www.hamarivani.com

गुरुवार, 2 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (६)

सबसे पहले क्षमा याचना क्योंकि पिछले दो दिन की कड़ियाँ ही नहीं सकीं क्योंकि नेटवर्क था ही नहीं
अब तो हमको भी सबकी यादों में घूम घूम कर बड़ा मजा आने लगा हैकितना प्यारा बचपन था? काश ! फिर से मिल जाये चाहे एक दिन के लिए ही सही , सच कितनी मस्ती करें? जिस के बचपन में भी हम झांक रहे हैं तो कितनी भूली बिसरी यादे शैतानियाँ, खेल और मस्ती याद रहे हैं की अरे हम भी तो इसी तरह से करते थे और फिर बगैर झांकें ही हम अपने बचपन में पहुँच जाते हैंचलिए जो नहीं पहुंचे हैं वे भी झांक लें और हमें बता दें



अरुण चन्द्र राय :




कुछ अधूरा, कुछ अनकहा
मेरा जन्म बिहार के मधुबनी जिले के एक सोते हुए गाँव रामपुर में हुआ था. सोता हुआ इस लिए क्योंकि आज भी मेरा गाँव नितांत गाँव है. जहाँ न तो पक्की सड़क पहुंची है न ही बिजली. अब भी मेरे गाँव की आधी आबादी कुएं का पानी पीती है. सरकारी चापानल भी कम ही हैं. जब मैं दस साल का हुआ तो बाबूजी अपने साथ धनबाद ले आये. तब तक तो पता ही नहीं था कि गर्मी की छुट्टी का क्या आनंद है क्योंकि गाँव में तो हर दिन छुट्टी का था. दस बजे का स्कूल था. चार बजे की छुट्टी. बीच में टिफिन में भी मौज मस्ती. पोखर में नहाना, भैसों की पीठ पर बैठ पोखर पार करना, खेतों से गन्ने तोडना, साग तोडना लगभग रोज़ का काम था. फिर दादा जी छड़ी और काका का थप्पड़. लालटेन की पीली मद्धम रौशनी में पहाड़े याद करना, दालान पर दादा जी के साथ नौ बजे बी बी सी का समाचार सुनना और ना जाने क्या क्या. इन सब मस्तियों को बाबूजी ने छीन लिया पढाई लिखाई का वास्ता देकर. तब जाकर समझ आया कि गर्मी की छुट्टी का क्या महत्व है. फिर तो इन्तजार रहने लगा मई के पहले सप्ताह का.
याद है मुझे जिस दिन धनबाद से गाँव आना होता था उस दिन सुबह से ही हम जूते पहन के तैयार रहते थे, जबकि ट्रेन होती थी रात के साढ़े दस बजे के. सोच के लगता है कि माँ कितनी परेशान होती होगी इस दौरान हम भाइयों को सँभालने में. दो दिन लगते थे धनबाद से गाँव पहुँचने में. उन दिनों ट्रेन में इतनी भीड़ नहीं दिखती थी. जसीडीह स्टेशन, जहांसे हम देवघर यानि बाबा वैद्यनाथ धाम जा सकते हैं, पर लिट्टी चोखा और पानी मिलता था. एक लिट्टी के साथ दो ग्लास पानी फ्री देता था. सालों साल हमने इस स्टेशन पर दोनों ओर से लिट्टी चोखा खाते रहे और पानी पीते रहे. दो लिट्टी लेकर पूरा परिवार पानी पी लेते थे. उन दिनों बोतल बंद पानी का इतना चलन नहीं था.


गाँव पहुँचते ही 'ब्रेक-फ्री' हो जाते थे हम. सीधे आम के बगीचे में. बात उस साल की है जब मैं नौवी में था. सन १९८७. मुझे न तो तैरने में डर लगता था न आम जामुन के पेड़ पर चढ़ने में. डर लगता था तो साइकिल चलने में. नौवी तक मैं साइकिल चलाना नहीं सीख पाया था. चूँकि बाबूजी आजीवन साइकिल नहीं चला पाए सो मुझे भी लग रहा था कि मैं भी साइकिल नहीं चला पाऊंगा. हाँ हाफ पैडल साइकिल चलानी आती थी.. जिसमे कैंची की तरह फ्रेम से लटक कर चलाते हैं साइकिल. आज की पीढ़ी उसे नहीं जान पायेगी क्योंकि अब तो हर ऊंचाई की साइकिल मिल जाती है. लेकिन हमारे समय में साइकिल एक ही हुआ करती थी. खैर.
इस बार जिस दिन हम गाँव पहुंचे उसी दिन जीवछ, जिसका परिवार पीढ़ियों से हमारे आँगन में पानी आदि भरा करते थे, की बेटी भी पंजाब से आई थी. जीवछ दस साल बाद पंजाब से लौटा था हमेशा हमेशा के लिए. उसकी बेटी मंजू चूँकि पंजाब में पैदा हुई और तेरह चौदह साल तक वही रही तो थोडा शहरी लग रही थी. गाँव भर का आकर्षण थी. मंजू साथ लेकर आई थी अपनी साइकिल.
मंजू हमसे उमर में एक आध साल ही बड़ी रही होगी या बराबर ही रही होगी. गर्मी के दिनों में जब आम पकने लगते हैं तो सुबह सुबह पके हुए आम रात को पेड़ से टपकते हैं. इन आमों का स्वाद शायद अब कभी ना मिले लेकिन अब भी याद है पूरा बगीचा महका होता था गछ्पक्कू आम से. सुबह तीन बजे से जग कर ही आम चुनते थे बगीचे बगीचे जाकर. दोपहर में हम डोल पत्ता खेल खेलते थे. ये कुछ कबड्डी की तरह था लेकिन जमीं और पेड़ दोनों पर खेला जाता था. मंजू भी डोल पत्ता खेलती थी हमारे साथ. एक दिन वह साइकिल चलने के लिए बोली. उसकी इच्छा थी कि वो मेरे पीछे साइकिल पर बैठे. लेकिन मुझे साइकिल चलने आती कहाँ थी. उसे बहुत आश्चर्य हुआ. मैंने उस से कहा कि मुझे हाफ पैडल साइकिल चलने आती है. तब से मंजू चिढाने लगी 'अरुण के हाफ पैडल'. मंजू से लड़ते झगड़ते, आम खाते खिलते, पेड़ पर चढ़ते उतरते १९८७ की गर्मी की छुट्टी बीतती रही. फिर कुछ ही दिन बचे थे हमारे धनबाद लौटने में.
मंजू एक दिन दोपहर में बोली."चलो मैं तुम्हे साइकिल चलाना सिखा देती हूँ' . और फिर उस दोपहर मेरे पीछे साइकिल पकड़ कर दौड़ती रही. शाम होते होते मैं साइकिल चलाना सीख गया था. धनबाद लौटने से एक दिन पहले मंजू मेरे साथ बहुत दूर तक साइकिल पर बैठ कर गई. उसे बहुत अच्छा लगा था.
अगली बार जब मैं गर्मी की छुट्टी में गाँव नहीं आ पाया क्योंकि दसवी में पहुच गया था. बाबूजी भी गाँव नहीं आये थे. उसके बाद १९८९ में मैं जब गाँव आया तो पता चला कि मंजू की शादी हो गई है. लड़का उस से उमर में कम से कम दस साल बड़ा रहा होगा. एक बेटी की माँ भी बन चुकी थी मंजू. अब भी जब कभी गाँव जाता हूँ और यदि मंजू को पता लग जाता है तो अपने मायके जरुर आती है. चार बेटियों के बाद बेटा हुआ उसे. शायद इस सब में उसकी सहमति नहीं रही होगी. उसकी सुनी आँखें न जाने क्या कहती हैं. मुझे देख बमुश्किल मुस्कुराती है वह. शायद कुछ कहना चाहती है अब भी वह लेकिन....
आज जब बाइक, तरह तरह के कार चला लेता हूँ , बाइक और कार मिला कर कम से कम एक लाख किलोमीटर ड्राइव तो कर ही चूका हो... तो रिअर वियु में कभी कभी मंजू गाडी के पीछे द



अंजू चौधरी "अनु"



 
 
 
 
