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शुक्रवार, 27 मई 2011

गर्मियों की छुट्टी और अपना बचपन !

कितना अच्छा लगता है जब कोई हमसे कह दे कि आप फिर से एक बार अपना बचपन जी लें। क्या वह दिन वापस मिल सकते हैं - नहीं लेकिन फिर भी लगता है कि कोई लौटा दे मुझे बीते हुए दिन बीते हुए दिन और वह पल छिन आज जब सोचती हूँ तो लगता है कि हमने अपने जीवन में कितनी मस्ती की है और फिर आज के बच्चों पर नजर डालते हैं तो लगता है कि ये तो अपना बचपन पैदा होते ही खो देते हैं। माँ बाप को ये जल्दी रहती है कि किस स्कूल में इनका अभी से रजिस्ट्रेशन करवा लें। हमारे ज़माने में तो २० मई को रिजल्ट मिला नहीं कि फिर छुट्टी सीधे जुलाई को को स्कूल खुलेंगे और सके बाद ही नई किताबें और नए क्लास कि पढ़ाई शुरू होती थी। गर्मियों में कोई टेंशन नहीं। भाई बहनों के साथ मस्ती और धामा चौकड़ी। पता ही नहीं चलता था कि कब वे दिन निकाल जाते थे।
आज तो स्कूल बंद ही तब होते हैं जब बच्चों के नए क्लास कि पढ़ाई शुरू हो जाती है और मिल जाता है ढेर सा होम वर्क और प्रोजेक्ट जो बच्चों का काम बड़ों का सिर दर्द ज्यादा हो जाता है। वैसे ये सिर दर्द मैंने नहीं झेला है सो नहीं जानती कि कैसे निपटा जाता है? हम बचपन में ही स्वतन्त्र रहे और अपने बच्चों के बारे में भी। चलिए इसी विचार के चलते अपने कुछ ब्लोगर साथियों को भी मैंने बचपन में वापस जाने के लिए बहुत बहुत कहा तो वे उसमें चले गए और अपने संस्मरण मुझे लिख कर भेज दिए आपके साथ सब शेयर कर लेते हैं। इसे पढ़ कर आप भी अपने बचपन में विचर आईये।

मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का.....

हमारे साथ के किस्से, लगे हैं बात कल की हो..

बढ़ी यह दूरियाँ मेरी, न जाने कब जवानी से

जब बचपन की धुँधली यादों के बीच झँकना शुरु किया तो कुछ सुनहरी और कुछ गुदगुदाती तस्वीरें भी नजर आईं. जबकि उन तस्वीरों का मुख्य अंग मैं स्वयं था किन्तु फिर भी सुनहरी कहना पड़ रहा है. यही साहित्यिक कायदा हैं पुरानी अच्छी यादों को जतलाने का जैसे किसी भी मृत आत्मा जिसने जीते जी भले ही सबका जीना हराम कर रखा हो, उसके नाम के आगे स्वर्गीय लगाने का कायदा है. आजकल तो हमारे नेताओं के बीच एक नई परिपाटी शुरु हो गई हैं कि मृत आतंकवादी के नाम के बाद भी सम्मान के साथ 'जी' लगाने लगे हैं. अब जो कायदा चल निकले, निभाना तो पड़ता है वरना कहाँ हम और कहाँ सुनहरी तस्वीर.

गर्मी की छुट्टियाँ लगते ही सब दोस्त शाम को कॉलोनी में खेला करते थे. छोटी सी सरकारी कॉलोनी थी मात्र २० से २२ घरों की. चारों तरफ पहाड़ों के बीच घिरी. सब घर अपने से. दिन भर तेज धूप की वजह से घर से निकलने की मनाही थी. तो घर में लोटपोट, चंपक, चन्दामामा, कॉमिक्स आदि लि बैठे रहते थे. बोरियत तो होती थी. जी ललचाता था कि किसी तरह बाहर निकला जाये. माँ दोपहर में खाना खाकर सो जाती थीं मगर जरा हम दरवाजा खोलें कि झट जाग कर पूछती थीं कि क्या हुआ? और हम उल्टे पैर कमरे में वापस.

