www.hamarivani.com
श्रद्धांजलि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
श्रद्धांजलि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

बाबूजी की 21वीं पुण्यतिथि !



                        20 अक्टूबर 1991 - वह दिन था जिस दिन बाबूजी (ससुर जी ) ने भी हमें अकेले छोड़ दिया था . शायद कोई ऐसा दुर्भाग्यशाली होगा जिसने अपने दोनों पिताओं को सिर्फ 2 माह 10 दिन के अंतर से खो दिया हो . मैं हूँ न - जिसने खोया है . 

                    कुछ तो ऐसा होता है जिसके लिए हम उनके जाने के बाद भी याद करते हैं। मेरे बाबूजी बड़े ही सिद्धांतवादी थे। उन्होंने जीवन भर कानपुर के बड़े सरकारी अस्पताल में फार्मासिस्ट की नौकरी की और ऐसे विभाग में रहे जहाँ उनके साथियों ने अपने कार्यकाल में ही बड़ी बड़ी कोठियां खड़ी कर ली और वे रिटायर्मेंट के बाद समय के अन्दर क्वार्टर खाली कर किराये के मकान  में आ गए अपने लिए एक मकान  भी नहीं बनवा  सके थे।
                   लड़कियों के जन्म को लेकर आज नहीं बल्कि ये परंपरा तो पुराने समय से चली आ रही है कि एक दो तक ठीक है लेकिन उससे अधिक तो घर वाले हाय तौबा मचाने लगते थे। मेरे बाबूजी के कोई बेटी न थी बस दो बेटे थे , सो मेरी जेठानी को जब पहली बेटी हुई तो सारे  घर में खुशियाँ इतनी मनाई गयीं कि  जैसे कोई लाटरी खुल गयी हो। उसके बाद दूसरी बेटी लेकिन बाबूजी ने कभी ये नहीं कहा कि  फिर बेटी आ गयी। दोनों उनके लिए जान से प्यारी थी। फिर मेरी शादी हुई और मेरी भी पहली बेटी हुई - हम विश्वविद्यालय कैम्पस में रहते थे . जिसने सुना चुप लगा गया कोई बाबूजी से पूछने भी नहीं आया . बाबूजी बोले -  'अरे पोती मेरे घर आई है सब लोगों को साँप क्यों सूंघ गया?  ' उन्होंने उसी धूम धाम से मुंडन किया सबको बुलाया . फिर कुछ साल बाद मेरी दूसरी बेटी।  बाबूजी ने अपने दिल में भले ही सोचा हो लेकिन कभी हम लोगों से इस बारे में एक शब्द नहीं कहा . जो बच्ची सबसे छोटी होती उनकी "रानी रानी " होती और सुबह उठ कर लाओ हमें दे जाओ हम जरा उससे बातें करेंगे . वह बोल न पाती हो बाबा जी उससे बतियाते रहते और हम अपने काम कर डालते . 
इसके कुछ साल बाद फिर मेरे जेठानी जी को बेटी हुई। हमारे परिवार में 5 बेटियां हो गयीं और लोगों ने हमें ताने दिए लेकिन उन्होंने कभी कुछ भी नहीं कहा।  हमारा संयुक्त परिवार रहा और जो आज भी हैं, भले ही अब परिवार के नाम पर सारे  बच्चे बाहर  या शादी हो चुकी है हम चार लोग भर है। तब भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस एक दिन बोले - 'तुम लोग कितना कमाओगे ? चिंता मत करना ये लक्ष्मी है,  हो सकता है कि इनके भाग्य से हम कमा  रहे हैं। ' जब पेंशन लेने जाते छुटकी के लिए खिलौने और बाकी लोगों के लिए कुछ न कुछ लेकर आते। ऐसा नहीं वे बच्चियों को जान देते तो बच्चे भी उन्हें बहुत प्यार करते  - उनके कैंसर के आखिरी स्थिति में मेरे पति ने बच्चों को बता दिया था कि ' अब बाबा ज्यादा दिन नहीं रहेंगे।  ' छोटों की बात जाने दीजिये मेरी जेठानी की बड़ी बेटी जो उस समय हाई  स्कूल में पढ़ रही थी एकदम चुप हो गयी थी और जब इन्हें अकेले में पाती  तो कहती ,' चाचा प्लीज बाबा को बचा लीजिये न। ' उसकी बात सुनकर हम लोग भी रो देते थे। 
बाबा और मेरी छोटी बेटी प्रियंका 


                      मेरी बड़ी  बेटी ने उनके न रहने के बाद  उनके डेन्चर को फेंकने नहीं दिया। मम्मी सब बाबा को ले गए इसको नहीं ले जाने देंगे . ये मेरे पास रहेगा और वह आज भी एक डिब्बे में सहेजा रखा है। अगर उन्होंने अपनी पोतियों को इतना प्यार दिया तो वे भी उन्हें बहुत प्यार करती थी । ये सब बातें होती हैं जो हमें अपने बुजुर्गों से जोड़ कर रखती हैं। 
                     मैं उन्हें शत शत नमन करती हूँ और कहती हूँ कि  लड़कियों के प्रति ईश्वर  हर इंसान में ऐसी ही भावना भरे . 

रविवार, 25 मार्च 2012

एक खामोश देशभक्त !

