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बुधवार, 25 जुलाई 2012

विदा एक सेनानी को !

                                 हमारी आजादी की उम्र बढ़ रही है और इसके लिए लड़ने वाले लोगों की संख्या कम हो रही है। हाँ एक और सेनानी कैप्टन डॉक्टर लक्ष्मी सहगल भी विदा हो गयीं. आजाद हिंद फौज की रानी   झाँसी  रेजीमेंट की  कमांडर , कानपूर की  वयोवृद्ध डॉक्टर और पूरे शहर के लिए माँ बनी रहीं खास तौर पर गरीब और असहाय इंसानों के लिए तो दवा से लेकर रुपये पैसे तक जैसे भी सहायता कर सकती थी करती रहीं। उनके क्लिनिक की आया या नर्स कभी उनके लिए वर्कर नहीं रही बल्कि उनकी बेटियां रहीं और सभी  से वे बच्चों की तरह ही प्यार करती रहीं। उनके मरीज उनको मसीहा समझते  थे और वह थी भी मसीहा .




                                 














                 


उनका जन्म 24 अक्टूबर 1914 को मद्रास में  एस स्वामीनाथन स्वामीनाथन और अन्ना कुट्टी के घर में हुआ था। 1938 में मद्रास  मेडिकल  कॉलेज से एम बी बी एस किया  था। उन्होंने डाकटरी के पेशे में वाकई भगवान की तरह से ही किया और उस धर्म को निभाया जिसे डॉक्टर अपने पेशे को शुरू करने से पहले शपथ लेते हैं। वे गरीबों और असहायों के इलाज में सदैव ही निःस्वार्थ रूप से लगी रहीं। फिर चाहे युद्ध की विभीषिका में घायल हुए लोग हों या दंगों  में हुए घायलों  की सेवा  और  इलाज का मौका हो या फिर आजाद हिंद फौज के सैनिकों के इलाज का मौका हो। 
                        जब  सुभाष चन्द्र बोस ने 19 फरवरी 1942 में आजाद हिंद फौज का गठन किया और दो जुलाई 1943 को नेताजी ने  सिंगापुर आकर  जो भाषण दिया तो उससे डॉ सहगल इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने उनके आह्वान पर आजाद हिंद फौज में शामिल होने का निर्णय ले लिया . नेताजी ने उसके साहस और लगन को देख कर उनको रानी झाँसी रेजिमेंट का कमांडर बना दिया. उनकी सक्रियता से ही आजाद हिंद फौज में महिलाओं की संख्या में वृद्धि  हुई.  वे नेताजी के कंधे से कन्धा मिला कर काम करती रहीं और उनकी रेजिमेंट ने अंग्रेजों से भी दो चार हाथ किये और गिरफतार करके भारत लायीं गयीं.
                  उन्होंने 1946 में   आजाद हिंद फौज के ही प्रेम कुमार सहगल से विवाह किया और फिर कानपुर को अपनी कर्म स्थली बना लिया. वे सोच से वामपंथी थी लेकिन उनका स्वभाव गाँधीवादी था . वे मजदूरों और गरीबों के लिए संघर्ष ही नहीं  करती रही बल्कि उनके लिए बहुत कुछ करती रही. कोई गरीब महिला उनके क्लिनिक आई नहीं कि  उससे फीस न  लेने का निर्देश और  ही दवा भी  मुफ्त  देने की हिदायत भी देती थीं। 

