www.hamarivani.com
beti aur ham लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
beti aur ham लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

कन्या त्याज्य है तो क्यों?

                     



                              कई घटनाएँ एक सुदृढ़ और विचारणीय विषय को जन्म देती हैं. आज सुबह ही खबर पढी - नवप्रसूता अपनी बेटी को जन्म देकर अस्पताल में छोड़ कर भाग गयी. इसने कुछ लिखने पर मजबूर कर दिया और उसमें और ऐसी कई घटनाएँ जुड़ गयीं. 
--नर्सिंग होम के कूड़ेदान में बच्ची मिली.
--चलती ट्रेन से दुधमुंही बच्ची को फेंका.
--मंदिर की सीढ़ियों पर बच्ची मिली.
--सड़क के किनारे झाड़ियों में बच्ची मिली.
--स्टेशन पर बच्ची को छोड़ कर माँ बाप लापता. 
                   इन सबसे बेहतर तो वे हैं जो किसी अनाथालय , या फिर ऐसी ही संस्थाओं के पलने में डाल दी जाती हैं. कम से कम उनके सड़क पर कुत्ते के नोचने या जानवरों के खाने से मौत का डर तो नहीं रहता . कम से कम माँ बाप की निष्ठुरता पर उतना बड़ा प्रश्न चिह्न तो नहीं लगता. ऐसे माँ बाप तो जल्लाद से भी गए गुजरे होंगे जिनकी  फूल सी बच्ची को फेंकते हुए आत्मा नहीं काँपी
                     इन बच्चियों के गुनाहगार सारे बेपढ़े नहीं हैं बल्कि बेपढ़े तो ईश्वर की देन मानकर सीने से लगाये रहते हैं. यही तो कहा जाता है कि ४-४ लड़कियाँ हैं. वे हत्या का पाप तो नहीं लेते. इन मासूम बच्चियों के माँ बाप या घर वाले वे हैं जिन्हें बेटी नहीं चाहिए   थी और  बेटी ने जन्म ले लिया तो छोड़ कर चल दिए. बेचारी आते ही दहेज़ और लम्बी चौड़ी मांगे जो करने लगती हैं और बेटे पैदा होते ही दहेज़ लेकर पैदा होते हैं. लड़कियों को त्यागने की एक वजह सिर्फ और सिर्फ दहेज़ ही बनती जा रही है. कुलदीपक की चाह में तो बेटियाँ अधिक हो सकती हैं और फिर ये भी है कि तथाकथित घर वाले पोते या बेटे के बिना घर आने की हिदायत देकर जो भेजते हैं तो फिर बेटी लेकर वे घर कैसे जा सकती हैं? जब कि लड़कियों की जरूरतें लड़कों से कम ही होती हैं, लड़कियाँ परिवार  के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं, परिवार की जरूरत पड़ने पर पूरी जिम्मेदारी संभाल लेती हैं. (अपवाद इसके भी हैं कभी ये काम बेटे भी बखूबी निभा लेते हैं.) 
                   इसका विकल्प सोचना होगा की इन त्याज्य बेटियों के लिए क्या किया जा सकता है. निःसंतान होना आज भी हमारे समाज में अभिशाप माना जाता है और न भी माना जाय तो कोई भी दंपत्ति ऐसा नहीं होगा जिसे जीवन में बच्चे होने की ललक न हो. बच्चों की किलकारियों से कितने घर वंचित हैं, जहाँ रोशनी कभी होती ही नहीं है, अँधेरे घर में उदास से बैठे  दंपत्ति अकेले कैसे जीवन गुजारते हैं ? इसका दर्द उनसे ही पूछा जा सकता है. बाँझ की मुहर लगाये कितनी स्त्रियाँ आज भी कहीं न कहीं उपेक्षा झेलती रहती हैं. उनके दर्द को शायद इन माँ बाप ने देखा ही नहीं है.  वे कभी कुत्ते पाल कर , कभी बिल्ली पाल कर अपना दिल बहलाया करते हैं. इंसान का बच्चा उनके नसीब में नहीं होता है. इन त्याज्य बेटियों का विकल्प यही है कि इनको किसी दंपत्ति को दे दिया जाय. उन माँ बाप से ही गुजारिश है कि वे बच्ची को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दें. भले ही वे अपनी पहचान न बताये, अनाथ कहकर उसे सुरक्षित स्थान पर पहुंचाएं. एक पाप जो आप उसको त्यागने का कर चुके हैं उसके जीवन रक्षा के लिए सुरक्षित स्थान पर पहुंचना उस पाप का थोड़ा सा प्रायश्चित किया  सकता है. अगर वे अनाथालय में भी पल जायेंगी तो सृष्टि का विनाश होने से तो बच जायेगा. नहीं तो कोई न कोई सूनी गोद उनको ले ही जाएगी. 
                        कभी सोचती हूँ कि कैसे कोई माँ अपनी संतान को ऐसे अनाथ छोड़ कर जा सकती है. शायद सब एक जैसे नहीं होते हैं. ये विषय बहुत पुराना हो चुका है लेकिन जब तक एक भी बेटी इस तरह से सड़क पर, अस्पताल में या कूड़ेदान में पड़ी मिलती रहेगी ये विषय पुराना नहीं होगा. जीवन का नाश कोई मजाक नहीं है. बेटियों की हिफाजत अगर न की गयी तो फिर ये सृष्टि ही खत्म होने लगेगी. सिर्फ बेटों से सृष्टि नहीं चलती और नहीं तो फिर ये सृष्टि ही रसातल में चली जाएगी. 
                   . 