बड़ी जुगत के बाद रास्ता निकला कि अब से सब दोस्त किसी दिन किसी के घर, किसी दिन किसी के घर सारी दोपहर रहा करेंगे ताकि सब साथ भी हो जायें और धूप की बात भी न उठे. पहले दिन सब दोस्तों को अपने ही घर पर रोका. माँ ने देखा भी सब दिन भर लुडो, सांप सीढ़ी, कैरम खेलने में कमरे में मस्त हैं, तो उनको क्या आपत्ति हो सकती थी. सबको उन्होंने बेल का शरबत भी पिलाया और सूजी का हलवा भी खिलाया.

अगले दिन दूसरे दोस्त के घर सब इक्कठे हुए. सिलसिला चल निकला. लेकिन लाख सब एक जगह जमा हो जाये मगर दिल तो बाहर धूप में निकल कर नजदीक में एक तालाब था, वहाँ जा तैरने का ही रहता था. हम सबको वहाँ न जाने और न तैरने की सख्त हिदायत थी क्यूँकि मान्यता यह थी कि वो तालाब हर साल एक बलि लेता है. इसी वजह से सब ललायित रहते कि वहाँ चला जाये. बुजुर्गों के अनुभव को काट अपने को ज्यादा अक्लमंद साबित करने की जो उम्र होती है, उसी के शुरुवात में रहे होंगे हम सब तब.

तो सब दोस्तों ने अपने घर मेरे घर जाने की बात की और मैने घर में उन दोस्तों में एक के घर जाने का बता दिया. तयशुदा कार्यक्रम से सब तालाब पर मिले. दिन भर बिना कपड़ों के खूब तैरे, वरना गीले कपड़े लिए कैसे घर लौटते. अब तो हर रोज ऐसी ही मस्ती में कटने लगा. अपनी बात को वजन देने के लिए, जिसके घर का पता बता कर जाते, शाम को आकर घर पर बताते कि आज आँटी ने श्क्कर के पराठें खिलाये. तो कभी पोहे खिलाये., तो कभी कि गज़ब का सैण्डविच बना था.

काठ की हांडी कब तक चढ़ती. एक रोज जिस दोस्त के घर का बता कर निकले थे, उसकी मम्मी याने श्रीमती शर्मा जल्दी शाम हमारे घर आ पहुँची. हम मित्र अभी तालाब से लौटे भी न थे. माँ ने बात करते करते उनसे पूछ लिया कि आपने परसों सेण्डविच में क्या क्या डाला था, मेरा बेटा तो दीवाना हो गया है उसका. अब शर्मा आँटी ने सैण्डविच खिलाई हो तो बतायें? वो हाँ हूँ करती रहीं और पू बैठीं कि बच्चे नहीं दिखाई दे रहे? माँ ने बताया कि वो तो आपके घर में हैं. फिर जो भी बात हुई हो, पोल पट्टी खुल गई. बात सबके घरों तक पहुँच गई.

शाम घर लौटे तो सबकी जो धुनाई हुई कि कई दिन तक याद बनी रही. आज भी जब कभी हम दोस्त मिलते हैं तो तालाब पर तैरने चलने की बात कर उस दिन को याद करते हैं. अब तक तैरने के नाम पर वो पिटाई ही याद आती है, तैरना तो मानो हम सब भूल ही गये हैं

यह अलग बात है कि अब स्विमिंग पूल में तैरते हैं मगर तालाब में तैरने के हुनर जुदा होते हैं, वैसे ही जैसे ए सी कमरे में बैठ गरीबों की परेशानियों को नहीं आंका जा सकता मगर हो वही रहा है.

-समीर लाल 'समीर'


विभा रानी:

गर्मी के दिन और गर्मी की रातें, बचपन की यादें, छुटपन की बातें.

कहां से याद करें और कैसे याद करें बचपन की गर्मी के दिन और रातें! न जाने कितनी मुश्किलें थीं उन दिनों. फिर भी, तब बिजली इतनी आंख मिचौली नहीं खेलती थी. शाम में स्ट्रीट लाइट भी जलती और सुबह सुबह नाली साफ करने और कचरा उठाने नगरपालिका के कर्मी भी आते. घर के पिछवाडे का पोखरा तब इतना साफ था कि हम छहो भाई-बहनों ने अपनी तैराकी वहीं सीखी. एक साथ जब छहों तैरते, तब सब अपना काम छोडकर हमें देखने लगते. सब वहीं नहाते, वहीं पूजा करते. उसी में गाय और भैस भी नहातीं और हम भी शलवार में हवा भर भर कर उसके सहारे पोखरे में तैरते. वह फूली शलवार जीवन रक्षक चक्के का काम करती. कुमुदिनी के फूल भी रात में उसमें खिलते और हम उसकी बैगनी आभा निहारते मुग्ध होते रहते. दो तरफ कच्चा और एक ओर पक्का घाट थे और कच्चे से तैराकी सीखने की शुरुआत का अंत पक्के घाट पर तैरने की परीक्षा पास करने के बाद पूरी होती.

