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शुक्रवार, 14 जून 2013

विश्व रक्तदाता दिवस !

चित्र गूगल के साभार 
                              

                      हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण होते हैं रक्त सम्बन्ध और उनके लिए हम कुछ भी करने को तैयार होते हैं लेकिन अगर उन्हीं को रक्त देने का मौका आ जाय तो डर कर पीछे हट जाते हैं .  कुछ भ्रांतियों से शिकार हम अपने आप में इतना  नहीं जुटा पाते हैं .लेकिन जो रक्तदान करते हैं वे उन रिश्तों से अधिक गहरे रिश्ते बनाते हैं क्योंकि वे जीवनदाता होते हैं और वह भी बिना किसी स्वार्थ के . 

                                 आज का दिन (१४ जून ) विश्व रक्तदाता दिवस के रूप में मनाया जाता  है . वैसे तो कहते हैं कि  जीवन देने और लेने वाला इश्वर होता है लेकिन इस धरती पर भी भगवान रहते हैं जो जरूरत पर जीवन दान में सहायक होते हैं . वे भगवान  हम और आप ही हैं बस अपनी सोच और इस विषय में जानकारी को अच्छी तरह जान लेना ही काफी होता है .
                                 मुझे के घटना याद है , मैं अपने पति के सभी मित्रों से परिचित तो नहीं हूँ क्योंकि उनका दायरा  बहुत बड़ा है . हम लोग कहीं जा रहे थे तो हमारे  एक परिचित मिले और इनको धन्यवाद देने लगे और बोले यार अब तो हमारा खून का रिश्ता हो चूका है . वैसे इस तरह के काम करके आने पर ये हमें कभी नहीं बताते हैं . हम लोग उनसे मिल कर आगे चल दिए . घर आने पर मैंने उनकी कही बात को पूछा कि  उन्होंने ऐसा क्यों कहा ?
                   तब इन्होने बताया कि इनके छोटे भाई की आंतें उलझ गयी थी और उनको हॉस्पिटल लाया गया उस समय तुरंत ऑपरेशन होना था . उसकी पत्नी बेहोश पड़ी थी , दो छोटे छोटे बच्चे है. बड़े भाई को शुगर होने के कारण  वे नहीं दे सकते थे . उनके ससुराल वाले आये और ब्लड के नाम पर खिसक लिए . ये उस समय वहां पर थे और ये संयोग था कि  इनका ब्लड ग्रुप उनसे मिलता था . इन्हें सोचने की जरूरत नहीं पडी  और इन्होने एक यूनिट खून उनको दिया और उनका ऑपरेशन हो गया और वे आज अपने परिवार के साथ स्वस्थ हैं . बस उसके बाद  ये उस बात को भूल गए थे .
                  मेरे बताने का मतलब सिर्फ इतना है की कभी कभी जब खून की जरूरत होती है तो वह ग्रुप नहीं मिलता है या फिर ताजे खून की जरूरत होती और कम मिलने वाले ग्रुप के लिए एक बड़ी समस्या हो जाती है . एक बार मैं भी अपनी बेटी के लिए फँसी थी उसका ग्रुप AB + था और उसके प्लेटलेट्स बड़ी तेजी से गिर रहे थे उसके लिए प्लाज्मा की जरूरत थी . मुझे फख्र इस बात का है कि आई आई टी के कई बच्चों ने आकर अपना खून दिया था और तब हम उसको बचा पाए थे . मैं उन बच्चों की आजीवन शुक्रगुजार  रहूंगी .
                   आज एक अपील  उस वर्ग से जो रक्तदान के लिए सक्षम हैं . अपने अपने क्षेत्र में युवाओं को इस बात के लिए प्रेरित करें कि वक्त पर रक्त देने के लिए संकल्पित रहें . ये न पैसे से खरीदा जा सकता है और न दौलत इसका निर्माण कर सकती हैं . कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं का निर्माण भी इस काम में सहयोग प्रदान कर सकती हैं . वे युवाओं के ब्लड ग्रुप के साथ उनकी पूरी जानकारी रखें ताकि उनसे संपर्क करके इच्छुक युवाओं से संपर्क किया जा सके . 
रक्तदान के लिए पात्रता : 
१. रक्तदान करने वाले की आयु १८  वर्ष से अधिक हो .
२. रक्तदाता को शुगर , BP या अन्य कोई घातक रोग की शिकायत नहीं होनी चाहिए  . गर्भवती महिलायें भी रक्तदान के लिए उचित पत्र नहीं होती हैं . 
३. एक बार में सिर्फ एक यूनिट रक्त ही दिया जा सकता है और शरीर की स्थिति २४  घंटे में सामान्य हो जाती है . 
४. किसी प्रकार के नशे के आदि व्यक्ति भी इसके लिए सही सिद्ध नहीं हो पाते है .
५.  पेशेवर रक्तदाता के रक्त को नहीं लेना चाहिए क्योंकि ये अपने खून का व्यापार करते हैं 

 

बुधवार, 12 जून 2013

बाल श्रमिक निषेध दिवस !

 विश्व बाल श्रमिक निषेध दिवस ! 

                        बच्चों को वैश्विक मुद्दा बनाये जाने का भी जन मानस के मन में जागती मानवीय भावनाओं और उनके प्रति संवेदनशीलता है और कितने एनजीओ इस दिशा में काम कर रहे हैं। हर बच्चे को स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा का अधिकार है और हर समाज का जीवन में बच्चों के लिए अवसरों का विस्तार करने का दायित्व भी है।  फिर भी दुनियां भर में लाखों बच्चों को किन्हीं कारणों से उचित अवसर नहीं मिल पाते हैं और वह बाल श्रम की जद में आते हैं।  पूरे विश्व में 160 मिलियन बच्चे बाल श्रम में लिप्त हैं।

 

          
                ये बचपन जो भूखा है और ये बचपन जिसकी भूख  किसी और को मिटानी चाहिए अपने नन्हें नन्हें हाथों से काम कर असहाय माता - पिता की  भूख मिटाने के लिए काम  कर रहे हैं और कहीं कहीं तो नाकारा बाप के अत्याचारों से तंग आकर उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी मजदूरी करने लगते हैं और कहीं कहीं माँ बाप के द्वारा ही बेच दिए जाते हैं।
                मैं अपनी बहन के यहाँ गयी तो उसकी सास ने कहा - कोई लड़की काम करने के लिए आपके जानकारी में हो तो बताना . घर में रखना है कोई तकलीफ नहीं होगी , घर वालों को हर महीने पैसे भेजती रहूंगी . क्या कहती उनसे ? उनकी बहू और बेटियां बहुत नाजुक है कि  वह अपने बच्चों को तक नहीं संभाल  सकती हैं और घर के काम के लिए उन्हें कोई बच्ची चाहिए क्योंकि उसको डरा धमका कर काम करवाया जा सकता है और अगर बाहर की होगी तो उसके कहीं जाने का सवाल भी नहीं रहेगा, स्थानीय होगी तो राज घर जायेगी तो सीमित समय तक ही काम करेगी। 
 
