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गुरुवार, 30 जनवरी 2020

करियर या शादी !

                                      यहाँ हम यह बात एक महिला या लड़की के लिए कर रहे हैं क्योंकि अपनी सुरक्षा , आत्मनिर्भरता और एक  अच्छे जीवन को जीने का अधिकार सिर्फ इस समाज  के अनुसार  सिर्फ पुरुष  को ही नहीं होता बल्कि ये उतना ही आवश्यक एक लड़की और महिला के लिए  होता है।
                                     आत्मनिर्भर होने का अर्थ ये बिलकुल भी नहीं होता है कि उसे लड़की के अंदर संवेदनाएं , कोमल भावनाएं या फिर एक सुन्दर जीवन जीने की इच्छा नहीं होती हैं।  वह सब कुछ चाहती है - आत्मनिर्भर होने के लिए एक नौकरी , एक सुन्दर घर और उस घर में पति और उसके अपने बच्चे। ऐसा  ऐसा सोचना स्वाभाविक भी है क्योंकि वह सब कुछ करती ही इस लिए है कि वह एक सुखमय और शांतिपूर्ण जीवन जी सके। इसके बाद भी आज कुछ परेशानियों का सामना कर रही है  - कभी रोग से लड़ने की क्षमता की कमी , कभी सामंजस्य की समस्या तो कभी घर और नौकरी के बीच पिसती हुई । इससे पारिवारिक जीवन भी प्रभावित होता है ।

शादी  की बढ़ती उम्र !

                         करियर की तैयारी के लिए वह कई बार कई साल लगा लेती हैं और फिर अपने करियर बनाने के लिए इतना समय लगाने के कारण वह अपनी मंजिल पर पहुँचाने के बाद उसको मजबूत भी करना चाहती है।  ऐसा नहीं है इस समय तक वह खुद भी शादी ले लिए तैयार नहीं  होती है , लेकिन घर वाले भी उसके लिए उचित वर खोजते रहते हैं।  इसी  जद्दोजहद में उसकी उम्र बढ़ती जाती है।  आज के समय के अनुसार जॉब के तनाव , अपने को ठीक से सेटल होने का तनाव, उसको ठीक से स्थिर नहीं होने देता है।  जब तक वो शादी करती हैं और फिर परिवार बढ़ाने के लिए प्रयास करती हैं।  तब तक शारीरिक स्थिति कई तरीके से हार्मोन असंतुलन का शिकार होने लगती  है। इससे शरीर में बहुत से परिवर्तन आने लगते हैं।  कई बार वह शरीर की समुचित देखभाल न होने  कारण भी कई समस्याओं में फंस जाती है।

माँ बनने में विलम्ब :-
                       देर से शादी करना और आज के चलन के अनुसार अभी तो जिंदगी शुरू हुई है , इस मानसिकता के अनुसार लड़कियां माँ बनने को दूसरे क्रम में रखती हैं और कभी कभी तो वे माँ बन कर अपनी जिंदगी को बांटना या कहें उसकी मुसीबतें बढ़ाना नहीं चाहती है।   कई बार माँ न बनने में देर होने के कारण शुरू होता है डॉक्टर के यहाँ चक्कर लगाने का सिलसिला।  कई बार उन्हें आईबीएफ के जरिये माँ बनने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। ये आधुनिक चिकित्सा  प्रणाली हमें बहुत कुछ ऐसा दे रही है , जो अतीत में संभव नहीं था लेकिन नए नए शोध से जो हमें उपलब्धि हो रही है , वह भविष्य पर अधिक घातक प्रभाव भी डाल रही  है।  इसमें आज कल सबसे घातक रोग जो महिलाओं के लिए सामने आता जा रहा है वह है कैंसर।  

 कैंसर के संभावित कारण :- कामकाजी महिलाएँ यद्यपि प्रसव अवकाश में अपने बच्चे को पूर्ण संरक्षण देती हैं और कभी कभी तो वह और अधिक छुट्टी लेकर भी उनको स्तनपान करवाती हैं लेकिन जैसे  ही वह ऑफिस जाना शुरू कर देती हैं , उनका यह क्रम बिगड़ जाता है।  उनके सामने फिर एक विकल्प रह जा है कि वह बच्चे को स्तनपान कराना बंद कर देती हैं।  इसके पीछे आज की आधुनिकता की मांग भी है कि वे अपने फिगर के प्रति इतनी अधिक सजग होती हैं कि  वह स्तनपान कराना बंद कर देती हैं।  लेकिन इससे उसमें दूध बनने की प्रक्रिया धीरे धीरे बंद जरूर हो जाती है और कभी कभी तो ऑपरेशन के बाद दी जाने वाली दवाओं के द्वारा माँ का दूध सूखा दिया जाता है।  यह कभी कभी एक घातक प्रभाव डालता है , इससे स्तन में गाँठ पड़ जाती है और उसके प्रति ऑफिस और घर की व्यस्तताओं के चलते ध्यान भी नहीं दिया जाता है।  यह लापरवाही या कहें कि  समयाभाव , जागरूकता का अभाव उनको एक मुसीबत में फंसा देता है।

माँ न बनने का निर्णय :- कई बार लड़कियां शादी भी विलम्ब से करेंगी और फिर माँ न बनने का निर्णय भी उनको बहुत सारी जिम्मेदारियों से मुक्त तो कर देता है लेकिन वह यह भूल जाती हैं कि प्रकृति ने जो शारीरिक संरचना बनाई है वो समय से अपने उपयोग के प्रति सक्रिय होती है और शरीर के हार्मोन्स अपने समय से संतुलन भी बनायें रखते हैं लेकिन यदि उनका समय से शरीर में उपयोग नहीं हो पता है तो वह कभी कभी विपरीत प्रभाव भी डालते हैं और वह किस रूप में और किस अंग को प्रभावित करेंगे नहीं जानते है । इसलिए दुष्प्रभावोंं से बचने के लिए  करियर की प्राथमिकता दूसरे स्थान पर  चाहिए । औरत को प्रकृति ने जो दायित्व सौंंपेे हैंं वह कोई और नहीं ककता है । प्रकृति हमें बनाती है हम 

बसंत.पंचमी !