मेरी उनसे मुलाकात एक मरीज के रूप में ही हुई थी लेकिन उनके चेहरे का तेज और बिखरती हुई ममता के  के कारण ही वे महिलाओं की पहली पसंद थीं. उन्होंने और डॉक्टर की तरह से प्रसव करने में सर्जरी को हथियार बनाने के स्थान पर  सदैव ही नॉर्मल डिलीवरी को प्राथमिकता देती थी. वे मानवता की पुजारिन थी. उनके जीवन के इतने सारे किस्से हें कि शायद उनके साथ रहने वालों के एक एक अनुभव भी बटोरे जाय तो जो छवि सामने आती है वह मनुष्य के रूप में उनको पूज्यनीय बनाता था.
                   सिर्फ दो वाकये सुनने को मिले जो उनकी महानता को प्रदर्शित करते हें - उनके एक माकपा  कार्यकर्ता जटाशंकर श्रीवास्तव की मृत्यु के बाद उनके घर की आर्थिक स्थिति बहुत ही ख़राब थी इसकी जानकारी जैसे ही उनको हुई उन्होंने वही उनके घर पर ही सप्ताह में एक दिन बैठने का निर्णय लिया और वहाँ बैठने पर जो भी फीस उन्हें मिलती थी वह वे उनकी पत्नी को दे देतीं. मानवता कि ऐसी मिशाल और भी हें. एक बार एक रैली से लौटते हुए बस से गिरकर उनके एक कार्यकर्ता की मृत्यु हो गयी और ये मानी हुई बात है कि ऐसे लोग बहुत अमीर नहीं हुआ करते हें. उसके लिए उन्होंने उनके इलाके में ही जाकर सप्ताह में एक दिन बैठने के निर्णय लिया और उस कमाई को उस कामरेड की पत्नी को देती रहीं. ये सेवा भावना और दया का भाव वह भी निःस्वार्थ रूप से की गयी सेवा का कोई दूसरा उदाहरण मिलता ही नहीं है.
                      जीवन भर मानव मात्र की सेवा करती रहीं और फिर न रहने पर भी आँखें अपनी दान कर दी , जिससे दो लोगों को दुनियाँ देखने का अवसर मिलेगा. अपने पार्थिव शरीर को मेडिकल कॉलेज को विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए दान कर दिया. सब कुछ यही से लिया और यही देकर चल दीं.  ऐसे इंसान सदियों में पैदा होते हें. ऐसी महान आत्मा को मेरा बार बार नमन .


                 

सोमवार, 23 जुलाई 2012

नाग पंचमी पर विशेष !

                               