 
                ये घरेलू  काम करने वालों का हाल है . होटलों , ठेकों , भट्ठों और भवन निर्माण में ऐसे बच्चे काम करे हुए देखे जा सकते हैं और उनके नन्हे हाथ कितनी तेजी से काम करते हैं ? यहाँ मुफ्त शिक्षा भी क्यों नहीं ले पा  रहे हैं ये बच्चे ? क्योंकि माँ बाप को दो पैसे कमा कर लाने वाले बच्चे चाहिए जिससे खर्च में हाथ बँटा सके। माँ बीमार हो तो बेटी काम करके आएगी। स्कूल जाने पर क्या मिलेगा? 
 

                  इनके लिए सरकारी नीतियाँ तो हैं लेकिन उन नीतियों को लागू करवाने के लिए जिम्मेदार लोग शोषण करने वालों से ही पैसे खाकर सब कुछ नजर अन्दाज करके कागजों में खाना पूरी करते रहते हैं।  घर में काम करने वाली कम उम्र लड़कियाँ अक्सर यौन शोषण का शिकार होती हैं और वे अपनी मजबूरी के कारण  कुछ कह नहीं पाती हैं।  घर की मालकिन भी पति के डर से अपना मुँह बंद रखती हैं। 
 
           होटलों में मुँह अँधेरे से उठ कर काम करते हुए बच्चे और आधी रात  तक होटल बंद होने तक काम करते रहते हैं और खाने को क्या मिलता है ? बचा हुए खाना या नाश्ता। वहीं से वह कभी कभी अपराधों में भी लिप्त हो जाते हैं। ढाबे और सड़क किनारे बने हुए चाय के होटल तो ऐसे बच्चों को ही रखते हैं ताकि उन्हें कम पैसों में अधिक काम करने वाले हाथ मिल सकें। जहाँ पर दौड़ दौड़ कर काम करने वाले नौनिहाल होंगे वहाँ पर अत्याचार का शिकार भी होंगे। 
 

             
आज के दिन इन बच्चों को कोई छुट्टी देने वाला भी नहीं होगा। वे बिचारे क्या जाने इस लोकतान्त्रिक देश में उनको पढ़ने लिखने और और बच्चों की तरह से खेलने का पूरा अधिकार ही नहीं है बल्कि सरकारी तौर पर उनके लिए मुफ़्त शिक्षा और खाने पीने की व्यवस्था भी है। हम इस दिन को मना कर और कुछ लिख कर अपने दिल में तसल्ली कर लेते हैं कि  हमारा फर्ज पूरा हो गया लेकिन हम भी उतने ही दोषी है क्योंकि कहीं भी काम करते हुए बच्चों से काम लेने वालों को समझाने का काम करने का प्रयास तो कर ही सकते हैं। ये भी निश्चित है की जिन्हें ये मुफ्त में काम करने वाले मिले हैं, वह हमें 'भाषण और कहीं जाकर दीजिये।' कह कर वहाँ से चले जाने के लिए मजबूर कर देंगे। 
 
         अभी पिछले दिनों ही एनसीआर के एक स्लॉटर हाउस में कितने नाबालिग बच्चे काम करते हुए पकड़े गए। फिर आगे क्या होगा? इसके बारे में कोई भी जानकारी नहीं है। लेकिन अगर उनको कार्यस्थल से बाहर लाया गया है तो जरूर उनको वहाँ से मुक्ति मिलेगी। लेकिन ऐसे बच्चों की पारिवारिक और सामाजिक परिस्थियों का भी अध्ययन होना चाहिए।  सरकार द्वारा गरीबी रेखा से नीचे पाए जाने वाले परिवारों को वो सुविधाएँ दिलवाने का प्रयास हो ताकि इन बच्चों के भविष्य के बारे में कुछ सार्थक सोचा जा सके।
 
        सरकारी प्रयास कभी तो अच्छे अफसर पाकर सफल हो जाते हैं और कभी वे भी बिक़े होते हैं,  लेकिन हम प्रयास तो कर ही सकते हैं, और हो भी रहे हैं।  कहीं कोई एक बच्चा भी माँ बाप को  समझाने से, मालिक को  समझाने से, उसके बचपन को बचाने   में सफल हो सके तो आज का दिन सार्थक समझेंगे 
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*सभी चित्र गूगल के साभार 
 
 

गुरुवार, 6 जून 2013

एक अनोखी शादी : विधा सौम्या संग अली अकबर मेहता !

                   कहाँ से शुरू करूँ ? हम राजनीति  में धर्मनिरपेक्ष होने की बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेकिन निजी जिन्दगी में झांक कर देखिये - वह सब कहने की बात और अमल करने की और ही होती है . लेकिन जो कुछ  बोले ही नहीं और करके गुजर गए . हम तो उनके दिल में झांक कर देख ही नहीं पाए कि वो इतना विशाल कैसे है ? इसमें दोनों ही परिवार के बड़े सदस्यों और फिर इस नयी पीढी के निर्णय का सम्मान करने के लिए वाकई बधाई के पात्र हैं .



                          ये शादी है विधा सौम्या ( पुत्री विभा रानी और अजय ब्रह्मात्मज ) अली अकबर मेहता ( पुत्र फातिमा एवं युसुफ मेहता ) . यहाँ बताते चले कि  दोनों ही  कलाकार हैं और अली तो प्रसिद्द कलाकार तैयब मेहता के पोते हैं . वह भी हर तरीके से अनोखी जहाँ दोनों की भावनाओं का सम्मान करते हुए हर रस्म पूरी की गयी . सबसे पहले शादी के कार्ड से शुरू करते हैं . हमने आपने दोनों ने दोनों धर्म के शादी के कार्ड देखे लेकिन ये कार्ड सबसे अलग - न इसमें ईश्वर का नाम और न अल्लाह का . कोई तस्वीर भी नहीं है . कुछ ऐसा है कार्ड --



     
                                                               June 1, 2013 

                                                              Madh Island , Mumbai 


                           

                                बस शादी की तारीख  के साथ कुल एक चित्र से सजा अनोखा कार्ड भी है . जिसमें अन्दर भी एकदम सादे ढंग  कन्या और वर के साथ सिर्फ उनके माता -पिता के नाम हैं . सबसे अलग और सबसे अनोखा सा कार्ड .  उसके ऊपर का चित्र भी पुराने ज़माने के कैमरे ( जिसमें कला कपड़ा ओढ़ कर फोटोग्राफर मुस्कराने के लिए कह कर ढक्कन घुमाया और बस हो गयी फोटो ). से निकलवाया गया है . वह भी एकदम ज़माने की दौड़ से अलग विशेष चित्र . 