बसंत पंचमी पर्व:-
     
                  बसंत पंचमी  हिन्दू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व  है।  यह त्यौहार हर साल हिंदू पंचांग (कैलेंडर) के अनुसार माघ की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है।  ऐसा माना जाता है कि  बसंत पंचमी के दिन ही ब्रह्मांड की रचना हुई तथा समस्त जीवों और मानवों का प्रादुर्भाव इसी दिन हुआ था।   ब्रह्मा जी इस सृष्टि से संतुष्ट नहीं थे क्योंकि जीव वाणी रहित थे , तब ब्रह्मा जी ने भगवन विष्णु से अनुमति प्राप्त करके अपने कमंडल से पृथ्वी पर जल सिंचित किया और इस सिंचन से एक देवी का प्राकट्य हुआ और ये देवी चार भुजाओं वाली थीं ।  इनके एक हाथ में वीणा , दूसरा हाथ वर मुद्रा में था।  , शेष दो हाथों में पुस्तक और माला थी।  ब्रह्माजी ने देवी से वीणा वादन का अनुरोध किया और जैसे ही देवी ने वीणा वादन आरम्भ किया पृथ्वी के समस्त जीवों को वाणी प्राप्त हुई।  उस देवी को ही माँ सरस्वती कहा जाता है।  माँ सरस्वती ने ही प्राणियों को विद्या और बुद्धि प्रदान की। इसी लिए बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा की जाती है।  बच्चों का विद्यारम्भ इसी दिन करवाया जाता है।  इस दिन बसंत का भी आगमन होता है  इस दिन  को श्री पंचमी व सरस्वती पंचमी भी कहते हैं| इस दिन लोग अपने घर, स्कूल व दफ्तरों को पीले फूल व रंगोली से सजाते हैं।

              इस दिन लोग सरस्वती माता की पूजा पूरी विधि विधान से करते हैं जिससे कि उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हो सके और माता का आशीर्वाद बना रहे। माँ सरस्वती को बुद्धि, ज्ञान और कला की देवी माना जाता है और इसी लिए इस दिन गुरु के समक्ष बैठ कर उनसे शिक्षा  ग्रहण करने का शुभारम्भ  किया जाता है। पुस्तक , वाद्य आदि देवी के समक्ष रख कर पूजा की जाती है।

                बसंत  ऋतु को सभी छह ऋतुओं  का राजा माना जाता है , इसी कारण इस दिन को बसंत पंचमी कहा जाता है तथा इसी दिन से बसंत ऋतु की शुरुआत होती है | इस ऋतु में खेतों में फसलें लहलहा उठती है और फूल खिलने लगते है।  जब धरती पर फसल लहलहाती है तो चारों तरफ पीले रंग की बहार नजर आती है।  खासतौर पर सरसों के फूलने पर जो छटा निखरती है , वही बसंत शब्द को चरितार्थ करती है।  ।

        बसंत पंचमी का त्यौहार बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है | इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करने के पीछे एक पौराणिक कथा है | सर्वप्रथम श्री कृष्ण और ब्रह्मा जी ने देवी सरस्वती की पूजा की थी | देवी सरस्वती ने जब श्री कृष्ण को देखा तो वो उनके रूप को देखकर मोहित हो गयी और पति के रूप में पाने के लिए इच्छा करने लगी | इस बात का भगवान श्री कृष्ण को पता लगने पर उन्होंने देवी सरस्वती से कहा कि वे तो राधा के प्रति समर्पित है परन्तु सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए भगवान श्री कृष्ण देवी सरस्वती को वरदान देते है कि प्रत्येक विद्या की इच्छा रखने वाले को माघ महीने की शुल्क पंचमी को तुम्हारा पूजन करेंगे | यह वरदान देने के बाद सर्वप्रथम ही भगवान श्री कृष्ण ने देवी की पूजा की |

 |               देवी सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, माँ शारदा, वीणावादिनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है ।

बसंत पंचमी का महत्व !

                बसंत पंचमी फूलों के खिलने और नई फसल के आने का त्योहार है।  ऋतुराज बसंत का बहुत अत्यधिक महत्व है।  सर्दी के बाद प्रकृति की छटा देखते ही बनती है।  इस मौसम में खेतों में सरसों की फसल पीले फूलों के साथ , आम के पेड़ पर आए बौर , चारों तरफ हरियाली और गुलाबी ठण्ड मौसम को और भी खुशनुमा बना देती है।  यदि सेहत की दृष्टि से देखा जाए तो यह मौसम बहुत अच्छा होता है।  इंसानों के साथ-साथ पशु पक्षियों में नई चेतना का संचार होता है।  इस ऋतु  को कामबाण के लिए भी अनुकूल माना जाता है।  हिन्दू मान्यताओं के अनुसार प्रमुख हिन्दू त्यौहार में पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है। बसंत पंचमी पर भी पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है।   कुम्भ और अर्धकुम्भ होने पर भी बसंत पंचमी को विशेष स्नान पर्व होता है। 

                 बसंत पंचमी के दिन को बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के आरंभ के लिए शुभ मानते हैं। इस दिन बच्चे की जीभ पर शहद से ॐ बनाना चाहिए। माना जाता है कि इससे बच्चा ज्ञानवान होता है व शिक्षा जल्दी ग्रहण करने लगता है । 6 माह पूरे कर चुके बच्चों को अन्न का पहला निवाला भी इसी दिन खिलाया जाता है । अन्नप्राशन के लिए यह दिन अत्यंत शुभ है । बसंत पंचमी को परिणय सूत्र में बंधने के लिए भी बहुत सौभाग्यशाली माना जाता है इसके साथ-साथ गृह प्रवेश से लेकर नए कार्यों की शुरुआत के लिए भी इस दिन को शुभ माना जाता है ।

विभिन्न राज्यों में बसंत पंचमी !

                  बसंत पंचमी भारत के  विभिन्न राज्यों में धूमधाम से मनाया जाता है।  पीले रंग के कपड़े , पीले रंग का भोजन और पीले फूलों से देवी सरस्वती का पूजन विशेष रूप से किया जाता है।  यह सब तो सामान्य विधि है लेकिन कुछ राज्यों में बसंत पंचमी अलग अलग ढंग से मनाई जाती है। 

1. राजस्थान और उत्तर प्रदेश :                                           

         यहाँ पर स्कूलों में बच्चों को पीले कपड़ों में और पीले फूलों की माला या फिर फूल लाने को कहा जाता है और वहां पर माँ सरस्वती की पूजा करवा कर , सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।  विभिन्न प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। 

2. बिहार :-
                   बिहार में लोग भी पीले वस्त्र पहन कर माथे पर हल्दी का टीका लगा कर मंदिर दर्शन के लिए जाते हैं और खूब  नाच गाने के साथ पर्व को मनाते  हैं। यहाँ पर केशर डाल कर चावल की खीर बनाई जाती है।  बेसन की बूंदी भी बनाई जाती है और उसकी चाशनी में केसर डाली जाती है। मालपुआ के बगैर बिहार का कोई पर्व नहीं मनाया जाता है। 

   3. बंगाल :-
                      ललित कलाओं के अतिरिक्त बंगाल में देवी पूजन को विशेष महत्व दिया जाता है।  दुर्गा पूजा और काली पूजा की तरह सरस्वती पूजा में भी पंडाल लगाए जाते हैं और वहां पर मूर्ति की विधिवत् पूजा कर प्रसाद बाँटा जाता है। प्रसाद में बूंदी के लड्डू , खिचड़ी ( इससे देवी का भोग भी लगाया जाता है।) केशरी राजभोग में चाशनी में केशर डाल दिया जाता है।   राजभोग विशेष रूप से बनाये जाते हैं।   इसके अतिरिक्त नृत्य समारोह और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं का आयोजन भी होता है। 

4. उत्तरकशी  : -
                                       उत्तरकाशी में लोग अपने घरों के दरवाजे पर पीले फूल उगाते हैं और पीले वस्त्र पहन कर और मिष्ठान्न के साथ पूजा अर्चना करके पर्व मानते हैं।

5. पंजाब और हरियाणा :-
                                            देश के इन दो राज्यों में बसंत पंचमी  के अवसर पर पतंगे उड़ाई जाती हैं।  नृत्य आदि का आयोजन होता है। यहाँ पर मक्के की रोटी और चने के साग के साथ मीठे चावल केशर डाल कर बनाये जाते हैं।    गुरुद्वारे में सार्वजनिक उत्सव आयोजित किये  जाते हैं।  लंगर  का प्रबंध होता ।

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

मकर संक्रांति !

