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सोमवार, 6 मई 2013

मुलाकात - सुधा भार्गव जी से!

सुधा भार्गव 
                         एक ऐसी मुलाकात जो अविस्मरणीय ही कहूँगी . सुधा जी से पहले से ही परिचित हूँ उनकी लघु कथाओं के सहारे जो मुझे बहुत ही अच्छी लगती हैं . उन्होंने मुझे पहले ही लिखा था कि  वे कानपूर आती रहती हैं और जब भी आएँगी तो मुझसे मुलाकात करना चाहेंगी .
                          इस बार के कानपूर प्रवास में उन्होंने आते ही मुझे मेल की कि वे कानपूर आ गयी हैं और मिलना चाहती हैं . फिर उनके घर की लोकेशन और बेटी और दामाद के बारे में बताया तो पता चला कि  मेरे पतिदेव उनकी बेटी और दामाद से परिचित हैं फिर क्या था ?  मुझे भी जाने में कोई संकोच नहीं हुआ . 
                           हम ऐसे मिले जैसे कि पहली बार नहीं बहुत बार मिल चुके हों . उनकी आत्मीयता और सब कुछ बाँट लेने की हसरत ने हम दोनों को जितने समय मौका मिला .हम अपनी अपनी बातें शेयर करते  रहे .
उनका कानपुर  प्रवास में कानपुर  के और ब्लॉगर और लिखने वालों से मिलने की बात से लगा की वे कितनी मिलनसार है  . वैसे तो मैं सबसे चुपचाप मिल लेती हूँ और  खुद में  में ही शेयर कर लेती हूँ लेकिन कुछ ऐसा मिला उनसे कि  मन हुआ सबसे इसको शेयर करूं . वैसे मैं मुलाकात को अपना व्यक्तिगत मामला मानती हूँ  इसी लिए मैं कोई कैमरा लेकर नहीं गयी थी कि  अपने उन क्षणों  को कैद करके सब लोगों के साथ बाँट सकती लेकिन वो पल मेरे मन में संचित हैं और फिर अपनी  मुलाकात इसी प्रवास में फिर से  करने वाली हूँ और वह भी अपने और ब्लॉगर साथियों के साथ . 
                           सुधा जी ने मुझे अपनी ४ किताबें भी भेंट की - जो उनकी लेखनी और भावों से परिचित करने के लिए पर्याप्त हैं .उनके काव्य संग्रह "रोशनी की तलाश में "  ने मुझे उनकी काव्य विधा से परिचित कराया . जिसमें उनकी कलम ने अगर गीत लिखे तो अंतस के भावों को जीवन के हर पहलू को दिखाने वाले हैं . लेकिन सिर्फ एक पक्ष नहीं बल्कि इस संग्रह में उन्होंने कई खण्डों में कविता को इस तरह से विभाजित किया कि  अगर प्रेम और दायित्वों में उलझी हुई नारी लिख रही है तो फिर समाज से जुड़े देश से जुड़े समसामयिक विषयों पर भी उनकी कलम बेबाक चली है. मुझे इस समय उनकी ये पंक्तियाँ बहुत समसामयिक लग रही हैं जब की ये पंक्तियाँ उन्होंने वर्षों पहले लिखी थी .
                   किसी की जिन्दगी पर दागी गोली चली , 
                   मेरे सीने में नजर आती है 
                   किसी की  आँख से ढुलके आंसू , 
                    बाढ़ मेरे घर में आती है. 
            
                  नारी मन के हर पक्ष को भी इसमें प्रस्तुत किया , उसके जीवन के विभिन्न पक्ष इस तरह रखे कि संवेदनशील कवि  हृदय सब कुछ कह देना चाह रहा हो. 

                           मैं सपने देखती हूँ 
                           दिखाती हूँ 
                            पर बेचा नहीं करती . 

         और 

                               आशा की दीपशिखा 
                                हाथ में प्रज्ज्वलित किये 
                                पूर्णता की धुन में 
                                आगे बढती रही .

                               पत्थर से पाँव छिले 
                               काँटों से घाव रिसे 
                                शून्य को ताकती  
                                आगे बढती रही . 

   और फिर भारतीय नारी को व्यंग्य में इस तरह से परिभाषित  कर गयीं .

                                भारतीय नारी 
                                 लौह सदृश्य भूमिका में थी 
                                लहू से लथपथ 
                                पति-पथ गामिनी . 

                    मैं उस पुस्तक की विवेचना नहीं कर रही लेकिन जब उसको पढ़ा तो उसमें इतना सारा था कि  हर पंक्ति को उद्धृत करने का मन करने लगा . लेकिन इतनी हिम्मत तो नहीं है कि  उसे पूरा का पूरा उठा कर रख सकूँ लेकिन उस कलम के प्रति नमित हूँ .तीन पुस्तकें उनकी बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानीयों की हैं सो मेरे पड़ोस में रहने वाले बच्चों ने मेरे आते ही कब्ज़ा कर लिया - 'दादू पहले हम पढेंगे ' .

 वे मुझसे बहुत बड़ी हैं लेकिन उनके स्नेह और अपनत्व को देख कर लगता है कि  हम पता नहीं कब से एक दूसरे को जानते हैं .

गुरुवार, 2 मई 2013

विश्व जल संकट !