गर्मी की छुट्टियों में हम कहीं नहीं जाते. ऐसा नहीं था कि रिश्तेदार नहीं थे. बस, रिश्तों की गर्मी नहीं थी. इससे, हम सब अमूमन घर पर ही रहते. गर्मी में स्कूल कॉलेज सुबह के हो जाते. मां और हम सब स्कूल-कॉलेज से दोपहर में लौटते, खाना खाते. गर्मी में सत्तू का चोखा, खीरे का रायता और आम की चटनी खाने का मुख्य आकर्षण होते. उनके सहारे खाना तनिक चटखदार हो जाता. फिर, भरी दोपहर काटने की चिंता? ना जी ना, कोई चिंता नहीं होती. हम भर गर्मी सिलाई-कढाई का कम करते. तब लडकियों की सिलाई-कढाई उअंके गुण का एक हिस्सा मानाजाता. उनके द्वारा कढाई किए गए तकिए,चादर, टेबल क्लॉथ आदि उनके दहेजकी सामग्री बनते और कई सालों तक वे ससुराल की शोभा बढाते रहते. जिन लडकियों को यह सब नहींआता, उनकी माताओंके अनुरोध पर जानेकितने तकिए,चादर, टेबल क्लॉथ आदि बनाकर हमने उनकी जान बचाई.

तो जी, गर्मी की छुट्टी में हमारे पास अपने रुटीन खाने पीने के अलावा कई आकर्षणों में प्रमुख था, ताश खेलना. अनुशासन की गांठ में रखनेवाली मेरी मां इस समय एकदम उदार हो जाती. मां-बेटी के बीच का फर्क़ मिट जाता. मैं, मेरी बडी बहन, मेरी दो चचेरी बहनें दोपहर में जुटतीं और फिर जो 3-2-5, कोट पीस और 29 की बाज़ी जमती तो पता ही नहीं चलता, कब दिया-बाती का समय हो गया. बडे बेमन से हम उठते. उस समय कोई घूमने-घामने आ जाता तो बहुत बुरा लगता कि नाहक, हमारी ताश की बाज़ी छिन गई.

दूसरा आकर्षण था- आम. तब 2 रुपए, 5 रुपए सैकडा आम बिकते थे. हमारा आमों का बाग भी था. वहां से लंग़डा आम आते. सुबह-शाम, दोपहर और रात हम आमों का भोग लगाते, वह भी भर पेट नाश्ता-खाना खाने के बाद. जबतक थाली में गुठली और छिलके के पहाड न उठा, तबतक आम खाना क्या हुआ? बाउजी बीजू (रसवाले) आम बाल्टी में पानी भरकर और उसमें आम डालकर हम भाई-बहनों के पास रख देते और हम सब उसे चूस चूस कर मिनटों में साफ कर देते. मुजफ्फरपुरवाली लीची बाज़ार में आ जाती. उसका भी हश्र आमों की तरह ही करते. यही नहीं, उस समय का हर मौसमी फल, चाहे तरबूज हो या खरबूज, खीरा हो या ककडी, हम जी भरकर इनका आनंद लेते.

इन्हीं फलों में एक था तडकुन (ताड के फल). मां के स्कूल की एक कर्मचारी थी- जलेश्वरी.उनके यहां ताड का बाग था. वह वहां से एकदम कौले (नरम) फल लाती. उसके भीतर से निकले रस को चूसते वक्त जो आनंद मिलता, उसे सिर्फ महसूसा जा सकता है. जामुन खाकर हम अपनी बैगनी हुई जीभ सभी को दिखाते. पके कटहल से घर गनगनाता रहता. खजुआ कोए हम खाते. नेढा और गुठली की सब्जी आम के आम, गुठली के दाम कहावत को चरितार्थ करते.