                    मकर संक्रान्ति हिंदु धर्म में एक प्रमुख पर्व है।  पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है तभी यह पर्व मनाया जाता है। यह वह पर्व है जबकि इसको अंग्रेजी माह जनवरी की दिनाँक  13 - 14 को ही पड़ता है लेकिन कभी कभी ग्रहों की गति या सूर्य के प्रवेश के समय में कुछ अंतर होने पर यह 15 जनवरी को भी पड़ती है  क्योंकि मकर संक्रान्ति के दिन से ही सूर्य की उत्तरायण गति भी प्रारम्भ होती है। इसलिये इस पर्व को उत्तरायणी भी कहा जाता है।  इसको उत्तरायणी गुजरात राज्य में ही कहा जाता है।
                       मकर संक्रांति एकमात्र ऐसा पर्व है जिसका निश्चय सूर्य की गति की अनुसार होता है क्योंकि शेष सभी पर्व चन्द्रमा की गति के अनुसार निश्चित होते हैं।  इसका अपना पौराणिक महत्व माना  जाता है।
पौराणिक सन्दर्भ में प्रमुख तीन घटनाओं को उल्लिखित किया गया है --
१. ऐसी मान्यता है कि इस दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूँकि  शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं , इसी लिए सूर्य धनु राशि से मकर में प्रवेश करते है ,तभी इसको मकर संक्रान्ति कहा जाता है।
२.  महाभारत काल में भीष्म पितामह सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण शरशय्या पर रहे , जब तक कि  सूर्य उत्तरायण नहीं हुए और इसी दिन उन्होंने अपने प्राण त्यागे थे।
३. मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर  कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर  में जाकर मिली थीं।
                  यह एक ऐसा पर्व है जो सम्पूर्ण देश में मनाया जाता है और अपने अपने रिवाजों के अनुरूप उसके स्वरूप को निश्चित कर लिया है।  एक दृष्टि देश के सभी राज्यों में मनाये जाने वाले ढंग पर डाले

पश्चिम  बंगाल -- बंगाल में इसको पौष माह के अन्तिम दिन पड़ने के कारण ही 'पौष पर्व ' नाम दिया गया है।  इसमें खजूर , खजूर के गुड़ को मिठाई बनाने में  प्रयोग  किया जाता है और माँ लक्ष्मी की पूजा की जाती है।  दार्जिलिंग में भगवान् शिव की पूजा होती है। इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल  दान करने की प्रथा है।

तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश --   पोंगल - ये चार दिनों का त्यौहार होता है -- प्रथम  भोगी-पोंगल जिसमें दिवाली की तरह ही घर की सफाई करते हैं , दूसरा  सूर्य-पोंगल  मनाने के लिये स्नान करके खुले आँगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है।इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा भी की जाती है। तीसरा  मट्टू अथवा केनू-पोंगल  जिसमें पशुओं की पूजा की जाती है ,उसके बाद खीर को प्रसाद  के रूप में सभी ग्रहण करते हैं।,  और चौथे  दिन कन्या-पोंगल- इस दिन बेटी और जमाई  का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है।

 पंजाब --   लोहड़ी  १३ जनवरी को ही मनाया जाता है। इस दिन सुबह स्नान करके तिल के तेल का दीपक जलाते हैं ताकि  घर में खुशियां और समृद्धि आये।  इस दिन अँधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल , गुड़ और मूंगफली और भुने हुए मक्के (तिलचौली ) की आहुति दी जाती है। इसमें भाँगड़ा और गिद्धा  नृत्य की  विशेष रूप से धूम होती है।   लोग  तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियाँ आपस में बाँटकर खुशियाँ मनाते हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है।

महाराष्ट्र --इस दिन सभी विवाहित महिलाएँ अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल-गूल नामक हलवे के बाँटने की प्रथा भी है। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं -'तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो।' इस दिन महिलाएँ आपस में तिल, गुड़, और हल्दी कुमकुम बाँटती हैं।

उत्तराखण्ड -- यहाँ पर यह घुघूती या काले कौवा के नाम से जाना जाता है और इसको चिड़ियों के अन्यत्र प्रवास को ख़त्म होने का पर्व मनाया जाता है।  इसमें खिचड़ी और अन्य चीजें दान की जाती हैं।  जगह जगह मेले लगते हैं और मीठे व्यंजन बना कर चिड़ियों को खिलाये जाते हैं।  

कर्नाटक -- यहाँ पर इसे  कृषि से सम्बद्ध मानकर मनाया जाता है।  वे अपने घरों को रंगोली से सजाते हैं और अपने पशुओं को भी  सजाते हैं।  उनके सीगों को रंगों से सजाते हैं।  महिलायें एक दूसरे के यहाँ एक थाली में तिल , गुड़ , गन्ने और अन्य मिष्ठान भर कर आदान प्रदान करती  हैं।

गुजरात -- मकर संक्रांति या उत्तरायण गुजरात का प्रमुख त्योहार है। पहले दिन 14 जनवरी को  उत्तरायण  मुख्य रूप से पतंगबाजी के रूप में मनाया जाता है। पतंग उड़ाने प्रतियोगिताएं राज्य भर में आयोजित की जाती है. अगले दिन बासी  उत्तरायण कहा जाता है , इसमें सर्दियों में उपलब्ध सब्जियों और चिक्की, तिल के बीज, मूंगफली और गुड़ से बने का एक  विशेष व्यंजन तैयार करते है, जिसका प्रयोग इस अवसर का जश्न मनाने के लिए किया जाता है।

 बिहार व झारखण्ड -- बिहार / झारखंड में इसे सकरात  या खिचड़ी  कहते हैं। पहले दिन मकर संक्रांति के दिन, लोग तालाबों और नदियों में स्नान करते हैं और मीठे व्यंजनों में तिल गुड़ के लड्डू और चावल की लाई 
 के लड्डू भी बनाये जाते हैं। खाने में चिवड़ा और दही  को प्रमुख रूप प्रयोग करते हैं।  खिचड़ी और काले तिल का दान विशेष रूप से किया जाता है।  

