मंगलवार, 3 जनवरी 2012
भ्रष्टाचार कम कहाँ?
हमारे रेलवे प्रशासन ने तत्काल रिजर्वेशन पर बहुत लगाम कसने के लिए प्रावधान किये। समय ४८ घंटे के बजाय २४ घंटे कर दिया। यात्री का आई कार्ड भी जरूरी बना कर उसका विवरण भी लेना शुरू कर दिया लेकिन इसके बाद भी दलालों का काम पूरे जोर शोर से चल रहा है क्योंकि हमारा रेलवे प्रशासन ही उनको पनाह दिए हुए है। पिछले दिनों मेरी बेटी को अचानक नागपुर जाने के लिए तत्काल टिकट लेना था। मेरा किसी भी दलाल से काम करवाने का कभी कोई इरादा नहीं रहा। चूँकि ऑन-लाइन रिजर्वेशन तत्काल में नहीं हो पा रहा था।
यही पास के कल्यानपुर रेलवे आरक्षण केंद्र पर मेरे पतिदेव सुबह सुबह पहुँच गए लेकिन टिकट खिड़की खुलते ही कुछ लड़के धक्का मुक्की करके आगे जाकर खड़े हो गए और उनके पास ७-८ फॉर्म भरे हुए थे और उन्होंने क्लर्क को पकड़ा दिए। ठीक ८:०४ मिनट पर कानपुर से नागपुर की ४९ सीट भर चुकी थी। हम घर में देख रहे थे नेट पर और पतिदेव को वापस आने को कहा। लेकिन रिजर्वेशन बहुत जरूरी लेना था। दूसरे दिन फिर भेजा गया और हश्र वही हुआ। तीसरे दिन मेरी बेटी ने कहा कि पापा मैं आपके साथ चलती हूँ। शायद मुझे जल्दी मिल जाए।
स्थिति रोज की तरह से थी। केंद्र के बरामदे men लगे हुए gril के बाहर कुछ लोग खड़े हुए थे और इन लोगों के पहुँचते ही एक टोकन पकड़ा दिया कि आपका दसवां नंबर है। इसका रेलवे से कोई लेना देना नहीं था। चैनल के खुलते ही लड़के धक्का मुक्की करते हुए आगे लग गए। लेकिन उसने लड़की होने के नातेउनके बीच में खड़ी नहीं हुई । दूसरे नंबर पर जगह मिल गयी। दो खिड़कियों में एक पर एक महिला थी और वह सबसे आगे खड़े एजेंट के सात फॉर्म लेकर भर रही थी। दूसरी खिड़की पर मेरी बेटी खड़ी थी। दो दिन से हम नेट पर स्थिति देख रहे थे , उसने वाकई उस जगह बगावत की - उसने अपनी खिड़की पर रिजर्वेशन करने वाले क्लर्क से कहा कि आप एक आदमी से सिर्फ एक फॉर्म लेंगे नहीं तो फिर आज मैं इसी जगह पर पुलिस को बुलाती हूँ और आपकी कम्प्लेंट करुँगी। वहाँ पर खड़े लोगों में वाकई गाली गलौज चल रही थी क्योंकि वे सभी दलालों के आदमी थे। जैसे ही एक रिजर्वेशन हुआ उसने उसी आदमी का दूसरा फॉर्म निकाला और भरने से पहले ही बेटी चिल्लाई कि पहले मेरा फॉर्म लीजिये नहीं तो इसी वक्त आपकी शिकायत करुँगी । शायद वह कुछ शरीफ था या फिर सिर्फ एक रिजर्वेशन की बात थी उसने कर दिया। मेरे पतिदेव ने आकर बताया कि मैं पिछले दो दिन से यही तमाशा देख रहा हूँ कि यही लड़के धक्का मुक्की करके आगे खड़े हो जाते हें फिर ७-८ फॉर्म देकर खड़े रहते हें दूसरे लेने वालों के लिए तब तक आरक्षण समाप्त हो चुका होता है।
क्या इस दलाली को देने के लिए हम खुद जिम्मेदार नहीं है क्योंकि हम टिकट खिड़की तक जाने की जहमत उठना नहीं चाहते हें और फिर कौन लाइन में लग कर खड़ा रहे। सबसे बेहतर है कि दलाल को सौ , दो सौ रुपये दिए जाएँ और फिर टिकट तो मिल ही जाएगा। ये भी भ्रष्टाचार का एक हिस्सा है और हम इस भ्रष्टाचार को हवा देने वाले हें। वैसे इस बात से रेलवे प्रशासन भी वाकिफ होता है लेकिन इस तरह से अगर औचक निरीक्षण करवाया जाय तो ऐसे कामों को रोका जा सकता है। अब हम ही सोचें क्या इस काम के लिए हम कुछ कर सकते हैं।
गुरुवार, 29 दिसंबर 2011
मध्यस्थता - एक निष्पक्ष कर्म !