  आज नाग पंचमी पर विशेष रूप से नाग पूजा की परंपरा को सब की तरह से मैंने भी निभाया. वह जीव जिसे हम सबसे खतरनाक समझते हें क्या वास्तव में वह उतना ही खतरनाक है ?
ऐसा कुछ भी नहीं है, वह एक जीव है हमारी ही तरह से आत्मरक्षा के लिए वह डस लेता है. जब उसको लगता है कि इस जीव से मेरे जीवन को खतरा है तो वह डस लेता है अन्यथा वह भी बेवजह किसी को नहीं काटता है. इंसान कसम खाता है और दूसरे पल अपने स्वार्थ के लिए उसको तोड़ने में हिचकता नहीं है लेकिन इस जीव के वंशजों ने जो वचन दिया था ये सांप आज भी उस कसम से बंधे हुए हें और उसको निभा रहे हें. सपेरा जब इनको जंगल में से पकड़ कर लाते हें तो वे वचनबद्ध होते हैं कि इतने समय के बाद उन्हें वापस जंगल में छोड़ देंगे. वे अपने उस वचन के खातिर जंगलों में और भूमि के अन्दर विचरने वाले प्राणी टोकरी में बंद घूमते रहते हें.
                           आजतक वे  महाभारत के युग के बाद से  वचनबद्ध है और उसको निभा रहे हें. वीर अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को महर्षि श्रृंगी ने शाप दिया था कि सात दिन के अन्दर उनको सांप के काटने से मृत्यु हो जायेगी.  जब बात से परीक्षित  भिज्ञ हुए तो उन्होंने अपने सात दिन तक भागवत सुनाने कि बात सोची क्योंकि उनको सातवे दिन ही सर्प दंश से मृत्यु होनी निश्चित थी. यद्यपि सांप से सुरक्षा पूरी तरह से रखी गयी थी लेकिन पूजा के लिए लाये गए फूलों के साथ सांप भी आया और उसके काटने से उनकी मृत्यु हुई. परीक्षित की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जनमेजय जब शासक बने तो उन्हें बाद में ज्ञात हुआ कि उनके पिता की मृत्यु का कारण क्या था? तब उन्होंने पृथ्वी से सर्प जाति के सर्वनाश के लिए सर्प यज्ञ करने का संकल्प लिया. यज्ञ के आरम्भ होने पर मंत्रो के आवाहन के साथ ही पृथ्वी पर उपस्थित सारे सर्प विभिन्न दिशायों से आकर यज्ञ कुण्ड में गिरने आरम्भ हो गए.  तब तक्षक ( सर्पों के राजा ) ने जनमेजय के गुरु मुनि आस्तीक की शरण ली और उनसे प्रार्थना की कि उनकी जाति को जीवन दान चाहिए. मुनि आस्तीक ने जनमेजय से अपनी गुरु दक्षिणा के नाम पर सर्पों को जीवन दान देने का वचन लिया और जनमेजय ने उनसे सर्पों से वचन लेने को कहा कि अगर कोई उनके गुरु की सौगंध दे और फिर उनके मंत्र का स्मरण करे तो सर्प उस इंसान को कभी नहीं काटेगा भले ही वह अपने प्रतिशोध के लिए ही क्यों न गया हो? सर्पों की ओर से ये वचन दिया गया और वे आज भी इस वचन से बंधे हुए हें.