मेरा अधूरा बचपन ........
यादे बहुत है ....बाते भी बहुत है ...पर लिखने को ऐसा कुछ खास नहीं कि जो मन से याद करके लिखा जाये ....याद तो वो किया जाये जिसको कभी भूले भी हो ...ये मेरा बचपन और उस से जुडी यादे ...वो नहीं जिसको मै दिल से ख़ुशी से बयान करूँँ ..जाने कहाँ गए वो दिन।...।
आज फिर से दिल में है कि हां मै भी कुछ लिखूं ...कि क्यों मेरा बचपन अधूरा सा लगता था मुझे .....
जहाँ तक मुझे याद है ...कभी किसी के साथ खुल कर अपने दिल की किसी भी बात को शेयर करना मेरी आदत में नहीं रहा...इसी वजह से मैंने खुद को हमेशा अकेला ही पाया ....गर्मी की छुट्टियों में नानी के घर जाना और वहां भी चुप हो कर सब के बीच रहना ....मेरे व्यवहार में था ...चुपचाप सी अकेली मै दूर आकाश में उड़ते पंछी...चिड़िया ....कभी कबूतर गिना करती थी ...एक ...दो ...तीन.........पता नहीं कब तक अकेली बैठी खुद से बाते करती रहती.ये ''अनु ''.रात को खुली छत पर ढेरो तारे ..और तरो से बाते करती ये ''अनु'' ...अपने ही मन से सवाल करती और खुद को ही जबाब भी देती रहती ...|छुट्टियों में माँ ने कभी देर तक सोने नहीं दिया ...सुबह जल्दी उठ कर ..उनके साथ रसोई के काम और फिर बाद में और घर के कामो में कैसे वक़्त निकाल जाता था .. पता ही नहीं चलता था ...और जब कभी खुद के खेलने के लिए वक़्त मिलता तो ...मन में एक अजीब से ख़ुशी होती थी ....खूब मन से खेला करती थी ..पर वो वक़्त ज्यादा नहीं होता था मेरे पास....तीन भाईयों की मै अकेली बहन...जिम्मेवारी इतनी कि कभी कभी अकेले में खूब रोने का मन करता था ..जब मेरी उम्र की लडकियां अपना बचपन ..मेरे सामने खुल कर बिंदास जीती थी ...और मै डरी हुई ...सहमी हुई ....सुनी आँखों से उन सब को देखती थी ...अपने ही घर के गेट कड़ी दूर से सबको देखना मेरी रोज़ की आदत थी ....वो सब जानती थी की मुझे खेलने नहीं दिया जायेगा ...इसी वजह से उन सबने मुझे बुलाना ही छोड़ दिया था .....खेलने को ...उस वक़्त लूडो ....सांप सीढ़ी....स्टापू...रस्सी कूदना ...सब था...पर वो वक़्त नहीं था ..जिस में बचपन का वक़्त व्यतीत हो ...अपन घर में लडको के बीच पली बड़ी हुई ...पाबंधी से मेरा बचपन मुझ से छीन गया ...माँ पापा से ज्यादा मुझे मेरे दो बडे भाई कहीं बाहर खलेने नहीं जाने देते थे ...किसी से मिलने जुलने पर मनाही थी ..|ऐसी बहुत से बाते है जो उस बचपन के साथ बीत गई ....जो कभी भी पूरी नहीं होंगी ...एक अधूरा बचपन जो मैंने जीया ...............|
वो अकेली ''अनु''
डरी सहमी
खुद से बाते करती
अपनों के लिए
अपनों में
जीती ''अनु''
संगी ना साथी
कोई था
फिर मिला उसे
कलम का साथ
जो बन गया
उसके जीवन का
आधार...........((((अंजु............अनु...)))


मृदुला प्रधान :

वह अनमोल बचपन .....!


स्मृतियों के वन में, पीछे मुड़कर देखने पर जो-जो दृश्य दिखाई पड़ता है, उनमें गर्मी की छुट्टियों में ननिहाल में बिताया हुआ समय सबसे साफ़ है. अम्मा के साथ मोटा-मोटी हफ्ते भर के लिए जाते थे . बिहार स्थित मुज़फ्फरपूर शहर के पास ,स्टेशन- ढोली ,गाँव चन्दन पट्टी .कितनी खुशी रहती थी.......... ...कितना कौतूहल रहता था .ननिहाल में कोई नहीं था.न नाना न नानी ,न मामा न मामी.
अम्मा इकलौती संतान थीं लेकिन ज़मींदारी का रोब बहुत ज़्यादा था.सिपाहीजी,दीवानजी ,नौकर ,दाई ,धोबिन,मालिन,हजामिन सबके सब वही थे.....नाना-नानी के ज़माने के.अम्मा के सामने कोई कुर्सी पर नहीं बैठता था,कुछ लोग खड़े रहते थे,कुछ ज़मीन पर बैठते थे.उनलोगों को नाना अपनी ज़मीन में बसा दिए थे और वे 'रैयत'कहलाते थे.सब कुछ अज़ूबा सा लगता था क्योंकि दरभंगा में तो बाबूजी डॉक्टर थे इसलिए वहां का माहौल एकदम अलग था.चन्दनपट्टी में बिजली नहीं थी,शाम में ही लालटेन जला दिया जाता था.अब सोचती हूँ की गर्मी क्यों नहीं लगती थी? कूएं के पानी की मिठास और सोंधापन ....अभी तक एकदम याद है.सामने फुलवारी में तरह-तरह के फल-फूल .कभी चंपा के फूल तोड़ती तो कभी अमरुद के पेड़ पर चढ़कर
बैठ जाती , ऊपर ही तोड़ती,ऊपर ही खाती .कभी करौंदा ,कभी शहतूत तो कभी फालसा बारी-बारी से खाती .क्या मज़ा आता था.लकड़ी का बक्शा नुमा गाड़ी 'सम्पनी' कहलाता था,बैल खींचता था. इसी पर चढ़कर हमलोग किसीके घर जाते थे.एक छोटी सी कविता के साथ इस संस्मरण को समाप्त करती हूँ क्योकि यादें हैं की रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं ...........
वह ममता कितनी
प्यारी थी,
वह आँचल कितना
सुंदर था,
जिसके कोने की
गिरहों में,
थी मेरी ऊँगली
बंधी हुई.
तब बित्ते भर की
खुशियाँ थीं,
ऊँगली भर की
आकांक्षा थी,
उस आँचल की
उन गिरहों में,
बस अपनी
सारी दुनिया थी.........



सोमवार, 30 मई 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (५)

ये यादें धरोहर हैं हर इंसान की और जिसने जैसे अपनी धरोहर सहेजी और मुझे सौंप दी उसको मैंने भी उसीतरीके से प्रस्तुत की हैराजीव कुमार जी की यादें एक कविता और संस्मरण के साथ प्रस्तुत हैं:




राजीव कुमार :