                       


पानी चाहिए और एक नल 
                पानी मानव जीवन की सबसे बड़ी  जरूरत है जिसे वह प्रकृति से लेने के लिए बाध्य है किन्तु अब शायद वह अपने को इतना समर्थ समझने लगा है कि विशेषज्ञों की चेतावनी , प्रकृति के संकेत के बाद भी भू जल दोहन से बाज नहीं आता है. वह तो हमें धरती के गर्भ से मिलेगा ही लेकिन उसको प्रदूषित करने में हम जो भूमिका निभा रहे हैं कि  गंगा , यमुना , गोमती किसी भी बड़ी नदी को देख लें - क्या उनका पानी पीने की बात तो दूर नहाने के काबिल तक बचा है . इसके जिम्मेदार हम ही हैं - बगलें झांक कर हम अगर कहना  चाहें कि ये  तो उनका काम है , जिनके पास रहने को घर नहीं और जो अपने काम इन स्रोतों से ही चलाते हैं . हम तो नदी में कपडे धोने नहीं जाते , हम तो नहरों में नहाने नहीं जाते फिर हम क्यों ? 
                      वैसे भी समरथ  को नहि दोष गुसाईं  - दोष तो उनका है जो सड़क पर लगे नालों पर अपनी अपनी बाल्टियों और डिब्बों की क़तार लगा कर घंटों खड़े रहते हैं और तब उनको पानी नसीब होता है. हम घरों में बैठ कर सबमर्सिबल लगा कर तेज धार पानी को यूं ही चला देते हैं और ऊपर रखी टंकी भरने के बाद भी वह कितनी देर तक बहता रहता है क्योंकि हम उसको चला कर भूल जाते है . वह पानी नालियों में चला जाता है . हमारे कूलर कितना पानी पी जाते हैं क्योंकि हमें कुछ तो ठंडक में रहने का हक है.  
                      अब जब कि  धरती के अन्दर का पानी भी बड़ी बड़ी फैक्ट्री और टेनरियों से निकले रासायनिक पदार्थों के समाने  से प्रदूषित हो चुका  है . जब इनके चलते गंगा भी एक गन्दा  नाला बन कर रह गयी है. हमें पीने के लायक पानी कहाँ से मिलेगा ? इसी पानी के पीने से , नहाने से कितने संक्रमण और चर्म रोगों से लोग ग्रसित हो रहे हैं क्योंकि उनके पास पानी प्राप्त करने के साधन सीमित और यही बचे है . 
                        हम घर में वाटर प्यूरीफायर लगा चुके हैं क्योंकि हमें प्रदूषित पानी पीने से कोई बीमारी न हो जाए क्योंकि अधिकतर संक्रमण दूषित पानी के कारण  ही होते है . लेकिन हम कभी इस विषय में नहीं सोच पाए कि  एक लीटर आर ओ से निकले हुए पानी से तीन लीटर प्रदूषित पानी नाली में बह जाता है . वैसे तो मैंने भी इस तरफ काफी दिन तक ध्यान नहीं दिया लेकिन पिछले दिनों  से मैं उस पानी को नापने की सोची और उस ट्यूब को एक बाल्टी में डाल  दिया तब पता चला कि  उससे एक लीटर पानी लेने पर तीन लीटर पानी बह जाता है . मेरे अनुमान से करीब पचास प्रतिशत आबादी किसी न किसी तरीके से इसको प्रयोग कर रही है तो हम कितना पानी बहा भी रहे हैं और कुछ लोग गन्दा बदबूदार पीने के लिए मजबूर है . 
                        फिर क्या सोचा आपने  इस पानी की बर्बादी को रोकने के लिए - वही मेरी तरह से उस पानी को एक बाल्टी में संचित कर लीजिये और अगर अपने गमले रखे हुए हैं तो उसमें डालने के लिए सीधे नल का पानी न डाल  कर इस पानी को डाल  कर उसका सदुपयोग कर सकते है . उससे घर की धुलाई के लिए प्रयोग कर सकते हैं . लेकिन उस पानी को यूँ ही नाली में मत बहने दीजिए . ये अवश्य है कि  इसके लिए आपको कुछ तो प्रयास करने होंगे . कहाँ कहाँ हम पानी को बहाने से रोक सकते हैं इस पर ध्यान देना जरूरी है क्योंकि अगर कभी हम ऐसे हालत में फँस जाते हैं तो हमें अपने घर के इस बहते हुए पानी की बहुत याद आती है .
                        हालत पर गौर कीजिये और फिर सोचिए कि अगर एक इंसान इस पर ध्यान दे और इसके प्रति जागरूक हो तो फिर कितने  लीटर पानी का सदुपयोग हो सकता है. कृपया ध्यान दें और भविष्य में आने वाले जल संकट से विश्व को बचाने में अपना सहयोग करें . .

बुधवार, 1 मई 2013

आज मजदूर दिवस है!