                         इस वचन को मैं स्वयं अनुभूत कर चुकी हूँ. ये मंत्र मुझे अपने गुरु से मिला था क्योंकि मेरे पतिदेव को सर्प से फोबिया था और अगर वे सपने में भी सांप को देख लेते थे तो चीख कर जाग जाते थे. जीवित देखने की तो बात कौन कहे? उस अनुभव को इस लिए बता रही हूँ क्योंकि जीव अनावश्यक किसी को परेशान नहीं करता है. तब मेरे नए घर में आने पर आवागमन के साधन उचित रूप से न थे और मैं करीब ५ किमी पैदल चल कर जी टी रोड पर पहुँचती और उसके बाद वहाँ से टेम्पो लेकर आई आई टी. पैदल रास्ते में कृषि विश्वविद्यालय के खेत  थे और बीच में सड़क थी. उसके नीचे ही पानी जाने के लिएय नहर से जुड़े हुए नाले थे. एक दिन मैं ऑफिस से पैदल आ रही थी तो देख कि एक काला  नाग बीच सड़क पर फन  फैला कर बैठा हुआ है और उसके पीछे लोगों के एक हुजूम रुका था और आगे भी . मेरी दृष्टि गयी तो मैंने मंत्र का स्मरण मात्र किया और वह नाग सर झुका कर चुपचाप सड़क से एक ओर नाले में चला गया और दोनों ओर के लोग अपने गंतव्य की ओर निकल गए. ये मेरा पहला अनुभव था. उसके बाद तो एक बार सांप मेरे कमरे में घुस आया और सोफे के नीच बैठ गया. मैंने देखा निकालने की कोशिश की लेकिन वह निकला नहीं . किसी को बता नहीं सकती थी नहीं तो वे लोग किसी को बुला कर उसको मरवा ही देते. मैंने अपनी दोनों बेटियों को लेकर पलंग पर सो गयी और मंत्र के साथ उनसे कहा कि दरवाजा खुला  है निकला जाइएगा. सुबह वह निकल कर जा चुका था. 
                      ये नागपंचमी का पर्व भी इस घटना से जुड़ा है कि इस दिन नाग की पूजा अर्चना और उनसे अभय रहने का दिन होता है. अगर हम उनको हानि न पहुंचाएं तो वह भी मनुष्य को हानि नहीं पहुंचाते हें.

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

लावारिस - बावारिस !

         ये आम बात है लेकिन इतने हद जाना हर किसी की वश की  बात नहीं। आज घर के बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार करना आम बात है, उन्हें घर से बाहर निकाल देना भी अब कोई बड़ी बात नहीं रही। फिर भी कुछ इंसान ऐसे भी होते हैं वैसे तो उन्हें इंसान कहना ही गलत है लेकिन और क्या कहा जाय? जहाँ इंसानियत भी शर्मिंदा होकर मुंह फेर ले वहां हम किसे क्या कहें?
          आज सुबह के अखबार ने उन गुमनाम हैवान के विषय में जानकारी दी एक बुजुर्ग को उनके परिजन मरणासन्न अवस्था में सड़क पर लिटा गए पास में उनके कपडे एक बैग में थे और पीने के लिए पानी एक डोलची में रखा था लेकिन वह पानी पीने की स्थिति में नहीं थे।  वह तो बेहोशी की हालत में थे। फिर किसी इंसान ने उन्हें एक रिक्शे में डाल  कर सरकारी अस्पताल में पहुँचाया तो वहां भी एक महान  इंसान बैठे हुए थे। बोले क्या सारे लावारिस यही लेकर चले आते हो और बाद में इस बात से इनकार कर दिया। उन्हें किसी तरह से भरती कर दिया गया। पर आत्मा रो दी क्यों रोई ? इसके पीछे कोई भावना तो रहती ही है . फिर अपनी ये एक कविता याद आई जिसे किसी ऐसे ही घटना के क्षणों में मैंने लिखा था --