- मध्यस्थता एक बहुत ही निष्पक्ष और पवित्र कर्म होता है। ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ आज होने लगा हो बल्कि इसके अस्तित्व को तो प्राचीन काल से ही पाया जाता है। अगर इस कार्य को करने वाला व्यक्ति प्रबुद्ध और जिम्मेवार हो और सामाजिक मूल्यों और नैतिक दायित्वों का सम्मान करने वाला हो तो उसकी भूमिका समाज में और ऐसे लोगों के लिए - जिनके जीवन के कुछ पहलू सिर्फ गलतफहमी या फिर विचार विभिन्नता के कारण त्रस्त हो रहे हों या फिर गलत को गलत का अहसास होने पर भी स्वीकारोक्ति से संकोच होता हो तो मध्यस्थता करके उन संबंधों को बचाया जा सकता है - भगवान होता है।
इस कार्य की भूमिका पर लिखने के लिए एक छोटी से घटना ने मजबूर कर दिया। मेरे परिचित की बेटी की शादी उनके एक रिश्तेदार ने मध्यस्थ बना कर करवाई थी। लड़के वाले लड़की वाले दोनों के साथ उनका रिश्ता बनता था। लड़का दूर का रहने वाला था , उन्होंने जो भी इस विषय में बताया लड़की वाले ने विश्वास कर लिए क्योंकि अमूमन हम ऐसा मानते हें कि ये हमारा इतना सगा रिश्तेदार है कोई गलत बात नहीं कहेगा - जो बताएगा वह सच होगा। उन्होंने अधिक छानबीन नहीं की और अपनी बेटी की शादी कर दी। बेटी जब लौट कर आई तो उसने बताया कि उसका पति तो बहुत शराब पीता है और सारी कमाई उसी में उड़ा देता है। अभी सास ससुर हैं तो उसके सारी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं ।
एक बेटी के पिता के लिए ऐसी सूचना जीते जी मारने वाली हो गयी, मध्यम वर्ग का पिता न तो बेटी को वापस घर में बुला कर रख सकता है और न ही बेटी के बारे में आँखें मूँद सकता है। जब बेटी मायके आ जाती तो वह शराब पीकर फोन पर सास ससुर को गालियाँ देता और पत्नी के लिए तो जीना हराम कर देता और वह अपने माँ बाप को इस जलालत से बचाने के लिए वापस ससुराल चली जाती। फिर एक दिन खबर आई कि उनकी बेटी नहीं रही - क्योंकि शराबी पति ने नशे में उसके सर पर कोई चीज दे मारी थी और वह वही गिर कर ख़त्म हो गयी।
आज नेट का युग आ गया है रिश्ते उससे भी मिल रहे हें लेकिन उसकी भी जानकारी शत प्रतिशत सही नहीं होती हें और प्राचीन काल से चली आ रही विवाह संस्था के लिए उपयोगी मध्यस्थता ही काम आती है। वह ही दोनों पक्षों को सूचनाएं देता है। अगर आप ऐसा कोई रिश्ता करवा रहे हें या फिर किसी के सम्बन्ध के मध्य आये हुए वैमनस्य को सुलझाने का प्रयास कर रहे हें तो इस बारे में आपको कभी भी झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए। कुछ ऐसी आचार संहिता होनी चाहिए कि जिससे कि मध्यस्थ पूरी तरह से अवगत हो और उसका आत्मिक तौर से पालन करे। आपका झूठ या फिर एक पक्ष को खुश करने का प्रयास दूसरे लिए जीवन भर का नासूर बन सकता है।