गर्मी की दोपहरी का एक और आकर्षण होता, नीम्बू, बेल और सौंफ के शर्बत. चीनी की अधिक खपत के कारण यह तनिक मंहगा था. हम इंतज़ार करते किसी मेहमान का. उनके कारण अपनी दोपहरी भी शर्बतमई. इसके अलावा शाम में आंगन में खाट, चौकी डालकर, मच्छरदानी लगा कर सोना. गर्मी छुट्टी कैसे बीत जाती, पता ही नहीं चलता।
(सफर जारी है )

गुरुवार, 19 मई 2011

"आरक्षण" में दलित !




"आरक्षण " फ़िल्म में सैफ अली खां ने एक दलित के किरदार को निभाया है और उनके इस चरित्र कोनिभाने के लिए उत्तर भारत के दलितों ने विरोध किया कि एक शाही परिवार का इंसान दलित के बारे में क्याजानता है."
ये तो बही हुआ कि अगर फिल्मों में कोई तवायफ का किरदार निभाता है तो उसके लिए उसका तवायफ होना जरूरी है। ये तो हुआ अपने लेबल को भुनाने वाली बात। दलित भी इंसान है और ये कोई जन्मजात उपाधि नहीं है, इसको अगर अर्थ में देखा जाय तो यही कहना है की जो आर्थिक रूप से निम्न स्थिति में जी रहे हैं वेदलित है न कि जाति के आधार पर एक प्रशासनिक अधिकारी भी अपने को दलित कहते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी अपनेजन्म को भुनाता रहे।
कुछ दिन पहले यही बात उ प्र की मुख्यमंत्री ने भी उठाई थी कि अन्ना की समिति में कोई दलित नहींहै और अब ये बात फ़िल्म में भी उठने लगी है। मैं पूछती हूँ कि सरकारें जब दलितों के लिए आरक्षण की सीमाबढाती है या फिर उनके हित के लिए सोचती है तो क्या सारे सोचने वाले दलित ही होते हैं? अगर नहीं तो फिर उससमय चुप क्यों रहते हैं? तथाकथित दलित जो आज उच्च पदों पर काबिज हैं क्या कभी उन लोगों ने ये सोचा हैकी हम आज सक्षम हो चुके हैं और अपने परिवार को भी सक्षम बनाने में समर्थ हैं तो अपने को आरक्षण की सीमासे अलग करते हुए उनको अवसर दें जो की गाँव में रह रहे हैं जिनके पास कुछ भी नहीं है अगर उनका एक बेटा याबेटी इससे लाभान्वित होते हुए कुछ बन सका तो एक दलित परिवार अपने को समाज में सम्मान से खड़ा करनेलायक हो सकेगा।
दलित विधायक , सांसद कितने प्रयत्नशील हैं कि वे गाँव में रहने वाले दलितों के लिए कुछ कर सकें। हाँअगर मौका मिला तो जरूर ही वे उन सुविधाओं को अपने घर वालों के नाम कर देंगे। ये दलितों की जंग तब तकचलती रहेगी जब तक की इसको पुनर्परिभाषित करके इसका आधार सामाजिक और आर्थिक न बना दियाजायेगा। दलितों की स्थिति में सामान्य वर्ग के लोग जी रहे हैं लेकिन वे जन्म से तो ब्रामण या वैश्य बन कर आयेहैं तो वे दलित हो ही नहीं सकते हैं भले ही वे किसी के घर में झाडू , पौंछा और बर्तन साफ कर रहे हों। वे लोग जोरिक्शा खींच रहे हैं, जो बोझा ढो रहे हैं या फिर मजदूरी कर रहे हैं - उनके लिए क्या परिभाषा है? वे दलित नहीं हैक्योंकि जन्म तो उन्होंने किसी उच्च कही जाने वाली जाति में लिया है न। उनके बच्चे कहाँ से पढ़ें? पेट की रोटियोंका ठिकाना नहीं है, उन्हें कोई सुविधा नहीं मिल सकती है क्योंकि ये दलित का लेबल जो खड़ा है मुँह बाए उसे वेकहाँ से लायेंगे? फिर कैसा सुधार और कैसी प्रगति? वे तो पीढ़ियों तक ऐसे ही जियेंगे।
ये दलित का तमगा क़ानून की नजर में भी वजन रखता है क्योंकि अभी हाल ही में उ प्र में हुए शशिहत्याकांड में तीन अभियुक्तों में एक दलित हैं "सीमा आज़ाद" । उनके जुरमाना में कमी कर दी गयी क्योंकि वेदलित हैं। क्या न्याय और क़ानून की नजर में भी अपराध का भार जाति और जन्म से कम हो जाता है। ये अपराधमें छूट किस लोकतंत्र की ओर इशारा करता है ? वाह रे हमारे कानून, लाभ की स्थिति में भी लाभ इस से अच्छाऔर क्या हो सकता है ? पहले तो उत्पीड़न की एक छड़ी थमा दी गयी जिससे वाकई उत्पीडित तो लाभ नहीं ले पाएऔरों ने इसे हथियार बना कर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया और खूब किया और किया जा रहा है। क़ानून औरदंड भी जन्म से जुड़ गए तो फिर न्याय कैसा रह जायेगा? फिर अब तो सिया भये कोतवाल अब डर काहे का। पहले तो राजनीति में जुड़े हैं तो अपराध सिद्ध ही नहीं होगा और अगर हो भी गया तो फिर क्या? अधिक से अधिकपार्टी से निकाल दिए जायेंगे। फिर वही से चुनाव लड़ लेंगे सुरक्षित सीट से और जीत कर राजा बेटा। अगली पीढ़ीतक पेंशन तो मिलती ही रहेगी। हम जेल गए भी तब भी बाल बच्चों को रोटी का धोखा तो नहीं रहेगा।
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शनिवार, 14 मई 2011