सुबह का अखबार
जब हाथ में आया
नजर पड़ी
एक तस्वीर पर
फिर उसका शीर्षक पढ़ा
सड़क पर फ़ेंक दिया
किसी सपूत ने
अपने अपाहिज और मृतप्राय पिता को,
उसने पाला होगा
बेटे बेटियों को
एक या दो होंगे
हो सकता है कि चार या पाँच हों।
सबको पाला होगा
हाथ से निवाला बनाकर खिलाया होगा
दुलराया और सहलाया होगा
फिर काबिल बनाकर
चैन की  साँस ली होगी
बुढापे की  लकड़ी
सहारे के लिए तैयार हो गई.
पर पता नहीं कहाँ भूल हुई?
लकड़ी बीच  में ही चटक गई
औ' मृतप्राय जनक को सड़क पर पटक गई,
सड़क पर पड़े पड़े
दम तोड़ दी।
लोगों ने झाँका औ' किनारा कर लिया
शाम होने लगी
पुलिस आई औ' मृत्यु प्रमाण-पत्र बनवाकर
मुर्दाघर में लावारिसों  में शामिल कर दिया,
लावारिस बना
दो दिन पड़ा रहा शव
बाद में लावारिस ही दफना दिया
पढ़कर यह दर्द कथा
दो ऑंसू टप-टप
गिरे अखबार पर
अनाम श्रद्धांजलि थी
या भविष्य में होनेवाली आशंका का भय
यह तो तय करेगा समय
यह तो तय करेगा समय। 


                           जब ये कविता मेरी छोटी बेटी सोनू ने पढ़ी तो आखिर की लाइनों को पढ़ कर मुझसे सवाल किया था  कि ' ये अपने क्या सोच कर लिखा था? वही की आपके बेटे नहीं है तो फिर हम क्या है? दुबारा इसतरह की बात अगर मैंने पढ़ी या सुनी तो फिर ................'  इतना कह कर वह चली गयी थी। ईश्वर  ऐसी ही सद्बुद्धि सभी बच्चो को प्रदान करे .

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

एक मूक श्रद्धान्जलि !

***** क्षमा इस बात के लिए की ये 13 लेख जुलाई को पोस्ट होना  लेकिन हमारी नेट सेवा  ने  आज  होने दिया.

      अखबार में एक छोटी सी खबर पढ़ी और फिर पहुँच गयी 3 साल पहले। अब तो हमें शर्म आने लगी है अपने  देश की व्यवस्था पर की न तो हमारे देश में कोई क़ानून रह गया है और न ही न्याय की आशा बची है। देश की व्यवसायिक नगरी मुंबई विगत वर्षों में कई आतंकी हमले झेल चुकी है और ऐसा नहीं है की उन हमले  देश के माहौल को हिला नहीं गए लेकिन हम हिल कर फिर स्थिर हो गए और वे जिन  ने 6 साल पहले मुंबई के कई रेलवे स्टेशनों पर हुए विस्फोट में 187 लोगों को  खोया है और वे न जाने कितने परिवारों को तहस नहस करने वाले बन गए।   फिर 13 जुलाई को मुंबई   में  3 भीड़ भरे स्थानों पर हुए विस्फोटों में 27 लोगों ने अपना जीवन की आहुति दी थी और फिर कुछ परिवार ऐसे ही बिखर गए।
                    3 साल पहले हुए विस्फोट पर एक कविता उसी समय लिखी थी उसे दुबारा यहाँ उद्धृत करके उन सबके दुःख को याद कर रही हूँ


