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सोमवार, 11 मार्च 2013

हौसले को सलाम ! (2)


           एक औरत की जिन्दगी कभी बहुत आसन नहीं रही है , अगर अंगुली  पर गिनने की बात हम छोड़ दें तो एक घर से दूसरे घर आकर उसको अपना बनाने की प्रक्रिया सदैव कुछ कठिन ही रही है और फिर कभी कभी तो ये प्रक्रिया  जीवन चलती रहती है और कभी कभी जीवन में  वाले संघर्ष से जीतकर अपने मनोबल और साहस के सामने उन्हें स्वीकार करने का विकल्प बन जाती हैं . जितने जीवन है उतनी ही कहानी लेकिन कुछ एक प्रेरणा का स्रोत बन जाती हैं तो कुछ गुमनाम रह जाती है . उन्हें प्रस्तुत करने का एक प्रयास और साथ देने वाले हैं हमारे साथी ब्लॉगर . आज की प्रस्तुति है रंजू भाटिया जी कॆ. 




(एक ख़त बेटी के नाम)
मेरी प्यारी बेटी ..

आज वह वक्त आ गया है जब मैं तुम्हे ज़िंदगी की उन सच्चाइयों से रूबरू
करवाऊं जिनका सामना मैंने किया और सहते सहते हर जुल्म को अपने से यह वादा करती गई कि यह पीड़ा तुम नही सहोगी ..यहाँ यह बताना मेरा उदेश्य नही हैं कि मैंने क्या क्या सहा  क्यूंकि अब  लगता है की अपनी इस पीड़ा कि जिम्मेदार मैं भी हूँ .पर कई बार हम सच में परिस्थियों के आगे विवश हो जाते हैं या हमारी ही कुछ कमजोरियां हमे उस हालात से विद्रोह नही करने देती ...बहुत छोटी थी जब मेरी शादी कर दी गई यह कह कर कि  नए  कपड़े नए गहने मिलेंगे .. माँ थी नही जो ज़िंदगी का असली मर्म दर्द समझाती ..उस पर वह उम्र थी ख़्वाबों की सपनों की ,जो यह तो देख रही थी कि शादी के होने पर गहने तो मिलेंगे पर इस के साथ जो मिलेगा वह इस पगले दिल ने सोचा ही नही था ।
          मात्र १९ साल में शादी हो के पति के घर आ गई ..शादी के बाद
पहला तोहफा १० दिन में ही मिल गया जब ममिया सास के कुछ कपड़े चोरी हो गए और तलाशी मेरी अलमारी की ली गई ..हैरान  परेशान हो कर पति की तरफ देखा तो वहाँ गहरा सन्नाटा था और सास- ननद  तो तलाशी ले ही रही थी ...माँ सगी नही थी पर ऐसा अपमान वहाँ अपना नही देखा था ..दिल किया धरती फट जाए और समा जाऊं  क्योंकि  शादी पर आए मेहमान अभी रुखसत नही हुए थे सब तमाशा देख रहे थे यह ...फ़िर  दो महीने बीते ही थे कि  तुम मेरी कोख में आ गई ..और मैं एक नए रंग में ख़ुद को देख कर खुश हो गई ..उस वक्त तक के मिले सारे दुःख
भूल  गई और तुम्हारे आने की राह देखने लगी ...इसी बीच ननद की शादी भी तय हो गई लगा कि  अब यह मेरी दुनिया है जहाँ अब कोई दर्द नही होगा ..पर वक्त को शायद इतना खुश होना मंजूर नही था इधर से तुम आई मैं जी भर के तुम्हे अभी देख भी न पायी थी की उधर से ननद तलाक ले कर और एक छोटी बच्ची को कोख में ले कर वापस आ गई .....खैर वक्त धीरे धीरे बीतने लगा ..मेरे साथ साथ अब तुम पर भी गुसा उतरा जाता.... ननद नौकरी करती थी  और घर में तुम्हे और उसकी बेटी को संभलने वाली मैं ही थी ।
        तुम्हारी दादी को बेटी के वापस आने के दुःख के साथ ही यह दुःख भी
था कि उनके इकलौते बेटे का बेटा नही हुआ बेटी हुई है .मुझे मनहूस चोर और भाग्यहीन नाम से अक्सर पुकारा जाता था क्यों कि  लड़की का होना ननद का वापस आना  और उसकी बेटी होना यह सब मेरे मनहूस होने के कारण था  इसी बीच यह पता लगा कि  तुम्हरे पापा जहाँ नौकरी करते हैं अब वह नही रही इसका कारण भी मुझे ही माना गया ..मैंने नौकरी की इच्छा जाहिर की यही सोच के कुछ सहारा तो मिलेगा पर तुम्हारी दादी को  मेरा बाहर नौकरी करना मंजूर नही हुआ ..   इसी तरह ३ साल बीत गए ..तभी तुम्हारी छोटी बहन के आने की खबर  मिली और इस बार बेटा ही होगा इस आशा को ले कर कई तरह की दवा मुझे खिलाई गई पर मेरा ईश्वर   जानता है कि  मैंने हर दवा लेते वक्त यही दुआ मांगी की ,मुझे दूसरी भी बेटी देना ..जाने क्यों यह बात दिल मैं आई की दूसरे की बेटी पर जुलम करने वाले के घर अब कोई बेटा न हो .ईश्वर ने मेरी
सुन ली और तुम्हारी एक प्यारी छोटी सी बहना आ गई ..अभी इन उलझनों से सुलझ ही रहे थे कि  एक एक्सीडेंट मैं तुम्हारी दादी चल बसी ..अब तक
तुम्हारे पापा का नौकरी का कोई जुगाड़ सही ढंग से नही बन पाया था और उनका वह गुस्सा गाहे बगाहे मेरे ऊपर उतरता रहता था   ...वैचारिक  समानता हम दोनों के बीच मैं कभी बन ही नही पायी और जो पति पत्नी के बीच का एक समझदार रिश्ता बन  पाता  वह तुम्हारी बुआ   ने कभी बनने नही दिया..तुम्हारे दादा जी आज तक मेरे हाथ का पानी नही पीते थे क्यूंकि  उनकी नज़रों मैं आज भी मनहूस थी  जिसने आते ही उनके घर को मुसीबतों से लाद दिया ..तुम्हारे नाना ,नानी ने तो मेरी शादी के बाद से ही अपना दरवाज़ा यह कह कर बंद कर लिया की हमने तो शादी कर दी अब आगे जीयो या मरो वही तुम्हारा  घर है ......
           आज उम्र की संध्या बेला आ गयी है  ..अपनी ज़िंदगी के बीते लम्हे मैं वापस नही ला सकती ..पर  तुम्हे और तुम्हारी बहन को यही सिखाया की खूब पढो ताकि वक्त आने पर अपने पैरों    पर आत्म सम्मान के साथ खड़ी रह सको  और
ख़ुद मैं इतनी ताक़त पैदा करो कि कोई तुम्हे मनहूस या चोर कह के गाली दे तो तुम वह लड़ाई ख़ुद लड़ सको  याद रखो की अन्याय वही ज्यादा होता है जब हम उसको चुपचाप सह लेते हैं ..मैं आज मानती हूँ की मैं उस वक्त इन सब बातों का विद्रोह नही कर सकी कुछ मेरे पास हिम्मत की  कमी थी और कुछ दिए हुए संस्कार कि वही घर है अब जीना मरना तो इसी में है
इन सबसे ज्यादा जो कमी मुझ ख़ुद मैं  लगी कि मैं शिक्षित होते हुए भी
अपने पैरों  पर खड़े होने कि हिम्मत नही जुटा पायी ..पर हाँ इतनी हिम्मत
जरुर जुटा ली की अपनी बात अपनी कलम से एक लेखिका के रूप में लिख पायी तुम्हारे पापा एक पिता बहुत अच्छे रहे बस पैसे कहाँ से आये यह फ़िक्र उन्हें कभी नहीं हुई और आज भी नहीं है ... ..  तुम्हे उच्च शिक्षा दिलाना मेरा एक सपना था और यह पूरा हुआ ,किस तरह से यह मैं ही जानती हूँ ..खैर जो बीत गई बात गई ..आज मुझे खुशी सिर्फ़ इसी बात कि है कि मैं अपनी बात लिख सकती हूँ कम से कम इतनी डरपोक तो नही हूँ .:) .आज मेरी अपनी एक पहचान है लोग मुझे एक अच्छी लेखिका के रूप में जानते हैं ..और यह पहचान मैंने ख़ुद बनायी है.... हाँ घर के कई मोर्चों पर अब भी चुप्पी लगा लेती हूँ इसलिए कि जो बात मैं इतने सालों में नही समझा पायी अब उसको समझाना मुश्किल है  और   अभी मुझे माँ होने का एक और फ़र्ज़ पूरा करना है ..तुम्हे तुम्हारे घर में खुशहाल देखना है.....आज तुम्हारे पास इतनी अच्छी शिक्षा है इसका भरपूर प्रयोग  करो और अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीयो ..बडो का सम्मान करो पर जहाँ अपमानित होने लगो वहाँ मेरी तरह गर्दन झुका के हर इल्जाम कबूल मत करो ..अपनी पसंद से अपना जीवन साथी चुनो और उस में सबसे पहले यह बात देखो कि क्या वह तुम्हारे विचारों को समझता है  और क्या तुम्हारी भावनाओं का भी उतना  मान करता है जितनी उसकी ख़ुद की हैं ..अब तुमने कुछ समय में अपना नया जीवन शुरू  करना है ..आने वाला कल
तुम्हारी राह देख रहा है ..तुम्हे हर खुशी मिले और अन्याय से लड़ने  की
ताक़त मिले इसी दुआ के साथ।(तुम्हारी माँ )