विश्व परिवार दिवस !


प्राणी जगत में परिवार सबसे छोटी इकाई है या फिर इस समाज में भी परिवार सबसे छोटी इकाईहै। यह सामाजिक संगठन की मौलिक इकाई है। परिवार के अभाव में मानव समाज के सञ्चालन की कल्पना भीदुष्कर है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी परिवार का सदस्य रहा है या फिर है। उससे अलग होकर उसके अस्तित्वको सोचा नहीं जा सकता है। हमारी संस्कृति और सभ्यता कितने ही परिवर्तनों को स्वीकार करके अपने कोपरिष्कृत कर ले, लेकिन परिवार संस्था के अस्तित्व पर कोई भी आंच नहीं आई। वह बने और बन कर भले टूटे होंलेकिन उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है। उसके स्वरूप में परिवर्तन आया और उसके मूल्यों मेंपरिवर्तन हुआ लेकिन उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है। कितनी आधुनिक विचारधारा में हमपल रहे हो लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ कर परिवार में परिवर्तित करने में ही संतुष्टिअनुभव करते हैं।
वास्तव में परिवार को जैवकीय संबंधों पर आधारित एक सामाजिक समूह के रूप में परिभाषित कियाजा सकता है जिसमें माता पिता और उनकी संतति होती है। जिसका उद्देश्य अपने सदस्यों के लिए सामान्यनिवास, आर्थिक सहयोग , प्रजनना, समाजीकरण और शिक्षण आदि की सुविधाएँ जुटाना है।
१५ मई को विश्व परिवार दिवस है। ये तो परिवार बनाने की परंपरा सम्पूर्ण विश्व में है . ये बात और हैकि परिवार से सम्बंधित नियमों और दायित्वों और उनके स्थायित्व में विभिन्नता पाई जाती है।
हमारा विषय अपने ही भारतीय परिवारों को बनाया जा सकता है। जीवन मूल्यों में तेजी से परिवर्तनहोने लगा है और परिवार कभी जिसमें दो से लेकर चार और पांच पीढ़ियों के लोग भी रहते थे धीरे धीरे बिखर करअब सिर्फ एकल परिवार के रूप में दिखलाई देने लगे हैं। जो आज के परिप्रेक्ष्य में परिवार की भूमिका को निभा नहींपा रहे हैं। समाज में घटित होने वाली अधिकांश घटनाएँ समुचित पारिवारिक वातावरण के अभाव में ही हो रही हैं। इनमें से चाहे आत्महत्या का मामला हो, बच्चों के बहकते कदम हों या फिर आभासी दुनियाँ में खोते जा रहे बच्चोंसे लेकर युवा तक के लोग हों।
इस आभासी दुनियाँ में खोने के लिए सबसे बड़ा कारण है कि बच्चे जब परिवार में अपने माता पिता कासानिंध्य नहीं प्राप्त कर पाते हैं तो वे अपनी बातों को शेयर करने के लिए किसी को खोजते हैं। यह आवश्यक नहींकि वे परिपक्व हों बस उन्हें जरा सी सहानुभूति मिली कि वे अपना दिल खोल कर रख देते हैं। उन्हें अपने जैसे हीलोग मिल भी जाते हैं और कुछ लोग ऐसे भावुक बच्चों की भावनाओं का फायदा भी उठाने लगते हैं। परिवार केपास इतना समय नहीं होता है कि वे देखें कि उनके बच्चे क्या कर रहे हैं? हाँ सारी आधुनिक सुविधायों को जुटानेको ही वे अपने दायित्वों कि पूर्ति समझ बैठते हैं।