आज मजदूर दिवस है और मजदूर अपने दिवस को कैसे मना रहे हैं ? सरकारी मजदूरों की बात नहीं करेंगे , बड़े बड़े कारखानों के मजदूरों की भी बात नहीं होगी क्योंकि वे वहां के कर्मचारी के रूप में जाने जाते है . वास्तव में मजदूर वे हैं जो इस समय खेतों में फसल काट रहे हैं और वे हैं जो सड़क निर्माण में लगे हैं . जिन्हें एक कतरा  छाँव का नसीब नहीं है .
                           मेरे घर के सामने सड़क और नालियों का निर्माण हो रहा है , जहाँ पर चालीस डिग्री तापमान में बेचारे मजदूर आज भी काम करने आये हैं . काम करवाने वाला ठेकेदार परिचित होने के नाते घर में आकर चाय और ठंडा पानी पीकर छाँव में बैठे रहते हैं और वे अपने काम में लगे रहते हैं . ईमानदारी से कहूं मैं उन लोगों के लिए ठन्डे पानी की बोतल अतिरिक्त लगा कर रखती हूँ और जब वे खाना खाने के लिए जाते हैं तो हमसे पानी ले लेते हैं सिर्फ इतना ही तो कर सकती हूँ उनके हिस्से का काम तो नहीं कर सकती .
                          आज भी शर्मा जी सुबह आ गये क्योंकि निर्माण सामग्री भी उन्होंने सुरक्षा की दृष्टि से मेरे घर में रखवा  दी है . चाय पीते हुए शर्मा जी से मैंने सवाल किया - क्या आज आप मजदूरों को छुट्टी नहीं दे सके ? '
'काहे की छुट्टी  भाभी ?'
'आज श्रमिक दिवस है , एक दिन उन्हें भी छुट्टी का अधिकार होना चाहिए .'
'छुट्टी कर लेंगे तो खायेंगे क्या? '
'आज उन्हें सवेतन छुट्टी दे दीजिये .'
'क्यों मजाक करती हैं , हम तो बरबाद हो जायेंगे . आप कहेंगी कि  काम पूरा नहीं हो रहा है . फिर वे हमारे स्थायी मजदूर तो हैं नहीं  , हम तो रोज बाजार से जाकर ले आते हैं .'
' एक दिन में कितना काम रुक जाएगा ?'
'ये सब व्यवहार में नहीं होता - ये कलम की बातें है . बतलाइये आज कौन सी फैक्ट्री बंद रहती है . सरकारी की बात नहीं कहूँगा .'
'मतलब ये मजदूर दिवस कागजी है , इसमें मजदूरों का कुछ लेना देना  नहीं है .' 
                    रुकिए मैं अभी काम देखकर आता हूँ , कहते हुए शर्मा जी वहां से जान छुड़ा कर भागे लेकिन अपने पीछे कितने सारे  प्रश्न छोड़ गए . ये सिर्फ एक शर्मा जी से जुड़े नहीं हैं बल्कि खुद हम सब से जुड़े हैं . 
छोटे स्तर  पर काम करने वाले ढेरों लोग हैं , जिन्हें एक दिन भी छुट्टी नहीं मिलती है. कुछ पैसे उन्हें जरूरत पर दे कर हम उनका शोषण करने से पीछे नहीं हटते हैं . कभी हम एक दिन की छुट्टी देकर उन्हें ये अहसास करवा सकते हैं कि वे भी इंसान हैं और उनसे काम लेने वाले भी सिर्फ व्यापारी नहीं बल्कि इंसान ही है . एक दिन की छुट्टी जो उन्हें बिना किसी बीमारी , घर के काम या फिर मजबूरी के बदले न लेनी पड़े बल्कि हम उन्हें खुद दे सके . आज के दिन अपने घर में काम करने वालों को छुट्टी देकर देखिये कितनी तसल्ली मिलती है और उनके चेहरे पर कितने  सुकून के भाव नजर आते है .  बस एक ही दिन की तो बात है. 

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

जिम्मेदार हम भी हैं !