गर्मी की छुट्टियाँ

"छुट्टी जब-जब आती
गाँव हमें ले जाती है ,
ताल-तलैये,बाग-बगीचे,
खेतों की सैर कराती है,
जामुन,कटहल,आम,पपीता
हमको रोज चखाती है,
किसका है यह,
कौन है मालिक,
कभी नहीं बतलाती है.
मिलवाती है सबसे सबको,
सबमें मेल कराती है,
सबको साथ बिठाती है,
मन के भेद मिटाती है.
सबका प्यार हमें दिलवाती,
स्नेहपात्र का बनाती है.
छुट्टी जब-जब आती है,
गाँव हमें ले जाती है.
आती है हर साल छुट्टियाँ
ढ़ेरों खुशियों लाती हैं
चाक दिखाती है कुम्हार का .
सृजनहार दिखलाती है,
बातों-बातों में हमसबको ,
सृजन-सार समझाती है.
ले जाती है घर लोहार के,
जीवन गढ़ना सिखलाती है.
सुख में,दुःख में साथ रहे सब
यही संदेशा लाती है
छोटे हों या बड़े सभी को
यह इंसान बनाती है.
छुट्टी जब-जब आती
गाँव हमें ले जाती है .
गर्मी की छुट्टियाँ
छुट्टियाँ नहीं देती अवसर बस आराम करने का , देती है अवसर हमें जाने का गाँव जहाँ आज भी बसता है हमारा सारा कुटुंब,जहाँ प्रकृति होती है सदा सबके पास,सबके साथ .यह देती है अवसर अपनों के अपनों के पास जाने का,रिश्तों की नींव मजबूत बनाने का.गर्मी की छुट्टियाँ इस लिहाज से काफी महत्वपूर्ण होती हैं क्योंकि बच्चों को महीने-भर की छुट्टी होती है जिसमें बच्चा सपरिवार अपने गाँव जा सकता है.
मैं बचपन से ही मैं मां-पिताजी के पास मुजफ्फरपुर शहर में रहा जो अपनी रसीली लीचियों के लिए मशहूर है . यह छोटा सा मगर बेहद ख़ूबसूरत शहर है. हमारे समय में स्कूल दो पालियों में चला करता था -जाड़े में 10 से 4 और गर्मियों में 7 से 1. बजे तक.लेकिन मई के महीने का मध्य आते-आते गर्मी की छुट्टियाँ पड़ जाती थी . हमें बेसब्री से इसका इंतजार रहता था.ख़ुशी इस बात से चौगुनी हो जाती थी कि हम सपरिवार घर जाते थे-माँ-बाबूजी और तीनों भाई.
जैसे -जैसे गर्मियों की छुट्टियाँ करीब आती जाती हमारे दिल की धड़कनें तेज होने लगती थी,जाने वाले दिन का इन्तजार ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता था. दिल के किसी कोने में अपने गाँव की तस्वीर पहले से ही सी उभरने लगती.पहले थोड़ी धुंधली जरूर होती थी,लेकिन जिस दिन हमारी यात्रा आरम्भ होती,गाडी मैं बैठते-बैठते सबकुछ साफ-साफ दिखने लगता था: एक-एक चीज मानचित्र की तरह नज़रों के सामने तैरने लगता थी .
मई 1971 की बात है.उन दिनों मुजफ्फरपुर से भागलपुर तक के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं चला करती थी.इसलिए हमें बरौनी जंक्शन तक पैसेंजर ट्रेन से और वहां से "धुलयान" नाम की दूसरी पैसेंजर ट्रेन से सुल्तानगंज तक का सफ़र पूरा करना पड़ता था.मुजफ्फरपुर से ट्रेन 8 बजे रात में खुलती थी और सुबह 4 बजे बरौनी पहुंचाती थी. तब ट्रेनों में खुली खिड़कियाँ हुआ करती थी, लोहे की छडें नहीं लगी होती थी जिसका एक फायदा यह था कि भीड़-भाड़ होने कि स्थिति में बाबूजी हमें (तीनों भाई को) खिड़की के रास्ते भीतर घुसा देते थे और वो दोनों भी किसी तरह भीतर आ जाते थे.
यात्रा वाले दिन दोपहर से ही मां रसोई में खाना बना रही थी:कुछ रास्ते का खाना और कुछ पकवान घर के लिए. मेरे भीतर एक अजीब सी बैचैनी घर कर गई थी . ठीक 6 बजे मैं बाबूजी के साथ खादी भंडार कैम्पस के बाहर से दो रिक्शा ले आया . उसपर सारा सामान रखा और स्टेशन की ओर चल पड़े जो खादी भंडार से तकरीबन तीन-साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी पर था.स्टेशन पर गाड़ी लगी रहती थी.हम सपरिवार गाड़ी में बैठ गए और उसके चलने की प्रतीक्षा करने लगे.उस दिन किन्ही अपरिहार्य कारणों से गाड़ी 8 बजे की जगह 12 बजे रात में खुली.मन की रफ़्तार गाड़ी की रफ़्तार से होड़ कर रही थी.या यों कहें गाड़ी के स्टेशन पहुँचाने से पहले ही वहां पहुंच जाता.ऐसा रास्ते भर होता रहा.खिड़की वाली सीट पर बैठने के लिये भी हम तीनों भाइयों के बीच खींच-तान हो रही थी जिसे मां ने बीच में पड़कर किसी तरह निपटाया. मैं बड़ा था सो मुझे ही त्याग करना पड़ा.उस दिन गाडी दस बजे के करीब बरौनी जंक्शन पर पहुंची तो हम सब अपना सामान लेकर भागलपुर जानेवाली गाड़ी में सवार हो गए यह गाड़ी मुजफ्फरपुर वाली पैसंजर ट्रेन का मेल लेकर ही जाती थी,ऐसा लोग कहते थे. भागलपुर वाली ट्रेन 12 बजे वहां से खुली . मई माह का तपता सूरज आसमान पर चढ़ आया था.लू के थपेड़े चलने लगे थे.लेकिन दिन के उजाले में चलती गाड़ी से बाहर का नजारा अद्भुत था.बाहर गाडी के साथ-साथ पेड़-पौधे भी तेजी से चलते,ट्रेन कि रफ़्तार से होड़ लेते नजर आ रहे थे.
जब हम सुल्तानगंज पहुंचे तो शाम के छः बज चुके थे और .जब हम स्टेशन पर उतरे तो सबकुछ जाना पहचाना सा ही लगा-प्लेटफार्म पार करनेवाला पुल,स्टेशन मास्टर का कमरा और चिर-परिचित टिकट खिड़की . अब हम स्टेशन से बाहर निकल आये क्योंकि अब हमें बाहर स्थित सरकारी बस अड्डे से घर जाने के लिए बस जो लेनी थी.मां ने दोनों भाई का हाथ पकड़ा,मैं और बाबूजी सामान उठाकर बस स्टैंड पर आ गए. संयोग से भागलपुर-देवघर बस उसी समय आकर खड़ी हुई थी.टिकट लेकर हम सभी बस में सवार हो गए.कुछ ही देर में बस सवारियों को लेकर अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी.जब हम रामपुर पंचायत भवन (जो कम्युनिटी हालके नाम से इलाके में प्रसिद्ध था) पहुंचे तो रात के 8 बज चुके थे. बस ने हमें वहीँ उतार दिया . आसमान में चाँद निकल आया था.वहां से पैदल करीब एक किलोमीटर खेतों के बीच से चलकर जाना पड़ता है, बीच में पड़ने वाले नहर को पार करके गाँव पहुंचा जाता है.रात में चलने के नाम से ही मेरी कंपकपी छूटने लगती है क्योंकि मुझे भूतों से बहुत डर लगता है.लेकिन बाबूजी का निडर और साहसी स्वभाव काफी सम्बलकारी था. उसपर घर जाने,अपनों से मिलने का उत्साह . हम चाँद के साये तले बाबूजी से सटे-सटे चलते रहे,मां और दोनों भाई साथ-साथ थे.घर से नहर की दूरी लगभग आधा किलोमीटर है.जब नहर के करीब पहुंचे तो हमें तेज बहते पानी का और डरावना स्वर सुनाई दिया दिया .साथ ही कुछ लोग नहर पर खड़े दिखाई दिए.डर के मारे मेरी तो घिघ्घी बांध गई,लेकिन पिताजी ने निर्भीक होकर पूछा तो पता चला छोटे चाचाजी और गाँव के भैया थे जो हमें लेने आये थे.
जब हमने आँगन में प्रवेश किया तो हमारी आँखें सबसे पहले दादाजी और मामा(हमारे यहाँ दादी को इसी नाम से बुलाते हैं ).दादाजी आँगन में खाट बिछा कर लेटे हुए थे .हमारे आने की खबर पाकर वे उठकर बैठ गए थे,मामा भी उनके पास ही बैठी थी.हम सभी ने दादाजी और मामा के पाँव छूकर आशीर्वाद लिया . अबतक पूरे आँगन में हमारे आने की खबर आग की तरह फ़ैल गई थी.सभी चाचा,चाची,बुआ और चचेरे भाई-बहन आँगन में आ जुटे.हम तीनों भाइयों ने अपने से बड़े सभी लोगों के पाँव छूकर आशीष लिया .मां घर के भीतर चली गई थी जहाँ घर की सभी महिलाएं उनसे मिलने पहुँच गई थी.सबसे मिलना कितना सुखद था बयां कर पाना बहुत मुश्किल था.गाँव में आज भी लोग जल्दी सो जाते हैं.लेकिन घर में सभी हमारा इन्तजार कर रहे थे.