--अगर आप विवाह के लिएय मध्यस्थ कर रहे हें तो लड़की और लड़के के विषय में यदि पूरी जानकारी आपको हो तो पहले आप ही इस बारे में निश्चित कर लें कि दोनों परिवार एक दूसरे के काबिल हें या नहीं। उनके स्तर का अंतर , शिक्षा का अंतर और विचारों का अंतर उनके जीवन के लिए अभिशाप साबित हो सकता है। गलत सूचना देने पर इसके उत्तरदायी आप ही होंगे।
--दोनों परिवारों को आर्थिक, सामाजिक स्तर में साम्य देखें , लड़के की किसी कमी के कारण गरीब घर की लड़की का रिश्ता करवाने का कभी प्रयास न करें क्योंकि इसमें लड़की का जीवन नरक बन जाता है। वह बड़े घर में पहुँच तो जाती है लेकिन उसकी स्थिति कभी भी उस दर्जे की पत्नी कि नहीं हो पाती है जितना कि उसे अपने स्तर के परिवार में मिल सकता था।
--आप दोनों परिवारों के आपस में मिलवा दें और शेष जानकारी उन्हें खुद ही इकट्ठी करने की बात कहें ताकि बहुत सी बातें जो आपको मालूम नहीं है और छानबीन के बाद पता लगायी जा सकती हें उनका दोष आपके सर पर न आये।
--सिर्फ रिश्ता करवाने के लिए दोनों पक्षों को एक दूसरे के विषय में भ्रम में न रखें, क्योंकि कुछ लोग दोनों पक्षों को एक दूसरे के बारे में लम्बी चौड़ी बाते बताते रहते हें सिर्फ इस उद्देश्य से कि किसी लड़के/लड़की का भला कर रहे हें। यहाँ आप भला नहीं कर रहे हें बल्कि उनके जीवन से खिलवाड़ कर रहे हें ।
--दोनों पक्षों को अगर आप जानते हों तो लड़की या लड़के के बारे में कोई दोष ज्ञात हो तो स्पष्ट रूप से बता दें ताकि दोनों पक्ष इस विषय में विचार कर सकें कि इस सम्बन्ध को हम स्वीकार कर सकते हैं या नहीं।
--अगर आप किसी के विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थ कर रहे हैं तो उस बारे में भी निष्पक्ष भूमिका निभानी चाहिए, एक दूसरे को गलत जानकारी देकर भ्रमित न करें।
--किसी टूटते हुए रिश्ते या फिर परिवार के लिए आप देवता स्वरूप हो सकते हें कि क्योंकि कई बार अपनी गलतियों का अहसास होने पर भी दोनों का अहंकार या पहल का संकोच उन्हें सही दिशा में नहीं जाने देता है और अगर आप इससे वाकिफ है तो इस दिशा में आपकी पहल किसी रिश्ते और परिवार को बचा सकती है।
--जब तक आप पूरे तथ्यों और सत्य से परिचित न हों उसके बारे में मिथ्या दावा न करें। आपका उपकार करने का विचार कहीं अपकार में न बदल जाए। हम दावा सिर्फ उन्हीं बातों में कर सकते हें जिन्हें हम गहराई से जानते हों।
शादी विवाह करवाना कुछ लोगों का धंधा होता है और इसके लिए वे झूठ और सच कुछ भी बोल सकते हें। ऐसे लोगों के बारे में जानकर कभी उनका विश्वास न करें। ये मध्यस्थ नहीं बल्कि दलाल होते हें जो किसी न किसी दृष्टि से अपने लाभ की सोचते हें। मध्यस्थ सिर्फ और सिर्फ एक जागरूक और जिम्मेदार व्यक्ति ही नहीं होता है बल्कि मानव जीवन के बारे में हितचिन्तक भी होता है। इसलिए मध्यस्थता की गरिमा को समझें , इस समाज में इस कार्य का बहुत ही महत्व है लेकिन यदि इसको करने वाला इसकी गरिमा से पूरी तरह से परिचित हो।
बुधवार, 7 दिसंबर 2011
ये जनसेवक हें !