           अब हम परिचय कर लें कन्या और वर से - जिन्हें हम सगाई के अवसर पर कैसे लगे देख रहे हैं ? 




          हमारे घर में हमारे घर जैसी सारी  रस्में हुईं क्योंकि शादी से पहले की सारी  रस्में तो हम अपने ढंग से कर रहे हैं . घर में सभी मेहमानों के आने के साथ शुभंकर और तेल हल्दी और मंडप की सारे  कार्यक्रम तो होने ही चाहिए और वह हुए भी .........




 मुंबई के घर और गाँव  के घरों में कुछ तो अंतर होता ही है और फिर मंडप की उपलब्धि भी एक बात है लेकिन आज कल प्रतीकात्मक साधन भी दिल को पूरी तसल्ली देने वाले होते हैं क्योंकि अपने अपने घर के सारे  शगुन पूरे कर लिए . शुभ काम में कोई कमी न रह जाए . सो मंडप भी अपने पूरे लाव लश्कर के साथ स्थापित किया गया .



    मंडप गाड़ने की रस्म पूरी हुई तो फिर कन्या के लिए तेल हल्दी की रस्में भी पूरी की गयीं . हम अपने तरफ से कोई कमी तो छोड़ नहीं सकते हैं . हमारी मान्यताएं और परम्पराए हमारे साथ जुडी जो रहती हैं . फिर विवाह जैसा काम हो और हम अपने घर में शगुन के सारे  काम न करें ये तो हो नहीं सकता है . पीली साडी में सजी विधा को शादी के एक दिन पहले  हल्दी चढ़ाई गयी . मैं भी शामिल थी इस कार्यक्रम में .

                       फिर रचाई गयी मेहंदी हम सब के हाथों में भी . दुल्हन की मेंहदी तो पहले ही रच गयी थी . घर में उपस्थित सभी महिलाओं के हाथ में मेंहदी लगी और उस सबसे निबट कर रखा गया था लेडीज संगीत का कार्यक्रम वैसे ये सिर्फ लेडीज संगीत ही नहीं था  बल्कि ये तो जेंट्स संगीत भी था क्योंकि इसमें सभी को पकड़ पकड़ कर नचाया गया था . सभी शामिल भी थे इसमें घर में आये हुए सारे  मेहमान इसका आनंद दे रहे थे.

               अब शुरू करने से पहले कन्या के मम्मी  पापा की एक तस्वीर भी तो देखते चलें 


                            और एक तस्वीर विधा की भी .............



                            शादी के लिए जो जगह चुनी गयी थी , वह किसी फिल्मी दुनियां के सेट जैसी ही थी . मड  आइलैंड में The Club @ Raheja Exotica को चुन गया था . उस स्थान की आतंरिक और बाह्य सज्जा सिर्फ कुछ शब्दों में या पंक्तियों में बयां करना संभव नहीं है . एक विशाल क्षेत्र में फैला हुआ वह कार्य स्थल प्राकृतिक सौंदर्य और सजावट से लग रहा था कि  जैसे हम किसी फिल्मी  के सेट पर आ गए हों .  कुछ ही चित्रों से इसको सजाया जा सकता है . इससे ही अनुमान लगाया जा सकता है कि  कितना अनुपम वातावरण वहां होगा .
                      मेहमानों को बैठने के लिए चारों तरफ से नारियल के पेड़ों से घिरा और फूल और अन्य पेड़ों से सज्जित कार्यस्थल   अपने आप में अनोखा दृश्य प्रस्तुत कर रहा था . मेहमानों को बैठने के लिए बड़े से स्टेडियम की तरह से गोल घेरे में बनी जगह को बड़ी खूबसूरती के साथ सफेद चादर से ढंके हुए गद्दे और मसनद के साथ लगे हुए सजीले कुशन लगा कर आसन तैयार किये गए थे . ताकि सभी कार्यक्रम के आनंद को उठा सकें .



                   ये तो आने वाले मेहमानों के लिए नियत स्थान हुआ और जहाँ पर कार्यक्रम होने थे वह स्थान भी अपने आप में अलग ढंग से  किया गया था .

                         बस कुछ कुर्सियां और एक सोफा  दूल्हा और दुल्हन के लिए रखा गया था .
यहाँ पर शादी दो अलग अलग धर्म से  जुड़े लोगों के  हो रही थी लेकिन इसमें ऐसा कुछ भी नहीं था कि जिसे कट्टरता के साथ जोड़ा जा सके . इसमें दोनों ही परिवारों के विशाल हृदयता का परिचय मिल रहा था बल्कि कहूं अली का परिवार हमारे साथ जुड़ कर हमें ही अनुग्रहित कर रहा था क्योकि उन्होंने हमारी हर रस्म को उतना ही मान दिया जितना की हम देते हैं और वो रस्में उनके अनुसार शायद नहीं होती है . हाँ अगर कुछ नहीं था तो हमारे अनुसार वहां कोई पंडित नहीं था और उनके अनुसार कोई मौलवी या निकाह संपन्न करवाने वाला व्यक्ति नहीं था .
                     वहां कार्य स्थल पर सिर्फ दोनों परिवारों के प्रमुख लोग ही थे और उनकी उपस्थिति में ही कार्य सम्पादित हुआ .
                  बरात आने पर हमने उस बारात का दिल से स्वागत किया और उनको समुचित स्थान पर बिठाया गया . कुछ ऐसा दृश्य था वहां ---


                                         वर के माता -पिता , वर वधु एवं वधु के माता -पिता


                       
                     शादी का आरम्भ तो अब होना था . सबसे पहले कन्यादान की रस्म हुई लेकिन यहाँ कन्या वर के हाथ नहीं सौंपी गयी बल्कि कन्या के माता - पिता ने कन्या को वर के माता -पिता को उनकी बेटी के रूप में सौप दिया और फिर वर के माता - पिता ने वर को बेटे के रूप में कन्या के माता - पिता कोसौंप  दिया  और फिर दोनों का स्थान बदल कर बिठा दिया गया . एक अलग सा विचार उठा मन में वाकई अगर दोनों परिवार बहू न समझ कर बेटी समझ कर स्वीकार करने लगें तो शायद समाज में हो रहे महिला उत्पीडन को एक विराम न सही कुछ अंकुश तो लगाया ही जा सकता है . दामाद भी बेटे के रूप में परिवार के साथ व्यवहार करे नहीं तो मैंने दामादों का नाटक कई घरों में देखा है . बेटा बन कर अधिक  प्रिय बना जा सकता है .