परिवार में खुद पति पत्नी पैसे कमाने की आपाधापी में दिन में १७-१८ घंटे काम में लगे रहते हैं और उनकेपास इतनी ऊर्जा शेष नहीं रहती है कि वे दिन भर के अपने सुख और दुःख को बाँट सकें। या फिर बच्चों के साथबैठ कर उनसे कुछ शेयर कर सकें । बच्चों के मन में दिन भर के बाद ढेर सी बातें होती हैं कि वे मम्मी और पापाको बताएँगे लेकिन मिलता उनको कुछ भी नहीं है।
'हम बहुत थके हैं बेटा, फिर कभी करेंगे इस बारे में बात। '
'बहुत परेशान करोगे तो हम तुम्हें होस्टल में डाल देंगे।'
आज बहुत छोटी उम्र के किशोरों में विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षण किस बात का प्रतीक है कि वे घरसे उपेक्षित हैं तो इस उम्र में प्यार की तलाश शुरू हो जाती है उनके अन्दर विवेक और निर्णय लेने की क्षमता तोपरिपक्व नहीं होती हैं लेकिन वे क्षणिक आकर्षण को ही सब कुछ मान बैठते हैं फिर उसके परिणाम कुछ अच्छेनहीं मिल रहे हैं। परिवार से जुड़े मुख्य मुद्दों में विवाह और संतानोत्पत्ति को रखा जा सकता है लेकिन उसके लिएआप अगर मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं तो परिवार बनाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। जिस संस्था कीआप नींव डाल रहे हैं उसके बारे में कुछ दूर तक सोच कर ही निर्णय लेने चाहिए। चाहे इसके लिए आप अपने कामसे समय निकलिये अथवा अपनी जरूरतों के अनुसार अपनी व्यस्तता को कम करके समय निकलिये।
इस सृष्टि का आधार परिवार ही है, हम कितने ही आधुनिक हो जाएँ लेकिन विवाह और परिवार संस्थाके प्रति उदार नहीं हो सकते हैं। उन्हें अपने मूल्यों को नहीं खोना चाहिए। जिस संस्था के निर्माण के लिए हमजिम्मेदार हैं उसके प्रति अपने दायित्वों के प्रति भी हम ही जिम्मेदार हैं। तलाक की सूली पर लटका विवाह यापरिवार एक स्वस्थ मानसिकता का प्रतीक हरगिज नहीं हो सकता है।
परिवार के प्रति अगर न्याय करना है और बच्चों को संस्कार देने हैं तो अपनी जीवन शैली में परिवर्तनआवश्यक है। बल्कि यों कहिये कि वह संयुक्त परिवार जिसे हम पीछे छोड़ा है और आगे बढ़ने में अपनी प्रगतिदेखते हैं वापस उसमें झांक कर देखिये तो पता चलेगा कि भटकते बचपन, बच्चों के प्रति असुरक्षा और उनकेसंस्कारों के प्रति जिम्मेदारी से आप मुक्त ही नहीं होते बल्कि अपने माता पिता की छत्रछाया में उनको सुरक्षा कीभावना का भी विकास हो सकेगा । वे अपने को अकेले नहीं बल्कि सुरक्षित महसूस कर सकेंगे और आपनिश्चिन्त। अपने आपसी संबंधों में भी आप माता पिता कि छाया में रहने से जल्दबाजी वाले निर्णय नहीं ले सकतेहैं। उनके पास अपनी सोच के अनुसार बहुत सारे समाधान होते हैं। आप पर एक नैतिक दबाव भी होता है औरपरिवार संस्था के मूल्यों कि इससे रक्षा भी होती है।
आज के दिन परिवार को स्थायी और सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को बचाए रखने वाली संस्थाही बनाये रखने के लिए संकल्प लेना होगा। एक शांत मष्तिष्क से अगर विचार करेंगे तो पाएंगे कि पैसे से सिर्फभौतिक सुखों को तो खरीदा जा सकता है लेकिन अगर आप मानसिक सुख शांति और सुरक्षा खरीदना चाहे तो वहसंभव ही नहीं है।

बुधवार, 11 मई 2011

ये तो हद है!