इन सांसदों को मुगलसराय स्टेशन पर पटना-नई दिल्ली राजधानी में ए सी वन में सीट न मिलकर ए सी टू में सीट मिली थी। फिर क्या था - सांसद बिफर ही तो पड़े। उनका कहना था कि जब रेलवे प्रशासन को ये पता था कि हम संसद सत्र में भाग लेने के लिए जा रहे हें तो अलग से कोच की व्यवस्था क्यों नहीं की गयी? बाद में वे काफी मान-मनोव्वल के बाद उसी में गए लेकिन रेल मंत्री से बात करने की बात की धमकी देकर।
हमें सांसद समूह से सिर्फ ये पूछना है कि सांसद बनने से पहले कभी भी उन्होंने ए सी वन के अतिरिक्त रेल में सफर नहीं की है। जब आम आदमी टिकट लेने के बाद भी सीट नहीं ले पाता है, वेटिंग में टिकट लेकर भी वह टी टी के पीछे भागता है कि उसको कहीं एक सीट दिलवा दे और वे सुविधा शुल्क वसूल करके कहीं बैठने की जगह दे देते हें। यहाँ तक कि स्लीपर के डिब्बे में जमीन पर लेटने की अनुमति के लिए भी पैसा चुकाते हें। ऐसा नहीं है कि आम लोगों की इस स्थिति से वे वाकिफ नहीं है लेकिन कभी इस बारे में उन्होंने अतिरिक्त कोच लगाने या फिर रेल प्रशासन से बात करने की कोशिश की है। अगर नहीं तो क्यों? जब खुद को मनचाही सीट न मिले तो हंगामा खड़ा करें जैसे ए सी टू उनकी इज्जत से बहुत नीचे का स्थान है। संसद सत्र के लिए जा रहे हें तो वे रेलवे प्रशासन या फिर देश पर अहसान करने नहीं जा रहे हें। साल में कितने महीने वे अपने घरों में बैठ कर मोटा वेतन और भत्ते लेते रहते हें , वे इन सबके अधिकारी है इसके लिए वे अपने क्षेत्र के कार्यों के द्वारा साबित करें। ये तेवर संसद में अपने क्षेत्र के विकास के कार्यों के लिए दिखाएँ तो शोभा देता है।
जिन सुविधायों से आपका चयन करने वाला वंचित है - उसे हासिल करने के लिए हंगामा करने का आपको कोई हक नहीं बनता है। हमें शर्म अआती है ऐसे सांसदों पर । वैसे अख़बार में अपना नाम देख कर खुश तो होंगे ही - काम तो ऐसे नहीं किये कि सुर्ख़ियों में आये इस तरह नाम तो हुआ।
सोमवार, 5 दिसंबर 2011
छोटी उम्र के बड़े निर्णय !
कुछ विधि का विधान कि लड़की गर्भवती हो गयी , उस समय दोनों ही ट्रेनिंग में थे तो दोनों ने मिल कर निर्णय लिया कि अभी गर्भपात करा देते हें नहीं तो बीच में ट्रेनिंग में व्यवधान आएगा और फिर आगे ये निर्णय ले लेंगे। पर कुछ ऐसे भविष्य के लिए वे तैयार न थे। ladaki के गर्भपात के साथ ही किसी कारण से उसको तकलीफ रहने लगी और दो चार महीने में वह इतनी बढ़ चुकी थी कि उसको अस्पताल में रख कर उसकी uterus को तुरंत निकलने का निर्णय लेना था। दोनों के घर वाले थे और उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी क्योंकि अभी तो उनका दांपत्य जीवन शुरू भी नहीं हुआ था और उसके पहले ही ख़त्म होने के कगार पर आ गया। लड़की के घर वाले अलग चिंता में परेशान थे और लड़के के घर वाले अलग चिंता में।
लड़के की माँ बार बार कह रही थी कि 'सोच लो इससे फिर तुम्हें बच्चा नहीं मिल सकता और इसके बिना तो जीवन अधूरा रहेगा।'
लड़की की माँ और बाप इस चिंता में कि--' इसके बाद मेरी बेटी का क्या होगा? पता नहीं ये लोग उसको कैसे रखेंगे ?'