                    कन्यादान के बाद रस्म  हुई जयमाल की . सभी विवाहों की तरह इसमें भी वर और वधु  एक दूसरे को जयमाल पहनाई . जब कि ये रस्म अली के परिवार लिए बहुत सामान्य नहीं ही होती है . लेकिन  हमारी परम्पराओं और रस्मों को पूरा सम्मान दिया गया . और उसके बाद सिन्दूर दान जो सिर्फ और सिर्फ हिन्दू धर्म में ही मान्यता प्राप्त एक वधु के लिए सबसे जरूरी रस्म होती है उसको सम्पन्न किया गया . वर ने वधु की मांग में सिन्दूर भरा और हमारी परंपरा के अनुसार ये विवाह की सबसे महत्वपूर्ण रस्म भी मानी जाती है . जो जीवन भर उसको एक अलग स्थान प्रदान करती है . उसके बाद मंगलसूत्र पहनने की रस्म भी अली ने पूरी की . इन सब के बाद वर और वधु का चित्र जयमाल , सिन्दूर दान और मंगलसूत्र के पहनने का साक्षी बना हुआ है . 
                      

                   इसके बाद अली के परिवार के अनुसार बधावन की रस्म पूरी की गयी जिसमें वर पक्ष ने वधु को उपहार आदि प्रदान किये और बिहारी परंपरा के अनुसार चुमावन की रस्म भी पूरी की गयी जिसमें सुहागन महिलायें कन्या को सिन्दूर लगा कर आशीर्वाद देती हैं और वर को अक्षत का विभिन्न स्थानों पर स्पर्श करते हुए उसके सर पर अक्षत छिड़क कर आशीष देती है .  इसकी एक छवि भी देख लें . 
             

हाँ इस विवाह में सिर्फ दो काम नहीं हुए - एक तो अली के परिवार की परंपरा के अनुसार निकाह नहीं हुआ और हमारी परंपरा के अनुसार सात फेरे नहीं लिए गए . इस विवाह में कोई मौलवी या कोई पंडित उपस्थित नहीं था . हाँ इन सारी  रस्मों के बाद शादी का कानूनीतौर पर पंजीकरण हुआ . वहां पर रजिस्ट्रार के प्रतिनिधि उपस्थित थे और गवाह के तौर पर अली के पक्ष से उनके छोटे भाई और पिता ने साइन किये और विधा की और से उसकी बहन और पिता ने . शादी को वैधता भी प्राप्त हो गयी .   उसके बाद कुछ ख़ुशी के पलों को दिल से ख़ुशी छलकते हुए पल में विधा और उनकी सासु मान फातिमा मेहता नृत्य करती हुईं .फातिमा जी ने सफेद साड़ी के साथ लाल ब्लाउज और माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी और जूड़े  में लाल फूलों के गजरे से सजा कर अपने को हमारे रंग में ही रंग डाला था  जो हम सबको बहुत ही अच्छा लग रहा था .


इन सब से अलग एक और चीज थी यहाँ की विवाह की समस्त रस्मों के पूरा होने के बाद सूफी संगीत का कार्यक्रम रखा गया था . जिसमें प्रसिद्द सूफी गायक ने एक से एक बढ़कर सूफी गीत गाकर माहौल को बहुत ही खुशनुमा बना दिया था .  
फिर वाही जो सब मौकों पर होता है डिनर का प्रोग्राम , जिसमें सभी ने देर रात तक सब तरीके के व्यंजनों का लुफ्त उठाया और वर और कन्या को ढेरों आशीष देते हुए अपने अपने घर को विदा हो गए और कन्या को उसके ससुराल के लिए रवाना  कर दिया . इन मंगल कामनाओं के साथ  की ये नव दंपत्ति सदैव फलते फूलते रहें और खुशियाँ उनके दरवाजे पर हर सुबह सूरज की किरणों के साथ दस्तक दें .  
                                      

बुधवार, 5 जून 2013

विश्व पर्यावरण दिवस !



                               दिन पर दिन बढती जा रही  हमारी वैज्ञानिक प्रगति और नए संसाधनों से हम सुख तो उठा रहे हैं लेकिन अपने लिए पर्यावरण में विष भी घोल रहे हैं . हाँ हम ही घोल रहे हैं . प्रकृति के कहर से बचने के लिए हम अब कूलर को छोड़ कर किसी तरह से ए सी खरीद कर ठंडक का सुख उठाने लगे हैं लेकिन उस ए सी  से निकलने वाली विपरीत दिशा में जाने वाली गैस के उत्सर्जन  से पर्यावरण को और प्रदूषित कर रहे हैं . सभी तो ए सी नहीं लगवा  सकते हैं . इस भयंकर गर्मी से और वृक्षों के लगातार कम होने से पशु और पक्षी भी अपने जीवन से हाथ धोते चले जा रहे हैं . 
                        मैं  लम्बे लम्बे भाषणों को सुनती चली आ रही हूँ  और सरकार भी प्रकृति को बचने के लिए मीटिंग करती है और लम्बे चौड़े प्लान बनाते है और फिर वह फाइलों में दब कर दम तोड़ जाते है क्योंकि शहर और गाँव से लगे हुए खेत और बाग़ अब अपार्टमेंट और फैक्ट्री लगाने के लिए उजाड़े  जाने लगे हैं और अगर उनका मालिक नहीं भी बेचता है तो उनको इसके लिए विभिन्न तरीकों  से मजबूर कर दिया जाता है कि वे उनको बेच दें और मुआवजा लेकर हमेशा के लिए अपनी रोजी-रोटी और अपनी धरती माँ से नाता तोड़ लें. कुछ ख़ुशी से और कुछ मजबूर हो कर ऐसा कर रहे है। ऊंची ऊंची इमारतें और इन इमारतों में जितने भी हिस्से या फ्लैट बने होते हैं उतने ही ए सी लगे होते हैं . उनकी क्षमता के अनुरूप उनसे गैस उत्सर्जित होती है और वायुमंडल में फैल जाती है . हम सौदा करते हैं अपने फायदे के लिए, लेकिन ये भूल रहे है कि हम उसी पर्यावरण में  विष घोल रहे है ,जिसमें उन्हें ही नहीं बल्कि हमें भी रहना है, 
                    मोबाइल के लिए टावर लगवाने का धंधा भी खूब तेजी से पनपा  और प्लाट , खेत और घर की छतों पर काबिज हो गए लोग बगैर ये जाने कि इसका जन सामान्य के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है ? उससे मिलने वाले लाभ को देखते हैं और फिर रोते भी हैं कि  ये गर्मी पता नहीं क्या करेगी ? इन टावरों निकलने वाली तरंगें स्वास्थ्य के लिए कितनी घातक है ? ये भी हर इंसान नहीं जानता है लेकिन जब इन टावरों में आग लगने लगी तो पूरी की पूरी बिल्डिंग के लोगों का जीवन दांव पर लग जाता है . इन बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में पेड़ पौधे लगाने के बारे में कुछ ही लोग सोचते हैं और जो सोचते हैं वे छतों पर ही बगीचा  बना कर हरियाली  फैला रहे है . 
                     हम औरों को दोष क्यों दें ? अगर हम बहुत बारीकी से देखें तो ये पायेंगे कि  हम पर्यावरण को किस तरह प्रदूषित कर रहे हैं और इसको कैसे रोक सकते हैं ? सिर्फ और सिर्फ अपने ही प्रयास से कुछ तो कर ही सकते हैं . यहाँ ये सोचने की जरूरत नहीं है कि  और लोगों को चिंता नहीं है तो फिर हम ही क्यों करें? क्योंकि आपका घर और वातावरण आप ही देखेंगे न . चलिए कुछ सामान्य से प्रयास कर पर्यावरण दिवस पर उसको सार्थक बना ही लें ------