रात को मैं दादाजी के साथ आँगन मैं ही सो गया.लेकिन आँखों से नींद कोसों दूर थी.मन
की अपनी गति थी.कल्पना मुझे अपने दोस्तों से मिलवा रही थी.आम के बागों की सैर करा रही थी.मैं तो सुबह के इन्तजार में बैचेन था.कब सुबह होगी और साल-भर बाद अपने दोस्तों के साथ मस्ती करूँगा.नदी किनारे जाऊंगा,बाग़-बगीचे की सैर करूँगा. मुंह अँधेरे जैसे ही दादाजी खेतों में जाने के लिए उठे वैसे ही मेरी भी आँख खुल गई. सुबह-सुबह मैं अपने दोस्तों को ढूंढ़ने निकल पड़ा.जैसे-जैसे उन्हें मेरे आने की खबर लगी,सब मेरे पास आ गए.सबसे पहले मैं दोस्तों के साथ नदी (बडुआ नदी) के किनारे सैर करने गया जहाँ गाँव के लोग नित्यक्रिया के लिए जाया करते थे. यह नदी घर से मुश्किल से 100 मीटर की दूरी पर है.
कुछ भी तो नहीं बदला था सालभर में.नदी किनारे का बरगद का विशाल बूढा पेड़ जो न जाने कितनी पीढ़ियों का साक्षी रहा है.उसके नीचे गाँव भर के जानवर जेठ की दोपहरी में सुस्ताते थे.गाँव के ढ़ेरों लोग भी वहां खाट लगाकर,गमछा बिछाकर बैठा करते थे.कोई ताश खेलता तो कोई अपनी आप-बीती सुना रहा होता. किसी को किसी से परेशानी नहीं थी.लेकिन हमारा लक्ष्य होता था उस कृशकाय बरसाती नदी की बीचो-बीच बहती पतली सी धारा में नहाना क्योंकि उसमें डूबने का खतरा जरा भी नहीं था.दादाजी बताते थे कि कभी यह नदी अपने तूफानी बहाव के लिए जानी जाती थी. एकबार 1960 में तो इसने अपना किनारा तोड़कर आसपास के गाँव में भारी तबाही भी मचाई थी.चारो तरफ बालू ही बालू भर दिया था.लेकन इंसानों की जिजीविषा भी कहाँ हार मानती है.सालों लगे लेकिन गांववालों ने बालू को टीले के रूप में जामा कर-कर के खेतों को आजाद किया,खेती योग्य बनाया.लेकिन उसके बाद ही उसकी और उस जैसी ढ़ेरों नदियों की जवानी और रवानी विकास की बलि चढ़ गई.हनुमना डैम बनाकर सदा के लिए उसके पर क़तर दिए गए.अब तो वह किसी क्षय-रोगी की तरह कृशकाय नजर आती है.लेकिन उतने पानी में उलट-पलट कर नहाने में जो स्नेह और आनंद मिला वह अनिर्वचनीय था.लगा जैसे उसने हमें अपनी गोद में भर रखा हो.उसके अंक से बाहर आने का जी ही नहीं करता था.आता भी नहीं यदि चचाजी बुलाने न आ जाते.
जैसे ही सूरज मध्य आकाश से थोड़ा पश्चिम की ओर ढला,दादाजी और बड़ों की सलाह को ठेंगा दिखाते हुए हमलोग छुपते-छुपाते घर के पिछवाड़े से होकर आम के बगीचे की ओर भाग गए.वहाँ मैं
मुग्ध होकर एकटक लटकते आमों को देखता रहता और उनके बीच पीले हो रहे आमों की तलाश करता. हवा के झोंके से कोई आम गिरता तो सारे दोस्त उसपर झपट पड़ते,लेकिन चूँकि मैं मेहमान था सो पहला आम मेरे हिस्से ही आता. बिना धोये आम ताजा आम खाने का मजा ही कुछ और था. आम के डंठल के रस से ओठों और गलों पार घाव भी हो जाता थे लेकी कौन उसकी परवाह करता था.दादी ने घर के पिछवाड़े उसी बालू में तरबूज की बेल लगा रखी थी जिसमें ढ़ेरों तरबूज लगे थे लेकिन सब छोटे=छोटे थे. बड़े तरबूजों को दादी लोगों की नज़रों से बचाने के लिए बालू में गाड़कर छिपा देती थी. क्योंकि उसे पता था कि हम आने वाले हैं.हम बेसब्री से सुबह होने का इन्तजार करते थे,दादी से तरबूज तोड़ने चलने का अनुरोध करते थे.काफी मन-मनौवल के बाद दादी हमारे साथ बाहर आती और एक जगह बालू खोद कर तरबूज को बाहर निकालती.हमें खाने से अधिक मजा दादी को बालू के भीतर से तरबूज को खोदकर निकलते और उसे तोड़कर बेल से अलग करते देखने में आता था.
आज समझ आता है वह वहां एक सूखी टहनी गाड़कर क्यों छोड़ दिया करती थी. इतना ही नहीं दादी हमारे लिए ढेर सारा मक्के और चावल का भूजा तथा चना,मक्का और जौ का सत्तू भी तैयार करके रखती थी.हम तो बस खाने के लिए घर आते और फिर गाँव की गलियों में गायब हो जाते थे.तपती दोपहरी भी हमारे उत्साह को फीका नहीं कर पाती थी.
जैसे ही सूरज ढलने को आता हम गमछे में भूजा बांधकर नदी की पेटी (नदी के भीतर)में पहुँच जाते थे.रेत पर खेलने का मजा ही कुछ और था.सूरज के छिपते ही रेत ठंढी हो जाती थी और उसपर दौड़ने में बहुत मजा आता था.हाँ बालू पर दौड़ना थोड़ा मुश्किल जरूर था बालू पैरों को पीछे खींच लिया करता था जिससे हमर चार कदम दो कदम बनकर रह जाता था.यहाँ केकड़े जैसा एक जीव बालू के भीतर बहुतायत में पाया जाता था जिसे हम बालू खोदकर बाहर निकल लेटे और फिर उसकी टांगों में धागा बांधकर उसे खूब दौड़ते.यह कितना सही था ,नहीं पाता, मगर रूटीन जीवन से अलग यहाँ का मजा ही कुछ और था. हम गीली रेत से घरोंदे बनाते,एक-दूसरे के घरौंदे तोड़कर,फिर उसे बनाते.
कभी सबेरे-सबेरे कुम्हार दादाजी (जो बाबूजी के दोस्त के पिताजी थे) के घर चला जाता जब वे चाक पर मिटटी का लौंदा डालकर मिटटी के अलग-अलग प्रकार के बर्तन बनाया करते थे.हम घंटों उनके पास बैठकर,उनके हाथों के बीच से बर्तन को आकार लेकर बाहर आते और फिर सधे हाथों से पतली रस्सी से उसे चाक से अलगकर जमीन पर रखते देखते रहते.घंटों सृजन का यह क्रम चलता रहता. थोड़ी धूप दिखाकर उसे आलाव में डालकर पकाया जाता था.जिसे हम पूरी तन्मयता से देखा करते थे.अब समझ आता है प्रकृति भी तो कुछ ऐसा ही करती आ रही है आजतक. यह हमारी दिनचर्या में शामिल था.
लेकिन बाबूजी को अधिक से अधिक लोगों से मिलने में मजा आता था.वह गाँव जाते तो एकबार आस-पास में बसे सभी रिश्तेदारों(क्योंकि लगभग सारे रिश्ते 20 -25 किलोमीटर के दायरे में ही होते थे) से जरूर मिलते थे.उनके साथ रहते-रहते मेरी भी कुछ ऐसी आदत हो गई थी कि जहाँ कहीं भी बाबूजी जाते मैं उनके साथ चल पड़ता .रात हो या दिन,बाबूजी पर इसका कोई असर नहीं पड़ता. तपती दोपहरी हो या चाँदनी रात सिर पर गमछा डाले पिताजी चल पड़ते थे अपने रिश्तेदारों से मिलने.कभी सड़क तो कभी जुते हुए खेतों के बीच से.उनका उत्साह देखते ही बनता था.रिश्तेदारों से जो स्नेह और प्यार मिलता था,जो खतीरदारी होती थी उससे हम अभिभूत हो जाते थे.पिताजी का अपने से बड़ों का पैर छूकर आदर देना और छोटों का उनका चरण स्पर्श करना मुझे भी ऐसा ही करने को प्रेरित करता था.बाबूजी सबसे मेरा परिचय करवाते थे,सबसे मुझे भी मिलवाते थे.
चूँकि साल में एकबार गाँव जाना होता था तो बाबूजी माँ और हमसब भाइयों को साथ लेकर ननिहाल और मौसी के घर भी जाया करते थे.मेरा ननिहाल और एक मौसी की ससुराल भागलपुर जिले के अमरपुर थाने में एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.हम स्टेट बस से पवई उतरकर पैदल ही ननिहाल चले जाते थे. मौसा जी को जैसे ही हमारे आने की खबर लगती वो छप्परवाली बैलगाड़ी लेकर पहुँच जाते क्योंकि मां उसी में बैठकर मौसी के ससुराल जाती थी,पैदल कभी नहीं.मौसी के यहाँ एक अलग ही आनंद आता था.उनका जामुन का एक विशाल पेड़ था.मुझे जामुन खाने का बहुत शौक था.मैं तो बिना कुछ खाए-पीये जामुन खाने पहुँच जाता.मौसाजी भी पीछे-पीछे आते और अपने हरवाहे को पेड़ पर चढ़कर मेरे लिए जामुन तुडवाते थे. मैं दोपहर में भी छिपकर वहां पहुँच जाता और मिटटी के ढेले से जामुन तोड़कर खाता था.
बाद में जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो अकेले ही गाँव चला जाया करता था और पूरी छुट्टी अपने गाँव,मौसी के गाँव,ननिहाल और आस-पास कि रिश्तेदारी में बिताकर लौट आता था,लेकिन खाली हाथ कभी भी नहीं.अपने साथ यादों की ढ़ेरों सौगात लेकर.जिसके सहारे साल यूँ निकल जाते हैं मानों पल बीता हो.