गोली, बारूद और धमाकों
की राजनीति कराने वालो
गुमनाम रहने वालो
कहते हो की हम धर्म के लिए
लड़ रहे हैं  लड़ाई ।
मत सताओ हमारे वर्ग को
अपने वर्ग का पता तो बताओ
वे कब तुम्हें अपना मानते हैं।
क्यों अपनी कुंठाओं और वहशत को
धर्म और वर्ग का नाम देते हो।
खून के रंग से बता सकते हो
तुम्हारे वर्ग के खून का रंग
कौन सा है?
तुम्हारे धर्म के लोगों के
खून का रंग कैसा है?
तुम्हारी गोलियों से मरे
सिर्फ इंसान होते हैं।
रोते बिलखते परिवार
कोई अपना खोते हैं।
जब देने को कुछ नहीं
तुम्हारे पास उनको
क्यों छीनते हो -- साया उनका
उनकी रोटियों को जुटाने वाला
तुम्हारा क्या बिगड़ा है।
तुम्हारा जो भी धर्म हो
एक तरफ खड़े हो जाओ
खुदा या ईश्वर की दुहाई देने वाले आवाज़ दो
उनको देखना है कि
कितने लोग तुम्हारी जमात में आते हैं।
ये हैवानियत का खेल
इंसानियत को
इस जहाँ से मिटा नहीं सकता है।
खौफ दे सकता है
रुला सकता है
पर किसी के आंसू
पोंछ नहीं सकता है
मुंह  छिपा कर बाहर निकलते हो
नाम तक नहीं है तुम्हारा
दूसरों के इशारे पर
गोली चलाने  वालो
कभी तुम्हारे भी शिकार होंगे
तुम्हारी ही गोलियों के।
ये धमाके तुम्हारे लिए शगल
घी के दिए जलने सा
जश्न मनाने का दिन
रोटी बिलखती इंसानियत,
हिलाकर रख दिया
विश्व के जनमानस को.
कहाँ है ये हत्यारे
शायद हममें ही छुपे हैं
वे मानव हो ही नहीं सकते है
सिर्फ हत्यारे हैं
और हत्यारों की कोई जाति नहीं होती
कोई धर्म नहीं होता।


                            मुझे इतना  ही नहीं लिखना है अपने  देश की राजनीति और सरकार क्या चाहती है ? इस मंशा पर प्रश्न करते करते थक चुके हैं . सरकार इन पकडे गए आतंकियों को कितने दिन तक शरण देकर उनकी आवभगत करना चाहती है . देश में तहस नहस मचाने  वाले इन आतंकियों को सरकारी मेहमान बना कर हम उनकी खातिर  तवज्जो में कोई कमी नहीं  रखते   हैं और चूंकि वह पडोसी देश से जुड़े हैं तो फिर अतिथि देवो भव की अपनी  परंपरा को हम छोड़ तो नहीं सकते  हैं.
                          13 जुलाई 2011 का आरोपी  यासीन  भटकल  दिल्ली और मुंबई पुलिश के  में भागने में सफल हुआ क्योंकि उन हादसों में शायद पुलिस के किसी परिवार का कोई सदस्य नहीं खोया होगा जिन्होंने खोया है वे शायद इस जन्म में उन्हें पा  न सकेंगे और भुला भी न सकेंगे।
                          अफजल गुरु ,  कसाब  फिर जुन्दाल फिर  आने  वाले कल आएगा  फसीह --   हम एक एक   पकड़  रहे  और खुद अपनी   पीठ थपथपा  रहे हैं .  कितने दिन आखिर  कितने दिन  सजा को इसी तरह से बढ़ाते हुए  किसी ऐसे काण्ड का इन्तजार  कर रहे हैं कि इन  आतंकवादियों को छोड़ने के  फरमान जारी  कर दिए जाएँ ऐसा होता रहा है और शायद वाकये  ऐसे ही किसी  का इन्तजार कर रहे हैं।  
                        क्यों नहीं ऐसे मामलों के लिए फास्ट ट्रेक  कोर्ट  में  सुनवाई क्यों नहीं  होती है?  मामले में हुए  को लागू करने में इतनी देर  क्यों की जा रही है?   इन्हें हम इतनी सुविधाएँ दे  रहे हैं कि  उनके मन बढ़ते  जा रहे हैं ,  उन्हें जेल में इन्टरनेट की सुविधा  चाहिए . वे हमारे  के लिए इतने बड़े मेहमान हैं उन्हें गतिविधियों का  तो होना ही चाहिए और फिर अपने भाई बंधुओं के साथ मिलकर हमारे घर में बैठ कर नयी  साजिश रच सकें और  अपने देश की सुरक्षा के लिए  नाकाबिल साबित कर सकें।  कब हमारी सरकार  और न्याय तंत्र   काम को अंजाम देगा   और उन हादसों में मरनेवाले लोगों की आत्मा को शांति और उनके परिजनों को संतोष मिलेगा .