* अगर हमारे घर में जगह है तो वहां नहीं तो जहाँ पर बेकार जमीन दिखे वहां पर पौधे लगाने के बारे में सोचें . सरकार वृक्षारोपण के नाम पर बहुत कुछ करती है लेकिन वे सिर्फ खाना पूरी करते हैं और सिर्फ फाइलों में आंकड़े दिखने के लिए . आप लगे हुए वृक्षों को सुरक्षित रखने के लिए प्रयास कर सकते है . 
* अगर आपके पास खुली जगह है तो फिर गर्मियों में ए सी चला कर सोने के स्थान पर बाहर  खुले में सोने का आनंद लेना सीखें तो फिर कितनी ऊर्जा और गैस उत्सर्जन से प्रकृति और पर्यावरण को बचाया जा सकता है .
*  डिस्पोजल वस्तुओं का प्रयोग करने से बेहतर होगा कि  पहले की तरह से धातु बर्तनों का प्रयोग किया जाए या फिर मिट्टी से बने पात्रों को , जो वास्तव में शुद्धता को कायम रखते हैं,  प्रयोग कर सकते हैं . वे प्रयोग के बाद भी पर्यावरण के लिए घातक नहीं होते हैं . 
* अगर संभव है तो सौर उर्जा का प्रयोग करने का प्रयास किया जाय जिससे हमारी जरूरत तो पूरी होती ही है और साथ ही प्राकृतिक ऊर्जा का सदुपयोग भी होता है . 
* फल और सब्जी के छिलकों को बहार सड़ने  के लिए नहीं बल्कि उन्हें एक बर्तन में इकठ्ठा कर जानवरों को खिला दें . या फिर उनको एक बड़े गमले में मिट्टी  के साथ डालती जाएँ कुछ दिनों में वह खाद बन कर हमारे हमारे पौधों को जीवन देने लगेगा . 
* गाड़ी जहाँ तक हो डीजल और पेट्रोल के साथ CNG और LPG से चलने के विकल्प वाली लें ताकि कुछ प्रदूषण को रोक जा सके .  अगर थोड़े दूर जाने के लिए पैदल या फिर सार्वजनिक साधनों का प्रयोग करें तो पर्यावरण के हित में होगा और आपके हित में भी . 
* अपने घर के आस पास अगर पार्क हो तो उसको हरा भरा बनाये रखने में सहयोग दें न कि  उन्हें उजाड़ने में . पौधे सूख रहे हों तो उनके स्थान पर आप पौधे लगा दें . सुबह शाम टहलने के साथ उनमें पानी भी डालने का काम कर सकते हैं . 

शनिवार, 18 मई 2013

उत्तर प्रदेश राजनीति के दांव पेंच !