उस समय न चिंता करने का वक़्त था और न सलाह मशविरा करने का। लड़के ने पेपर लेकर तुरन ही साइन करके दे दिए। ऑपरेशन हुआ और लड़की घर आ गयी और लड़का अपनी ट्रेनिंग के लिए वापस हो गया। लड़की अपने माता पिता के घर आ गयी।
लड़के ने अपनी पत्नी से कहा - तुम चिंता मत करना कोई कुछ भी कहे, मुझ पर भरोसा रखना। मैं जल्दी नहीं आ पाऊंगा लेकिन अपने फैसले पर मैं अडिग रहूँगा।
कुछ महीने भी न बीते थे कि लड़के के घर वाले अब इसके बच्चे न होंगे तो नाम कैसे चलेगा? इससे तो अच्छा है कि दूसरी शादी कर दी जाये , दो शादियाँ होती नहीं हें क्या? पत्नी की सहमत मांगी जाने लगी कि अगर वह राजी हो जाए तो उसकी शादी कर दी जाये। लड़की के घर वाले भी सोचने लगे कि अपनी छोटी बेटी का विवाह कर दिया जाय तो दो बहने साथ बनी रहेंगी और बच्चे भी हो जायेंगे। जब पानी सर से गुजारने लगा तो लड़की ने अपने पति को इस बारे में बताया और तुरंत आने के लिए कहा।
लड़के ने आकर दोनों परिवारों से बात की। उसकी ट्रेनिंग पूरी हो चुकी थी। उसने दोनों परिवारों को बैठकर अपना निर्णय सुनाया - 'मैंने शादी की थी तब ऐसा कुछ भी नहीं था, अब जो समस्या है वो हम दोनों की है। आप लोग इस बारे में न सोचें तो अच्छा होगा। मैं इसको साथ लेकर जा रहा हूँ। अगर आपको ऐसे ही ये लड़का - बहू और beti -damad स्वीकार हो तो खबर कर देना मैं घर आता रहूँगा और अगर नहीं तो मैं इसके साथ रह कर ही खुश रहूँगा। शादी कोई मजाक नहीं है कि जब चाहा उसको अपनी सुविधा से जोड़ लिया और न मन bhara तो उसको तोड़ दिया। '
छोटी उम्र के इस बड़े निर्णय के बारे में पता लगा तो बहुत ही अच्छा लगा कि आज की पीढ़ी अपने मूल्यों के साथ जुड़ी है और उसकी गरिमा को सम्मान दे रही है।
मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011
देश के चालाक !
हम बात इस उत्तर प्रदेश की ही कर सकते हें जहाँ पर जातिवादी की जड़ें इतनी गहराई तक राजभवन सेलेकर प्रदेश के क़ानून तक में पैठ बना चुके हें कि लगता है कि यहाँ जो भी होता है वह इस लिए होता है कि यहाँ पर वहीलोग जीवित रहें जिन्हें इस जाति विशेष में विशेष दर्जा दिया गया है.और अनुसूचित नाम का तमगा लगाये जो भी लोगहें वे ही सारे लाभों को लेने के हकदार हें बल्कि उस समय तो हद गुजर गयी जब गरीबी के मानकों को भी अलग अलगपरिभाषित किया गया। शिक्षा जो कि सबका अधिकार है और इसके लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है , इस क्षेत्रमें भी अनुसूचित और पिछड़ा होना लाभदायक सिद्ध हो रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जाति और पिछड़ी जाति केलोगों के लिए २ लाख तक की वार्षिक आय पर जो लाभ दिया जा रहा है वही लाभ सवर्ण को १ लाख रूपये की वार्षिकआय तक ही मिलेगा। अब कोई भी अर्थशास्त्री या कानूनविद इस बात को स्पष्ट करे कि जन्म के आधार पर ये रूपये कीकीमत कैसे अलग अलग हो जाती है? क्या सवर्ण को गरीब होकर उन लाभों को लेने का अधिकार नहीं है और नहीं है तो क्यों ? उत्तर प्रदेश सरकार इस बात को स्पष्ट करे।
उत्तर प्रदेश सरकार अनुसूचित जाति के लिए केंद्र से आरक्षण बढ़ाने के लिए कह रही है क्योंकि अबइतने वर्षों में उनकी आबादी बढ़ चुकी है और शेष जातियों की आबादी लगता है कि समाप्तप्राय हो चुकी होगी। एक उच्चपद पर आसीन जिम्मेदार व्यक्ति से ऐसे गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य या फिर अपील को क्या नाम दिया जाय?