यह ख़त शायद  आज के हालत से न मिलता हो .पर आज भी बहुत तरक्की नहीं हुई है ।आज कई जगह वह लड़के की माँ होने का और ससुराल के रंग ढंग वही है जो आज से तीस साल पहले थे ...लड़की को आज जरुरत है आपकी आवाज़ उठाने की .अन्याय न सहने की ..नहीं तो पढना लिखना बेकार है ..बेटियाँ  माँ की हालत से होश संभलते ही परिचित थी .और यही सब देख कर अपने आने वाले जीवन के प्रति भी बहुत अधिक आश्वस्त नहीं थी ,पर वक़्त अपनी रफ़्तार से चलता है और आगे आने वाले मान दंड वही तय करता है ।यह ख़त आज पढने वालों को सत्तर अस्सी के दशक का लग सकता है और यह भी की अब एक माँ को ख़त लिखने की जरूरत
क्यों पड़ी ?पर दिल के बोझ को कहने का सुनाने का कोई वक़्त तय नहीं है बस दिल किया और कह दिया .।क्यों की आज बहुत सी घुटन से आजादी है जो खुद की हासिल की हुई है ,पर आज भी अनचाहे रिश्तो को ढ़ोने का बोझ है ,आज भी पति पत्नी के रिश्तों में विश्वास की कमी है ,आज भी  घर को जिम्मेवारी से चलाने का काम पति नहीं जानता है इस लिए यह ख़त है और मैं हूँ ....

रंजना भाटिया !

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

हौसले को सलाम ! (१)

                        बीत गया महिला दिवस और फिर एक साल के लिए गया ये दिवस, लेकिन हम उसके होने का अहसास, अलग अलग महिलाओं के हौसले को देख कर सलाम करते हुए, करते रहेंगे . एक पहल है उस वर्ग की अपने विषय में सोचने की और अपने संघर्ष के रूप को प्रस्तुत करने की . कई बार तो हमें ऐसा लगेगा कि ऐसा भी कभी होता है लेकिन होता है क्योंकि हर महिला के सहन करने की सामर्थ्य अलग अलग होती है और अगर उसके सामने ज्वालामुखी भी फटती है तो वो उससे भी भिड़ने की ताकत रखती है और भिड़ती ही रही है. जो हार गयीं वो हौसले वाली कब कहीं जायेंगी? इन महिलाओं के हौसले को देख कर इसका निर्णय तो आप ही करेंगे . 

रश्मि प्रभा जी 




                          इस बार पहली कड़ी में रश्मि प्रभा जी ने कुछ दिया जो ठीक वैसे ही जैसे वे छायावादी कवि के प्रदत्त नाम को लिए हैं तो उसकी अभिव्यक्ति का भी कुछ तो असर इस कलम में है और इनकी प्रस्तुति में है.  

                                                         

आस-पास ?
वह तो अपने भीतर है 
सच स्पष्ट है 
पर नकाब है !
भीतर को उजागर न करो 
तो किसी और के लिए सोचा ही नहीं जा सकता !
तो - 
जो स्त्री मेरे भीतर रहती है 
वह जब छोटी सी थी 
तो अपने पापा के लिए ख़्वाबों की सच्चाई थी 
माँ के लिए हंसी का झरना 
भाई-बहनों के लिए बहुत ख़ास ,,,
पुरवा का झोंका जब बनी 
तो कितनी नज़रें उठीं 
जो ठहरी 
उसने मन में सोच लिया 
सच को बदल दूंगा !!!
सच बदला -
एक एक कौर के लिए बढ़ने की बद्दुआ उसने दी 
जिसने सम्मान,नाम देने के अग्नि फेरे लिए 
.......
रास्ते ही डगमगाने लगे .
समाज-परिवार और मासूम बच्चे 
सवालों ने जीना हराम कर दिया 
अपमान की अग्नि में झुलसने का जो सिलसिला आरम्भ हुआ 
वह तो थमा ही नहीं 
अति सर्वत्र वर्जयेत 
अन्याय सह्नेवाला भी गुनाहगार है 
ईश्वर हमेशा साथ है 
ये तीन स्वर सहयात्री बने 
मन ने कहा -
जान लेने से अधिक कोई नहीं मार सकता 
और मृत्यु के भय से परे उस स्त्री ने 
बच्चों के लिए सम्मान का घेरा बनाया 
सुकून भरी नींद के लिए लोरियां संजोयीं 
अकेलेपन को वरदान माना 
सरस्वती के आगे नतमस्तक हुई 
शब्दों का वरदान ले 
भावों की परिक्रमा करने लगी ....
कुछ निशान बनाये 
साथ ही इस घृणित सच को स्वीकारा -
हौसले अपने होते हैं 
जिसमें साथ की आहुति कोई नहीं देता 
समाज हो या परिवार 
वह ऊँगली पहले उठाता है 
और अपने घिनौने रूप का सवाल 
भयभीत चेहरे के साथ स्वत्व की मशाल लिए स्त्री के आगे रखता है 
नींद उडती है 
पर ................ मशाल आत्मविश्वास की बुझती नहीं है ...