                                     उत्तर प्रदेश की राजनीति से पूरा देश प्रभावित  है क्योंकि केंद्र में सबसे अधिक सांसद उत्तर प्रदेश से  (८० ) होते हैं तो फिर अगर प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी केंद्र पर काबिज होने का ख़्वाब देखे तो कोई गलत तो नहीं है . उसके लिए जैसा कि उत्तर प्रदेश वासियों में सोचा था कि  नयी उम्र का मुख्यमंत्री और प्रबुद्ध माने जाने वाला इंसान प्रदेश के लिए कुछ ऐसा करेगा जिसमें प्रदेश का भला नजर आएगा लेकिन यहाँ तो वही समझ आया कि सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं . सबकी नजर आगामी  लोकसभा चुनाव पर लगी है. 
                                  युवाओं को रिझाने के लिए चुनाव पूर्व किये गए वादे बेरोजगारी भत्ते को देकर पूरा किया जा रहा है . ( पैसे पार्टी के फंड से थोड़े ही देने हैं ) कुछ वाकई उसके सुपात्र थे और कुछ तो बेईमानी से ले भागे ( वैसे मुफ्त में माल मिले तो किसको परेशानी होगी ? )  जिन्हें मिल गया वो समझे कि इनका वोट तो पक्का हो गया . फिर आगे चले इससे सिर्फ काम चलने वाला नहीं है तो कुछ और पिछड़ी जातियों को आरक्षित कर दिया आखिर अधिकार जो है और फिर उससे आगे और बढे सरकारी कर्मचारियों को बहुत काम करना पड़ता है तो उनका भी तो ध्यान रखना ही पड़ेगा . एक तीर से दो शिकार हो गए . राज्य सरकार की छुट्टियों में एक और ५ अप्रैल की छुट्टी का इजाफा किया गया क्योंकि इस दिन महर्षि कश्यप और महाराजा निषाद राज  जयंती थी . ठीक उसी तरह जैसे पिछली सरकार ने कांशीराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की थी और दूसरी सरकार ने आकर उसको निरस्त कर दिया और अपने लाभ के लिए दूसरों की जयंती पर अवकाश घोषित कर दिया . बात कुछ भी हो वो सारी जातियां जिन्होंने इस अवकाश की मांग की थी , सरकार की मुरीद हो गयी और आगे इनके वोट भी पक्के ही समझिये . 
                       ये पिछले महीने की बात है और फिर ब्राह्मणों को रिझाने के लिए परशुराम जयंती जोर शोर के साथ मनाई गयी . जिसमें संकल्प लिया गया कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल को हटा कर इनको ही लाना है . एक समारोह से पूरा वर्ग सध गया और फिर आगे बढे . 
                        फिर उनको अल्पसंख्यकों की भी याद आ ही गयी कि  उनको कौन सा चारा डाला जाय ताकि उनको अपने हित में मोड़ा जा सके . हम मतदाता भी इतने भोले होते हैं कि लॉलिपोप दिखा कर कुछ भी करवा लीजिये . हाँ तो सरकार को याद आ गयी कि ख्वाजा के उर्स पर सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया जाय  जिससे कि एक वर्ग और अपने कब्जे में आ जाय  . खैर सब खुश हो गए और मिठाई बाँट डाली कि छुट्टी की घोषणा कर दी गयी है. एक तो सरकारी कार्यालयों में वैसे भी काम करने वाले अपने को सरकारी दामाद समझते ही हैं ऊपर से जब सार्वजनिक अवकाश मिल जाए तो क्या कहना ? सरकार के गुणगान करेंगे और उसके प्रति वफादार भी तो रहना होगा . 
                         इस समय उत्तर प्रदेश में 32 सार्वजनिक अवकाश और 18 निबंधित अवकाश घोषित हो चुके हैं . 52 रविवार होते हैं . पांच दिवसीय कार्य दिवस होने पर 52 शनिवार भी अवकाश दिवस हो गए और जहाँ ऐसा नहीं है वहां पर 12 द्वितीय शनिवार की छुट्टी होती है . इस तरह से वर्ष के 365 दिन में 154 /114 दिन अवकाश के हुए . 
                         अभी कितने और महापुरषों को इसमें शामिल किया जा सकता है क्योंकि अगर वर्ग विशेष को अपने काम के लिए आरक्षित करना है तो कुछ न कुछ लगातार ऐसा करना होगा की वे आपके प्रति वफादार रह सकें और केंद्र चुनाव में आपको ही चुनें . 
                          नयी उम्र के बच्चों को अपने पक्ष में करने के लिए (क्योंकि उन्हें तो चुनाव और सरकार के कामों से अधिक मतलब नहीं होता है बल्कि उनके व्यक्तिगत हित का काम करने वाला उनका सर्वाधिक प्रिय बन जाता है.) अभी मार्च माह में लखनऊ में लैपटॉप का वितरण हुआ और जितनी कीमत के लैपटॉप वितरित किये गए उससे कहीं अधिक धनराशि  उस समारोह को आयोजित करने में खर्च कर दी गयी  . हजारों की संख्या में लैपटॉप अभी भी स्कूलों में धूल खा रहे हैं क्योंकि आयोजन की तिथि निश्चित नहीं हो सकी है.  
       फिर लाखों रुपयों का वितरण के बहाने चूना राजकोष में लगने वाला है. फिर चाहे जिन्हें ये लैपटॉप दिए हैं वे उसको संचालित करने के लिए नेट की सुविधा भी हासिल करने में समर्थ न हों और फिर अगर वे समर्थ भी हैं तो फिर इस नयी उम्र की पौध के लिए नेट का प्रयोग कितना घातक  बनता जा रहा है इस बात को सरकार  को समझने की जरूरत होगी . 
                    हमें ये देखने की जरूरत है कि जहाँ सरकार विकास और जनहित के नाम पर राजकोष को उदारता के साथ खर्च कर रही है क्या उसका प्रयोग बेरोजगारी भत्ते की जगह नियमित रोजगार चाहे वह कम ही वेतन का होता , कम से कम उन्हें नियमित काम तो मिला होता और नियमित निश्चित धनराशि  मिल पाती जो उनके जीवनयापन में या फिर उनको आगे कुछ् करने में सहायता दे पाती . इस भीषण गर्मी में पीने के पानी की सार्वजनिक रूप से व्यवस्था हो पाती तो अधिक जनहित में होता और वह काम वाकई लोगों को एक जनहित को महत्व देने वाली सरकार का समर्थन कर रहे होते . ऐसा नहीं कि इन्हें नहीं मालूम में कि प्रदेश में बिजली  सड़कें , आवास और सफाई की कितनी अधिक जरूरत है और राजकोष को अगर इस दिशा में खर्च कर दिया जाता तो प्रदेश का हर व्यक्ति शुक्रगुजार होता . लेकिन नहीं सत्ता का इतना उपयोग तो कर ही सकते हैं कि  हम वह करें जिसमें आम आदमी लाभान्वित  हो सके . तभी उनको यहां से कुछ मिलने की उम्मीद करनी चहिए. राजकोष की बरबादी को आम आदमी भी समझता है और उसके ही पैसे को अपनी मर्जी से खर्च कर देने भर से अच्छी सरकार नहीं कहला  सकती है. 

मंगलवार, 14 मई 2013

परिवार दिवस !

                         
चित्र गूगल के साभार ( संयुक्त परिवार )