एक वही क्यों? यहाँ तो हर दल ने आरक्षण को अपना चुनावी हथकंडा बना रखा है क्योंकि अगर वे इसतरह से जाति के सहारे लोगों न लुभायेंगे तो लोग आकर्षित कैसे होंगे? और सिर्फ उनका ही दोष कहाँ है? ये देश के लोगभी तो अपने स्वार्थ के लिए किसी को भी देश की बागडोर देने में संकोच नहीं करते हें। सिर्फ उन्हें कुछ लोभ दे दियाजाय। लोग तो शायद अपनी गरीबी और स्वार्थवश ऐसा कर भी लें यह खेल तो संसद तक में होता है जहाँ बैठ कर सांसदसाल में लाखों का लाभ ले रहे हें।
वैसे इस समय उत्तर प्रदेश में अनुसूचित या पिछड़ी जाति का होना ही फायदेमंद चीज है क्योंकि इस प्रदेशमें दंड और कानून भी इनके प्रति नरमी बरत रहा है । पिछले दिनों सीमा आजाद नाम की राजनेत्री एक हत्या के मामलेमें दोषी ठहराई गयी और उनका आर्थिक दंड इसलिए काम कर दिया गया क्योंकि कानून में इनके लिए आर्थिक दंड मेंभी छूट है। गरीबों के लिए छूट होना समझ आती है लेकिन एक नेत्री के लिए जाति के आधार पर छूट कुछ समझ नहींआई लेकिन अंधेर इसी को कहा जाता है वैसे भी उत्तर प्रदेश में ये कथन एकदम सच है और जब तक ये सरकार है सच हीरहेगा --
Government is of the SCST , by the SCST and for the SCST।
शनिवार, 1 अक्टूबर 2011
राजनीति का नया रूप!
हम कहते हें कि पाकिस्तान आतंकियों को प्रशिक्षण देता है, उन्हें शह दे रहा है और ये अपने ही देश के अन्दर बैठेराजनेता अपने ऐसे वक्तव्यों से क्या अपनी उनके प्रति सहानुभूति और संरक्षण नहीं दर्शा रहे हें। अगर किसी राज्य कीविधायिका अब देशद्रोहियों के पक्ष में मतदान करके सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती देती है तो लोकतंत्र के तीनस्वतन्त्र स्तंभों को दूसरे के कार्य में निरर्थक हस्तक्षेप कहा जाएगा।
अफजल गुरु संसद हमले काण्ड का आरोपी है तो इसका पूरा मामला केंद्र शासित दिल्ली से जुड़ा है और वहीं केन्यायायलय में मामला विधाराधीन रहा और उसको सजा निधारित की गई फिर इस विषय में किसी राज्य कीविधायिका में उसे विचारार्थ रखने की बात क्यों और कैसे उठी? क्या उमर कश्मीर भारत से अलग और अफजल गुरु कोकश्मीर के प्रति समर्पित मानते हें और यदि नहीं तो फिर कल जब यही kasaab के साथ होगा तो भी क्या इसी तरह सेफाँसी का विरोध करके देश के प्रति अपनी निष्ठां पर स्वयं प्रश्नचिह्न लगाकर अपनी प्रतिष्टा और देश के प्रति निष्ठां नहीं खोरहे हें। इन सब के पीछे सिर्फ किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं बनता है - ऐसी बातों के पीछे किसी बड़े दल या केंद्र की शहहोती है क्योंकि ऐसे जघन्य अपराधियों को जब हम सरकारी मेहमान बनाकर वर्षों जेल में पाल रहे हें तो कल को इनकापालना किसी नई घटना का वायस बन जाय तो कोई बड़ी बात नहीं है। अभी हाल में ही १३ जुलाई को कसाब के जन्मदिनपर हुए विस्फोट से अगर सरकार और जिम्मेदार मंत्रालय को समझ नहीं आता है तो फिर उन्हें अपने को गैर जिम्मेदारमान लेना चाहिए और सत्ता छोड़ कर चले जाना चाहिए।
