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सोमवार, 21 जून 2010
उ. प्र. में बी टी सी का यथार्थ !
आजकल मैं भी और माँओं की तरह से वर की खोज करने में लगी हूँ और जब भी अखबार का matrimonial देखती हूँ. तो खासतौर पर हिंदी पेपर में आज कल लड़की की योग्यता में एक लाइन अक्सर देखने को मिल जाती है - 'विशिष्ट बी टी सी को प्राथमिकता' .
सबसे पहले तो मैं ये बता दूं कि ये विशिष्ट बी टी सी है क्या? उ. प्र. में बी. एड . करने वालों की संख्या इतनी हो चुकी थी कि उनको जॉब नहीं मिल पा रही थी तो यहाँ की सरकार ने सब बी. एड. डिग्री धारियों को एक अल्प प्रशिक्षण के बाद विशिष्ट बी. टी. सी. का नाम लेकर प्राथमिक विद्यालयों में नियुक्त करने का प्रावधान किया है. अब ये बी एड धारी गाँव में पढ़ाने के उद्देश्य से तो पढ़े नहीं थे और न ही इसके इच्छुक होते हैं लेकिन फिर भी सरकारी नौकरी के मजे तो सभी को पता हैं और फिर क्यों इधर उधर भटकें सो इसी में लाइन में लग जाओ . आज नहीं तो कल नौकरी पक्की हैं.
इनमें से अधिकतर लोग जुगाड़ वाले होते हैं और फिर अगर जुगाड़ न चली तो और रास्ते खोज लेते हैं. जिसकी पोस्टिंग हो गयी जाकर वहाँ ज्वाइन जरूर कर लेंगे और फिर शुरू होती हैं इसकी हकीकत से दो चार होना.
इस बार बी टी सी के आवेदन पत्र भरने वालों में २० प्रतिशत वे हैं जो कि एम बी ए, एम सी ए. , बी एम एस, बी ए एम एस और बी टेक हैं. ये आंकड़े क्या दर्शाते हैं कि हमारे यहाँ शिक्षा का व्यापारीकरण इतना हो चुका है कि कुकुरमुत्तों कि तरह खुलते जा रहे इंजीनियरिंग कॉलेज, मैनेजमेंट कॉलेज, मेडिकल कॉलेज ने शिक्षा कि उपयोगिता पर प्रश्न चिह्न लगा दिए हैं.
हम इस दिशा से आ रहे बी टी सी करने वाले लोगों से क्या ये अपेक्षा कर सकते हैं कि वे गाँव में जाकर गरीब बच्चों को पढ़ाएंगे और सही शिक्षा दे पायेंगे. कभी नहीं, वे सिर्फ सरकारी नौकरी के लालच में ऐसा करने के लिए इच्छुक हैं. जहाँ कोई पुरसाहाल नहीं होता, आप हफ्तों स्कूल न जाएँ - चाहे जब चले जाएँ या न जाएँ - हाँ जब निरीक्षण हो तो आप उपस्थित हो जाएँ आपका रिकार्ड एकदम सही रहेगा.
और हम ऐसे शिक्षकों से आशा भी क्या कर सकते हैं?
कितने पैसे भर कर उन्होंने प्राइवेट संस्थायों से ये उपाधियाँ ली होंगी?
कितने सपने इतने सालों तक उनके मन में सजे रहे होंगे? लम्बे पॅकेज और बढ़िया कंपनी में जाने का सपना, किसी बड़े शहर में रहकर नौकरी करने का सपना, दो चार साल के बाद विदेश जाने का सपना, बढ़िया कार और बंगले में रहने का सपना.
एकाएक सब छोड़ कर बी टी सी करके नौकरी करने का निर्णय - जिसमें न पढ़ने वालों का कोई स्तर और न स्कूल का. हाँ एक सुरक्षित भविष्य का सपना जरूर है. चाहे जाएँ या न जाएँ हर महीने मोटी पगार तो बैंक में जाने वाली है.
इस उपाधियों के लेने के लिए उन्होंने बड़े शहर में रह कर ही पढ़ाई की होगी , फिर अब गाँव और वह भी कभी कभी तो एकदम सड़क से बहुत दूर , जहाँ पर सवारी भी उपलब्ध नहीं है , नौकरी करने क्यों जायेंगे? कैसे तैयार कर रहे हैं उस काम के लिए. क्योंकि उनको यह पता है कि बस पोस्टिंग लेनी हैं बस फिर सब अपनी मर्जी.
कुछ उदाहरण - मेरी एक बहुत खास बी एस सी और कंप्यूटर में डिप्लोमा के बाद अचानक बी टी सी करने चली जाती हैं क्योंकि उनके ससुर उसी इलाके में मास्टर साहब हैं और फिर नियुक्ति भी मास्टर साहब के अनुकूल ही मिल गयी. ये सर्वविदित हो गया कि ये मास्टर साहब की बहू हैं आये या न आयें उपस्थिति तो लग ही जानी हैं . फिर कभी कभी जाना पड़े तो शहर की रहने वाली लड़की कैसे गाँव की नौकरी पर समय से पहुंचे. उनके पतिदेव स्कूल पहुँच कर प्रार्थना करवा देते हैं और बच्चों को बिठा देते हैं और वे बाद में तैयार होकर पहुँच जाती तो पतिदेव घर आ जाते.
दूसरे महिला भी मेरे बहुत करीब लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि ये पोल मैं ही खोलने वाली हूँ. वे पति के साथ पुणे में रहती हैं और नौकरी उनकी यहाँ चल रही है. कैसे? उन्होंने अपनी जगह एक बेकार युवती को नियुक्त कर दिया है और उसको २-३ हजार रुपये हर महीने दे देती हैं . खुद महीने में एक बार आकर पूरे महीने के हस्ताक्षर करके चली जाती हैं. हाँ बाकी काम वह लड़की संभाल लेती हैं. इनकी तरह से एक नहीं कईयों लड़कियाँ और लड़के हैं जो ठेके पर अपना काम करवा रहे हैं और खुद वेतन उठा रहे हैं. सौदा क्या बुरा है? २-३ हजार दे भी दिए तब भी १५ तो अपनी जेब में आ ही रहे हैं. कुछ जरूरत हुई तो विभाग में खिला पिला दिए.
अब हर जगह ये किसी तरह से बी टी सी में हो जाये, फिर तो भविष्य सुरक्षित. लेकिन ये सुरक्षित भविष्य क्या देश के भावी भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहा है. ये यथार्थ है उ. प्र. कि बी टी सी की.
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