                   रोज रोज की घटनाएँ हमें क्या दिखा रही हैं? हमारी ही तस्वीर , जिसे हम खुद गढ़ रहे हैं . दोष अगर हम अपने बच्चों को  दें तो फिर हम से अधिक समझदार  और कोई हो ही नहीं सकता है . कभी कभी तो हम उसका दोष दूसरों भी मढ़ने से नहीं चूकते है .
                             मेरी एक मित्र खुद बहुत अच्छे पद पर हैं और पतिदेव भी . बड़ा बेटा वाकई योग्य निकला और वह इंजीनियरिंग के बाद आइ ए  एस  बन गया .  जरूरी तो नहीं कि  सारे बच्चे एक ही तरह के निकलें . छोटा बेटा अभी अभी बालिग़ होने वाला है लेकिन उसके हाथ में गाड़ी है और खर्च करने के लिए पैसे भी . दोस्तों की फौज होना तो बड़े घर के बच्चों की शान ही होती है.
                             एक रात शराब पीकर गाड़ी चलते हुए एक्सीडेंट कर दिया और तुरंत पकड़ में भी आ गए क्योंकि एक्सीडेंट थाने  के आस पास ही हुआ था . पुलिस ने उन्हें साथियों सहित  बंद कर दिया  वो रात में पहले पुलिस वालों को डराने का प्रयास करता रहा कि  मेरे पापा ये हैं और मेरा भाई ये है लेकिन शायद पुलिस वाले उस समय  विश्वास नहीं कर रहे होंगे और उन्होंने छोड़ा नहीं और समाचार अखबार में आ गया . जब मैंने पढ़ा तो मेरी समझ आ गया कि  ये बिगड़े हुए नवाब कौन है? लेकिन दूसरे ही दिन के बाद इस खबर का कोई आगे का  हाल नहीं मिला कि पुलिस ने केस फाइल किया भी या नहीं और फिर कोई समाचार नहीं मिला . मैंने तो उसके घर जाना उचित नहीं समझा  क्योंकि हो सकता है कि वे समझें कि लोग उनके उपहास के लिए पूछने आ रहे हैं .
                      इस बिगड़े हुए बेटे के कार्य कलापों में क्या माता - पिता की कोई भी भूमिका नहीं है ? है  और शत प्रतिशत वे इसके लिए जिम्मेदार है . माना आप बहुत अच्छे और सम्मानीय लोग है लेकिन इस घटना के बाद एक मैं क्या उनके जानने वाले करीब करीब सभी लोगों ने यही कहा होगा की बच्चों की परवरिश हम पूरी पूरी सुख और सुविधा अपनी हैसियत के अनुसार देते ही हैं लेकिन जब हम उनकी नाजायज मांगों को मान लेते हैं या फिर बच्चे को अपने स्टेटस के अनुसार रखने की सोच बना लेते हैं तो वह हमारे लिए ही भारी पड़ता है. हम व्यस्त है लेकिन कितना ? अपने बच्चे के लिये कुछ तो समय निकाल  ही सकते हैं . हम अपनी जीवन शैली में कुछ तो परिवर्तन कर सकते हैं, कितनी ही व्यस्तता हो फिर भी बच्चे की शिक्षा और उसके आचरण के प्रति आपको सजग रहना होगा . रोज न सही लेकिन कभी कभी तो आप उसके कॉलेज में जाकर उसके बारे में पता कर ही सकते है . अगर नहीं कर सकते हैं तो हम गैर जिम्मेदार अभिभावक कहे जाएंगे .
                       बच्चों को बाइक देना तो अब जरूरी समझा  जाने लगा है क्योंकि स्कूल उनके दूर दूर होते हैं और बाइक हाथ में आते ही उनके पीछे बैठने वाले दोस्तों की भी कमी नहीं रहती है.  वे सब किस आचरण के हैं उसका प्रभाव आपके बच्चे पर जरूर ही पड़ेगा . आप उसके मित्रों पर भी नजर रख सकते हैं . ऐसे मित्र कभी न कभी घर पर भी आते रहते हैं और आप अपने परिपक्व होने के साथ ऐसे लोगों को पहचानने की क्षमता रखते जरूर हैं . बच्चों के जेब खर्च को एक सीमा में रखिये . इतना भी न दीजिये कि वे दोस्तों के साथ होटलों या फिर रेस्टोरेंट में जाकर रोज पार्टियाँ करें , ड्रिंक पार्टी एक आम चलन हो चुक  है. जेब खर्च दीजिये लेकिन ऐसा नहीं कि  उसके दुरूपयोग से वे अपनी दिशा भटक जाएँ .
                       बच्चों में चाहे लड़कियाँ हों या फिर लडके घर वापस लौटने की भी एक सीमा निश्चित कीजिये कि  उन्हें इस समय तक घर आना ही होगा . पार्टियाँ बड़े घर के बच्चों की देर से शुरू होकर देर तक चलती हैं , ये आधुनिकता की निशानी आप मान सकते हैं लेकिन ये स्वस्थ मानसिकता की निशानी तो बिलकुल भी नहीं है.  ये नहीं कि  उनके लौटने की कोई समय सीमा ही न हो . कई बार माता - पिता अपने आराम को ध्यान में रखते हुए एक चाबी बेटे को भी दे देते हैं कि  अगर वे देर से लौटें तो उनकी नीद ख़राब न हो , लेकिन शायद वे ये भूल जाते हैं की सिर्फ कभी कभी नींद ख़राब होने को बचने के लिए आप जीवन भर के लिए अपने बच्चे को दिन का चैन और रात की नींद ख़राब करने की छूट दे रहे है .
                          उनका बच्चा रात दो बजे घर से बाहर  घूम रहा है और माता - पिता निश्चिन्त कैसे रह सकते हैं? मोबाइल तो हर बच्चे के पास होता है फिर कैसे उनकी स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाने की बात एक समझदार माता पिता नहीं सोचते हैं . किशोरों का अमर्यादित आचरण सिर्फ इसी बात और छूट का परिणाम है की माता - पिता जरूरत से अधिक पैसे और ऐशो आराम के साधनों को बच्चों को सौंप देते है .
                          बच्चों के कमरे और उसमें सभी आधुनिक संसाधन होना  कोई  नई  बात नहीं है. फिर  कमरे में उन संसाधनों के दुरूपयोग को तो आप नहीं रोक सकते हैं . हर बच्चा इतना समझदार भी नहीं होता है कि  वह उसका उचित प्रयोग ही करे. सुविधाएँ प्रदान जरूर करें लेकिन उसके प्रयोग पर एक नजर भी रखना बहुत जरूरी होता है. जो संसाधन उन्हें प्रदान करें उसमें अपनी दखल भी बनायें ताकि उनके प्रयोग पर नजर रखी जा सके . ये कोई गलत काम करने की वजह से  नहीं  बल्कि हमारे बच्चे उस दौर से गुजर रहे  हैं जहाँ उनके भटक जाने की पूरी पूरी गुंजाइश होती है . उसे रोकने के लिए या दिशा भटकने से पहले ही हम उन्हें रोक सकते है .
     जिम्मेदार हम भी हैं !

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

हौसले को सलाम ! (12)

   

                           संघर्ष अगर किसी के सहारे के रहते किया जाय तो   तो साथ  है  अगर मंजिलें बहुत बहुत दूर हों और एक औरत के खाली हाथ हों या फिर हाथ बंधें हों तो फिर उसकी विवशता को और उसमें फंसकर छटपटाते  उसके जीवन को कैसे ईश्वर राह दिखता है और वह भी उस मुकाम तक  दे  उसने कभी कल्पना ही न की हो. एक  ऐसी ही महिला की कहानी जो मिली भी तो सिर्फ कुछ घंटों के  लेकिन दे गयीं ये सब .....

                              आज की प्रस्तुति मेरी ही है. ............!







     वह भी मेरी ही तरह से एयर पोर्ट पर किसी को रिसीव करने के लिए बाहर से आई थी  और फ्लाइट लेट थी .   उनका बेटा आ रहा था और मेरी बेटी।  वह छोटे कद की शालीन सी दिख रही थी।  समय तो  हमें गुजारना ही था, एक दूसरे के बारे में कुछ जानना भी इसका एक अच्छा विकल्प था।    अपनी आदत के अनुसार जब दो महिलायें बैठती हैं तो  एक दूसरे के  बारे में जानने के लिए उत्सुक होती है। 
आप कहाँ से हैं? 
 