नाम उजागर होते अजगर से सवाल 
गिद्ध सी मंशा का धुंआ उठता है 
पर हौसला वही है - जिसका नाम हो 
नाम को पूजा नहीं 
तो फिर हौसला कैसा ???

रश्मि प्रभा !

                                                          .

गुरुवार, 7 मार्च 2013

" अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस "

            

          " अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस " को हम एक दिवस की तरह हमेशा मानते हैं और फिर दूसरे दिन इस दिन कहे गए सारे वादों और संकल्प को भूल कर जिन्दगी फिर उसी ढर्रे पर चलने लगती है. इस बार सोचा कुछ ऐसा करें कि  कुछ लोगों कीं जिंदगियों से दो चार किया जाए . वह उस समय भी संघर्ष कर रही थी, जब वह घर की चहारदीवारी के अन्दर रहती थी और वह आज भी संघर्ष कर रही है .  मेरे अनुसार इस दिवस की सार्थकता तभी कुछ प्रतिशत हम सिद्ध कर सकते हैं जब हम उनके दिल और आँखों में झांक कर देखें कि  कहाँ आंसुओं के कतरे सूख चुके हैं , अब होंठों की हंसी ने जीवन में जगह बना ली है लेकिन उनके राह के काटों के निशान सिर्फ उनके पैरों में ही शेष नहीं है बल्कि वे अगर झांक कर देखें तो दिल में भी कहीं शेष है . 

                 जिन्दगी कहीं  भी फूलों की सेज नहीं है . एक नारी के लिए जन्म से लेकर अपने जीवन के अंत तक कितने तरीके से वह इस बात को सोचने के लिए मजबूर होती है की वह नारी क्यों हुई? सबकी जिन्दगी बड़े घरानों में पैदा हुए नारियों की तरह से नहीं है . सबके लिए जीवन के रास्ते  पहले से पहले खुले नहीं होते हैं कि वे उनपर चलती चली जाएँ . अपनी राहें उन्होंने खुद बनायीं हैं और उसमें बिछे काटों को खुद ही काटा है नहीं तो लहुलुहान होकर उन पर चलते रहना उनकी नियति बना दी गयी है. हम कहते हैं कि  नारी सशक्तिकरण हो रहा है , इस बात से इनकार तो नहीं किया जा सकता है लेकिन इस महिला सशक्तिकरण कहें तो विश्व की कितने प्रतिशत नारियां शक्तिशाली बन चुकी है , आज भी हम कह सकते हैं कि नारियों का आत्मनिर्भर होना , नौकरी करना या फिर घर से बाहर निकल कर कुछ करना उनके शक्तिशाली होने का प्रतीक नहीं है . कितनी महिलायें नौकरी करती हैं लेकिन फिर भी वे परतंत्र है क्योंकि  उनका वेतन उनके परिवार की संपत्ति होती है. कहीं कहीं तो उनको  अपने वेतन से कुछ अंश भी लेकर अपने हाथ से खर्च करने का हक नहीं होता है. एक आवरण पड़ा होता है उनके जीवन के भीतर और बाहर से दिखने वाले स्वरूप पर. कुछ ऐसी ही जिंदगियों की संघर्ष गाथा प्रस्तुत करने का हमारा प्रयास है और आशा करती हूँ कि अगर इसको पढ़ने वाले साथियों के दृष्टि में भी कोई ऐसी महिला संज्ञान में हो तो उसके संघर्ष को एक रूप देकर हमें भेजने की कृपा करें . उसमें नाम के उजागर करने की कोई भी जरूरत नहीं है. वो एक गाथा ही काफी है. 
                 वे हमारे अपने हों या न हों लेकिन अगर वे हमारे संज्ञान में हैं , जो अपनी  जिन्दगी की उन चुनौतियों से जूझते हुए अपने पैरों पर खड़े होकर सांस ले रहे हैं . इस मुकाम तक आते आते जो झेला वह एक मिसाल ही तो है . कहीं न कहीं वे लोग कुछ सन्देश दे जाते हैं - उन्हें मैं एक श्रृंखला में शामिल करके उनके संघर्ष के सफर की दास्ताँ को एक रूप देकर यहाँ प्रस्तुत करके महिला दिवस पर उनके हौसले को सलाम करती हूँ . 

                            

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

अल्पकालीन निद्रा श्वासावरोधन !

                             



                           हम अपने स्वास्थ्य के प्रति कितने सजग हैं? ये तो हमसे बेहतर कोई नहीं जानता , लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिनके बारे में हम तब सोचते हैं जब कोई अगला उसका शिकार  मुसीबत में पड़ जाता है. अगर किसी साधरण सी बात को हम गंभीर परिणामों में देखते है तो फिर अन्दर तक काँप जाते हैं .
                                आज सुबह की ही बात है, खबर मिली की मिश्र जी रात  में सोये थे और फिर सुबह उठे ही नहीं . कोई परेशानी नहीं थी और घर वालों के अनुसार वे डिनर लेने के बाद आराम से सोये थे. फिर क्या हुआ? एक बड़ी ही अजीब बात सुनने को मिली उन्हें खर्राटे बहुत आते थे और वही उनके जीवन को ख़त्म करने के कारण  बने. 
                      वैसे तो खर्राटे  एक  बात है और मेरी दृष्टि से हर दस लोगों में ८ लोग किसी न किसी रूप में खर्राटे कम या ज्यादा लेते ही है . ये खर्राटे व्यक्ति के निद्रावस्था में सांस का अल्पकाल के लिए अवरोधन की स्थिति है. ये आवाज क्यों आती है? इसके विषय में डॉक्टर के अतिरिक्त सभी अपने अपने विचार प्रस्तुत करते हैं और इसके विषय में दलीलें भी देते है . इन श्वासावरोधन को भी दो रूप में देखा जाता है  -- 

1. अल्पकालीन श्वासावरोधन की स्थिति
                       इसमें व्यक्ति के वायु मार्ग (श्वसन) सम्पूर्ण रात जल्दी जल्दी बंद होते हैं , जिससे श्वास में अवरोध उत्पन्न होता है. इस स्थिति में फेफड़े वायु लेने का प्रयास करते हैं लेकिन अवरोधित मार्ग के कारण  संभव नहीं हो पाता और ये इस स्थिति को एक सामान्य रूप में देखा जा सकता है. इसको हम अपने शरीर की अन्य स्थितियों में एक मानते है। 