सरकार क्यों ऐसे अपराधियों के मामले को वर्षों लटका कर रखती है क्योंकि उन्हें आशंका है कि अगर वह अफजल गुरुजैसे लोगों को फाँसी दे देती है तो उससे जुड़े वर्ग विशेष का समर्थन खो सकती है और ऐसा कोई भी रिस्क वह लेना नहींचाहती है। इसी लिए गृहमंत्री पी चिदंबरम अपने बयान में ये कह रहे हें कि हर आतंकी हमले को रोका नहीं जा सकता है।क्यों नहीं रोका जा सकता है क्या वे अमेरिका से सबक नहीं ले सकते हें कि एक हमले की तबाही के बाद कोई भीआतंकवादी संगठन वहाँ एक भी वारदात नहीं कर सका और अपने देश के प्रति प्रतिबद्धता दुहराते हुए चाहे राष्ट्रपतिबदल गए हों लेकिन ओसामा को जिन्दा या मुर्दा प्राप्त करने के संकल्प को कभी नहीं बदला। और जिनके इरादे मजबूतहोते हें उन्हें लक्ष्य तक पहुँचाने में कोई रोक नहीं सकता है।
उमर के ये अपने शब्द नहीं है बल्कि उसके साथ दूसरे अलगाववादी नेताओं ने भी सुर मिलने शुरू कर दिए हें। हमारी केंद्रसरकार की इसमें शत प्रतिशत शह है और जब तक ऐसी सरकार रहेगी देश सदैव असुरक्षित रहेगा।
बुधवार, 21 सितंबर 2011
कैंसर को हरा दिया!
कैंसर एक ऐसा रोग जिसके बारे में पता चलते ही उससे पीड़ित और उसके घर वाले मानसिक तौर पर टूटजाते हें और उन्हें सिर्फ मौत सामने दिखलाई देती है। जब इंसान अन्दर से टूट जाता है तो फिर उसके और उसकेघर वालों को उसके लिए एक दृढ इच्छाशक्ति बनाये रखने में सहयोग देना चाहिए। भय का भूत ही इंसान कोकमजोर कर देता है।
इस रोग से लड़ते हुए एक इंसान को मैं पिछले १० सालों से देख रही हूँ और वह इंसान कोई और नहींमेरे बॉस हें। बहुत साल पहले जब वे मेरे बॉस नहीं थे तब उन्हें आँतों में कैंसर हुए था और उससे लड़े और मुक्तहोकर वापस लौटे और पहले की तरह से अपनी क्लास और प्रोजेक्ट का काम संभाल लिया। दुबारा उन्हें गले मेंकैंसर हुआ और वह कई महीनों तक बिस्तर पर रहे, अपनी पूरी जिजीविषा से उससे लड़ते रहे और फिर उसकोअपना गुलाम बना लिया । जब वे लौट कर आये तो उन्हें अधिक बोलने से मना किया गया था लेकिन उस समयप्रोजेक्ट की conference चल रही थी। उन्होंने सभी मेहमानों का स्वागत किया । फिर धीरे धीरे खुद को इस काबिलबना लिया। खाना पीना एकदम से प्रतिबंधित और काम के घंटे उतने ही। अपनी षष्ठी पूर्ति के बाद भी वे काम केघंटे उतने ही बनाये हुए हें। आई आई टी में सिर्फ एक विभाग नहीं बल्कि कंप्यूटर साइंस और इलेक्ट्रिकलइंजीनियरिंग दोनों विभागों में प्रोफेसर का काम देख रहे थे । आज भी उनके काम करने और करवाने की लगन देखकर लगता है कि कोई कह नहीं सकता कि ये इंसान कैंसर से लड़कर अपनी इच्छाशक्ति के बल पर ही मशीनअनुवाद में विश्व स्तर पर अपना अलग स्थान बनाये हुए है।