किसे लेने आयीं है? 
कौन कौन है परिवार में ? आदि आदि।  
       हम  भी इसके अपवाद न थे. लेकिन इतने थोड़े से समय में सब कुछ बता  देने के लिए किसी को मोटिवेट करना मेरे काम से जुड़ा है ,  और उनके बारे में सब कुछ जान लिया।

                    वह  कमला एक बेटे और एक बेटी की माँ  - बेटा  वैज्ञानिक और बेटी इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर। बेटा  विदेश से "युवा वैज्ञानिक एवार्ड" लेकर लौट  रहा था और उसकी इच्छा थी कि वह अपना एवार्ड माँ को दे और माँ उसको लेने के लिए आये। वह आई थी और उसका सिर गर्व से ऊँचा था। 
                     अपने  संघर्षों  की परछाईं उनकी नज़रों में नजर आ रही थी - जब वह हाई स्कूल कर चुकी तो गाँव के रिवाज के अनुसार उसकी शादी की बात शुरू हो गयी। वहाँ के रिवाज के अनुसार आस पास के रिश्तेदारों में वर खोजा जाता था और एक वर मिला वह इंजीनियर था। पहले कद देख कर उसने मना  कर दिया की इतनी छोटी लड़की से नहीं करेंगे , लेकिन बाद में हाँ कर दी और फिर शादी हो गयी।  वह गाँव छोड़ कर शहर आ गयी , पति के पद के अनुसार उसे हर सुख -सुविधा मिली। वह जल्दी ही एक बेटे और बेटी की माँ  बन गयी।  उसके पति सिविल इंजीनियर थे और अपने पद के अनुसार उनकी ऊपरी आय भी अधिक ही थी और सोसायटी के अनुरूप पार्टी होते रहना आम बात थी और फिर पार्टी में तो ड्रिंक भी करने लगे।  काम में इतने व्यस्त रहते थे कि अपने स्वास्थ्य की ओर कभी ध्यान नहीं दिया  और उनको जल्दी ही डायबिटीज भी हो गयी लेकिन इस बारे में न उन्हें  और न ही मुझे कुछ भी पता न था। सब कुछ वैसे ही चलता रहा और तब पता चला जब कि उनकी दोनों किडनी बेकार हो चुकी थीं। 
         सिर्फ सत्ताईस साल की उम्र में जब बेटा ५ और बेटी ३ साल की थी मेरी दुनियाँ उजड़ गयी।
                   गाँव से जेठ सारा सामान भर कर गाँव ले जाने के लिए आ गए।  पति के ऑफिस में लिख कर दे दिया कि  मेरी बहू नौकरी नहीं करेगी और सब कुछ  लेकर गाँव आ गए। बिना पढ़े लिखे खेती वाले घर में - एक विधवा का जीवन  कैसा होता है? ये हर कोई नहीं जानता।  मेरे घर का सारे सुख- सुविधा का सामान जेठ के कमरे  में लग गया और मुझे मिली एक कोठरी  जिसमें जमीन  पर एक दरी पड़ी होती और उस पर अपने दोनों बच्चों के साथ सोती। सुबह से घर के काम मेरे जिम्मे सबके  खाने के बाद जो भी बचता चाहे सिर्फ रोटी या फिर सिर्फ दाल, पेट भरे या नहीं खा कर रह जाती। बेटा जानवरों के साथ खेतों में घूमता और बेटी मिट्टी में  खेलती रहती और जब थक जाती तो आकर मेरे पास सो जाती।  वे बच्चे जो कभी गाड़ी के अलावा चले नहीं थे, रात में  जमीन पर एक दरी पर मेरे पास सोने आ जाते।  रात में मैं बिस्तर पर पड़ी रोती कि क्या जिन्दगी इतनी विरोधाभासी भी हो सकती है? आगे और पीछे अँधेरे के अलावा कुछ भी नजर नहीं आता था। 
                        एक दिन जेठ जी ने बेटे को कुछ माँगने पर पीटा और कहा वैसे ही रह जैसे बिना बाप के बच्चे रहते हैं, तेरा बाप कमा कर नहीं दे रहा है जो तेरी फरमाइश पूरी करूँ। ये शब्द मेरे कानों में गर्म शीशे की तरह से घुल ही तो गए लेकिन मुझे जलालत के सिवा कुछ भी हाथ नहीं आया। पेंशन मेरी अभी बन कर नहीं आ रही थी, तो मेरे पास जो भी था उसको सँभाल कर रखे थी कि अगर इन लोगों को पता चल गया तो वे वह भी मुझसे ले लेंगे। 
 