                          आज एक वाकया याद आ गया . मेरे एक आत्मीय हैं - उनके अपने ७ भाई हैं और उनके अपने अपने परिवार है . मानी  हुई बात है कि  सब अब अलग अलग रह रहे हैं . ये सबसे छोटे हैं - खुद भी अच्छी स्थिति में हैं और सारे भाई भी सम्पन्न है . विवाद हुआ कि पैतृक  मकान को लेकर इनकी इच्छा थी कि  पिताजी के नाम को रहने दिया जाय और सारे  भाई बाजार भाव पर ये मकान उन्हें दे दें ताकि वे उसमें पिता के नाम से कोई  स्वयंसेवी संस्था बना दें और पिताजी का नाम चलता रहे . लेकिन भाई को कोई नहीं दे पाया। मकान किसी तीसरे व्यक्ति को बेच दिया गया और पैसे बाँट लिए  . जब इस भाई की बेटी की शादी हुई तो कोई भाई शादी में शामिल तक नहीं हुआ. उन्होंने शादी के कार्ड में अपने सभी भाइयों के नाम लिखवाये थे . हाँ एक भाई ने किसी दूसरे आदमी से एक लिफाफे में कुछ रुपये रख कर भेज दिए  जिसे इनके बेटे ने वापस कर दिया कि पैसे हमारे पास भी हैं . शादी में अपने की उपस्थिति मायने रखती है . इसमें एक साथ रहने की बात छोडिये सुख और दुःख में शामिल होने का अर्थ भी  खो गया . वे भाई जो कभी एक साथ बैठ कर खाना खाते थे , खेलते थे और सोते भी थे . अब किसी के कुछ न रह गए थे. परिचितों के परिधि से भी बाहर क्योंकि विवाह समारोह में तो सभी शामिल होते है. 
           हमारे देश में परिवार संस्था का जो स्वरूप है वह देश में नहीं बल्कि विदेशों में भी बहुत ही गर्व की दृष्टि से देखा जाता है . परिवार सामाजिक संगठन की एक महत्वपूर्ण इकाई है और समाज का निर्माण भी बहुत सारे परिवारों  से ही होता है . परिवार दिवस की अवधारणा  भी हमें पश्चिम से ही मिला लेकिन हम इसके मुहताज क्यों हुए ? हम तो वृहत परिवार के सदस्य होते रहे हैं और सभी उसमें एक परिवार के सदस्य होकर जीते रहे हैं और कहीं कहीं आज भी जी रहे है . विवाह और सन्तति के क्रम से ही इसका निर्माण हुआ और फिर इसी क्रम में यह आगे बढ़ता चला जा रहा है. समय के साथ इसमें परिवर्तन अवश्य ही हुआ है . कभी परिवार बड़े बाबा और बड़ी दादी से शुरू होता था और घर में एक बड़ी  सास के रहते हुए सारी बहुएँ ही रहती थी और घर के सरे निर्णय पर घर के सबसे बुजुर्ग द्वारा ही लिए जाते थे और वो सबके लिए शिरोधार्य होती थी क्योंकि आर्थिक आधार वही बड़ा माना जाता था . धीरे धीरे घर में बगावत करने वाले भी लोग होने लगे और इस आधार की नींव से ही दीवार दरकने लगी फिर एक विशाल भवन में दीवारें खड़ी  होने लगी और एक से दो परिवार बंटने  लगे. फिर भी माता -पिता के लिए उनका घर शेष था . उनके लिए अपने घर में अधिकार से रहने का जज्बा भी शेष था .
                              धीरे धीरे परिवार का आकर छोटा होने लगा क्योंकि हमारी प्रगति ने हमें और अधिक सुविधा और सुख से भरपूर जीवन जीने के लिए ऐसा करने पर मजबूर कर दिया . हमारे माता - पिता ने अपने ४ बच्चे अपने सीमित साधनों में पाले और फिर उनको सक्षम भी बनाया .  परिवार में अब उनको कोई जगह नहीं दी जा रही है . अब परिवार का मतलब है पति पत्नी और बच्चे . यानि की एकल परिवार की नींव पड़  चुकी है और यही कारण  है पारिवारिक तनावों के निरन्तर बढ़ाते जाना . उन परिवारों का भी दिन व दिन टूटते जाना . विवाह संस्था जो इस परिवार की नींव होती है , धीरे धीरे वह भी ख़त्म हो रही है . लिव इन रिलेशन ने परिवार को सबसे बड़ा झटका दिया है . बिना किसी बंधन और जिम्मेदारी के जीवन बिताना शायद आज के लोगों को ज्यादा सहज लगने लगा है.
                                  वैसे तो   रोज ही होना चाहिए क्योंकि इस जीवन को दिशा  देने वाले परिवार  के लिए हम सिर्फ एक दिन कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं ? लेकिन ये हमने अपने देश से नहीं बल्कि पश्चिमी संस्कृति से ग्रहण किया है . हम पश्चिम से क्या क्या ले चुके हैं लेकिन उसमें कितना सार्थक ले रहे हैं और कितना पूर्ण ग्रहण कर रहे हैं और कितना आंशिक ? अपनी मर्जी और सुविधा के अनुसार हम ग्रहण कर रहे है . हमने वहां के देखा देखी एकल परिवार की भूमिका को सहज और सरल समझ कर अपना लिया . अपनी माता पिता के प्रति जिम्मेदारी से मुक्त भी हुए और पत्नी भी खुश . फिर ये नहीं सोचा कि हमारी माता -पिता  आर्थिक रूप से आत्मनिभर है भी या नहीं . पश्चिम में तो बुजुर्गों के लिए पेंशन का प्रावधान है और वे उससे अपनी जरूरतों को पूरा कर लेते हैं . वे अपने बच्चों पर आश्रित नहीं होते हैं .हमने आधे अधूरे स्वरूप को अपनी सुविधानुसार अपना लिया . 

                           वहां के लोग  अपने घर को छोड़ देते हैं तो फिर वे जिम्मेदारी उठाने वाली बात समझते ही नहीं है. उनको अपने  माता पिता से कितना लगाव होता है ? क्योंकि वे बड़े होते ही अपनी जिम्मेदारी खुद उठाने लगते हैं . हम तो अपने पैरों पर खड़े होने तक माता - पिता पर आश्रित होते हैं और अपने पैरों पर खड़े होते ही खुद मुख्तार बन जाते है . फिर हमें परिवार के स्तर  अपने से कम नजर आने लगता है . विवाह सम्बन्ध भी अपने वर्तमान स्तर के अनुसार करके उस पुराने परिवार को छोड़ कर नया परिवार बसा लेते हैं .
                        अब परिवार की परिभाषा अलग तरीके से गढ़ ली गयी है ,  जिसमें प्रेम और सामंजस्य का पूर्ण अभाव मिलता है.  वैसे तो हम वसुधैव कुटुम्बकं  की बात करते हैं लेकिन अपने ही परिवार में क्या हो रहा है ? की हम भाई बहनों की बात छोडिये अपने माता -पिता तक को नहीं रख पा  रहे हैं बल्कि परिवार की परिभाषा अब पति पत्नी और बच्चों में सिमट गयी है. क्या धीरे धीरे ये भी ख़त्म हो जाएगा ? अगर हमने न सोचा तो फिर ये भी दिन आएगा  . लोग होंगे , परिवार को बढाने  के सारे  प्रयत्न होंगे  लेकिन एक बंधन जो है वो परिवार में बंधे न होंगे . 

सोमवार, 13 मई 2013

अक्षय तृतीया : कल और आज !