(सफर आगे जारी रहेगा)

रविवार, 29 मई 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (४)

हम सब सबके बचपन के संस्मरण पढ़ कर कुछ अपने भूले हुए कामों को भी याद करने लगे हैं और कितना सुखद लग रहा है ये सब पढ़ कर फिर देर किस बात की है आप अपना बचपन मुझे भेज दीजिये और मैं उसको इस श्रंखला के कड़ी बना कर सबके सामने रख देती हूँ
अब अपना आगे का सफर देखते हैं :

रुण कुमार झा:

‘छुट्टी’ शब्द मानव जीवन के लिए एक अहम शब्द है। इस शब्द में हर्ष और विषाद के दोनों भाव छिपे हुए हैं। हम इसकी गहराई में न जाकर अपने बचपन में बिताई हुई छुट्टी के दिन के उन लम्हों को याद करें, जो अब भी मेरे आपके जेहन में वर्तमान है।
मेरे जैसे करोड़ो बच्चों को अपने स्कूल से गर्मी की छुट्टी का इंतजार रहता है। फिर अपनी-अपनी तरह से वे छूट्टियों का मजा लेने का कार्यक्रम बनाते हैं। मैं भी बचपन में स्कूल से गर्मी की छुट्टी का इंतजार कर रहा था, जैसे-जैसे छुट्टी के दिन करीब आता जाता एक अजीब तरह का उत्साहं दिलो-दिमाग में भरता जा रहा था। आखिर गर्मी की छुट्टी हो गयी थी स्कूल में।
इस बार की छुट्टी कैसे मने और कहाँ मनाई जाये इस पर परिवार में मम्मी-पापा भाई-बहनों से तकरार होता था, जिसकी चलती उसी के पसंद की जगह हम जाते। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार हम सभी मम्मी की पसंद से अपने ननिहाल गये छूट्टी मनाने।
हमारा ननिहाल बिहार के एक पिछड़े इलाके में पड़ता है। गंगा के किनारे वह गाँव बसा हुआ है। मुझे कभी वहाँ अच्छा नहीं लगा। लेकिन मन मार कर हम वहाँ पहुँच गये। पहला दिन तो मैं पछता रहा था और मम्मी को मन ही मन कोस भी रहा था, कि हमें कहाँ ले आयीं , लेकिन नहीं! दूसरे दिन ही मुझे अहसास हुआ कि इससे अच्छी जगह तो छूट्टी बिताने का कोई दूसरी हो ही नहीं सकती । फिर क्या था, तो हम अपने छोटे मामा के साथ गंगा किनारे पहुँच गये, जहाँ हरा-भरा खेत था, और उसमें तरह तरह के मौसमी साग, सब्जी से लेकर तरबूज-खरबूज, ककड़ी, खीरा आदि मन को ललचा रहा था। वहीं गंगा के विशाल पेट जो अब सिर्फ रेत के टिलों से अच्छादित था, हमें अपनी ओर खिंच रहा था। मौन निमत्राण दे रहा था। वहाँ पहुँचते-पहँुचते भीषण गर्मी के कारण हम सब थक गये थे, प्यास के मारे हम सब का बुरा हाल था। अब हम पानी कहाँ से लायें, जल में रह कर मीन प्यासी वाली बात हो रही थी, गंगा के किनारे मौजूद होकर भी हम प्यासे थे, कारण यह था कि जिस कारण से भी हो, गंगा सिमटती जा रही थी, सिकुड़ती जा रही थी। और हम जहाँ पर थे वहाँ से आध किलोमिटर की दूरी पर थी गंगा, जिसमें कंचन पानी था, लेकिन हम सब वहाँ प्यास के कारण पहुँच नहीं सकते थे। अब क्या करें, इसी उहापोह थे कि इतने में एक चमत्कार हुआ। बाल मन के लिए चमत्कार ही था। मामा ने गंगा के पेट से टीले के नीचे की रेत को हाथ से एक सवा फिट गहराई मंे खोदा। खोदते ही पानी लबालब आ गया। फिर क्या था। हम लोगों ने ऐसे कई गड्ढे बनाये और खूब कूद फंाद करता रहा। गंगा के पेट के बीच पहाड़नूमा टीले पर से नीचे कूदना फिर चढ़ना और भाग-भागकर एक दूसरे पर बालू उछालना मुझे इतना अच्छा लगा कि मैं सोचने लगा कि इस से अच्छी जगह तो दूसरी कहीं और हो ही नहीं सकती। जब तक हम ननिहाल में रहे हम इसी प्रकार गंगा के किनारे रेत और खेत में लगे हुए तरबूज-खरबूजों का आनन्द लेते रहे। कभी-कभार नौका विहार का भी आनन्द हमने लिया। यह सब अलौकिक आनन्द से कम नहीं था, गर्मी की छूट्टी का। आज याद करता हूँ तो रोना आ जाता है कि क्या वह भी दिन था और एक आज का भी दिन है। दोनो समय और दिन में कितना फर्क है! क्या वो दिन अब हमारे जीवन में कभी लौट पायेगा?



शिखा वार्ष्णेय :



गर्मियों की छुट्टियाँ ???? वो कैसी होती हैं? हमने तो कभी जाना ही नहीं ।कभी कहीं नहींजा पाते थे हम उन दिनों. बाकी मेहमान ही हमारे यहाँ आया करते थे और उन्हीं के मुँह से सुना करते थे हम ,बर्फ केगोले,कुल्फी, खस के शरवत की बातें...गरम दोपहरी, छत पर रातों को नानी की कहानियों की बातें.हमारी तो गर्मियांमेहमानों को आसपास की जगहों को घुमाने में ही निकल जाती .पर्वतों के ढलानों पर कुलांचे मार कर दूर दूर निकल जातेऔर लौटते हुए नानी याद आ जाती.पेड़ों से कच्चे सेब और आडू तोड़ कर खाते और फिर पेट में दर्द से रोते.चीड के पेड़ों सेउसके फूल तोड़ कर लाते और घर आकर उन्हें खूबसूरत रंगों से सजाते.पलक झपकते ही सारी गर्मियां निकल जाती.हमेंकभी गर्मियों की छुट्टियाँ मिली ही नही ...क्यों??? अरे भाई क्योंकि हमारा बचपन पहाड़ों पर बीता और वहां छुट्टियाँगर्मियों में नहीं जाड़ों में होती हैं :) ही ही ही.