           उसी समय मेरी बड़ी ननद गाँव आई और मेरे बच्चों और मेरी दुर्दशा होती देखी, वे  बड़ी थी और उन्होंने अपने पति, जो कि मेरे पति के मित्र भी थे। उन्होंने हम तीनों को मेरे मायके भेजने का प्रस्ताव अपने भाई के सामने रखा लेकिन जेठ जी इसके लिए राजी नहीं थे। उनको एक काम करने वाली मिली थी। लेकिन नन्दोई जी के कहने पर वह एक महीने के लिए भेजने को तैयार हो गए लेकिन उससे पहले उन्होंने मुझसे कुछ कागजों पर दस्तखत करवा लिए , इसमें उनकी मंशा क्या थी ? ये न मुझे पता थी और न ही मेरी ननद को लेकिन नन्दोई जी इसके बारे में अनुमान लगा चुके थे कि वह हमारी जायदाद अपने नाम लिख कर हमें उससे वंचित कर सकते हैं। मायके पहुँच कर मैंने खुली हवा  में साँस ली लेकिन एक माँ  के लिए उसकी सबसे छोटी बेटी और वह भी विधवा हो तो  दिल पर क्या गुजरी  है ये उसके अलावा कोई और नहीं जान सकता। मैं तो कुछ दिन आराम से रही लेकिन मेरी ननद ने कुछ और ही सोच रखा था।
                          मेरी बड़ी ननद ने अपने बड़े भाई से बैर मोल लिया और पति के ऑफिस में  मेरी नौकरी के लिए बात की लेकिन मैं सिर्फ हाई स्कूल पास थी और मुझे क्लर्क की नौकरी के लिए भी टाइपिंग आनी चाहिए थी।  जो मुझे नहीं आती थी , एक इंजीनियर की पति चपरासी जैसे पद पर काम करे न ही मुझे उचित  लग रहा था और न ही ऑफिस वालों को।  मुझे एक महीने  का समय  दिया गया और मैं ऑफिस से आकर टाइपिंग सीखने  जाने लगी।  मेरी ननद मेरे साथ रही बच्चों को देखने के लिए लेकिन अपना घर छोड़ कर कौन कितने दिन रह सकता था और फिर वह भी चली गयी।  
           कुछ दिन में टाइपिंग सीखने के दौरान मेरी दोस्ती एक लड़की से हुई , उसके भाई उसको छूटने के बाद लेने आते थे, मैं बच्चों को साथ लाती थी और वे  उतनी देर बाहर के चबूतरे पर खेलते रहते थे।  एक दिन सोनिया के भाई उसको लेने आये तो उन्होंने बच्चों को खेलते देखा तो पूछ बैठे - "बच्चों आप यहाँ क्या कर रहे हैं ?" बच्चे तो बच्चे बता दिया कि मेरी मम्मी यहाँ पढ़ने आती हैं तो तब तक हम बाहर खेलते हैं , घर में कोई नहीं है न।
 
                   फिर एक दिन और वह मुझे अपने घर ले गयी।  उसके घर में उसके तीन भाई और भाभी थे सबने मुझे उसकी ही तरह से घर में जगह दी।  मेरे पति का सारा पैसा  मुझे दिलवाया और मेरे लिए अपने घर के करीब ही एक फ्लैट खरीदवा दिया। मैं ऑफिस जाती और बच्चे मेरे पीछे उनके घर में  रहते मुझे नहीं पता कि  मेरे बच्चे समय के साथ इतने समझदार और गंभीर कैसे हो गये ? बेटा खुद पढ़ने  बैठता और बहन को भी लेकर बैठता।  खुद ट्यूशन  लेकर अपनी पढाई के लिए सारा सामान खुद जुटा लेता मुझसे कुछ नहीं कहता था। 
                मेरे देवर  और  जेठ ने कभी ये जानने की कोशिश नहीं की कि  मैं कहाँ हूँ ? जिन्दा भी हूँ या मर गयी।  मेरे बच्चों का क्या हुआ ? मेरे हिस्से  की सारी  खेती दबा ली।  मेरी आमदनी अधिक नहीं थी किसी तरह से बच्चों को पाल ही रही थी। बेटे ने स्कालरशिप लेकर अपनी ही नहीं बल्कि अपनी बहन को भी पढाई के लिए प्रेरित किया। फिर उसको अंटार्टिका जाने का अवसर मिला लेकिन हम इतने समर्थ नहीं थे कि वहां पर रहने के लिए जो किट चाहिए थी वह खरीद सकते। उस दिन मैंने अपने बेटे को बहुत मायूस देखा वह मेरे साथ आकर लेट गया और भरे गले से पहली बार बोला - "आई अगर बाबा होते तो मैं अंटार्टिका जा पाता न।" मैं निरुत्तर थी लेकिन मैंने उसके सिर पर हाथ रखते हुए पूछा कि कितने पैसे लगेंगे और उसने जो रकम बताई वो मेरे पास हो ही नहीं सकती थी।बस एक चीज थी कि हमारे यहाँ सोने का महत्व बहुत था और मेरे पास भी काफी जेवर थे और फिर मैंने बगैर किसी की परवाह किये और बगैर बताये अपना मंगलसूत्र जो कि  बहुत कीमती था बेच दिया क्योंकि वह मेरे किसी काम का नहीं था लेकिन वो मेरे पति की निशानी थी और उसको बेचने में मेरा कलेजा मुंह को आ गया था लेकिन दिल कड़ा करके मैंने बेच दिया और उसको पैसे दिए कि जाकर अपनी किट खरीद ले। 
                     उसने मुझसे बहुत सवाल किये कि आप पैसे कहाँ से लाईं ? मैंने कह दिया कि अपनी कलीग से उधार ले लिया है धीरे धीरे अदा कर दूँगी। उसकी ख़ुशी ने मुझे इतना आत्मसंतोष दिया था कि वह मेरे लिए अनमोल था। वहां से आकर उसको पी एचडी के लिए स्कॉलरशिप मिल गई और वहां मेरे पास से दिल्ली चला गया। उसने अपनी बहन को एम टेक करवाया और उसकी शादी में भी पूरी जिम्मेदारी उठाई। 
                     उसके सपने कैसे पंख  लगा कर ऊँचाइयों पर जा पहुँचे मुझे पता नहीं लगा. उसने पढाई लगातार बिना रुके पूरी  की जो मैं न जुटा सकी वह उसने खुद  जुटाया और अपने वैज्ञानिक  के सपने को पूरा ही नहीं किया बल्कि इस एवार्ड को लाकर मेरे संघर्ष को एक मुकाम दे दिया।

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

हौसले को सलाम (११ ) !