बुधवार, 11 जुलाई 2012

आम आदमी कौन है ?



                   आम आदमी कौन है? 


                               माननीय गृह मंत्री जी  का बयान  उन्हें एक गैर जिम्मेदार मंत्री और लोक से दूर रह कर उसको परिभाषित करने पर एक गैर जिम्मेदार जन प्रतिनिधि   भी ठहरा रहा है। उन्होंने अपने वक्तव्य में किस वर्ग की बात की है?  किस आम आदमी की बात की है?  जो 15 रुपये की मिनरल वाटर की बोतल  और 20 रूपये की आइसक्रीम खाता है और गेहूं और चावल में एक रुपये के बढ़ने पर चिल्लाता है।
                              महोदय आप अपने मंत्रित्व के चश्में को  उतारिये और आम आदमी के बीच में आइये  तब आपको पता चलेगा कि  -- वो हजारों किसान जो ख़ुदकुशी कर रहे हैं और कर चुके हैं , वे अगर आइसक्रीम खाने की हालत में होते  तो अपने परिवार को अनाथ छोड़ कर ख़ुदकुशी करने पर मजबूर न होते। आप संसद में बैठ कर लाखों रूपये हर महीने लेकर ऐसा बयान  दे सकते हैं लेकिन अगर आपसे   पूछा जाय कि  आम आदमी लौकी और तरोई जैसी  सब्जियां किस भाव खरीद कर खा रहा है? ये आपको पता नहीं होगा। कितने लोग सिर्फ एक वक़्त खाकर सोते हैं इसके आंकड़े आपके पास नहीं होंगे .  सड़क के किनारे लगे सरकारी नलों से बदबूदार पानी भर कर पीने वालों की संख्या आप तो क्या आपका मंत्रालय भी नहीं बता सकेगा.  दिन 12 से 14 घंटे काम करके रोटी जुटाने वाला आइसक्रीम नहीं खा सकता  . आपको पता भी है कि  कितने साठ  साल के ऊपर के व्यक्ति  श्रम करके अपने परिवार को पाल रहे हैं - नहीं और बिलकुल भी नहीं।
                        आप खुद ए सी गाड़ियों में चलते हैं तो आपको सिर्फ गाड़ियों में घूमते  हुए लोगों को ही देखने की आदत है और उन तक ही आपकी पहुँच भी है,  तभी आप गाड़ी के खिड़की से फेंकी गयीं मिनरल वाटर की बोतल देख पाते  हैं। भारत आज भी गरीबी से जूझता हुआ गरीब देश ही कहा जाएगा क्योंकि यहाँ पर उन्नति और प्रगति तो सिर्फ सरकार के नुमाइंदों की हो रही है और सरकारी नीतियां बनती भी उन्हीं के हित के लिए है। वर्तमान सरकार और उसकी नीतियां अगर ऐसी ही चलती रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब कि  भूख से भरे हुए लोगों की लाशें सड़क पर पड़ी मिल रही होंगी
                  आपकी सरकार 24 रुपये से ऊपर कमाने वाले को गरीब मानती ही नहीं है तो फिर आप सब को लाखों र्मिलने पर भी खर्च पूरा क्यों नहीं होता और आप सबको भत्ते बढवाने की दरकार क्यों बनी रहती है? इसका उत्तर आपके पास हो तो दीजिये। 
                     गेहूं और चावल पर एक रूपये आप बढ़ाते हैं और पेट्रोल , डीज़ल और गैस पर कितना बढ़ाते हैं? गेहूं और वावल कच्चा नहीं चबाया जाता है,  उसे पकाने के लिए वह क्या करेगा? आम आदमी की पीड़ा संसद में  पैर रखते ही हर आम से खास बना वह जनप्रतिनिधि भूल जाता है और फिर वहां बैठ कर वह सावन के अंधे की तरह होता है कि  जिसे हर जगह हरियाली ही दिखलाई देती है।
                     जिस सरकार के पास सिर्फ धांधली ही धांधली हों वह आम आदमी की परेशानी की बात करे भी क्यों?  जहाँ पर सुरेश कलमाड़ी और राजा  जैसे लोग होते हैं उन्हें सिर्फ बयानबाजी से ही मतलब होता है। गृहमंत्रालय जो देश के बारे में फाइलों में विवरण रखता है वह सिर्फ केन्द्रीय और राज्य मंत्रियों , सांसदों और विधायकों  तथा सरकारी कर्मचारियों का होता है। आम आदमी की तस्वीर से तो वह खुद वाकिफ नहीं है।
                    आम आदमी की तस्वीर दिखाती हूँ -- एक रिक्शा वाला जब दिन भर  रिक्शा चलाता  है, टूटी फूटी सडकों  पर सवारी लेकर मीलों चलता है  तो उसकी कमर टूट जाती है, पैर जवाब दे जाते हैं और शाम को वह पानी की बोतल या आइसक्रीम नहीं बल्कि छोटी सी परचून की दुकान से 5 रुपये की दाल , 10रु का आटा , नमक और मशाले के छोटे छोटे पाउच , 5 रुपये का दूध लेकर घर जाता हैऔर उसके पास गैस नहीं होती है उसकी पत्नी या बेटी ईंट  के चूल्हे पर सूखी और गीली लड़कियाँ जला कर घंटे भर धुंए से जूझती है तब पेट भरने के लिए कुछ पका पाती  है। क्या यह 24 रुपये में पालने वाला एक अमीर परिवार है अगर  तो आपकी गरीबी रेखा किन लोगों के लिए खींची गयी है? 
                      कभी पैदल चल कर इन बस्तियों में जाइए तब गृह मंत्री बनने का और बनकर बयानबाजी करने का शौक पूरा कीजिये . एक गैर जिम्मेदार सरकार के गैर जिम्मेदार गृहमंत्री से सिर्फ और सिर्फ आसमान  में उड़ते हुए नीचे झांकने  जो ऊंची  ऊँची अट्टालिकाएं  दिखलाई देती  वही नजर आती हैं और वह उन्हीं को भारत समझते हैं। वे अपने चैंबर में बैठ कर और बड़े बड़े स्थानों पर जाकर बयानबाजी करने के बजाय अगर पूरे कार्यकाल में एक बार भी सभी नहीं तो कुछ राज्यों का दौरा किये होते तो आपकी आखों का चश्मा अपने आप उतर जाता और नंगी आँखों से भारत की तस्वीर आप देख पाते .