हिमांचल प्रदेश -- इसको माघ साजी  कहा जाता है , साजी  संक्रांति का प्रतीक शब्द है।  शरद के समापन बसंत के आगमन पर मनाया जाता है।  इसमें पवित्र जल में स्नान करके मंदिरो  में जाते हैं।  गरीबों में खिचड़ी , मिठाई दान करते हैं।  आपस में भी खिचड़ी और गुड़ तिल की चिक्की का आदान प्रदान करते हैं और शाम को लोक नृत्य आदि का आयोजन होता है।  

आसाम --  आसाम में इसको बिहू कहा जाता है।  इसमें रात में ही बांस और सूखे पत्तों से झोपड़ी नुमा तैयार करते हैं और सुबह स्नान करके उस झोपड़ी को जलाते हैं फिर चावल की रोटी बनाते हैं पीठा बनाकर देवता को अर्पित करते हैं और फिर आपस में बाँटते हैं।  इसी के साथ अच्छी फसल की कामना करते हैं।  

राजस्थान -- इस पर्व पर सुहागन महिलाएँ अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएँ किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं।

 उत्तर प्रदेश -- यहाँ पर भी इसको संक्रांति या खिचड़ी के नाम से जाना जाता है , यह दो दिन मनाया जाता है - पहले दिन शाम दाल की नयी फसल आने के उपलक्ष में मूंग दाल के मगौड़े और उडद दाल के बड़े बनाये जाते हैं और दूसरे दिन सुबह लोग पवित्र नदी अगर उपलब्ध है तो उसमें स्नान करते हैं और फिर काले तिल और खिचड़ी का दान करते हैं।   उस दिन खाने में खिचड़ी ही खायी जाती है।  इसके साथ ही तिल के लड्डू के साथ साथ अन्य धान्य के लड्डू जैसे भुने चने के , लाइ के , रामदाना के का भी सेवन करते हैं और दान करते हैं।  इस पर्व पर संगम के साथ साथ गंगा , यमुना आदि नदियों में स्नान करने लाखों की संख्या में लोग आते है।

 कश्मीर घाटी -- में इसको नवजात शिशु या नववधू के आगमन पर उत्सव के रूप में मनाया जाता है और इसको शिशुर संक्रात  कहते हैं। 

                                भारत के अतिरिक्त यह पर्व अलग अलग नामों से बाहर भी मनाया जाता है।  इसमें पडोसी देशों में  --
नेपाल  --  मकर संक्रान्ति को माघे-संक्रान्ति, सूर्योत्तरायण  कहा जाता है। थारू समुदाय का यह सबसे प्रमुख त्यैाहार है। नेपाल के बाकी समुदाय भी तीर्थस्थल में स्नान करके दान-धर्मादि करते हैं और तिल, घी, शर्करा और कन्दमूल खाकर धूमधाम से मनाते हैं। वे नदियों के संगम पर लाखों की संख्या में नहाते हैं।
 बांग्ला देश -- शंकरेण / पौष सांगक्रान्ति
थाईलैंड  -- सोंगक्रान
लाओस  -- गड़बड़ी मा लाओ
म्यांमार -- थिंज्ञान
कंबोडिया  -- मोहां / सांगक्रान
 श्रीलंका  -- पोंगल / तिरुनल


बुधवार, 1 जनवरी 2020

वो सर्दी और ये सर्दी !

संस्मरण
          
 
      आज के तापमान को देखते हुए अखबार में 1961- 62 की सर्दियों का जिक्र किया गया तो याद आया कि वह सर्दियां आज की तरह साधनों से सम्पन्न न थी और न ही उस समय  तापमान नापा जा सकता था । ना इतने सारे साधन थे कि इंसान सर्दी से अपने को सुरक्षित रख सके।
             मुझे अच्छी तरह याद है उस समय मेरी दो बहनों का जन्म हुआ था। 1 महीने पहले मेरे चाचा की बेटी मंजू और एक महीने बाद मेरी बहना सुनीता का जन्म हुआ था। जहाँ माँ और चाची को लिटाया जाता था एक बड़ा हॉल था।  घर में छोटा बच्चा होने के कारण हॉल में जिसमें कि जच्चा और बच्चा रहते थे पापा लकड़ी के बड़े-बड़े जड़ों वाले टुकड़े ले आते थे और उस कमरे में 24 घंटे आग जला करती थी। प्रसूता और नवजात के पास एक बोरसी में कंडे की आग जलाकर रखी जाती थी । मुझे नहीं याद लकड़ी उस दौरान कब तक  जलाई गई होगी और भयंकर सर्दी में किस तरह से छोटे बच्चे और उसकी मां को बचाया गया होगा।
         उस समय सर्दी में स्कूल की छुट्टियाँ नहीं होती थीं । दादी तैयार कर देती और हम स्कूल चले जाते । बाहर खुले में रखी बाल्टियों में बर्फ जम जाती थी ।
     उसी समय चीन के साथ भारत की लड़ाई हुई थी और घर में यह चर्चा हुआ करती थी कि सीमा पर लड़ने वाले सैनिकों को किन हालातों का सामना करना पड़ रहा होगा। देश के मैदानी इलाकों में यह हालात थे और वहां पर हालातों की सिर्फ कल्पना की जा सकती थी ।
       दादी हम भाई बहनों से कहती कि भगवान का कीर्तन करो तो ये सर्दी खत्म होगी । हम सब उनकी बात मानकर सुबह शाम आरती में शामिल होते । आज बहुत सारे साधन है लेकिन वह परिवार का सुख नहीं है । 

रविवार, 13 अक्टूबर 2019

शरद पूर्णिमा,कोजागरी पूर्णिमा रास पूर्णिमा

         शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं; हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन  मास की पूर्णिमा  को कहते हैं। ज्‍योतिष के अनुसार, पूरे साल में केवल इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिन्दू धर्म में इस दिन कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। इसी दिन श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। मान्यता है इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखने का विधान है।आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसे 'रास पूर्णिमा' भी कहते हैं। ज्योतिष की मान्यता है कि संपूर्ण वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रमा षोडश कलाओं का होता है। धर्मशास्त्रों में इस दिन 'कोजागर व्रत' माना गया है। इसी को 'कौमुदी व्रत' भी कहते हैं। रासोत्सव का यह दिन वास्तव में भगवान कृष्ण ने जगत की भलाई के लिए निर्धारित किया है, क्योंकि कहा जाता है इस रात्रि को चंद्रमा की किरणों से सुधा झरती है। इस दिन श्री कृष्ण को 'कार्तिक स्नान' करते समय स्वयं (कृष्ण) को पति रूप में प्राप्त करने की कामना से देवी पूजन करने वाली कुमारियों को चीर हरण के अवसर पर दिए वरदान की याद आई थी और उन्होंने मुरलीवादन करके यमुना के तट पर गोपियों के संग रास रचाया था। इस दिन मंदिरों में विशेष सेवा-पूजन किया जाता है।

कथा

एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी।[1] दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।
उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली-” तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।“ तब छोटी बहन बोली, ” यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। “उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।
                 इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और जितेन्द्रिय भाव से रहे। धनवान व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए १०० दीपक जलाए। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (३ घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।
                  इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

दशहरा !