 


          समय के साथ इंसान की प्रवृत्तियों में  परिवर्तन आ चुका  है और इस परिवर्तन का ही प्रभाव है कि समाज में हर कोई कुछ प्राप्त करना चाहता है लेकिन देने का भाव उनमें कहीं भी नहीं है. कहाँ से और कैसे अर्जित किया जाय इसके लिए रास्ते खोजने में मनुष्य सदैव प्रयासरत  रहता  है ? अपने परिश्रम की बदौलत हासिल किये गए धन से संतुष्टि नहीं होती बल्कि अन्य तरीकों से हासिल की हुई चीज से बहुत संतुष्टि मिलती है. हम निज स्वार्थ पूर्ति के लिए हर तरीके से प्रकृति , पशु और स्वयं  मनुष्य का दोहन कर रहे है . प्रकृति के गोद में चाहे एक पौधा  न लगाया हो लेकिन अगर कहीं सड़क किनारे ग्रीन बेल्ट में फूल  लगे मिल गए तो थैले भर कर पूजा में चढ़ाये जाते है . पालतू पशुओं को कभी एक रोटी न डाली हो लेकिन उसके दूध के लिए न जाने कैसे कैसे जतन  करके उसके खून से भी दूध निकल कर बेच रहे हैं . मनुष्य अगर उससे हम काम लेते हैं तो शायद ही लोग उनको उनके वेतन के अतिरिक्त शायद ही कभी कुछ दे रहे होंगे ( मैं अपवादों की बात नहीं कर रही हूँ ). उनके परिश्रम से हम जितना काम लेते हैं उससे कुछ कम ही पैसे देते होंगे और कहीं कहीं तो उनके वेतन को महीने पूरे होने के बाद भी कुछ अधिक दिन होने पर ही दिया जाता है. 
                         हमारे अन्दर परोपकार की भावना का ह्रास हो रहा है और निजी स्वार्थ की भावना बलवती होती चली जा रही है . सिर्फ हम आत्मनिरीक्षण करके देखें तो इनमें से कुछ खूबियाँ हमारे अपने अन्दर ही मिल जायेंगी .   भावनाओं के चलते हुए हमारे ऋषि - मुनियों ने वर्ष में कुछ ऐसे दिन रखे हैं जिनमें हम अपने संचित से कुछ दान कर पुण्य कमाते हैं . वैसे तो जरूरतमदों की सहायता करने के लिए किसी भी तिथि या पर्व की जरूरत नहीं होती है , निस्वार्थ भाव से किया गया दान और उस दान के सुपात्र का होना सबसे बड़ा पुण्य है. 
            ऐसे ही पर्वों में वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया  को अक्षय तृतीया  कहा गया है और इस दिन दान , जप - तप , हवन और तीर्थ स्थानों पर जाने का अक्षय फल देने वाला पर्व कहा गया है . 
                    ग्रीष्म ऋतु  में पड़ने वाले इस पर्व पर दान का विशेष  महत्व है लेकिन इस पर्व पर शास्त्रों में वे वस्तुएं दान योग्य बताई गयीं है जिनसे मनुष्य पशु पक्षी गरमी से प्रकोप से बच सकें . इस दिन धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोग सड़क के किनारे पानी के लिए प्याऊ लगवाते हैं . पक्षियों के लिए पेड़ की डाल पर मिटटी के बर्तनों में पानी भर कर टांग दिया जाता है . ग्रीष्म ऋतु  में सर्वप्रथम आवश्यकता पानी और उसके बाद सत्तू को महत्व दिया गया है. इस तृतीया से ठीक पहले अमावस्या को सत्तू का सेवन आवश्यक माना  गया है (उनके लिए जो इस बात को मानते हों ) वैसे  बच्चे आज कल पिज़्ज़ा , बर्गर , चाउमीन को ही जानते हैं . ये देशी फ़ास्ट फ़ूड है जो सदियों से चलता चला आ रहा है . इस दिन सत्तू के दान का भी बहुत महत्व है क्योंकि सत्तू की स्वभाव ठंडा होता  है और इसको पानी शक्कर या गुड के साथ घोल कर खाने से भूख के साथ गर्मी भी शांत होती है. 
इसके अतिरिक्त छाता , चप्पल , सुराही आदि गर्मी से बचाने  वाले जितने भी साधन होते हैं विशेष रूप से दान करने का विशेष पुण्य मिलता है और पुण्य न भी मिले एक मानव होते के नाते इस भीषण गर्मी में नंगे पैर धूप  में चलने वाले को चप्पल या छाता  मिल जाए तो उसकी जान को तो एक राहत  मिलेगी और यही राहत किसी गरीब की आत्मा से निकले हुए भाव, उस दानकर्ता की मानवता को एक प्रणाम है .
                          इस अक्षय तृतीया का महत्व इसी  रूप में जाना जाता है कि इस दिन किया गया दान , जप - तप सभी अक्षय होता है और इससे प्राप्त पुण्य भी अक्षय होता  है लेकिन समय के साथ और मानव की बढती हुई लालसा ने इसके स्वरूप को समय के अनुसार बदल लिया और आज चाहे इसे हम मार्केटिंग का एक तरीका कहें कि बड़े बड़े विज्ञापनों द्वारा जन सामान्य को इस दिन सोने की खरीदारी करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और इस दिन विशेष छूट और लाभ का लालच देकर स्वयं के लिए संग्रह करने की प्रवृत्ति को भी प्रोत्साहन  दिया जाने लगा है और भाव अभी वही है कि  जो इस दिन जिस वस्तु का क्रय करेगा वह भी उसके लिए अक्षय बनी रहेगी .सोना खरीदो तो वह सदैव अक्षय रहेगा लेकिन अब ये औरों के लिए नहीं बल्कि अपनी जरूरत और अपनी संपत्ति को अक्षय रखने के लिए लिया जाता है. अपनी संपत्ति या स्वर्ण आभूषणों को अक्षय अवश्य रखिये लेकिन उस धन से कुछ प्रतिशत दान के लिए भी रखा जाय तो इसका अर्थ और भाव सार्थक होता नजर आयेगा . लेकिन इस पर्व का भाव और अर्थ कल और आज बदले है लेकिन वह व्यक्ति की बढाती हुई आर्थिक उपलब्धियों के अनुसार - एक सामान्य व्यक्ति आपको दान करता मिल जाएगा लेकिन एक संपन्न व्यक्ति बड़ी बड़ी कारों में ज्वेलर्स के यहाँ आभूषण खरीदते हुए मिल जाएंगे .