केन्द्रित श्वासावरोधन की स्थिति - 
                      व्यक्ति की निद्रा की स्थिति में मष्तिष्क फेफड़ों को श्वास लेने का निर्देश नहीं देता है, तब व्यक्ति की श्वसन प्रक्रिया में वायु प्रवाह एवं फेफड़ों में उसका सामान्य रूप से आवागमन सम्पन्न नहीं होता है.   यह स्थिति व्यक्ति के लिए हृदयाघात या अन्य प्रकार की ह्रदय व्याधियों का कारण  बन सकती है. क्योंकि यह अल्पकालीन  श्वासावरोध फेफड़ों में वायु का संचार नहीं होने देता , जिससे रक्त में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है और हृदय को अधिक मेहनत  या कार्य करना पड़ता है और इसी स्थिति में ऐसी दुर्घटनाएं हो जाया करती है।
अल्पकालीन निद्रा श्वासावरोधन  के कारण : 
                   यह अल्पकालीन श्वासावरोधन  तब होता है जब कि  व्यक्ति निद्रा के दौरान वायुमार्ग के मध्य बढ़ी हुई मांस पेशियों, जैसे टांसिल का असामान्य रूप से बढ़े होने के कारण  अवरोध उत्पन्न होता जाता  है.  यह तब भी हो सकता है जब  जबान या गले की मांसपेशियां अधिक ढीली हो जाती है और वायुमार्ग अधिक खुला रहता है. 
                    खर्राटे मात्र अल्पकालीन श्वासावरोधन का संकेत है। जिन्हें हम एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया समझ लेते हैं,  वे कभी कभी बहुत खतरनाक तरीके से जीवन को मुसीबत में डाल  देते है . 
                      कोई भी व्यक्ति यदि खर्राटे लेता तो अवश्य ही उसका श्वसन मार्ग आंशिक रूप से अवरोधित होता है. यदि आप तेज खर्राटे लेते हैं और आपकी नींद टूट जाती है, तब आपको इस स्थिति को गंभीरता से लेना  चाहिए . इस स्थिति में आप अपने डॉक्टर से  अपने अल्पकालीन निद्रा श्वासावरोधक परीक्षण करवा सकते है .  खर्राटे  किसी बड़ी मुसीबत का कारण बन सकते  है या फिर यह इसका पूर्व संकेत होते है. इस प्रकार खर्राटों से सचेत रहकर भावी मुसीबत से  के लिए तैयार रहें . 
    अल्पकालीन निद्रा श्वासावरोधन का निदान :

                    खर्राटे के संकेतों से आप अगर सचेत हो रहे हैं तो इसको आसानी से ज्ञात किया जा सकता है. यदि आपके डॉक्टर ये समझते हैं कि आप को अल्पकालीन निद्रा श्वासावरोधन की समस्या है, तो वह आपके लिए आपकी सम्पूर्ण रात्रि की "स्लीप स्टडी" की व्यवस्था  - आपकी नींद एवं श्वसन प्रक्रिया की जांच के लिए कर सका है. यह स्लीप स्टडी अस्पताल में विशेष रूप से बनाये गए 'निद्रा केंद्र ' में किया जा सकता है. ज्यादातर 'निद्रा केंद्र ' यथा संभव स्वाभाविक निद्रा के लिए आरामदेह और अनुकूल वातावरण से युक्त होते हैं . जिससे आप स्वाभाविक नीद लें और उसके अवरोध को आसानी से रिकॉर्ड किया जा सके. 
  पॉलिसोमनोग्राफी - 
                                          'निद्रा अध्ययन कई प्रकार के हो सकते हैं . सबसे अधिक विश्वसनीय एवं पूर्ण तरीका 'पॉलिसोमनोग्राफी ' कहा जाता है. एक निद्रा तकनीशियन पॉली सोमनोग्राम के साथ एक सेंसर आपके शरीर के साथ लगा देता है और इससे आपके शरीर को निम्न  प्रक्रिया दिखलाई देती है --

* मष्तिष्क प्रक्रिया (नींद / जागृत स्थिति में )
* नेत्र गतिविधि 
* मांसपेशियों एवं पैरों की गतिविधि 
* श्वसन तंत्र एवं ह्रदय गतिविधि 
* आक्सीजन स्तर 
                              पॉलिसोमनोग्राम से आपके निद्रा विशेषज्ञ को एक चित्र प्राप्त होता है कि  आप कैसे सोते हैं और आपकी निद्रा भंग होने के कारणों को जाना जाता है. इसके अतिरिक्त दूसरे प्रकार के निद्रा परीक्षण भी संभव है, जो कि  घर पर भी किये जा सकते हैं लेकिन वे पॉली सोमनोग्राम की तरह आवश्यक  जानकारी प्रदान नहीं कर सकते है . 

                     अल्पकालीन निद्रा श्वासावरोधन की गंभीरता:--  

          ये नींद में श्वास के रुकने की प्रक्रिया एक गंभीर रोग का संकेत हो सकती है, लेकिन हम अगर इसके बारे में नहीं जानते तो फिर हम इसके नजर अंदाज करने के कारण और कई परेशानियों  का शिकार हो सकते है और अपने सामान्य जीवन में एक व्यवधान पाते हैं . इसके कारण  होने वाली संभावित समस्यायों को भी हम इस तरह से समझ सकते है . 
                                                
अल्पकालीन निद्रा श्वासावरोधन :--

                                                                 | 
  1. हाई ब्लड प्रेशर 
   2. ह्रदय सम्बन्धी समस्याएं ( हार्ट अटैक, हार्ट फेल  आदि )
   3. स्मृति सम्बन्धी समस्याएं एवं वैचारिकता सम्बन्धी समस्याएं 
  4. पक्षाघात 
  5. इन्सुलिन क्षमता वृद्धि 
  6 मार्ग दुर्घटना या कार्यस्थल दुर्घटना 

              आप अपने डॉक्टर से परामर्श करें और यदि आप अल्पकालीन निद्रा श्वासावरोधन से ग्रसित है तो आपको समुचित निदान एवं उपचार के लिए कदम उठाने चाहिए और अपने जीवन को स्वस्थ रहने की दिशा  में जागरुक होने का परिचय भी दे। 

** यह लेख मैंने अपनी मित्र  की सहायता लेकर ही लिखा है. 

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

किशोर अपराधियों की बढती उपज !