                               दशहरा या विजयादशमी हमारे देश का बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है और साथ ही इसको संस्कृति से जोड़ते हुए समाज को एक सन्देश - बुराई पर भलाई की विजय या सत्य की असत्य पर विजय जाता है।  पूरे  देश में कहीं विजयादशमी का सम्बन्ध सिर्फ रामायण महाकाव्य की लीला से होता है और कहीं पर इसको दुर्गा पूजा के साथ जोड़ कर देखते हैं कि  दुर्गा जी के द्वारा महिषासुर का वध भी शक्ति की विजय दिखता है और दोनों का ही एक ही सन्देश जाता है। हमारे देश में ही दशहरा विभिन्न स्थानों पर अलग अलग तरीके से मनाया जाता है।  सबका उद्देश्य एक ही होता है लेकिन कहीं कहीं पर लोक कथाओं पर आधारित भी है।   

 बंगाल का दशहरा :-- बंगाल में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है, जो कि बंगालियों, ओडिओं तथा असमियों का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है।   इसमें  दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है, जिसके अन्‍तर्गत स्त्रियाँ द्वारा नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना के बाद दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।  देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं व देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं इसके साथ ही वे आपस में भी सिंदूर खेलती हैं और अंत में सभी देवी प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता  है। उसके बाद दशहरा का त्यौहार मनाया जाता है। विसर्जन की ये यात्रा महाराष्‍ट्र के गण‍पति-उत्‍सव के गणेश-विसर्जन के समान ही भव्‍य, शोभनीय और दर्शनीय होती है जबकि इस दिन नीलकंठ पक्षी को दर्शन  बहुत शुभ माना जाता है।

कर्नाटक का दशहरा -  मैसूर का दशहरा अंतर्राष्ट्रीय उत्सव के रूप में अपनी अलग पहचान बना चूका है जिसमे शामिल होने के लिए विदेशो से पर्यटक आते है | इस दिन यहाँ कई प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किये जाते है लेकिन सबसे अधिक प्रसिद्ध है 12 हाथियों की इस इस उत्सव में उपस्थिति | इन हाथियों की अपनी अपनी विशेषता होती है | दशहरा उत्सव के अंतिम दिन यहा मैसूर महल से “जम्बो सवारी” का आयोजन किया जाता है जिसमे रंग बिरंगे आभूषण और कपड़ो से सजे हाथी एक साथ शोभायात्रा के रूप में इकट्ठे चलते है और इन सबका नेतृत्व करने वाल विशेष हाथी “अम्बारी ” है जिसकी पीठ पर चामुंडेश्वरी देवी की प्रतिमा सहित 750 किलो का “स्वर्ण हौदा” रखा होता है | यह सवारी मैसूर महल से तीन किलोमीटर की दूरी तय करने एक बाद बन्नीमंडप पहुचकर समाप्त होती है | इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीप-मालिकाओं से दुल्‍हन की तरह सजाते हैं। साथ ही शहर में लोग टॉर्च लाइट के संग नृत्य और संगीत की शोभायात्रा भी निकालते हैं।

 तमिलनाडू , तेलंगाना , आंध्रप्रदेश का दशहरा :--

इन सभी  राज्यों में दशहरा  नौ दिनों तक मनाते  है ,| यहाँ के लोग दशहरे पर तीनो देवियों लक्ष्मी ,सरस्वती और दुर्गा की पूजा करते है | अगर कोई भी नया कार्य करना हो तो इस दिन को बहुत शुभ माना जाता है | इन सभी राज्यों में लक्ष्मी माता की पूजा प्रथम तीन दिनों में की जाती है उसके अगले तीन दिनों में विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा अर्चना की जाती है और अंत के तीनो दिनों में शक्ति की देवी माँ दुर्गा का पूजन किया जाता है। |यहाँ नवरात्रि जैसी कोई परिकल्पना नहीं है लेकिन शक्तिपूजा का ही विधान है।

 उत्तर भारत का दशहरा --( उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , बिहार और पंजाब ):--

उत्तर भारत  में दशहरे के पर्व का सम्बन्ध सीधे सीधे असत्य पर सत्य की विजय माना जाता है। इस पर्व को मनाने से पूर्व रामलीला का जगह जगह पर आयोजन होता है।  यहाँ पर रामलीला बहुत लोकप्रिय है , जिसमें रामायण को आधार मान कर उसको नायकीय रूप में प्रस्तुत किया जाता है। रामलीला इस तरह से आयोजित की जाती है कि दशहरे के दिन रावण वध का प्रसंग आता है और फिर रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के बड़े बड़े पुतले बना कर जलाये जाते हैं।   | यहा दशहरे की रौनक देखते ही बनती है | जहाँ  एक ओर रामनगर की लीला विश्वविख्यात है | वही बनारस में घट स्थापना से शुरू हुआ यह उत्सव दस दिन तक चल चलता है | दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, इन सभी राज्यों में दशहरे का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। इन सभी प्रदेशों में इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। यहां दशहरे को विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर प्रदेश में दशहरे के दिन नीलकंठ नामक चिड़िया और मछली के दर्शन करना विशेष शुभ माना जाता है।

  कुल्लू का दशहरा:--

                            हिमाचल प्रदेश में स्थित कुल्लू का दशहरा एक अनोखे और भव्य अंदाज में मनाये जाने के कारण विश्वविख्यात है  | कुल्लू का दशहरा पारम्परिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व रखता है | यहाँ  इस पर्व को मनाने की परम्परा राजा जगत सिंह के समय से चली आ रही है  |एक लोक कथा के अनुसार राजा जगत सिंह ने एक साधू की सलाह पर कुल्लू में अयोध्या से मंगवा कर भगवान रघुनाथ जी (राम जी ) की प्रतिमा स्थापित की थी | वास्तव में राजा किसी रोगग्रस्त से थे और इसी से मुक्ति पाने के लिए साधू ने उन्हें यह सलाह दी थी | मूर्ति स्थापना के बाद राजा धीरे धीरे स्वस्थ हो गए और  उन्होंने इसी वजह से अपना शेष जीवन भगवान को समर्पित कर दिया। इस उत्सव के एक दिन पहले एक रथ यात्रा आयोजित की जाती है जिसमे रथ में भगवान रघुनाथ जी ,सीता जी एवं दशहरे की देवी मनाली की हिडिम्बा जी की प्रतिमाओं को रखा जाता है |सातवे दिन रथ से व्यास नदी के किनारे लाया जाता है जहा लंका दहन का आयोजन होता है | इसके बाद रथ पुन: वापस लाकर रघुनाथ जी को उनके मन्दिर में फिर से स्थापित कर दिया जाता है | दशहरे के दिन यहाँ की धूमधाम देखने योग्य होती है |