चलिए शिखा ने तो गर्मियों की सर्दियों में बदल दिया , भाई वह उनके अपने मौसम के अनुसारछुट्टियाँ हो होती थीलेकिन छुट्टियाँ तो छुट्टियाँ हैकभी भी उनको एन्जॉय किया जाय


(सफर अभी जारी रहेगा।)

शनिवार, 28 मई 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (३)


अजित गुप्ता :



गर्मियों की छुट्टियों में बचपन के वे दिन

गर्मियों की छुट्टियों का किसे इंतजार नहीं होता? हमें भी होता था। मेरा बचपन जयपुर में बीता। जयपुर में एक मन्दिर परिसर में घर था जहाँ केवल दस-बारह ही परिवार रहते थे। बड़ा सारा मोगरे का बगीचा था, परिसर के चारों तरफ शहतूत के पेड़ लगे थे। हमारे घर के बाहर एक खिरनी का पेड़ था, जिसमें बहुत कम खिरनी लगती थी, लेकिन लगती थी। एक तरफ के खाली मैदान को हमने खेल मैदान बना रखा था। जिसमें क्रिकेट, बेडमिन्‍टन और रिंग खेली जाती थी। हमारे परिसर के सारे ही परिवार सुबह के खाने से दस बजे तक फारिग हो जाते थे। क्‍योंकि हमारे परिवार को छोड़कर सभी व्‍यवसायी थे। जैसे ही पुरुष घर से बाहर और सारे ही बच्‍चे और महिलाएं हमारे पड़ोस के घर में एकत्र हो जाते थे। कभी ताश का दौर चलता तो कभी चौपड़ का। कभी केरमबोर्ड भी आ जाता। बीस-पच्‍चीस लोगों का हुजूम सारा दिन धमाचौकड़ी करता। कोई ताश खेल रहा होता तो कोई चौपड़। चौपड़ जब बिछती तो सारा हुजूम ही वहाँ उमड़ता और पासे कितने आएंगे और किस गोटी को कूटना है, बस इसी का शोर रहता। केरमबोर्ड में भी रानी किसकी होगी, इसके लिए खूब तमाशा होता।

शाम होने को आती तो महिलाएं रसोई में चले जाती और हम बच्‍चे या किशोर निकल पड़ते क्रिकेट खेलने। मैदान तो खूब बड़ा था ही। कभी हमारे साथ बड़े भी आ जुटते तो खेल में परिवर्तन भी हो जाता। क्रिकेट से बेडमिन्‍टन और रिंग पर आ जाते। लेकिन यह दौर चलता लगभग सूरज के अस्‍त होने तक। हम सब जैन परिवार थे तो सभी सूर्यास्‍त से पूर्व भोजन करते, इसलिए प्रत्‍येक घर से आवाजे आने लगती कि अब खेल बन्‍द करो, नहीं तो खाना नहीं मिलेगा। जैसे-तैसे सूर्यास्‍त से पूर्व भोजन करते और फिर निकल पड़ते सैर करने। इस बार हमारी मित्रमंडली ही साथ होती। हम लोग जहाँ रहते थे वहाँ रेत के बड़े-बड़े टीले थे। बस जाकर जम जाते किसी एक टीले पर। धीरे-धीरे हमने बड़ों को भी चश्‍का लगा दिया और वे हमारे साथ आने लगे। हमारा काम और आसान हो गया, अब हमें घर आने की जल्‍दी नहीं थी। रात नौ बजे तक हम टीलों पर ही फिसलते रहते। कबड्डी खेलते रहते। जयपुर में हमारा घर शहर के परकोटे के बाहर था, हम रेत के टीलों की ओर जाते और कुछ भी बोलते तो परकोटे की दीवार से प्रतिध्‍वनी लौटकर आती। हम छोटे बच्‍चों को खूब डराते। आवाज लगाते कि इस पीपल के पेड़ पर भूत रहता है। प्रतिध्‍वनी आती कि रहता है, रहता है।

रात को लौटने के बाद भी हम घर नहीं जाते, मोगरे के बगीचे के पास ही एक कुआँ था और बगीचे को पानी देने के लिए एक हौज बना रखा था, बस हमारी सहेली मण्‍डली वहीं जमती। जब हौज में पानी होता तो उसमें डुबकी भी लगा लेते। जब रात अधिक हो जाती तब लगता कि अब घर जाने पर डाँट अवश्‍य पड़ेगी। लेकिन हम चुपचाप से अपनी खटिया पर बिस्‍तर डालकर सो जाते। हमारे यहाँ छत नहीं थी तो घर के बाहर खटिया डालकर ही सोते थे। पास-पास दो घर थे तो पास-पास ही खटिया लगी होती। काफी देर तक भी खुसुर-पुसर चलती रहती, इस डर से बेपरवाह कि यदि पिताजी जग गए तो डण्‍डे पड़ेगे। बोरियत क्‍या होती है इस शब्‍द का जीवन में अता-पता ही नहीं था। कभी शाम को मन्दिर भी चले जाते और खूब आरती और भजन गाकर भगवान को भी प्रसन्‍न करने का प्रयास कर लेते। हमारे पास काम ज्‍यादा थे और समय कम। स्‍कूल से होमवर्क भी मिलता था लेकिन हमने शायद ही कभी किया हो। एक बात और, सुबह को पिताजी जल्‍दी ही जगा देते। हमारे घर के पास गलता जी नामक तीर्थ है। बस रोज सुबह ही पिताजी के साथ वहाँ पैदल जाते। पहले चढ़ाई फिर ढलान और तब जाकर पानी का बड़ा कुण्‍ड। वहाँ खूब नहाते। लेकिन मैंने तैरना नहीं सीखा, सारे ही भाई-बहनों ने सीखा लेकिन मैं इस मामले में डरपोक निकली। पिताजी अक्‍सर गलता जी से भी बहुत आगे तक हमें ले जाते लेकिन इससे हमारी दिनचर्या में कोई अन्‍तर नहीं आता। अब क्‍या कोई किशोर ऐसी छुट्टियां व्‍यतीत करता है, जो हम करते थे? यह तो दिनचर्या है गर्मी के दिन की लेकिन जब बरसात आ जाती थी तब रेत के धोरों में खेलने का आनन्‍द ही कुछ और था। लेकिन वो फिर और कभी।





वंदना गुप्ता :

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन........

समझ नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ? ये बात तो है कि बचपन कब आता है और कब गुजर जाता है पता ही नहीं चलता . फिर भी बचपन की कुछ मीठी मीठी यादें हर किसी के ज़हन में ताज़ा रहती हैं और हमारी तो ज्वाइंट फॅमिली थी मतलब सभी एक ही घर में रहते थे .......मेरे ताउ जी और उनकी फॅमिली हम सब एक ही घर में रहते थे और ३ ताऊ जी थे और उनके भी बच्चे तो काफी बड़ी फॅमिली थी.
छुट्टियों का इंतजार हम सब को रहता था क्यूँकि उसमे हम सभी बहुत धमाल मचाते थे . मेरी बड़ी बहन के बच्चे और मेरे ताऊ जी की बेटियों के बच्चे भी छुट्टियों में आ जाते थे तो सारा दिन घर में जैसे जश्न सा मानता रहता था.........गर्मी चाहे कितनी ही हो मगर हमारा छोटा सा कमरा था सारे बच्चे उसी में आकर बैठ जाते थे और कभी कुछ खाना पीना तो कभी खेलना और कभी चुटकुले सुनना और कभी पहेलियाँ पूछना..........दिन कहाँ निकल जाता था पता ही नहीं चलता था और रातों का भी ऐसा ही आलम था.