आस्ट्रेलिया में भारतीयों के साथ हो रहे विगत वर्षों से दुर्व्यवहार की खबरें - यहाँ तक कि हमले और हत्याओं तककी घटनाएँ आम हो चुकी हैं हम ये सब पढ़ और सुन कर आदी हो चुके हैं कौन सा हमारे घर या परिवार का कोईइसमें त्रसित है। हम आज भी वहाँ जाने के लिए तैयार हैं चाहे अपना जमीर ही बेच कर क्यों रहना पड़े?
आज अख़बार में पढ़ा कि बिकनी पर हिन्दू देवी लक्ष्मी के तस्वीर का प्रिंट छापने से कारण विवाद
से घिरीआस्ट्रेलियाई कंपनी लीसा ब्लू स्विमवियर ने माफी मांगी - ' अगर हमारे करण आपकी भावनाएं आहट हुई हैं , तो हम उसके लिए माफी माँगते हैं।'


सिर्फ बिकनी के लिए माफी माँग ली गयी , उस दिन टाइम्स ऑफ इंडिया में छापे हुए समाचार में इस बिकनी केअतिरिक्त कुछ जोड़ी जूते भी उसमें प्रदर्शित किये गए थे इनके ऊपर गणेश, और अन्य धार्मिक प्रतीक चिन्होंको बनाया गया था। क्या ये किसी भी धर्म का अनुयायी हो इस बात को सभी समझते हैं कि अगर हम किसी कीआस्था या विश्वास के प्रति इस तरह का व्यवहार करेंगे तो वह अनुचित की श्रेणी में रखा जाएगा।
लेकिन शायद इंसान की सोच इससे अधिक व्यावसायिक हो गयी है उसको प्रचार मिलना चाहिए चर्चित तो हुए शायद इससे पहले इस कंपनी को भारत में कोई जानता हो लेकिन अब सभी लोग जान गए हैं।
देवी देवता या धर्म ग्रन्थ ऐसे आस्था से जुड़े हैं कि इनके अपमान और प्रतिकार के लिए युद्ध या विद्रोह कुछ भी होसकता है। अगर विदेशी यह जानते हैं कि ये हिन्दू धर्म के देवी देवता या पूज्य हैं तो फिर उनका प्रयोग क्या प्रदर्शितकरता है? बिकनी या जूते पर जीसस कि तस्वीर क्यों नहीं लगाई गयी? सिर्फ इस लिए कि वे किसी धर्म के लिएपूज्य पुरुष हैं। फिर दूसरे कि भावनाओं को आहत करने के लिए ऐसा काम क्यों किया गया? क्या सिर्फ माफी मांगलेने से हम उनको माफ कर पायेंगे? शायद नहीं। ये तमाशा धर्म ग्रंथों के लिए भी होता रहा है। लेकिन किसी कासार्वजनिक तौर पर अपमान करने के बाद उससे माफी मांग ली जाय तो अपराध क्षम्य हो जाता है। आस्था एकऐसी भावना है कि जिसके लिए अगर कोई आहत करे तो फिर कम से कम मैं तो क्षमा नहीं कर सकती जिन देवीदेवताओं को हम सर नवाते हैं उनको जूतों में बना कर बनाने वाले क्या प्रदर्शित करना चाहते हैं? व्यापार के लिएइन सब को भी प्रचार तंत्र का हिस्सा बना लिया जाय। बदनाम होंगे तो क्या नाम होगा? ऐसे मामले को विश्वपटल पर उठना जरूरी है ताकि भविष्य में आस्था को इतने अश्लील तरीके से कोई प्रयोग कर सके।

रविवार, 1 मई 2011

श्रमिक दिवस किसके लिए ?