गुजरात का दशहरा

गुजरात में मिटटी का एक रंगीन घड़े को देवी का प्रतीक माना जाता है जिसको कुंवारी लडकिया अपने सिर पर रखकर गरबा करती है  जो गुजरात की शान है | गुजरात के सभी पुरुष और महिलाये दो डंडो से गरबे के संगीत पर गरबा नाचते है | इस अवसर पर भक्ति और पारम्परिक लोक संगीत का समायोजन भी होता है | आरती हो जाने के बाद यहा पर डांडिया रास का आयोजन होता है जो पूरी रात चलता है | | नवरात्रि  में सोने के गहनों को खरीदना बहुत ज्यादा शुभ माना जाता है   राजस्थान और गुजरात दोनों एक दुसरे से सटे हुए राज्य है शायद यही कारण है कि यहां पर दशहरे से जुडी एक ही मान्यता को दोनों जगह समान माना जाता है यहां नवरात्रि के 9वें दिन के उपवास के बाद 10वें दिन व्रत को खत्म कर लोग अन्न खातें है। गुजरात में दशहरे के दिन सुबह उठ के लोग जलेबी और फाफडा खा के अपने दिन की शुरुवात करतें हैं।

बस्तर का दशहरा :--

बस्तर के दशहरे के मुख्य कारण को राम की रावण पर विजय न मानकर लोग इसे माँ दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते है | दंतेश्वरी माँ बस्तर के निवासियों की आराध्य देवी मानी जाती है जो माँ दुर्गा का ही स्वरूप  है | यहाँ पर यह पर्व पूरे 75 दिन तक चलता है जो  दशहरा श्रावण मास की अमावस से लेकर आश्विन मास  की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है | पहले  दिन को काछिन गादी कहते है जिसमे देवी से समारोह आरम्भ की अनुमति ली जाती है | यहाँ पर देवी एक कांटो की शैय्या पर विराजमान होती है जिसे काछिन गादी कहते है | यह कन्या अनुसूचित जाति की है जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति की अनुमति लेते है | यह समारोह लगभग 500 साल पहले 15वी शताब्दी से शुरू हुआ था | इसके बाद जोगी बिठाई होती है | इसके बाद यहाँ पर भीतर रैनी (विजयादशमी) , फिर बाहर रैनी (रथ यात्रा ) और अंत में मुरिया दरबार होता है | इसपर्व का समापन आश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाडी पर्व से होता है |

महाराष्ट्र का दशहरा :--

महाराष्ट्र में माँ दुर्गा को नवरात्रि के नौ दिनों तक पूजा जाता है और दसवे दिन माता सरस्वती की पूजा की जाती है | यहा के लोगो का मानना है कि इस दिन माँ सरस्वती की पूजा करने से स्कूल में नये नये पढने वाले बच्चो पर माँ का आशीर्वाद रहता है इसलिए इस दिन को विद्या के लिए बहुत ज्यादा शुभ माना जाता है | महाराष्ट्र में लोग नया घर खरीदने के लिए भी इस दिन को बहुत शुभ मानते है | | यहा पर एक सामजिक उत्सव सिलंगण का आयोजन भी इस दिन होता है जिसमे गाँव के सभी लोग नये कपड़े पहनकर गाँव के दुसरी ओर जार्क शमी वृक्ष के पत्तो को अपने गाँव लाते है | एक पौराणिक कथा के अनुसार शमी वृक्ष के पत्तो को स्वर्ण से जोड़ा गया है | इन शमी वृक्ष के पत्तो को स्वर्ण के रूप में लोग एक दुसरे को देकर इस पर्व का आनन्द लेते है |

कश्मीर का दशहरा :--

वैसे तो कश्मीर में हिन्दुओ की संख्या बहुत कम है फिर भी यहा पर अल्संख्यक हिन्दू इस पवित्र त्यौहार को अपने अलग ही अंदाज में मनाते है | यहाँ के लोग नवरात्रि के दिनों में केवल पानी पीकर ही उपवास करते है | यहा के हिन्दू परिवार खीर भवानी माता में बहुत आस्था रखते है और इस दिन माता के दर्शन को बहुत शुभ मानते है | यहाँ के लोगो का मानना है कि दशमी के दिन जो तारा उगता है उस समय विजय मुहूर्त माजा जाता है जो सभी कार्यो को सफल करता है इसलिए उस विजय मुहूर्त के तारे के नाम पर इसे विजयादशमी कहते है |
 
इन सबके अतिरिक्त विदेशो में भी विजयादशमी का त्यौहार बड़ी उमंगो और धूमधाम से मनाते है  | नेपाल में नौ दिन तक माँ काली और माँ दुर्गा की पूजा की जाती है और दशहरे वाले दिन राज दरबार में राजा अपनी प्रजा को अबीर ,दही और चावल का तिलक लगाते है  | श्रीलंका ,चीन ,मलेशिया और इंडोनेशिया में भी अपने अपने रीति  रिवाजो से अनुसार यह पर्व मनाने की परम्परा है |
                 

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

विभिन्न राज्यों में नवरात्रि !


                      भारतीय हिन्दू समाज में जितने पर्व और त्यौहार मनाये जाते हैं , उनमें नवरात्रि का  विशिष्ट स्थान है।  नवरात्रि शक्ति की उपासना का पर्व है।  शक्ति ही सृष्टि का निर्माण करती है , उसका पालन  करती है और उसका संहार भी करती है।  इसीलिए देवी शक्ति को सर्वोपरि माना गया है।  शक्ति ही महालक्ष्मी , महासरस्वती और महाकाली के रूप में जानी  जाती हैं। नवरात्रि में इन्हीं व्यक्त महाशक्तियों की आराधना की जाती है। 
                     नवरात्रि भी वर्ष में दो बार मनाई जाती है।  प्रथम वासंतिक नवरात्रि - जिसके प्रथम दिन से नवसंवत्सर आरम्भ होता है और वह हिंदी पंचांग के नववर्ष का प्रारम्भ कहा जाता है।  दूसरी नवरात्रि आश्विन मास में होती हैं , जिन्हें  शारदीय नवरात्रि कहा जाता है।  नवरात्रि का अर्थ है नौ रातों तक नौ रूपों में देवी दुर्गा की आराधना। शक्ति की उपासना का पर्व प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि , नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जाता है।  सर्वप्रथम श्री रामचंद्र जी ने इस शारदीय नवरात्रि की पूजा का आरम्भ समुद्र तट  पर किया था और विजय प्राप्त की। दशमी को विजयादशमी इसी लिए मनाई जाती है क्योंकि इस दिन श्रीरामचंद्र्र जी ने रावण का वध किया था।  
  भारत के सभी राज्यों में नवरात्रि का पर्व विभिन्न तरीकों से इसे मनाया जाता है।   इस समय नौ दिनों तक महिलाएं एवं पुरुष व्रत रखते  हैं।घर पर व्रत का खाना बनता है और सभी इसका आनंद उठाते हैं। दुकानों में  के व्रत दौरान खाए जाने वाले खाध पदार्थों की भरमार होती है। सजे धजे मंदिरों में पूजा ,भजन,कीर्तन ,जगराता होता है। कुल मिलाकर हर शहर का वातावरण उत्सव के रंग में रंगा होता है ।  हां पूजा के रस्मों में अंतर अवश्य होता है।  