                                                          बचपन त्याग कर बच्चा जब किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखता है तो वह दौर उनकी जिन्दगी का सबसे नाजुक दौर होता है . मनोवैज्ञानिक तौर पर उनका मन विभिन्न जिज्ञासाओं और कौतुक से भरने लगता है . वे उन प्रश्नों के उत्तर अपने घर वालों से और मित्रों से बार बार प्राप्त करना चाहते हैं और अगर वे संतुष्ट हो सके तो वह बात उनके कोमल मन पर हमेशा के लिए अंकित हो जाती है और अगर वे संतुष्ट न हो सके तो फिर वे खुद उसको खोजने के प्रयास में रहते हैं . जीवन के इस नाजुक दौर में वे अपने मष्तिष्क में उमड़ते हुए अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर खोजने में रास्ते से भटक भी जाते हैं . माँ बाप उन्हें बच्चे समझते हैं और वे अपनी को बड़ा समझते हैं . इसी लिए वे अपनी उम्र के साथ साथ गलत जरिये से भी अपनी जिज्ञासा शांत करने का प्रयास करते हैं। 
                                                  दिग्भ्रमित इन किशोरों के इस भटकाव के लिए दोषी कारण इसी समाज में और हमारे बीच  ही पल रहे हैं।  हम उनसे अनजान होते हैं ठीक वैसे ही जैसे चिराग तले अँधेरा होता है। ऐसा नहीं है इसके लिए हम ही जिम्मेदार भी हैं लेकिन उसको सोचने की जरूरत महसूस नहीं करते हैं या फिर करके भी उससे अनजान बने रह कर अपने दबदबे और पैसे की हनक में उन्हें बढ़ावा देते रहते हैं। अगर बच्चे भटक भी गए तो बचाने के लिए हम हैं न। कुछ कारणों को तो हम देख कर समझ सकते हैं और उन के निवारण के लिए प्रयास भी कर सकते हैं। 
1. संयुक्त परिवार का विघटन : 
                          संयुक्त परिवार की पहले वाली परिभाषा तो अब अपने भाव  और अर्थ दोनों ही खो चुकी है लेकिन जो परिभाषा अब भी शेष रह सकती है वह भी ख़त्म होती जा रही है। विवाह के बाद पति और पत्नी , बच्चे होने के बाद उसमें बच्चे भी शामिल हो जाते हैं। बस विवाह के बाद माता पिता का स्थान बेटे और बहू की मर्जी पर निश्चित होता है। आज के दौर में अधिकतर पति और पत्नी दोनों ही काम काजी होते हैं और बच्चों के विषय में वे इतर साधनों से परवरिश तो सोच सकते हैं लेकिन माता  - पिता को अपने साथ रखने की बात उन्हें कम ही समझ आती है। शायद जनरेशन गैप की वजह से वे सामंजस्य नहीं बिठा पाते हैं . फिर बच्चे पहले क्रच में डाल देते हैं और फिर थोडा बड़ा होने पर स्कूल या फिर आया के भरोसे छोड़ना शुरू कर देते हैं। ये जरूरी नहीं कि  वे नौकरी शौकिया तौर पर कर रही हों उनकी मजबूरी भी हो सकती है लेकिन इसके पीछे बच्चों की उपेक्षा किसी को नहीं दिखाई देती हैं 
             बच्चों को स्कूल के बाद आया और उसके अशिक्षित बच्चों का साथ मिलता है और उनसे ही मिलती है कुछ जानकारियाँ जो वे अपने छोटे से घर में माता - पिता के साथ रहते हुए हासिल कर लेते हैं। एक कमरे के घर  में पति-पत्नी और बच्चे जिसमें वे अपने रिश्ते का निर्वाह भी कर रहे होते हैं। उसमें बच्चों की उपस्थिति जाने अनजाने उनके रिश्तों के प्रति उनके मन में गाहे बगाहे एक प्रश्न छोड़ जाते  है और यही से पैदा होती है उनके लिए एक नयी जानकारी हासिल करने की इच्छा , जिसे वे अपने साथियों के साथ बाँटते हैं और फिर बाल अपराधियों के यौन अपराध में लिप्त होने का एक स्पष्ट कारण सामने होता है। अगर बाबा और दादी भी घर में होते हैं तो बच्चों के लिए सिर्फ एक शिक्षक ही नहीं बल्कि एक अभिभावक भी रहता है जो उन्हें हर दृष्टि से सुरक्षित और नैतिकता का ज्ञान देने में अग्रणी रहते हैं। वे बुजुर्ग हैं तो घर पर बोझ नहीं होते बल्कि हमारे एक ऐसे बोझ को कम करते हैं जिसे हम कर ही नहीं सकते हैं। 
2.गजेट्स की उपलब्धि : 
                                    रोज रोज बढ़ते जा रहे गजेट्स और सामान्य वर्ग की बढती हुई सामर्थ्य या शौक कहें नित नए गजेट्स का घर में आना सामान्य बात हो चुकी है। घर में प्रवेश कर चुके गजेट्स बच्चों की पहुँच से दूर नहीं होते हैं बल्कि घर में माता -पिता की अनुपस्थिति में ये गजेट्स उनके लिए एक्सपेरिमेंट का साधन बन जाते हैं और वे उनसे खेलते हुए सब कुछ जान लेते हैं जो उनकी उम्र के लिहाज से उचित  है वो भी और जो उचित नहीं है वो भी।
          टीवी तो नवजात शिशु की भी पसंद बनाते देखा है . माँ अपने शौक के चलते रोते हुए बच्चे को टीवी के आगे कर देती है और फिर वे बच्चे टीवी के रंगीन स्क्रीन और संगीत सुनकर चुप हो जाता है तो माँ बड़े शान से कहेगी कि इसको तो अभी से टीवी का बहुत शौक है चाहे जैसे रो रहा हो इसको टीवी दिखाने  लगो चुप हो जाएगा और फिर रिमोट पकड़ने लायक होने पर वह रिमोट किसी को ही नहीं देता है। धीरे धीरे वह उसके लिए पूरी तरह से समय गुजरने का साधन बन जाता है। 
                    कंप्यूटर या लैपटॉप तो आम बच्चों की पढाई का हिस्सा प्राथमिक शिक्षा स्तर से ही बन चुके हैं . उनको ऑपरेट करना , नेट सर्फिंग करना उनके लिए कोई बड़ा काम नहीं रह जाता है। फिर घर में अकेले होने पर उसमें गेम खेलना और पिक्चर देखना उनके लिए समय गुजारने  का एक सबसे अच्छा साधन बन जाता है। इसमें देशी विदेशी फिल्में, पोर्न फिल्में और विभिन्न साइट्स शामिल होती हैं। उन्हें घर में रोकने वाला भी कोई नहीं होता है। इसके सकारात्मक प्रयोग को 10 में से सिर्फ 2 बच्चे खोजते हैं और शेष नकारात्मक प्रयोग को अधिक प्राथमिकता देते हैं। मध्यम वर्गीय परिवारों में पैसे की चलती हुई कशमकश के चलते  बच्चे बहुत जल्दी धन प्राप्त करने के लिए प्रयास करने लगते हैं। इसके लिए मेहनत करने की बात बच्चे कम ही सोचते हैं वे अन्य तरीकों को प्रयोग करना सीख जाते हैं। अभी हाल ही कानपूर में हुई एक बैंक डकैती में इंजीनियरिंग कॉलेज के दो छात्र लिप्त पाए गए और उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि  उन्होंने एक इंग्लिश पिक्चर देख कर इस डकैती की योजना बनाई  थी और वे उसमें सफल भी हुए। पुलिस उन तक कई हफ्तों बाद पहुँच पायी थी।

