ऐसे फैलाया जाता है, हम भी देख लेंगे अभी तुम्हें ४-४ लड़कियों की शादी करनी है. मेरी माँ तो बैठ कर रोने लगी , मुझे भी डर लगा कि कहीं पापा कुछ न कहें. भाई साहब आये तो पता चला. मैंने अन्दर कमरे में जाकर लेट गयी. मुझे बुलाया गया. माँ इस आशा में कि भाई साहब अब मुझे डांट लगायेंगे बिल्कुल एलर्ट बैठ गयी.
'हाँ , रेखा किसपर लिखा था तुमने?'
'उन्हीं की बहुयों के जलाने पर लिखा था.' मैं डांट पड़ने के डर से बहुत धीमे धीमे बोल रही थी.
'ये तो तुमने बहुत अच्छा किया , ऐसे लोगों को चौराहे पर खड़ा करके जूते भी लगाये जाएँ तो कम है.'
मेरी तो आँखे चमक उठी और माँ शांत हो गयीं की अब तो ये मानने वाली नहीं. पापा और भाई साहब की शह मिल रही है.
मेरा काम अपनी गति से चलने लगा. अब मुझे किसी कि भी परवाह नहीं थी. मेरी अभिव्यक्ति और विचारधारा वैसे ही आज भी है, आदर्शों और सिद्धांतों पर चलाने वाली अगर कुछ गलत है तो गलत है चाहे उसके करने वाला मेरा अपना खास ही क्यों न हो. मेरी लेखनी के शिकार मेरे अपने बहुत करीबी भी बने और मैंने बेबाकी से ही लिखा. वह बात और है कि उ सा बात का उलाहना मेरे पापा या भाई साहब को सुनने को मिला हो. मिलता रहता था और वे अपने ढंग से उससे निपटते रहते थे. बस मुझे बता देते कि आज तुम्हारे इस लिखने से ये हुआ.
इन्हीं के साथ एक कटु अनुभव ये भी हुआ कि मेरी एक शिक्षिका थी अब रिटायर हो चुकी थी लेकिन उन्होंने मुझे बचपन में पढ़ाया था और हम उनको 'चाची बहनजी ' कहते थे. घर से बहुत दूर नहीं रहती थी. पता चला कि उनकी पुत्रवधु उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार करती है. सबसे बुरी बात जो मेरे दिल को लगी वो ये थी. कि चाची बहनजी हमेशा एकदम सफेद साड़ी पहनती थी. अब सुना कि बहू अपने कपड़े धो कर उससे निकले साबुन में कहती कि अब अपनी साड़ी इसमें धो लेना. हो सकता है कि ये आपको कहानी लगती हो लेकिन ऐसा ही था और इससे भी बहुत अधिक सुना. मेरा मन तो रो दिया. हमेशा स्मार्ट रहने वाली मेरी वो शिक्षिका आज इस हाल में. फिर क्या था मेरी वेदना बह निकली और निकल कर इस रूप में आ गयी.
मनोरमा आई नहीं कि ये खोज शुरू हो गयी कि ये रेखा श्रीवास्तव है कौन? मेरा घर बहुत दूर नहीं था और सब आपस में परिचित भी थे. इत्तेफाक से उनके पुत्र मेरे भाई साहब के कालेज में ही टीचर थे. कैर उनको पता चल गया कि ये रेखा श्रीवास्तव है कौन? फोटो उसमें बहुत साफ नहीं छपा था फिर भी पता चलना कोई बड़ी बात नहीं थी . फिर क्या था? एक दिन कॉलेज में स्टाफ रूम में भाई साहब से बोले - 'विनोद तुम्हारी सिस्टर ने ये ठीक नहीं किया?'
'क्या ठीक नहीं किया? क्या किया है उसने? ' भाई साहब को पता था लेकिन उन्होंने भी नाटक किया.
'यही जो मनोरमा में निकाला है, कितनी बदनामी हो रही है?' वे गुस्से में थे.
उसमें उनका नाम कहीं भी नहीं दिया था. लेकिन कहानी अपनी हो तो सबको पता चल जाता है.
'देखो, मेरी सिस्टर लिखती है, और वह क्या लिखती है इससे मेरा कोई सरोकार नहीं. वह लिखने के लिए फ्री है. अगर तुम्हें लगता है तो जाकर उस पर मानहानि का मुकदमा कर दो.' भाई साहब ने दो टूक जबाव दिया था.
अब तो स्टाफ रूम में सभी टीचर ' अरे विनोद रेखा ने क्या लिखा है? यहाँ लाओ हम भी पढ़ें?' लोगों को तो मजा आता है किसी कि बात का बतंगड़ बनाने. भाई साहब ने आकर मुझे बताया मैंने कहा - ' ये स्टाफ रूम में नहीं जायेगी , अगर उनमें जरा सी भी गैरत होगी तो वे अपने व्यवहार को सुधारने का प्रयास करेंगे.' (क्रमशः)