                    उत्तरप्रदेश , मध्य प्रदेश और बिहार :--उत्तर भारत के इन राज्यों लगभग समान रूप से पूजा की जाती है और इसके नौ दिन नौ देवियों के नाम को समर्पित होते हैं।  पहले दिन कलश की स्थापना कर देवी का आह्वान किया जाता है और क्रमशः प्रथम - शैलपुत्री , द्वितीय- ब्रह्मचारिणी , तृतीय चंद्रघंटा , चतुर्थ - कूष्माण्डा , पंचम स्कंदमाता , षष्ठ - कात्यायनी , सप्तम - कालरात्रि , अष्टम - महागौरी , नवम - सिद्धिदात्री देवियों के नाम से पूजन और इनके मन्त्रों का जप भी किया जाता है। 
               नवरात्रि  में प्रथम दिन ही कलश स्थापना की जाती है और अखंड ज्योति जला कर रखी जाती है, जो नौ दिनों तक लगातार जलती रहती है।  व्रत रखने वाले शुद्धता से साथ अधिकतर भूमि शयन करते हैं।  अष्टमी या नवमी के दिन पूजन, हवन के बाद व्रत का परायण किया जाता है। 
                 नवरात्रि में अष्‍टमी और नवमी के दिन निकलने वाले ज्वारों पर भक्तों की अटूट आस्था है। माना जाता है कि ज्वारों में सांग लगवाने से मन्‍नतें पूरी होती है। कानपुर में ज्वारों का अलग ही महत्व है। यहां पर बच्चे, बड़े और महिलाएं जुलूस में शामिल होकर सांग* लगाकर देवियों के मंदिर जाते हैं , कानपुर में सिद्ध देवी मंदिरों के दरबार में जाते हैं। नवरात्रि  के पर्व पर शहर के सभी जगहों से ज्वारे निकलते हैं। इसमें कुछ लोग तो 40 सालों से ज्‍वारे निकाल  रहे हैं। लोगों का मानना है कि ज्वारे में शामिल होने मात्र से लोगों की सभी मन्नतें पूरी हो जाती हैं।

