एक औरत की जिन्दगी कभी बहुत आसन नहीं रही है , अगर अंगुली पर गिनने की बात हम छोड़ दें तो एक घर से दूसरे घर आकर उसको अपना बनाने की प्रक्रिया सदैव कुछ कठिन ही रही है और फिर कभी कभी तो ये प्रक्रिया जीवन चलती रहती है और कभी कभी जीवन में वाले संघर्ष से जीतकर अपने मनोबल और साहस के सामने उन्हें स्वीकार करने का विकल्प बन जाती हैं . जितने जीवन है उतनी ही कहानी लेकिन कुछ एक प्रेरणा का स्रोत बन जाती हैं तो कुछ गुमनाम रह जाती है . उन्हें प्रस्तुत करने का एक प्रयास और साथ देने वाले हैं हमारे साथी ब्लॉगर . आज की प्रस्तुति है रंजू भाटिया जी कॆ.
(एक ख़त बेटी के नाम)
मेरी प्यारी बेटी ..
आज वह वक्त आ गया है जब मैं तुम्हे ज़िंदगी की उन सच्चाइयों से रूबरू
करवाऊं जिनका सामना मैंने किया और सहते सहते हर जुल्म को अपने से यह वादा करती गई कि यह पीड़ा तुम नही सहोगी ..यहाँ यह बताना मेरा उदेश्य नही हैं कि मैंने क्या क्या सहा क्यूंकि अब लगता है की अपनी इस पीड़ा कि जिम्मेदार मैं भी हूँ .पर कई बार हम सच में परिस्थियों के आगे विवश हो जाते हैं या हमारी ही कुछ कमजोरियां हमे उस हालात से विद्रोह नही करने देती ...बहुत छोटी थी जब मेरी शादी कर दी गई यह कह कर कि नए कपड़े नए गहने मिलेंगे .. माँ थी नही जो ज़िंदगी का असली मर्म दर्द समझाती ..उस पर वह उम्र थी ख़्वाबों की सपनों की ,जो यह तो देख रही थी कि शादी के होने पर गहने तो मिलेंगे पर इस के साथ जो मिलेगा वह इस पगले दिल ने सोचा ही नही था ।
मात्र १९ साल में शादी हो के पति के घर आ गई ..शादी के बाद
पहला तोहफा १० दिन में ही मिल गया जब ममिया सास के कुछ कपड़े चोरी हो गए और तलाशी मेरी अलमारी की ली गई ..हैरान परेशान हो कर पति की तरफ देखा तो वहाँ गहरा सन्नाटा था और सास- ननद तो तलाशी ले ही रही थी ...माँ सगी नही थी पर ऐसा अपमान वहाँ अपना नही देखा था ..दिल किया धरती फट जाए और समा जाऊं क्योंकि शादी पर आए मेहमान अभी रुखसत नही हुए थे सब तमाशा देख रहे थे यह ...फ़िर दो महीने बीते ही थे कि तुम मेरी कोख में आ गई ..और मैं एक नए रंग में ख़ुद को देख कर खुश हो गई ..उस वक्त तक के मिले सारे दुःख
भूल गई और तुम्हारे आने की राह देखने लगी ...इसी बीच ननद की शादी भी तय हो गई लगा कि अब यह मेरी दुनिया है जहाँ अब कोई दर्द नही होगा ..पर वक्त को शायद इतना खुश होना मंजूर नही था इधर से तुम आई मैं जी भर के तुम्हे अभी देख भी न पायी थी की उधर से ननद तलाक ले कर और एक छोटी बच्ची को कोख में ले कर वापस आ गई .....खैर वक्त धीरे धीरे बीतने लगा ..मेरे साथ साथ अब तुम पर भी गुसा उतरा जाता.... ननद नौकरी करती थी और घर में तुम्हे और उसकी बेटी को संभलने वाली मैं ही थी ।
तुम्हारी दादी को बेटी के वापस आने के दुःख के साथ ही यह दुःख भी
था कि उनके इकलौते बेटे का बेटा नही हुआ बेटी हुई है .मुझे मनहूस चोर और भाग्यहीन नाम से अक्सर पुकारा जाता था क्यों कि लड़की का होना ननद का वापस आना और उसकी बेटी होना यह सब मेरे मनहूस होने के कारण था इसी बीच यह पता लगा कि तुम्हरे पापा जहाँ नौकरी करते हैं अब वह नही रही इसका कारण भी मुझे ही माना गया ..मैंने नौकरी की इच्छा जाहिर की यही सोच के कुछ सहारा तो मिलेगा पर तुम्हारी दादी को मेरा बाहर नौकरी करना मंजूर नही हुआ .. इसी तरह ३ साल बीत गए ..तभी तुम्हारी छोटी बहन के आने की खबर मिली और इस बार बेटा ही होगा इस आशा को ले कर कई तरह की दवा मुझे खिलाई गई पर मेरा ईश्वर जानता है कि मैंने हर दवा लेते वक्त यही दुआ मांगी की ,मुझे दूसरी भी बेटी देना ..जाने क्यों यह बात दिल मैं आई की दूसरे की बेटी पर जुलम करने वाले के घर अब कोई बेटा न हो .ईश्वर ने मेरी
सुन ली और तुम्हारी एक प्यारी छोटी सी बहना आ गई ..अभी इन उलझनों से सुलझ ही रहे थे कि एक एक्सीडेंट मैं तुम्हारी दादी चल बसी ..अब तक
तुम्हारे पापा का नौकरी का कोई जुगाड़ सही ढंग से नही बन पाया था और उनका वह गुस्सा गाहे बगाहे मेरे ऊपर उतरता रहता था ...वैचारिक समानता हम दोनों के बीच मैं कभी बन ही नही पायी और जो पति पत्नी के बीच का एक समझदार रिश्ता बन पाता वह तुम्हारी बुआ ने कभी बनने नही दिया..तुम्हारे दादा जी आज तक मेरे हाथ का पानी नही पीते थे क्यूंकि उनकी नज़रों मैं आज भी मनहूस थी जिसने आते ही उनके घर को मुसीबतों से लाद दिया ..तुम्हारे नाना ,नानी ने तो मेरी शादी के बाद से ही अपना दरवाज़ा यह कह कर बंद कर लिया की हमने तो शादी कर दी अब आगे जीयो या मरो वही तुम्हारा घर है ......