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

तकनीकी शिक्षा : गुणवत्ता या संख्या ?

                          शिक्षा के क्षेत्र में इतनी प्रतियोगिता चल रही है कि हर बच्चे का सपना अब कहीं और नहीं बल्कि इंजीनियर या डॉक्टर बनने पर ही टिका हुआ है, लेकिन हर बच्चे की मेधा और बुद्धिमत्ता को बढ़ाने  का कोई भी साधन ऐसा नहीं है कि हम उसे सबके बराबर कर सकें। सपने हर बच्चे को देखने का हक है और ईश्वर से कामना भी यही है कि उनका ये सपना सच हो लेकिन क्या अगर हम उनके लिए उतने ही संस्थान खोल दें जितने के इस परीक्षा में बैठने वाले लोग हैं तो क्या सभी का ज्ञान और बुद्धि का स्तर  समान हो सकता है। नहीं ऐसा नहीं हो सकता है, सपने हम समान देख सकते हैं लेकिन उनको हासिल कर लें ये जरूरी नहीं है। 
                         करीब आधा दशक तक देश में सिर्फ 4 आई आई टी रहीं और उनके शिक्षण और प्रशिक्षण का स्तर उच्चकोटि का रहा है। देश से लेकर विदेश तक यहाँ के छात्रों ने अपने नाम का परचम लहराया है। विश्व स्तर पुरस्कार जीत कर अपने संस्थान  का नाम रोशन किया है। तब राजनीति में बैठे कुछ लोगों को लगा कि अगर ऐसी ही और कई आई आई टी खोल दी जाएँ तो देश में इतने ही सशक्त और सक्षम इंजीनियर तैयार हो सकेंगे और फिर हम इस क्षेत्र में सबको पीछे छोड़ देंगे . फिर क्या था? राजनीति जो सिर्फ विधेयक पास करने भर से ही सपने देखने लगती है और इसको क्रियान्वित भी कर दिया गया . देश में आई आई टी का तमगा लगा कर निकलने वाले छात्रों की संख्या बढ़ गयी . प्रतिष्ठित चारों आई आई टी के शिक्षकों ने  अपना संस्थान  छोड़ कर नए संस्थानों में निदेशक के पद संभाल  लिए तो आशा  जगी कि आई आई टी के इसी स्तर  को कायम रख पाने में सफल हो सकेंगे लेकिन मुझे नहीं लगता कि  ऐसा हो पाया या आगे भी हो पायेगा। हम संख्या तो बढ़ा सकते हैं लेकिन उसकी गुणवत्ता को कायम रखने के लिए योग्य शिक्षक कहाँ से लायेंगे?  आज के भौतिकवादी युग में जब कि  पैसे की ही अहमियत सबसे  है और विदेशी कम्पनियाँ अधिक पैकेज  देकर मेधा को ले कर जा रही  हैं और मेधा भी संस्थान  से निकलते ही पैसे की चकाचौंध से भ्रमित होकर चले जाते हैं और क्यों न जाएँ? क्या हम उनको इतना दे सकते हैं। नहीं फिर हम मेधा को रख ही नहीं सकते हैं। 
           शोध की दिशा में जाने वाले कितने छात्र होते हैं और जो होते हैं वे कितनी आई आई टी के लिए पर्याप्त होंगे। संख्या नहीं हमे लिए गुणवत्ता पर अधिक ध्यान देना होगा . 
                इसके साथ ही  जब इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने की स्वतंत्रता दे दी गयी तो फिर ये कुकुरमुत्तों की तरह उगने लगे . जिसने इंटर पास किया और इंजिनियर बनने की इच्छा है तो बनाने के लिए तैयार है ये कॉलेज। फिर ऐसे लोगों का भविष्य क्या होगा? इसका किसी को नहीं पता है। बैंक से लोन लेकर या घर जमीन बेच कर माँ  बाप पढ़ा तो देते हैं फिर उसके बाद ? नौकरी के लिए भटक रहे हैं क्योंकि इन कॉलेज में गुणवत्ता क्या है? ये उन सब लोगों को पता नहीं होती है बस अच्छी सी बिल्डिंग और ऊपरी तामझाम देखकर उन्हें लगता है कि पढ़ कर निकलते ही मेरा बेटा अच्छे से पैकेज  पर नौकरी करने लगेगा और हमारे दिन बदल जायेंगे। ये सपना हमेशा सपना ही रह जाता है और बच्चे इतना भी नहीं कमा पाते हैं कि वे अपने लिए हुए लोन को भी चुका  लें।
                  अब  और  सपना हम देखने लगे हैं कि  4  एम्स उत्तर प्रदेश में खोले जाएँ बगैर ये सोचे कि  क्या उन सब में वह गुणवत्ता बनाकर रखी जा सकेगी जो इस समय एक एम्स होने पर कायम है। केंद्र के एक एम्स की   उचित है क्योंकि एक को वह सारी सुविधाएँ मुहैया कराइ जा सकती हैं जो उच्च स्तरीय चिकित्सा के लिए जरूरी है। ये प्रस्ताव और उसको पूरा करने का सपना धीरे धीरे ही फलीभूत होता है कहीं ऐसा न हो आधी छोड़ एक को धावों आधी मिली   न पूरी पावो . 
                    
                          अतः ऐसा निर्णय लेने से पहले हमें अपने अतीत से सीख लेनी चाहिए कि शिक्षा में संख्या नहीं बल्कि गुणवत्ता का महत्व होता है। उसे कायम चाहिए। हर स्तर के छात्र के लिए उस स्तर के संस्थान होने चाहिए और भी गुणवत्ता को पूरी तरह से कायम रखना चाहिए ताकि उससे पढ़कर निकल कर आने वाले छात्र अपना जीवन ट्यूशन पढ़ा कर या फिर  शिक्षा से  कुछ  इतर करके अपना जीवन न गुजारें।