विश्व
में सभी को एक एक दिन देकर सम्मान किया जाता है , वह सम्मान चाहे सार्थक हो या हो इसी क्रम में भूले हम उनको भी नहीं है जिन्होंने कभी हमारे आशियाँ बनाये, कभी हमारे बोझ को अपने कन्धों पर उठाया , कभी हमें बिठा कर खुद सारथी बन कर मंजिल तक पहुँचाया आज उन्हें सम्मान देने वाला दिन है आज विश्व श्रमिक दिवस है
मैं कड़ी धूप में पसीना बहते हुए उन श्रमिकों को सलाम करती हूँ, जिन्हें हमने ये दिन दिया है पर क्या सिर्फ इस सम्मान के देने से ही हम उनके पसीने की कीमत का आकलन कर पाए हैं ठेला गाड़ी में टनों लोहे को लाद कर खींचते हुए - वे हाड़ मांस के शरीर हमसे इतर तो नहीं है लेकिन हाथ की लकीरों में जरूर कुछ अंतर तो लेकर आये हैं हम दाता नहीं फिर भी उनके फैले हुए हाथों पर कुछ कभी कभी तो रख ही देते हैं और उस पर भी मोल तोल कि इसका इतना नहीं इतना होता है ये सोचे बगैर जिस पैसे को बचाने की हमारी नियत रहती है उतना हममें से कुछ पान खाकर थूक देते हैं या फिर धुंए में उड़ा देते हैं अगर उनको दे दें तो शायद वे नमक के साथ रोटी खाने के जगह किसी सब्जी से खाने की सोच सकते हैं
पूरे विश्व की बात तो नहीं करते हैं लेकिन अगर हम सिर्फ अपने नगर कानपुर की ही बात करें तो कभी भारत का मानचेस्टर कहा जाता था आज से ३० साल पहले यहाँ पर कपड़े की कई मिलों का धुआ आसमान में उड़ता था और लाखों की संख्या में मजदूर अपने परिवार पालते थे धीरे धीरे सब बंद हो गयी मिलों क़ी बड़ी बड़ी बिल्डिंग भी आज खँडहर बन चुकी हैं लेकिन वे मजदूर आज भी आशा लगाये हैं कि शायद फिर से चल पड़े और वे जो उस समय जवान थे आज प्रौढ़ हो चुके हैं और उनके नन्हे बच्चे जवान हो गए हैं उनके बच्चे भी श्रमिक का ठप्पा लगाये घूम रहे हैं क्योंकि उनके पास पढ़ने केलिए पैसे थे कि पढ़ सकें और सरकार के पास उनके लिए कुछ सार्थक सोचने के लिए समय
सारी सरकारी घोषणाएं सिर्फ कागजों में होती हैं, उनका क्रियान्वयन कभी नहीं होता है अगर हुआ भी तो फायदा कोई और उठाता है वे तो वही खड़े हैं सँगठित मजदूरों की कितनी संख्या है? सारे असंठित मजदूर हैं और उनके बहते हुए पसीने की कमाई का सिर्फ कुछ प्रतिशत ही उनको मिलता है सरकार द्वारा मजदूरी निर्धारण के बाद भी वे इस बात से वाकिफ नहीं है और वे जी तोड़ मेहनत करते करते समय से पहले बूढ़े हो जाते हैं और कभी अशक्त होकर कभी किसी बीमारी का शिकार होकर एडियाँ रगड़ते हुए मर जाते हैं वे पीढ़ी दर पीढ़ी श्रमिक ही बने रहते हैं उनको मिलने वाली सुविधाएँ तो कोई और खा रहा है
हम औरों तक क्यों जाएँ? क्या हममें से किसी ने अगर अपने यहाँ कुछ काम करने वाले लोग हैं तो उनको आज छुट्टी दी , क्या हमने उनको कुछ अच्छा खाने के लिए दिया या फिर आज के दिन मनाने के लिए कुछ अतिरिक्त पैसे दिए? शायद नहीं - हम इतना कर ही नहीं सकते हैं हमारी सोच तो अपने से ऊपर उठ कहाँ पाती है? फिर क्या फायदा इस दिन को मनाने का? अरे कुछ सरकार ही ऐसे प्रकोष्ठ खोले कि आज का दिन उनके लिए विशेष बन जाय हम भी तो कर सकते हैं अगर हम उनको अपनी तरह से मनुष्य मान कर चलें तो आज तो गया चलिए आगे के लिए कुछ संकल्प कर लें की उन्हें हम कुछ ऐसा देंगे की वे भी अनुभव करें की उनके लिए विश्व में कोई दिन है जिस दिन उन्हें काम के बिना भी कुछ मिलता है उनके अस्तित्व को दुनियाँ में कोई समझता है
तभी ये दिन उनके लिए सार्थक होगा