आज उम्र की संध्या बेला आ गयी है ..अपनी ज़िंदगी के बीते लम्हे मैं वापस नही ला सकती ..पर तुम्हे और तुम्हारी बहन को यही सिखाया की खूब पढो ताकि वक्त आने पर अपने पैरों पर आत्म सम्मान के साथ खड़ी रह सको और
ख़ुद मैं इतनी ताक़त पैदा करो कि कोई तुम्हे मनहूस या चोर कह के गाली दे तो तुम वह लड़ाई ख़ुद लड़ सको याद रखो की अन्याय वही ज्यादा होता है जब हम उसको चुपचाप सह लेते हैं ..मैं आज मानती हूँ की मैं उस वक्त इन सब बातों का विद्रोह नही कर सकी कुछ मेरे पास हिम्मत की कमी थी और कुछ दिए हुए संस्कार कि वही घर है अब जीना मरना तो इसी में है
इन सबसे ज्यादा जो कमी मुझ ख़ुद मैं लगी कि मैं शिक्षित होते हुए भी
अपने पैरों पर खड़े होने कि हिम्मत नही जुटा पायी ..पर हाँ इतनी हिम्मत
जरुर जुटा ली की अपनी बात अपनी कलम से एक लेखिका के रूप में लिख पायी तुम्हारे पापा एक पिता बहुत अच्छे रहे बस पैसे कहाँ से आये यह फ़िक्र उन्हें कभी नहीं हुई और आज भी नहीं है ... .. तुम्हे उच्च शिक्षा दिलाना मेरा एक सपना था और यह पूरा हुआ ,किस तरह से यह मैं ही जानती हूँ ..खैर जो बीत गई बात गई ..आज मुझे खुशी सिर्फ़ इसी बात कि है कि मैं अपनी बात लिख सकती हूँ कम से कम इतनी डरपोक तो नही हूँ .:) .आज मेरी अपनी एक पहचान है लोग मुझे एक अच्छी लेखिका के रूप में जानते हैं ..और यह पहचान मैंने ख़ुद बनायी है.... हाँ घर के कई मोर्चों पर अब भी चुप्पी लगा लेती हूँ इसलिए कि जो बात मैं इतने सालों में नही समझा पायी अब उसको समझाना मुश्किल है और अभी मुझे माँ होने का एक और फ़र्ज़ पूरा करना है ..तुम्हे तुम्हारे घर में खुशहाल देखना है.....आज तुम्हारे पास इतनी अच्छी शिक्षा है इसका भरपूर प्रयोग करो और अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीयो ..बडो का सम्मान करो पर जहाँ अपमानित होने लगो वहाँ मेरी तरह गर्दन झुका के हर इल्जाम कबूल मत करो ..अपनी पसंद से अपना जीवन साथी चुनो और उस में सबसे पहले यह बात देखो कि क्या वह तुम्हारे विचारों को समझता है और क्या तुम्हारी भावनाओं का भी उतना मान करता है जितनी उसकी ख़ुद की हैं ..अब तुमने कुछ समय में अपना नया जीवन शुरू करना है ..आने वाला कल
तुम्हारी राह देख रहा है ..तुम्हे हर खुशी मिले और अन्याय से लड़ने की
ताक़त मिले इसी दुआ के साथ।(तुम्हारी माँ )
यह ख़त शायद आज के हालत से न मिलता हो .पर आज भी बहुत तरक्की नहीं हुई है ।आज कई जगह वह लड़के की माँ होने का और ससुराल के रंग ढंग वही है जो आज से तीस साल पहले थे ...लड़की को आज जरुरत है आपकी आवाज़ उठाने की .अन्याय न सहने की ..नहीं तो पढना लिखना बेकार है ..बेटियाँ माँ की हालत से होश संभलते ही परिचित थी .और यही सब देख कर अपने आने वाले जीवन के प्रति भी बहुत अधिक आश्वस्त नहीं थी ,पर वक़्त अपनी रफ़्तार से चलता है और आगे आने वाले मान दंड वही तय करता है ।यह ख़त आज पढने वालों को सत्तर अस्सी के दशक का लग सकता है और यह भी की अब एक माँ को ख़त लिखने की जरूरत
क्यों पड़ी ?पर दिल के बोझ को कहने का सुनाने का कोई वक़्त तय नहीं है बस दिल किया और कह दिया .।क्यों की आज बहुत सी घुटन से आजादी है जो खुद की हासिल की हुई है ,पर आज भी अनचाहे रिश्तो को ढ़ोने का बोझ है ,आज भी पति पत्नी के रिश्तों में विश्वास की कमी है ,आज भी घर को जिम्मेवारी से चलाने का काम पति नहीं जानता है इस लिए यह ख़त है और मैं हूँ ....
रंजना भाटिया !