3.शिक्षा का व्यापारीकरण : 
                       शिक्षा का व्यापारीकरण हो चुका है और अपनी काली कमाई  को सफेद बनाने के चक्कर में रोज नए इंजीनियरिंग कॉलेज , मेडिकल कॉलेज , यूनिवर्सिटी और डिग्री कॉलेज खुलते चले जा रहे हैं और हमारी शासन व्यवस्था उनको बगैर मानकों के भी मान्यता प्रदान करती चली जा रही है . इसमें शिक्षा प्राप्त करने वालों का भविष्य कितना उज्जवल होता है इसकी कई मिसाले मेरे सामने हैं . अपने कॉलेज में कोटा पूरा करने के लिए उनको छात्रों को उनके गाँव और घर जाकर लुभाना होता है इसके लिए उनके एजेंट बाकायदा कम कर रहे होते हैं। उन्हें फीस कम करवाने और स्कालरशिप दिलवाने का लालच देकर किसी तरह से उनके सर्टिफिकेट हासिल कर लेते हैं और फिर वे उसमें प्रवेश लेकर बंध जाते हैं भले ही वे इस काबिल न हों लेकिन उन्हें अच्छे करियर के दिवा स्वप्न दिखा कर फंसा लेते हैं। 
                         मेरे अपने सामने कई ऐसे बच्चे हैं जिन्होंने प्राइवेट कॉलेज से बी टेक किया फिर घूमते रहे , फिर एम् बी इ भी कर लिया और आज भी वे खाली घूम रहे हैं। अगर माता  पिता सम्पन्न न होते तो वे किसी स्कूल में पढ़ा रहे होते और अपने कॉलेज के लिए दलाली कर रहे होते। बी टेक , फिर पी सी एस की तैयारी  के लिए कोचिंग और फिर बी टी सी करके प्राइमरी स्कूल में पढाने  वाले भी कई लोग मेरी नजर में हैं।
                        ऐसे कॉलेज में  निकलने वाले बच्चे जब बैंक से कर्ज लेकर पढ़ते हैं और बाहर निकल कर उनके कुछ बनने के सपने टूटने लगते हैं बैंक के कर्जे को चुकाने का जो तनाव घर वालों पर होता है वो धीरे धीरे उनके ऊपर उतरा जाने लगता है क्योंकि वे अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करके पढ़ते हैं तो उनके टूटते मनोबल को सही दिशा देने वाला कोई नहीं होता है और वे चेन स्नेचिंग , लूट पाट , डकैती जैसे अपराधों में लिप्त होने लगते हैं। ये महँगी शिक्षा उन्हें अपने गुजरे भर के लिए रोजगार नहीं दिलवा पाती है और वे ठगे जाने के बाद विद्रोही हो जाते हैं। अपराध की दुनियां में ऐसे लोगों के लिए दरवाजे खुले होते हैं और ये पढ़ी लिखी पीढी इसमें फँस जाती है। 

4.भौतिकता की चकाचौंध :  
                                    दिन पर दिन बढ़ते जा रहे ऐशो आराम के साधनों की आमद ने इंसान को परिश्रम से विमुख कर दिया है और किशोर तो आजकल शार्ट  कट के चक्क में अधिक रहते हैं। उनको अपने मित्रों की बराबरी करने के चक्कर में और साथ ही लड़कियों को आकर्षित करने की जो भावना उनमें घर करती जा रही है इसके लिए उनको महंगे कपडे गाड़ियाँ और मोबाइल चाहिए होते हैं। ये भी जरूरी नहीं है कि सम्पन्न  परिवारों के बच्चे हों फिर वे गलत हाथों में पड जाते हैं और इस अपराध की दुनियां में जमें हुए लोग इस फिराक  में रहते हैं की उन्हें नयी पीढी के किशोर मिले जिन्हें आसानी से प्रशिक्षित किया जा सकता है और जल्दी उन्हें अपराध में लिप्त समझा भी नहीं जाता है।

शनिवार, 26 जनवरी 2013

संशोधन चाहता है संविधान !.

                        हम देश के गणतंत्र दिवस का बहिष्कार कर रहे हैं है आखिर क्यों ? ये संविधान किसके लिए बनाया गया था? इस देश के रहने वालों के लिए और उस समय देश के हालत कुछ और ही थे . हमारे संविधान निर्माता विद्वान और देशभक्त थे और वे सबसे पहले देश को  पैरों पर खड़ा करना चाहते थे और उसमें सभी की बराबर भागीदारी स्वीकार कर रहे थे।
                        एक वो गणतंत्र था जब कि  इस देश को लोकतंत्र का कलेवर पहनाया गया . उस समय के नेता ईमानदार और कर्मठ थे और देशभक्त भी थे . आज नेताओं की एक ही जाति और धर्म है स्वार्थ सिद्धि . सत्ता में आयें या नहीं अगर वे संसद में बैठे हैं तो फिर सत्ता में अपनी संभावनाओं को तलाशते हुए देश में बनाये जाने वाले क़ानून में खुद को रख कर तब समर्थन देते हैं जब कि  उनकी अपनी अंगुली न फँस रही हो। नैतिकता, समान अधिकार और समानता के प्रश्न पर कोई कहाँ एक दिखाई देता है। बातें करना और बात है और उसको अमल में लाना और बात .
                        न देश में आधी आबादी सुरक्षित है और न  बचपन - उसके क़ानून बनाने में सोचते सोचते सालों  गुजर  गए , वें न  बन सके हैं और  न नहीं पायेंगे . हाँ अगर सांसदों के हित की कोई बात शुरू होगी तो कोई विपक्ष नहीं है सब एक स्वर में उसका समर्थन करने में पीछे नहीं रहेंगे  ये संसद में बैठ कर देश नहीं अपने भले की नीतियों का निर्माण करने अधिक उत्सुक दिखलाई देते हैं। जो मर्यादा राजनैतिक दल लोकतंत्र में अपनी भूमिका में निभाते हैं वह सब भूल जाते हैं। नाम लोकतंत्र और काम आपतंत्र  के करने में सब माहिर है। हम गणतंत्र क्यों मनाएं ? अपने ही देश में हम सुरक्षित नहीं है। हमारी सेनाओं के जवान अपनी आहुति देश की रक्षा के लिए दे रहे हैं और उनसे कई गुनी ज्यादा सुविधाएँ और पैसे ये नेता खा रहे हैं . और देश के प्रधान मंत्री खामोश रहते हैं क्योंकि उन्हें चलने वाला रिमोट तो किसी और के हाथ में होता है जब तक उसको चलाया नहीं जाएगा तो उनके मुंह से शब्द कैसे बाहर  आ सकते हैं ?
                   अब ये स्पष्ट रूप से महसूस किया जाने लगा है कि जो युवा चाहता है उसके लिए वह एक जुट है और इसके लिए उसको संसद पर काबिज होना पड़ेगा और निजी स्वार्थों को पोषित करने वाले कानूनों को बदल कर एक स्वस्थ राजनीति की परंपरा का निर्वाह करने वाला संविधान बनाये रखना होगा . उसमें संशोधन चाहिए और ऐसे संशोधन जो देश और देशवासियों के हित में हों न की संसद में बैठे हुए लोगों की मर्जी और उनके हितों की पूर्ति करने वाले। ऐसे लोग आयोगों पर काबिज हैं जिन्हें उस आयोग के अंतर्गत आने वाली सीमाओं की पूरी पूरी जानकारी तक नहीं है। कोई गरीबों को किसी रूप में परिभाषित करता है तो कोई देश वासियों को मिनरल वाटर की बोतल पी कर सड़क पर फेंकने वाला बता रहा होता है।
--सत्ता का चश्मा चढ़ा कर देश को देखने वालों की अब इस देश को जरूरत नहीं है।
--अपने बल पर चलने के काबिल नहीं है और संसद में सीट पर कब्ज़ा किये बैठे लोगों को जरूरत नहीं है।
-- जेल में बैठ कर चुनाव लड़ने वालों की भी जरूरत नहीं है। अगर वे अपराधी साबित नहीं  हैं फिर भी अगर उनके ऊपर कोई  लगाया गया है और मामला लंबित है तब भी वे उससे बरी होने तक चुनाव के लिए अयोग्य घोषित किये जाने चाहिए।
--संविधान में परिभाषित किये गए कुछ शब्द विशेष को पुनर्परिभाषित किये जाने की जरूरत है। जैसे अनुसूचित जाति  में आने वाले वे लोग जो आज भी सिर  पर मैला ढो  कर जीवन यापन कर रहे हैं उनका हक है  , न कि  उनका जो सिर्फ नाम के लिए जाति का लाभ उठा रहे हैं।
 --अल्पसंख्यक को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है क्योंकि देश की आबादी के बढ़ने से इस की सीमायें भी अब टूटने लगी हैं।
--आरक्षण का आधार अब आई आई टी की तरह से हर क्षेत्र में आर्थिक स्थिति को बनाया जाना चाहिए। क्योंकि  दलित वह  हैं मैला उठा रहे हैं , कूड़ा बीन रहे हैं लेकिन दलित नहीं है , भीख मांग कर पेट भर रहे हैं लेकिन दलित नहीं है . जो महिलायें अपने दुधमुंहे को सड़क के किनारे लिटा कर काम कर रही हैं लेकिन वे दलित की श्रेणी में नहीं आती है।  उनके बच्चों को आरक्षण की जरूरत है,  उनको नहीं जो  मैला ढोने  वालों का जाति  नाम लगा कर किसी आई इ एस के  परिजन   होने पर भी अनुसूचित जाति के आरक्षण का लाभ पीढी दर पीढी उठा रहे हैं।, जो सिर्फ जाति के नाम पर पहले से लाभ के पदों पर काबिज हैं और आने वाली पीढियां भी इसका लाभ उठा रही हैं।
--कानून प्रणाली को त्वरित बनाने के लिए नए संशोधन होने चाहिए . अपराधों की गंभीरता बढ़ जाने पर उनके दंड में भी बढ़ोत्तरी और कठोरता आनी  चाहिए।
-- राज्य हो या केंद्र सबसे पहले देश के नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने वाले साधनों की उपलब्धता को प्राथमिकता देने की बात करनी चाहिए न कि  अपने अहम् को संतुष्ट करने वाले कामों में जनता के पैसे को बर्बाद करे . इसके लिए संविधान में ही प्रावधान किया जाना चाहिए।
--देश का विकास भूखे मरते हुए लोगों को रोटी और रोजी उपलब्ध करने से अधिक महसूस होगा न की बड़े बड़े पार्कों के सुन्दरीकरण के नाम पर पैसे लुटाने में। उस पार्क की चाहरदीवारी के बहार पोलिथीन लगा कर घर बना कर रहने वाले विकास की कहानी पर धब्बा दिखलाई देते हैं।
--ये गणतंत्र तब तक बेमानी है , जब तक की इस देश में वाकई लोकतंत्र सही अर्थों में स्थापित न हो जाए। 
                  अब निर्णय देश के युवा वर्ग पर निर्भर है और आधी आबादी इसादेश के भविष्य को तय करने में अपनी आधी नहीं बल्कि पूरी पूरी ताकत लगा कर ढर्रे पर लेन का काम करेगी। अब वो आरक्षण की भीख नहीं मांगेगी बल्कि अपने दम पर संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए उनको टक्कर देगी . कल आने दीजिये तब इसा गणतंत्र को मनाने के अर्थ को सार्थक करने के लिए सब साथ होंगे 