ये लेख पुराना है लेकिन इस क्रांतिकारी को नमन करने के लिए हम इतिहास नहीं बदल सकते हें। बस हम उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हें।

आज २५ मार्च उनकी पुण्य तिथि है. वह खामोश क्रांतिकारी - बहुत शोर शराबे से नहीं बने थे. उन्हें मूक क्रांतिकारी के नाम से भी जाना जा सकता है. अपने बलिदान तक वे सिर्फ कर्म करते रहे और उन्हीं कर्मों के दौरान वे अपने प्राणों कि आहुति देकर नाम अमर कर गए.
वे इलाहबाद में एक शिक्षक जय नारायण श्रीवास्तव के यहाँ २६ अक्तूबर १८९० को पैदा हुए. शिक्षक परिवार गरीबी से जूझता हुआ आदर्शों के मार्ग पर चलने वाला था और यही आदर्श उनके लिए संस्कार बने थे. हाई स्कूल की परीक्षा प्राइवेट तौर पर पास की और आगे की शिक्षा गरीबी की भेंट चढ़ गयी. करेंसी ऑफिस में नौकरी कर ली. बाद में कानपुर में एक हाई स्कूल में शिक्षक के तौर पर नौकरी की.
वे पत्रकारिता में रूचि रखते थे, अन्याय और अत्याचार के खिलाफ उमड़ते विचारों ने उन्हें कलम का सिपाही बना दिया. उन्होंने हिंदी और उर्दू - दोनों के प्रतिनिधि पत्रों 'कर्मयोगी और स्वराज्य ' के लिए कार्य करना आरम्भ किया.
उस समय 'महावीर प्रसाद द्विवेदी' जो हिंदी साहित्य के स्तम्भ बने हैं, ने उन्हें अपने पत्र 'सरस्वती' में उपसंपादन के लिए प्रस्ताव रखा और उन्होंने १९११-१३ तक ये पद संभाला. वे साहित्य और राजनीति दोनों के प्रति समर्पित थे अतः उन्होंने सरस्वती के साथ-साथ 'अभ्युदय' पत्र भी अपना लिया जो कि राजनैतिक गतिविधियों से जुड़ा था.
१९१३ में उन्होंने कानपुर वापस आकर 'प्रताप ' नामक अखबार का संपादन आरम्भ किया. यहाँ उनका परिचय एक क्रांतिकारी पत्रकार के रूप में उदित हुआ. 'प्रताप' क्रांतिकारी पत्र के रूप में जाना जाता था. पत्रकारिता के माध्यम से अंग्रेजों की खिलाफत का खामियाजा उन्होंने भी भुगता.
१९१६ में पहली बार लखनऊ में उनकी मुलाकात महात्मा गाँधी से हुई, उन्होंने १९१७-१८ में होम रुल मूवमेंट में भाग लिया और कानपुर कपड़ा मिल मजदूरों के साथ हड़ताल में उनके साथ रहे . १९२० में 'प्रताप ' का दैनिक संस्करण उन्होंने उतारा. इसी वर्ष उन्हें रायबरेली के किसानों का नेतृत्व करने के आरोप में दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गयी. १९२२ में बाहर आये और पुनः उनको जेल भेज दिया गया. १९२४ में जब बाहर आये तो उनका स्वास्थ्य ख़राब हो चुका था लेकिन उन्होंने १९२५ के कांग्रेस सत्र के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया.
१९२५ में कांग्रेस ने प्रांतीय कार्यकारिणी कौंसिल के लिए चुनाव का निर्णय लिया तो उन्होंने स्वराज्य पार्टी का गठन किया और यह चुनाव कानपुर से जीत कर उ. प्र. प्रांतीय कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य १९२९ तक रहे और कांग्रेस पार्टी के निर्देश पर त्यागपत्र भी दे दिया. १९२९ में वह उ.प्र. कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष निर्वाचित हुए और १९३० में सत्याग्रह आन्दोलन ' की अगुआई की. इसी के तहत उन्हें जेल भेजा गया और ९ मार्च १९३१ को गाँधी-इरविन पैक्ट के अंतर्गत बाहर आये.
१९३१ में जब वह कराची जाने के लिए तैयार थे. कानपुर में सांप्रदायिक दंगों का शिकार हो गया और विद्यार्थी जी ने अपने को उसमें झोंक दिया. वे हजारों बेकुसूर हिन्दू और मुसलमानों के खून खराबे के विरोध में खड़े हो गए . उनके इस मानवीय कृत्य के लिए अमानवीय कृत्यों ने अपना शिकार बना दिया और एक अनियंत्रित भीड़ ने उनकी हत्या कर दी. सबसे दुखद बात ये थी कि उनके मृत शरीर को मृतकों के ढेर से निकला गया. इस देश की सुख और शांति के लिए अपने ही घर में अपने ही घर वालों की हिंसा का शिकार हुए.
उनके निधन पर गाँधी जी ने 'यंग' में लिखा था - 'गणेश का निधन हम सब की ईर्ष्या का परिणाम है. उनका रक्त दो समुदायों को जोड़ने के लिए सीमेंट का कार्य करेगा. कोई भी संधि हमारे हृदयों को नहीं बाँध सकती है.'
उनकी मृत्यु से सब पिघल गए और जब वे होश में आये तो एक ही आकार में थे - वह था मानव. लेकिन एक महामानव अपनी बलि देकर उन्हें मानव होने का पाठ पढ़ा गया था.
कानपुर में उनकी स्मृति में - गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक चिकित्सा महाविद्यालय और गणेश उद्यान बना हुआ है. आज के दिन उनके प्रति मेरे यही श्रद्धा सुमन अर्पित हैं.