दिन में हम सभी ज्यादातर ताश खेलते या लूडो ........ताश में भी पत्तादाब या सीप और उसमे भी अपने अपने पार्टनर पहले बना लेते थे. सब पहले से सेट करके रखते यहाँ तक कि इशारे भी सेट होते थे ताकि हार ना जाएँ ...........और फिर उसमे लड़ाइयों का आलम तो पूछिए ही मत........रोज लड़ना झगड़ना और मेरी मम्मी के पास सबका आना और फिर उनका सुलह करवाना...........तब वो भी खेल में शामिल हो जाती थीं मगर मेरी मम्मी बहुत सीधी थीं या जानबूझकर हम से हार जाती थीं मगर हम बच्चे बहुत खुश हुआ करते थे . और जो हमसे छोटे बच्चे थे वो हमारे साथ खेलने को झगड़ते थे ........ये यादें ऐसी हैं कि आज भी जब हम सब मिलते हैं तो याद करते हैं.........एक ताश में गेम होता था लाद ........उसे खेलने के लिए कई बार हम १५ -१५ लोग होते और पत्ते ३-४ ही हाथ में आते थे और शोर ऐसा कि क्या बताएं उस पर बड़ों की डांट पड़ती सो अलग ...........इन सभी खेलों में हमारे साथ हमारे बड़े भाई भी शामिल हो जाते थे तब अलग ही बात होती थी खेल की.........यहाँ तक कि रात के १ बज जाते मगर किसे होश ? और तब मेरे बाऊ जी सबको डांट लगाते सोना नहीं है क्या और हम सब चुपचाप जाकर सोने की कोशिश करते .........उन दिनों छतों पर सोया करते थे और छत पर सोने का अपना ही मज़ा होता था ..........शाम को ही छतों पर पानी डाल आया करते थे ताकि ठंडी हो जायें और फिर हम सब बिस्तर लगाकर घंटों मस्ती मारा करते .........कभी वो सब अपने स्कूल की बातें सुनाते तो कभी भूत प्रेतों की बात करते और फिर सब डरते........एक अलग ही समा था जो अब लौटकर नहीं आने वाला........
उन्ही दिनों १९८३ में जब इंडिया ने वर्ल्ड कप जीता था तो हम सब एक साथ थे और घर में रात को देर तक टीवी देखने में पाबन्दी थी मगर हम जब तो ठहरे जुनूनी .......जब तक तो देख सकते थे टीवी पर देखा और जब हमें बड़ों का हुक्म आ गया कि सो जाओ तो चुपचाप जाकर सोने की एक्टिंग की और थोड़ी देर में ही बराबर के पडोसी की खिड़की हमारी खिड़की के सामने पड़ती थी और वहाँ टीवी लगा हुआ था तो हम सबने अपनी खिड़की से आखिर का मैच देखा और उसमे भी सबके टशन थे कि जैसे ही कोई हिलता और कोई आउट होता तो उसे कह देते कि अब हिलना मत वरना आउट हो जायेगा........ना जाने कैसे कैसे अन्धविश्वास पाल लिए थे उस पल हम सभी ने .........मगर जब इंडिया जीता तो ख़ुशी की सीमा नहीं थी और हम सबने उसे बहुत एन्जॉय किया ...........वो भी कुछ ऐसे लम्हात थे जहाँ बहुत बेफिक्री थी ........कोई चिंता नहीं बस सारा दिन सारे घर में कभी धूप में तो कभी छाँव में धमाचौकड़ी मचाना और शाम को छत पर पतंग उडाना ......बेशक मुझे नहीं आती थी मगर मेरे भांजे तो थे ना वो सब उड़ाते और हम सब उनकी हेल्प करते ..........अब तो सिर्फ यादें हैं और कई बार कहती हैं ..........कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.






वंदना अवस्थी दुबे :

मैं मूढमति .

छुट्टियों के नाम पर मुझे वो छुट्टियाँ भुलाए नहीं भूलतीं, जब हम गर्मियों की छुट्टी में अपने पुश्तैनी गाँव जाया करते थे. ये अलग बात है कि उस वक्त मैं बहुत छोटी थी, और मेरा हर काम दीदियों का मोहताज हुआ करता था. उनके खेलों में मैं किसी प्रकार कच्ची लोई मान के शामिल कर ली जाती थी, और तमाम खेलों में मेरी सहभागिता केवल उन सब के पीछे-पीछे दौड़ने तक ही सीमित थी. मेरी खूब सारी दीदियाँ मिल के गुडिया की शादी करतीं, और मुझे ढोल बजाने का काम सौंप , खेल की मुख्य धारा से अलग कर देतीं
(
ये बाद में समझ में आया). और मैं मूर्खमति, मिटटी के मटके के मुंह पर कागज़ चिपका के बनाए गए ढोल को पीटती, एक तरफ बैठी खुद को अति महत्वपूर्ण समझती. ऐसी ही बहुत सारी यादें हैं, लेकिन यहाँ लिखूंगी, तो पूरी पोस्ट ही बन जायेगी :) अभी इतना ही बाकी फिर कभी. ठीक है ?
(सफर अभी जारी रहेगा)

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन ! (२)

डॉ रूपचंद शास्त्री "मयंक"



पिकनिक में मामा मामी उपहार में मिले !


यह बात 1966 की है। उन दिनों मैं कक्षा 11 में पढ़ रहा था। परीक्षा हो गईं थी और पूरे जून महीने की छुट्टी पड़ गई थी। इसलिए सोचा कि कहीं घूम आया जाए। तभी संयोगवश् मेरे मामा जी हमारे घर आ गये। वो उन दिनों जिला पिथौरागढ़ में ठेकेदारी करते थे। उन दिनों मोटरमार्ग तो थे ही नहीं इसलिए पहाड़ों के दुर्गम स्थानों पर सामान पहुँचाने का एक मात्र साधन खच्चर ही थे।
मेरे मामा जी के पास उन दिनों 20 खच्चर थीं जो आरएफसी के चावल को दुर्गम स्थानों तक पहुँचातीं थीं। दो खच्चरों के लिए एक नौकर रखा गया था इसलिए एक दर्जन नौकर भी थे। खाना बनाने वाला भी रखा गया था और पड़ाव बनाया गया था लोहाघाट। मैं पढ़ा-लिखा था इसलिए हिसाब-किताब का जिम्मा मैंने अपने ऊपर ही ले लिया था।
मुझे यहाँ कुछ दिनों तक तो बहुत अच्छा लगा। मैं आस-पास के दर्शनीय स्थान मायावती आश्रम और रीठासाहिब भी घूम आया था। मगर फिर लौटकर तो पड़ाव में ही आना था और पड़ाव में रोज-रोज आलू, अरहर-मलक की दाल खाते-खाते मेरा मन बहुत ऊब गया था। हरी सब्जी और तरकारियों के तो यहाँ दर्शन भी दुर्लभ थे। तब मैंने एक युक्ति निकाली जिससे कि मुझे खाना स्वादिष्ट लगने लगे।
मैं पास ही में एक आलूबुखारे (जिसे यहाँ पोलम कहा जाता था) के बगीचे में जाता और कच्चे-कच्चे आलूबुखारे तोड़कर ले आता। उनको सिल-बट्टे पर पिसवाकर स्वादिष्ट चटनी बनवाता और दाल में मिलाकर खाता था। दो तीन दिन तक तो सब ठीक रहा मगर एक दिन बगीचे का मालिक नित्यानन्द मेरे मामा जी के पास आकर बोला ठेकेदार ज्यू आपका भानिज हमारे बगीचे में से कच्चे पोलम रोज तोड़कर ले आता है। मामा जी ने मुझे बुलाकार मालूम किया तो मैंने सारी बता दी।
नित्यानन्द बहुत अच्छा आदमी था। उसने कहा कि ठेकेदार ज्यू तुम्हारा भानिज तो हमारा भी भानिज। आज से यह खाना हमारे घर ही खाया करेगा और मैं नित्यानन्द जी को मामा जी कहने लगा।


उनके घर में अरहर-मलक की दाल तो बनती थी मगर उसके साथ खीरे का रायता भी बनता था। कभी-कभी गलगल नीम्बू की चटनी भी बनती थी। जिसका स्वाद मुझे आज भी याद है। पहाड़ी खीरे का रायता उसका तो कहना ही क्या? पहाड़ में खीरे का रायता विशेष ढंग से बनाया जाता है जिसमें कच्ची सरसों-राई पीस कर मिलाया जाता है जिससे उसका स्वाद बहुत अधिक बढ़ जाता है। ऐसे ही गलगल नीम्बू की चटनी भी मूंगफली के दाने भूनकर-पीसकर उसमें भाँग के बीज पीसकर मिला देते हैं और ऊपर से गलगल नींबू का रस पानी की जगह मिला देते हैं। (भाँग के बीजों में नशा नहीं होता है)
एक महीने तक मैंने चीड़ के वनों की ठण्डी हवा खाई और पहाड़ी व्यंजनों का भी मजा लिया। अब सेव भी पककर तैयार हो गये थे और आलूबुखारे भी। जून के अन्त में जब मैं घर वापिस लौटने लगा तो मामा और मामी ने मुझे घर ले जाने के लिए एक कट्टा भरकर सेव और आलूबुखारे उपहार में दिये।
आज भी जब मामा-मामी का स्मरण हो आता है तो मेरा मन श्रद्धा से अभिभूत हो जाता है।
काश् ऐसी पिकनिक सभी को नसीब हो! जिसमें की मामा-मामी उपहार में मिल जाएँ!
--
आज वो पहाड़ी मामा-मामी तो नहीं रहे मगर उनका बेटा नीलू आज भी मुझे भाई जितना ही प्यार करता है।
पहाड़ का निश्छल जीवन देखकर मेरे मन में बहुत इच्छा थी कि मैं भी ऐसे ही निश्छल वातावरण में आकर बस जाऊँ और मेरा यह सपना साकार हुआ 1975 में। मैं पर्वतों में तो नहीं मगर उसकी तराई में आकर बस गया।