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

दुष्कर्म : महामारी !

     

              हम अगर अपने समाज के इतिहास पर दृष्टि डालें तो पायेंगे कि  जब हमारा चिकित्सा विज्ञानं इतना उन्नत नहीं था तो देश में कुछ महामारी ऐसी फैलती थी कि  गाँव के गाँव उसके शिकार हो जाते थे और तब पूरे देश में हडकंप मच जाता था। प्लेग, हैजा जैसे रोग महामारी के नाम से जाने जाते थे। जिनका इलाज बहुत जल्दी नहीं खोज जा सकता था , ठीक उसी तरह हमारे देश में और समाज में एक मनोविकृति दुष्कर्म नामक महामारी फैलती चली जा रही है और उसके रूप विकराल से विकराल होते चले जा रहे हैं . यह एक मनोरोग है और दिन पर दिन यह महामारी का रूप लेता चला जा रहा है। इस बीमारी के कीटाणु नर जाति के मष्तिष्क में ही घुस रहे हैं और इस बीमारी में उम्र, जाति और सामाजिक रिश्तों की भी कोई सीमा या बंदिश नहीं होती है। अधेड़ , जवान या किशोर कोई भी किसी भी उम्र की बच्ची, किशोरी ,युवती या फिर  प्रौढ़ा को  शिकार बना सकता है। अब तो इस बीमारी में एक और जटिलता देखी जाने लगी है कि पहले तो इस बीमारी का शिकार बिगडैल दबंग पुरुष ही हुआ करते थे और इस काम के लिए गरीब , अपने नौकरों की बेटियों या पत्नियों पर रीझ कर अपनी इस बीमारी का शिकार बना लिया करते थे और वे उनके मातहत होकर कैसे और किसके आगे मुंह खोलते ? इसलिए चुपचाप हुजूर के इस जुल्म को सहते रहते थे। न कोई थाना , और न कोई रपट - अपने माई बाप के खिलाफ कौन जबान खोल सकता था?
                    फिर इस काम के लिए राजनीति में जगह बनने लगी, नेताओं और उनके गुर्गों ने महत्वाकांक्षी महिलाओं को राजनीति में मुकाम दिलवाने का झांसा देकर उनकी इज्जत से खेलने लगे लेकिन इसके पीछे वे महिलायें भी बराबर की दोषी समझी जानी चाहिए , जो सिर्फ अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए अपनी इज्जत से भी सौदा कर सकती हैं। दूसरे इसमें कद्दावर लोगों के द्वारा  अपने आकाओं को खुश करने के लिए लड़कियाँ उठाई जाने लगी और फिर छोड़ दी जाती क्योंकि उनके खिलाफ मुंह खोलने की किसी की हिम्मत नहीं थी। कभी खोलने की कोशिश की जान से ही हाथ धोना पड़ा।  मधुमिता शुक्ल केस इसका गवाह है और इसमें एक बात अच्छी ये रही कि उसके गुनहगार को समुचित सजा मिली। 
                    हम जिस गति से विज्ञानं और कंप्यूटर युग में जा रहे हैं उससे भी ज्यादा आम लोगों के लिए उपलब्ध नए नए गजेट्स उनको पतन की और ले जा रहे हैं। नेट का युग आ गया और अगर इसमें हमारे कदम प्रगति के पथ पर बढे तो फिर गर्त में जाने के रास्ते भी खुल गए।  बस यही से इस महामारी के कीटाणुओं ने किशोरों, युवाओं, और अधेड़ों के अन्दर प्रवेश कर लिया। और प्रवेश करते ही सबसे पहले ये कीटाणु उसके बुद्धि और विवेक को ग्रस लेते हैं और उसकी आँखों की कोर्निया को बच्ची से लेकर वरिष्ठ महिलाओं तक सब सिर्फ और सिर्फ स्त्रीलिंग दिखने लगती हैं। उनकी बुद्धि से सामाजिक रिश्तों का पेज पूरा का पूरा डिलीट हो जाता है . अपवाद ही सही बाप - बेटी , भाई -बहन , चाचा भतीजी , मामा- भांजी और जीजा- साली और मित्र के रिश्तों पर तो कोई रोक लगायी ही नहीं जा सकती है। ये कीटाणु इन पवित्र रिश्तों की मर्यादा को खंडित करने में संकोच नहीं करते हैं . बाकी  पडोसी या मित्र के लिए तो कुछ भी संभव है।
                  जब इसके कीटाणु सोते रहते हैं तब तो कुछ भी नहीं लेकिन ये कीटाणु किसी भी स्त्रीलिंग को देख कर वीभत्स  रूप से सक्रिय  हो जाते हैं और तब उस रोग ग्रस्त व्यक्ति के लिए अपने पर अपने मन मष्तिष्क पर काबू रखना असंभव हो जाता है। स्कूल, अस्पताल, घर , रेल , बस , टैक्सी, ऑटो किसी भी स्थान पर ये अपने काम को अंजाम देने के लिए विवश हो जाते हैं। इसमें पहले समय में तो सिर्फ अनपढ़ और दबंगों को ही इसका शिकार देखा जाता था लेकिन अब तो विवेकपूर्ण और उच्च शिक्षित लोगों को भी इसका शिकार होते देखा जा रहा हैं। इसमें पद, शिक्षा और प्रतिष्ठा सब कुछ इसके कीटाणुओं के सक्रिय  होते ही विवेक को हर लेते हैं और तब शिक्षक , डॉक्टर , संरक्षक , मालिक या फिर कोई श्रमजीवी होने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता है।  व्यक्ति इसमें बिलकुल दिग्भ्रमित होकर कार्य करने लगता है। छात्र  वर्ग में तो यह हवा की तरह से फैल रहा है। अब तो इसने अपने पैर ऐसे फैलाने शुरू कर दिए हैं कि सामूहिक दुष्कर्म की घटनाएँ दिन पर दिन बढती जा रही हैं। अगर हम एक दिन का अख़बार उठा कर देखें तो हमें कई जगह पर कई घटनाएँ मिल जायेंगी और ये वही घटनाएँ है जिन्हें पुलिस ने दर्ज किया है और वे जो दर्ज की ही नहीं जाती हैं या फिर अपनी इज्जत की झूठी शान के चलते लोग पुलिस तक पहुँचाना ही नहीं चाहते हैं या फिर दबंगों के प्रभाव में दबा दिए जाते हैं , उनका इससे कोई भी लेना देना नहीं है।