क्‍या होता है ज्‍वारा -  नवरात्रि के पहले दिन मिट्टी के घड़े में जौ डालकर ज्वारे बोए जाते हैं। इसमें नौ घड़े होते हैं और जहां पर ज्वारे बोए जाते हैं, वहा पर शुद्ध जल का कलश भी रखा जाता है। इस कलश के ऊपर नौ दिनों तक ज्‍योत जलाई जाती है। नवमी के दिन महिलाएं माता के दरबार के लिए ज्वाराअपने सर पर रख कर मंदिर की और प्रस्थान करती हैं और उनके साथ गाजे बाजे भी होते हैं।   बच्चे-पुरुष सांग लगवाते हैं।
                 इस क्षेत्र में नवरात्रि के व्रत में सब अपनी अपनी श्रद्धा के अनुरूप पूजा और व्रत करते हैं।  कुछ लोग निर्जल नौ दिन का व्रत  करते हैं और कुछ लोग सिर्फ एक लौंग खाकर रहते हैं।  फलाहारी व्रत अधिकतर लोग रखते हैं।समय और श्रद्धा के अनुसार कुछ लोग एक समय व्रत रह कर शाम को एक बार खाना ग्रहण कर लेते हैं।  नवरात्रि के पुरे नौ दिन कन्याओं की कुछ लोग विशेष पूजा करते हैं।  उनको घर बुला कर उनके पैर धोकर और टीका लगा कर पूजा करके भोजन कराते  हैं और दक्षिणा देकर उनको विदा करते हैं।
               इसके अतिरिक्त नवरात्रि में रामचरित मानस का पाठ भी नवाह्न परायण के अनुसार नौ दिन में रामायण का सम्पूर्ण पाठ पूर्ण कर लेते हैं।
तमिलनाडु
दक्षिण के इस राज्य में नवरात्रि  का त्यौहार अलग  अंदाज में मनाया जाता है। नवरात्रि  की नौ रातें देवी दुर्गा ,देवी लक्ष्मी एवं देवी सरस्वती को समर्पित हैं।अय्यर  समुदाय की महिलाएं शाम को सुहागिनों को अपने घर पर बुलाती हैं तथा सुहाग की निशानियां जैसे चूड़ी ,कान की बाली आदि उपहार में देती हैं। एक नारियल , पान ,सुपारी एवं रूपये भी इन महिलाओं को दिये जाते हैं। मसूर और अन्य दालों से बने विशेष व्यंजन आमंत्रित लोगों के लिए प्रतिदिन बनता है। कुछ लोग घर में गोलू बनाते हैं।गोलू में अस्थाई रूप से नौ सीढ़ी बनाई जाती है जिस पर सजावटी सामान , देव देवी की मूर्तियां रखी जाती हैं। यह मूर्तियां पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं 
आंध्र प्रदेश 
                                 यहां नवरात्रि  के दौरान विशेषकर तेलंगाना क्षेत्र में  बटुकम्मा पाण्डूगा मनाया जाता है।  इसका अर्थ देवी मां का आह्वान  करना है। महिलाएं बटुकम्मा तैयार करती हैं। इसमें मौसमी फूलों की सात परतें होती हैं। यह देखने में फूलों का फूलदान जैसा लगता है। तेलगू में बटुक का अर्थ है जीवन और अम्मा का अर्थ है मां। इस दौरान महिलाएं सोने के जेवर और सिल्क की साड़ी पहनती हैं। बटुकम्मा बनाने के बाद महिलाएं शाम को रस्म निभाती हैं। बटुकम्मा को बीच में रखकर देवी शक्ति  को समर्पित गीतों पर नृत्य करती हैं। इसके बाद बटुकम्मा का विसर्जन पानी में कर दिया जाता है।
केरल
                 यहां अंतिम तीन दिन ही नवरात्रि  मनाई जाती है अष्टमी ,नवमी एवं विजया दशमी। केरल में शिक्षा प्रारंभ करने के लिए इन तीन दिनों को शुभ माना जाता है। अष्टमी के रोज किताबें और वाद्य यंत्र देवी सरस्वती के समक्ष  रखकर उसकी पूजा का जाती है। ऐसा ही बसंत पंचमी के दिन पश्चिम बंगाल में होता है । दशमी के दिन किताबों को निकालकर पढ़ा जाता है। 
कनार्टक
                  कर्नाटक में नवरात्रि मनाने की परंपरा आज भी पुरातन काल से चली आ रही है  , उसे ही मानते हैं। सन  1610 ई..में राजा वाडयार के समय से यह त्यौहार मनाया जाता है। विजयनगर साम्राज्य में जिस तरह से नवरात्रि  मनाई जाती थी आज भी यहां के लोग उसी तरह से इसे मनाते हैं। अधिकांश स्थानों की तरह यहां भी नवरात्रि  मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय के रूप में मनाई जाती है।महिषासुर मैसूर का निवासी था। मैसूर का दशहरा विश्व प्रसिद्ध है।आज भी यहाँ पर भव्य तरीके से मनाया जाता है। यहां सड़क पर सजे धजे हाथियों का जुलूस निकलता है।इसके अलावा प्रदर्शनी और मेले तो आम बात है।
गुजरात
                यहां धरती पर जीवन का स्रोत मां के गर्भ का प्रतीक मिटटी का कलश नवरात्रि  का मुख्य आकर्षण है। कलश में पानी ,सुपारी एवं चांदी का सिक्का डाला जाता है। सबसे ऊपर एक नारियल रखते हैं। महिलाएं इसके चारों ओर नृत्य करती हैं। इसे ही गरबा कहते हैं। डांडिया रास भी गुजरात में नवरात्रि  का आकर्षण है।गुजरात में नवरात्रि  के दौरान गरबा महोत्सव का आयोजन किया जाता है। पारंपरिक गुजराती ड्रेस में सजे लड़के-लड़कियां जोड़े के साथ गरबा पंडालों में गीत-संगीत की धुन पर डांस करते हैं। गरबा पंडालों को खासतौर पर सजाया जाता है।   इस महोत्सव के दौरान देवी  दुर्गा की आराधना की जाती है। गरबा में हिस्सा लेने के लिए लोग खास तौर पर तैयारी करते हैं। करीब एक महीने पहले से ही ट्रेनिंग क्लास ज्वाइन करते हैं। आजकल गरबा का क्रेज देश के कई शहरों में बढ़ता जा रहा है।
महाराष्ट्र
            यहां के निवासियों के  लिए नवरात्रि  नई शुरूआत करने का समय है जैसे नया घर ,नया वाहन इत्यादि खरीदना। महिलाएं एक दूसरे को अपने घर पर आमंत्रित करती हैं और उन्हें नारियल ,पान ,सुपारी भेंट करती हैं। सुहागिनें एक दूसरे के माथे पर हल्दी-कुमकुम लगाती हैं।महाराष्ट्र विशेषकर मुम्बई में नवरात्रि  गुजरात जैसा ही मनाया जाता है। प्रत्येक इलाके में गरबा और डांडिया खेला जाता है और सभी इसका भरपूर मजा लेते हैं।
हिमाचल प्रदेश
                यहां का नवरात्रि  अनोखा है। नवरात्रि  में यहां के लोग रिश्तेदारों के साथ मिलकर पूजा करते हैं। अन्य राज्यों में जब यह पर्व खत्म होता है तब यहां कुल्लू दशहरा प्रारम्भ होता है। यह भारतवर्ष की शान है। लोग भक्ति  को व्यक्त करने के लिए नाचते गाते हैं। दशमी के दिन मंदिर  की मूर्तियों का जुलूस निकाला जाता है। 
पंजाब
        यहां के निवासी पहले सात दिन व्रत रखते हैं। यहां जगराते  विशेष महत्व मन जाता है। जगराते  का अर्थ है  - पूरी रात जागकर देवी के भजन गाना। अष्टमी के दिन व्रत तोड़ने के लिए नौ कुमारी कन्याओं को भोजन कराया जाता है । भंडारे में पूरी , हलवा और भिगोकर और फिर चने को चौंक कर खिलाया जाता है ।कन्याओं को लाल चुनरी उपहार में दी जाती है। इन कन्याओं को कंचिका  भी कहते हैं । नवरात्रि  पूरे देश में मनाई जाती है। मनाने की विधि में अंतर है। परंतु पूजा हर जगह पर देवी के शक्ति  रूप की ही होती है और लोगों का जोश ,उमंग और उल्लास भी एक जैसा ही होता है।
पश्चिम बंगाल 
                बंगाल में दुर्गा पूजा की तैयारियां काफी पहले ही शुरू हो जाती हैं। यहां पंचमी से दुर्गोत्सव की शुरुआत होती है। महाकाली की नगरी कोलकाता में तो पांच दिनों तक श्रद्धा और आस्था का ज्वार थमने का नाम ही नहीं लेता है बल्कि पूरे साल में सबसे उत्साह से इसे मनाने की तैयारी करते हैं।
                  पूजा के इन चार दिनों में सभी लोग खुशियां मनाते हैं। जिस प्रकार लड़की विवाह के बाद अपने मायके आती है, उसी प्रकार बंगाल में श्रद्धालु इसी मान्यता के साथ यह त्योहार मनाते हैं कि दुर्गा मां अपने मायके आई हैं।
               दुर्गोत्सव से पहले तो देवी मां की सुन्दर और मनोहारी मूर्तियां बनाई जाती हैं। प्रमुख रूप से कोलकाता के कुमोरटुली नामक स्थान पर कलाकार मूर्तियों को आकार देते हैं। बंगाली मूर्तिकार द्वारा देवी दुर्गा के साथ साथ लंबोदर गणेश, सरस्वती, लक्ष्मी और कार्तिकेय की भी मूर्तियां बनाई जाती हैं। देश के बहुत से प्रांतों में बंगाली मूर्तिकारों की खूब मांग रहती है। यहां निर्मित मूर्तियां देश के अन्य स्थानों के साथ ही दुर्गा पूजा के लिए कोलकाता में विशाल पंडाल सजाए जाते हैं। शहर और दूर गांवों से आकर शिल्पकार पंडालों का निर्माण करते हैं। इन भव्य पंडालों को बनाने में आने वाली लागत लाखों रुपए में होती है। वहां के निवासी इन दिनों खूब खरीदारी करते हैं। 

                    फुटपाथ पर लोग सजावट की बहुत सारी सामग्री बेचते हैं। दुकानों से लेकर शॉपिंग मॉल तक हर जगह भीड़ का रेला दिखाई पड़ता है। सभी अपनी-अपनी पसंद की चीजें खरीदते हैं। लोग अपने परिजनों, संबंधियों को वस्त्र आदि उपहार स्वरूप देते हैं। विजयादशमी के दिन मां का विसर्जन होता है।
                      कुल मिला कर सम्पूर्ण देश में चाहे वह किसी भी भाग में हो , नवरात्रि शक्ति स्वरूपा देवी के लिए ही मनाया जाता है और सभी में पूर्ण श्रद्धा और भक्ति का भाव भरा होता है। 
 *सांग : या लोहे का भरी सा भाला जैसा होता है , जिसे सांग लेकर चलने वाले अपने एक गाल से डालते हुए मुंह के अंदर से दूसरे गाल से निकाल कर चलते हैं।  भारी होने के कारण दोनों तरफ लोग उसे भाले को हाथों का सहारा देते हुए चलते हैं।  यह लोग ज्वारों के साथ साथ चलते हुए मंदिर तक जाते हैं।