                         भाग्य और कर्म दोनों का चोली दमन का साथ है. हाँ ये हो सकता है की भाग्य साथ न दे तो अथक परिश्रम के बाद भी उपलब्धि नगण्य हो लेकिन कर्म कभी भी विफल नहीं होता है . हौसला भी बना रहता है और मार्ग भी आसन हो जाता है. उसके बाद उसका आकलन अगर सही ढंग  से किया गया तो सब कुछ सार्थक लगता है. 

                          आज की प्रस्तुति है विभा श्रीवास्तव जी की . 



नर से बढ़ कर नारी .... 
लिखा हमनें पढ़ा ....
सोचा हमनें  समझा नहीं ....
माना हमनें अपनाया नहीं ....
लेकिन मैं एक उद्दाहरण लाई हूँ ....
सन 1995 ....
मेरे ससुर जी रिटायर्ड होनें पर मुजफ्फरपुर(बिहार) में बना-बनाया घर खरीद लिए जो हमलोगों का स्थाई निवास-स्थान बना ..... उस घर के पड़ोस में ही एक परिवार रहता था .... उस परिवार में पति-पत्नी और दो प्यारी सी छोटी-छोटी बच्चियां .... छोटी वाली कुछ महीनों की थी लेकिन बहुत ही प्यारी थी .... उसी उम्र का मेरी देवरानी का बेटा भी था जो बाहर भोपाल में अपने माता -पिता के साथ रहता था .... पोते के नहीं रहने के कारण मेरी सास उस बच्ची के पास ज्यादा जाती .... और धीरे-धीरे ,उस परिवार से हम सब घनिष्ट होते गए .... उस परिवार के लिए बड़ी भाभी और बच्चियों के लिए बड़ी अम्मा बनी मैं ..... मुझे एक और देवरानी मिली नीतू अस्थाना और देवर विवेक अस्थाना .....
विवेक एक लड़कियों के महाविद्द्यालय में सहायक के तौर पर कार्य करते थे .... आमदनी का एक ही जरिया होने के कारण पैसे की कमी नीतू को बहुत ही परेशान करता था .........
 वो अक्सर बात किया करती :- दीदी मुझे कुछ करना होगा ,क्यूँ कि मैं अपनी बच्चियों को लाड-प्यार से पालना चाहती हूँ .... बहुत पढ़ाना चाहती हूँ .... इतने पैसे से ठीक से भोजन ही नहीं हो पाता .... शिक्षा कैसे होगा .... ??
कुछ सालों के बाद जब छोटी वाली भी स्कूल जाने लगी तो नीतू कुछ करने के लिए सोच ही रही थी , राह मिल गया ..... जिस महाविद्द्यालय में विवेक काम करते थे वहीँ नीतू को एक दूकान मिल गया ...दूकान बहुत ही छोटा था लेकिन नीतू के सपने और उस सपने को पूरा करने के हौसले बहुत ही बड़े थे .... नीतू उस दुकान में लड़कियों के जरुरत के सामान रखती थी .... उस महाविद्द्यालय में होस्टल भी था और दूर गाँव से आने वाली लड़कियों की संख्या भी अधिक थी .... लडकियों को बाहर बाज़ार जाने की इजाज़त भी नहीं थी ..... इसलिए नीतू के दूकान अच्छे चलने लगे ..... नीतू मेहनत भी बहुत करती .... सुबह उठ कर घर का सारा काम करती और लड़कियों को स्कूल भेजती .... फिर विवेक के साथ ही दुकान जाती .... बच्चियों के स्कूल से आने के समय घर आती ,उन्हें खाना खिला फिर दुकान जाती .... शाम में दूकान बंद करने के बाद बाज़ार जाती .... लड़कियों की जो मांग होती उसे खरीदती और साथ में घर के भी सामान लाती ..... फिर घर का रात का काम करती ....
उसके मेहनत रंग ला रहे थे लेकिन नीतू पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पा रही थी .... पैसे आ रहे थे ,तो खर्चे भी बढ़ रहे थे .... कुछ समय के बाद दूकान में ही वो लड़कियों के कपड़े मौसम के अनुकूल रखने लगी .... जो लडकियाँ उसके दुकान से कपड़ें लेती नीतू को ही सिलाने के लिए दे देतीं .... कुछ आमदनी का जरिया और हो गया .......... लेकिन नीतू अभी भी संतुष्ट नहीं थी .... वो थक रही थी लेकिन हौसले के पंख तो अभी भी थे ......... 
आज से 3-4  साल पहले अपने घर में ही लड़कियों का होस्टल खोल ली ..... घर में लड़कियां रखी .... खाने की भी व्यवस्था की .... फिर और कमरे बनवाती गई .... लड़कियों की संख्या बढाती गई ..... अपनी दोनों बेटियों को बाहर रख कर शिक्षा दिलवा रही है ....... 
पिछले दिन(18/3/2013) जब मैं पापा जी का श्राद्ध-कर्म के भोज में उसे आमंत्रित की तो वो अपनी चालीस लड़कियों के साथ एक कुशल सेनापति की तरह आई ........ सच बताऊँ .... उससे ज्यादा मैं उस दिन खुश हुई उन लड़कियों को देख कर .... उन्हें भोजन कराने मैं ज्यादा आनन्दित हुई ......... उन सब को एक बात मैं भी बोली खुद को बदलो समाज बदलना है ....
सच बताईये विवेक से बढ़ कर नीतू हुई कि नहीं ..... ??
उसने  साबित किया या नहीं .... ??

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

हौसले के सलाम ! (१०)

                    कुछ ऐसे ही लोग जिन्हें हम देखते हैं और देख कर खुद हैरान हो जाते हैं लेकिन ये भी सच है की अगर हम खुद हौसला नहीं खोते तो वह ईश्वर भी हमारा हाथ थामे रहता है और हमें उतनी शक्ति देता है और रास्ते भी देता रहता है. 