                ऐसी घटनाएँ तो होती ही रहती हैं और दब जाती हैं बगैर किसी निर्णय के। ये कोई अनोखा मामला तो नहीं है जो ऐसा बवाल मचाया जा रहा है।   लेकिन अब सामूहिक दुष्कर्म के मामले  इतना तूल  क्यों पकड रहे  है क्योंकि निर्भया काण्ड के बाद से जो कुछ भी कानून ने किया बहुत संतोष जनक तो नहीं है लेकिन अब लड़कियों और उनके संरक्षकों ने इस अन्याय के खिलाफ मुंह खोलना शुरू कर दिया है और जैसे ही उन लोगों ने ये हिम्मत दिखाई , अपराधियों ने पीड़िता को ही नहीं बल्कि उनको परिवार और पैरोकारों को मारना और मरवाना शुरू कर दिया। कुछ लोगों का कहना है कि  ये सब मीडिया की महिमा है, नहीं तो ऐसे कितने मामले अदालतों में पड़े हैं और वर्षों से निर्णय के लिए तरस रहे हैं। लेकिन कुछ  मामलों में अमानुषिकता की सारी  हदें पार हो गयीं और फिर जब यह महामारी अपनी पराकाष्ठा  पर पहुँच गयी है तो फिर कुछ तो इसके लिए आवाज उठाएंगे ही। अब जब ये बीमारी बुरी तरह से फैल चुकी है और इसको नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक हो गया है . इस बात को समाज में सिर्फ आधी आबादी ने ही महसूस नहीं किया है बल्कि इस महामारी से बचे हुए युवा भी इस के निदान के खोज के लिए प्रयत्नशील हो रहे हैं। राजनीति के ठेकेदार और न्याय के पैरोकार अभी भी इस मामले को इतना गंभीर नहीं मानते हैं क्योंकि उनके अनुसार इस काम के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि  सांसद शीतकाल का मजा अपने घरों में उठा रहे हैं फिर क्यों बेवजह परेशां हों? इसके लिए वर्मा समिति को नियुक्त कर दिया गया ,  जिससे सारे मामले को ध्यान में  रखते हुए उसके लिए निर्णय की संस्तुति वही करेगी।  लेकिन उसके निर्णयों को कितना माना जा रहा है।
                 इस महामारी को नियंत्रित करने के लिए प्रयास तो करने ही पड़ेंगे नहीं तो मानव जाति  का अस्तित्व  खतरे में पड  जाएगा हम इसके लिए समुचित इलाज को खोजने में प्रयत्नशील है कि ऐसा कुछ हो जाय कि ऐसे महामारी से ग्रस्त लोगों के लिए एक सबक बन जाय तो फिर कुछ सुझाव हम भी तो खोज ही सकते हैं-----

1. फास्ट ट्रेक कोर्ट का गठन (जिसके लिए सरकार सहमत हो रही है। )
2. पुलिस चार्जशीट कम से कम समय में तैयार करके कोर्ट में प्रस्तुत करे।
3.  इसके लिए रोज सुनवाई की जाए ताकि न्याय जल्दी मिले। 
4. इसके लिए आरोपित व्यक्ति की जमानत उसके निर्दोष साबित होने के पहले न की जाय।  हाल ही में जमानत पर आये अपराधियों ने पीड़िता को जला दिया।
5 . पीडिता का सम्पूर्ण इलाज सरकारी खर्च पर कराया , चाहे इसके लिए उसे कहीं भी भेजना पड़े। 
6 . इस महामारी के रोगी के लिए फाँसी की सजा उचित इलाज नहीं है क्योंकि वह कुछ ही समय में अपने सारे कष्ट से मुक्त हो जाएगा  अगर वह वास्तव में महामारी से ग्रस्त पाया जाता है तो उसको अंग-भंग  का दंड दिया जाय। 
7. आरोपियों के निम्न अदालत , उच्चा न्यायलय  सर्वोच्चा न्यायलय से दोषी घोषित होने के बाद कोई भी पुनर्विचार याचिका या दया याचिका का प्रावधान नहीं होना चाहिए। 
8. सौ दिन के अंदर इनके भविष्य का निर्णय होना आवश्यक है।
9  . इस महामारी से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर के बाहरी हिस्से पर जिस पर सीधी दृष्टि पड़े - जैसे चेहरे पर स्थायी रूप से ऐसा कोई निशान बना दिया जाय जिससे उसके इसा रोग से ग्रस्त होने का पता चलता रहे। ऐसे लोगों का चेहरा देखते ही उनसे सावधान रहा जा सके 
10 . वह निशान ऐसे लोगों को सामान्य लोगों के तरह से नागरिक अधिकारों से वंचित  करने के लिए पर्याप्त होने चाहिए।  ठीक वैसे ही जैसे कहा जाता है कि वह भारत का नागरिक हो पागल और दिवालिया नहीं होना चाहिए ठीक इसी तरह से वह इस महामारी से ग्रस्त नहीं होना चाहिए।
11 . ऐसे लोगों के परिवार में कोई अपनी बेटी न दे बल्कि इनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए
12 . इन्हें कोई अपने संस्थान  में प्रवेश या फिर नौकरी न दे।
                       अगर इन सब  पर अमल किया जाय तो फिर ऐसे लोगों को देख कर और चिन्हित होने के भय  से लोगो  में फैल रही इस महामारी पर स्वतः अंकुश लग जाएगा।