संगीता स्वरूप :




रेखा जी का मेल आया कि बचपन में गर्मी कि छुट्टियाँ कैसे बितातीं थीं इस परकुछ लिख कर भेजो .... अब बताइए कल कि बात याद नहीं रहती और वो हैं किइतने पुराने दिनों कि याद ताज़ा करने को कह रही हैं ...चलिए कोशिश करती हूँस्मृति मंजूषा खोलने की ..

मेरे पापा उत्तर-प्रदेश के इरिगेशन डिपार्टमेंट में इंजिनियर थे तो हमेशा ही पोस्टिंग छोटी छोटी जगह ही हुई ..कस्बेनुमाकॉलोनी में ही रहते हुए बचपन बीता ..
गर्मियों की छुट्टियों में हमारा तो कहीं घूमने जाना नहीं होता था बस शहरों में रहने वाले रिश्तेदार ही शुद्ध वातावरण काआनन्द लेने हमारे यहाँ आ जाते थे ...इस तरह हम जाएँ या न जाएँ पर छुट्टियाँ खूब मस्ती में बीत जाती थीं ..बचपन सेही खेलों का बहुत शौक रहा है ..हर तरह के इनडोर गेम्स ..कैरम , चाईनीस चैकर .. और ताश ... और जब सब मिल करखेलते थे तो लड़ाई होना भी लाज़मी था ..सबसे ज्यादा मज़ा आता था जब दिल्ली से ताई जी आती थीं ,
क्यों कि उनके साथ आते थे हमारी उम्र के बराबर के ही तीन बच्चे .. हम सबमें एक डेढ़ साल की उम्र का ही अन्तर थाइसलिए उनके साथ बहुत मज़ा आता था ..गर्मी की दोपहर में ..पापा तो ऑफिस चले जाते थे और माँ और ताई जी हमपाँचों को ज़बरदस्ती सुला देती थीं ... पर हम लोंग सोते कहाँ थे ..जैसे ही दोनों सोयीं सब एक एक करके भाग लेते थे औरअपने ही कम्पाउंड में लगे आम अमरुद के पेड़ों पर चढ तोड़ लाते थे ..कभी करोंदे और निम्बू भी तोड़ लाते थे हांलांकिनिम्बू और करौंदे तोडने में हाथ काँटों से छिल भी जाते थे ..और यह सब देख कर कभी माँ की डांट के साथ साथ मार भीपड़ जाती थी ... क्यों कि हम कच्चे पक्के सब निम्बू और करौंदे तोड़ लाते थे ... सूरज ढलने पर आँगन में खूब छिडकावकरना ..सारे बच्चे छिडकाव के लिए पाईप लेने के लिए छिना झपटी करते थे और इस तरह एक दूसरे पर खूब पानीडालते थे .. यह स्नान क्रिया तब तक बंद नहीं होती थी जब तक कोई बड़ा आ कर पानी बंद नहीं कर देता था ...रात मेंआँगन में ही चारपाईयां बिछायी जाती थीं ..देर रात तक खुसर फुसर होती रहती थी ..तब ताई जी कहतीं थीं कि चलो एकगेम खेलते हैं .. देखते हैं कौन कितनी देर चुप रह सकता है ... जो पहले बोलेगा उसे सजा मिलेगी ...इस गेम का लॉजिकबाद में समझ आया ... ..
खैर इन सबसे इतर एक घटना मैं साझा करना चाहूंगी ...जिसको मैं ज़िंदगी भर नहीं भूल सकती .. बात तब की है जब मैं८ या ९ साल की रही होऊँगी ... पापा की पोस्टिंग रिहंद में थी ... वहाँ रिहंद बाँध बन रहा था ..ये मिर्ज़ापुर से करीब १००किलोमीटर दूर है ..कुछ लोगों को कॉलोनी में घर मिला हुआ था बाकी लोगों को जहाँ सुविधा हुई वहाँ दे दिया गया थाहमारा घर ऐसी जगह था जहाँ घर के पीछे से ही जंगल शुरू हो जाता था ..और बचपन में हम उस जंगल में बहुत घूमतेथे ..एक बार ताई जी जब आयीं तो अपने साथ मिर्जापुर की छडियां लायीं थीं ...पूरी छ: .. पूछने पर बताया कि वहाँ कीमशहूर हैं ... (अब पता नहीं कि मशहूर थीं या नहीं पर उन छड़ियों से एक दो बार पिटाई ज़रूर हो गयी हमारी ) अब हमसब बच्चों को धुन कि इन छड़ियों को लेकर जंगल की सैर की जाए ... ..
बस मौके की तलाश थी ॥और एक दिन दोपहर को मिल गया मौका ...माँ और ताई जी गहरी नींद में थीं कि हम पांचोएक एक छड़ी उठा कर घुस गए जंगल में ...शुरू में तो जंगल इतना गहन नहीं था ..और एक दूसरे को कहते हुए हम आगेही बढते गए ..इतनी दूर तक इससे पहले हम लोंग कभी नहीं गए थे ..८ साल से १२ साल की उम्र के बच्चे हर ओर सेनिश्चिन्त हल्ला गुल्ला करते चले जा रहे थे ..सामने ही एक खायी दिखाई दी ..जिसमें एक गाय का पूरा कंकाल दिख रहाथा ..हम सब ही थोड़ा डर गए ..इतने में ही बड़ी जोर से किसी जानवर की आवाज़ सुनाई दी और हम सारे के सारे उलटेपाँव भागे ... डर के मारे बुरा हाल था ...मैं और मुझसे छोटा एक मेरा कज़िन सबसे पीछे ... छड़ी थी कि और परेशान कररही थी ... वो फेंक फांक कर जो दौड लगाई है ..और साथ में हम दोनों जो सबसे पीछे थे रोते भी जा रहे थे ...फिर दोनों बड़ेभईया हमारा हाथ पकड़ कर लगभग घसीटते हुए आखिर जंगल से बाहर ले ही आए ... और हमने चैन की साँस ली ... घर जाने से पहले सबने तय कर लिया कि किसी को कुछ नहीं बताना है ..क्यों कि बताने से डांट पड़ती तो दोनों बड़ेभाइयों को ही पड़ती तो उनकी सख्त ताकीद थी कि खबरदार जो कुछ कहा .. हमने तो कुछ नहीं कहा ...पर उन छड़ियों नेकह दिया जो हम फेंक आए थे ...माँ लोग सच ही बड़ी जासूस होती हैं ..तब समझ नहीं आता था ... कि कैसे सब पता चलजाता है ..जब छड़ियाँ कम मिलीं तो खोज शुरू हुई और सबकी पेशी ...आखिर डरते डरते सब बता दिया ...लेकिन लगताहै हादसा कुछ ज्यादा ही गंभीर था तब डांट के बजाये प्यार से समझाया गया ...और तब जा कर पता चला कि वो दहाड़छोटे मोटे जानवर की नहीं शेर की थी ... .. जो अक्सर रात को घर के आस पास भी आ जाया करता था ..... आज भी इसघटना को याद कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं । ,,

** ये यादें सबने बड़े जतन से संजोयीं है और जिसने जैसे साझा की उसमें मैंने बिल्कुल भी क़तर व्योंत की जरूरत नहीं समझी आप भी सब पढ़े और उस बचपन के बारे में जानें जो फिर कभी आएगा नहीं ये यादें एक धरोहर है

(ये सफर अभी जारी रहेगा)