                      आज की प्रस्तुति है सरस दरबारी जी की .
 
                   

                रेखाजी का मैसेज  आया  कि  अपनी लेखनी द्वारा महिला दिवस के  उपलक्ष्य में  स्त्रियों के संघर्ष और हौसले को  मान दिया जाय , जिन्होंने मुश्किलों को धता बता कर - अपने लिए समाज में एक गरिमा स्थापित की एक उदाहरण  --बनकर .

                 आँखों के सामने एक एककर चेहरे उभरते  ... नाम याद आते गए . सबकी एक ही -  ' प्रताड़ना' .....कभी  पति द्वारा, कभी  ससुराल में,कभी समाज में , बस अलग थी तो परिस्थितियां , परिवेश , शहर और नाम .
      तभी एक नाम जेहन में उभरा -- , सुनीति  का जो उम्र में मुझसे काफी छोटी ,  एक अन्तरंग सहेली , घर भर की चहेती --हाथों हाथ पली उसका हर शौक पूरा किया जाता -- यहाँ तक कि  जब उसने अपने विवाह पर हर साड़ी  के साथ मैचिंग चप्पल और उसी से मेल खाते हैंडबैग आर्डर किए तो रिश्तेदारों को अतिश्योक्ति लगी .  सुनीति  के माता -पिता ने दिल खोल कर उसकी हर  ख्वाहिश पूरी की .
            जितना प्यार दुलार उसे मायके में मिला , उससे कहीं ज्यादा दुलार ससुराल में मिला . विशाल उसे बहुत चाहते थे ,  जितनी देर घर पर रहते उसको आँखों  से  ओझल न होने देते ,  सास-श्वसुर, नन्द और विशाल , इस छोटे से चार सदस्यों के परिवार में वह एक मुट्ठी सी बंध गयी.
                    विशाल जब फैक्ट्री चले जाते तो वह बहुत ऊबती .श्वसुर को जैसे ही इस बात का अहसास हुआ, उन्होंने  उसके लिए एक प्राइमरी स्कूल खुलवा दिया .....
                      अब उसका समय बड़े आराम से कटता, गुणी  तो थी है .....स्कूल भी बढ़कर सेकेंडरी स्कूल बन गया .... इसी बीच दो प्यारे प्यारे बच्चे हुए ....बहुत होनहार ... और दुनियां का हर सुख उस घर में पनाह लेने पहुँच गया . पंद्रह साल यूं ही हंसी ख़ुशी में बीत गये. 
               शायद ईश्वर भी डर गया की कहीं यह लोग इतना सुख पाकर मुझे न भूल जायें . और एक दिन विशाल की  फैक्ट्री में बायलर फट गया . त्राहि त्राहि मच गयी और जब तक सब समझ पाते विशाल के सीने में इतना धुआं भर गया कि  सांस के लिए जगह ही न बची ...... वह छोड़ कर चली गयी और उसके साथ ही चली गयीं उस घर की खुशियाँ .....
         सुनीति पत्थर हो गयी ...न बोलती , न रोती  , सबने रुलाने की बहुत कोशिश की , लेकिन सुनीति  सिर्फ सूनी आँखों से सबको देखती रही , लेकिन सुनीति सिर्फ रीती आँखों से सबको देखती रही. जब दर्द असहनीय हो जाता तो एक लम्बा सा नि:श्वास लेती और फिर वैसी ही. मुझे जब खबर मिली तो एक ही बात मूंहसे निकली, " ईश्वर इतना निष्ठुर तो नहीं हो सकता".
                उससे मिली तो मैं बिलख बिलख कर रो पड़ी   और वह मेरी पीठ पर हाथ फेर कर सांत्वना देती रही . 
         मैने  रोते रोते उससे पूछा , "कहाँ से लायी इतनी हिम्मत सुनीति ?" 
                  उसकी आँखों की कोर पर एक नमी ठहरी देखी  बस. मैं चली आई ....धीरे धीरे रिश्तेदार भी चले गए . अब केवल सुनीति  और उसके बच्चे . हल्द्वानी में विशाल और सुनीति  ने एक बहुत ही  सुन्दर बंगला   बनवाया था ... उसे बहुत ही चाव से सजाया था. उस हादसे के बाद जब वह उसी घर में बच्चों के साथ लौटी तो उसका यह संसार यादों की एक क़ब्रगाह बन गया था. हर तरफ विशाल की वही मुस्कराहट .. मानो  एक घिनौना मजाक कर रहे हों .... और अभी ठहाका लगाकर किसी कमरे निकल आयेंगे ......
                  अब, उसके दोनों बच्चे और वह स्कूल जिसे वह चलाती थी, बस यही उसकी दुनिया थे.
                    उस हादसे के बाद वह उठ खड़ी  हुई , उसे बच्चों  के लिए जीना था .  जब  वह बहुत  टूट जाती तो बारी बारी  वह और उसकी बेटियां  एक दूसरे को सहारा देती ... .. माँ बनकर . बस  समय फिर मरहम बना ... घाव तो भरे नहीं ... ;पर उसने उन्हें के साथ जीना सीख लिया . 
  आज उसके बच्चे अव्वल नम्बरों से पास हो ऊँची सिक्षा के लिए बाहर चले गए. और उसका स्कूल शहर के सम्मानित और गरिमा प्राप्त संस्थाओं में से एक है .उसे सरकार की तरफ से कई सम्मान, मैडल और प्रशस्ति पत्र मिले, अपने योगदान के लिए .
                    आज वह सबका गौरव है ...   . अपने माता -पिता का ... अपनी ससुराल और अपने शहर का .