बुधवार, 29 सितंबर 2010

इतिहास की पुनरावृत्ति !

                        क्या हमें फिर से अतीत के इतिहास को दुहराने का जरूरत आ पड़ी है. इस विषय को नहीं छूना चाह रही थी लेकिन आज की इस घटना ने झकझोर दिया. अब इंसां की वहाशियत ने हदें पर कर दीं हैं और वह भी आँखों के सामने जब देखा तो रोना आ गया उस माँ के रोने पर जिसने बेटी को स्कूल ही तो भेजा था पढ़ने के लिए और लौट कर तो उसे बेटी की लाश ही मिली और वह भी दरिंदों की नोची हुई अपनी बेटी की लाश.
                       कानपुर नगर - अब अखबारों में इस काम के लिए बहुत चर्चित हो रहा है. कुछ दिन पहले एक नामी गिरामी डॉ. के नर्सिंग होम के आई सी यूं में भर्ती एक लड़की के साथ बलात्कार के बाद इंजेक्शन लगा कर उसे मौत की नीद सुला दिया गया क्योंकि एक दिन पहले ही उसने अपने माँ बाप से कहा था कि मुझे यहाँ से निकाल ले चलो नहीं तो मैं नहीं बचूंगी और नर्सिंग होम वालों ने छुट्टी नहीं दी. दूसरे ही दिन उन्हें बेटी के लाश मिल गयी.
                      पुलिस बलात्कार के जरूरी साक्ष्य भी नहीं जुटा पाई , पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट से पुष्टि के बाद साक्ष्य कहाँ से लाये? यद्यपि संचालिका अभी जेल में हैं लेकिन उन पर लगी धाराएँ पुलिस बदल कर हल्की कर रही है क्योंकि मालदार पार्टी है और बेटी किसी गरीब की.
                       कल स्कूल गयी १० वर्षीया दिव्या को लहूलुहान हालत में स्कूल कर्मियों द्वारा घर छोड़ा गया और जब माँ उसे अस्पताल ले गयी तो डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया. उस बच्ची के साथ जो व्यवहार किया गया है उसने अब तक के सारे वहशीपन के रिकार्ड तोड़ दिए थे. डॉक्टर खुद हतप्रभ थे कि इस नन्ही सी बच्ची के साथ क्या हुआ है?  डाक्टरी रिपोर्ट के अनुसार जो समय तय है उस समय बच्ची स्कूल में थी.
                       ये समाज क्या चाहता है , पहले तो इन मासूमों को होने से पहले ही ख़त्म करने की साजिश रची जाती है और अगर वह दुनियाँ में आ भी गयी तो दोयम दर्जे के व्यवहार का शिकार हो जाती है. अब तो उनकी उम्र का भी कोई लिहाज नहीं  बचा क्या फिर से बाल विवाह की प्रथा शुरू कर दी जाय या फिर उनकी शिक्षा को बंद कर दिया जाय. कोई भी माता पिता अपने बेटी के साथ साए की तरह से नहीं रह सकता है. उसको घर की देहलीज तो लांघ कर बाहर निकलना ही पड़ेगा.
                       पहले यही होता था न, कि किसी की सुन्दर बेटी पर अगर बूढ़े जमींदार की नजर भी पड़ गयी या सुल्तान की नजर पड़ गयी तो उसकी जिन्दगी उसकी नजर हो जाती थी. इसी लिए तो बेटियों को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था या फिर जल्दी शादी करके उसको ससुराल वाली बना दिया जाता है और तब भी वह कम उम्र में ही माँ बनने के अभिशाप से ग्रसित होकर मृत्यु के मुँह में चली जाती थी. नसीब उसका मृत्यु  ही होती थी. या फिर बाल विधवा बनकर लोगों की इस गलत नजर का शिकार होकर अपनी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष करती फिरती थी.
                         अब हमारे पास क्या रास्ता है? क्या करें हम? बेटियों को सिर्फ सीने से लगा कर रखे और विदा कर दें. अगर उनको घर से बाहर निकालेंगे तो फिर किसी वहशी की नजर न पड़ जाए. किसका विश्वास करें-- डॉक्टर, पड़ोसी, रिश्तेदार, स्कूल, रिक्शेवाला, बसवाला और फिर शिक्षक ? अगर किसी का नहीं तो फिर ये कौन सा जीवन जीने की हक़दार हैं?  इस बात को मैंने अपने एक लेख में पहले भी जिक्र किया था कि अब लड़कियों को खुद में इतना सक्षम बनाना होगा कि वे अपनी सुरक्षा खुद कर सकें. उनको मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग आरम्भ से देने की जरूरत अब आ पड़ी है. इसको स्कूल के स्तर पर ही अनिवार्य करना होगा. कम से कम वे संघर्ष कर अपना बचाव तो कर सकें. ये वहशी दरिन्दे कुछ भी नहीं सिर्फ मानसिक बीमारी से ग्रसित होते हैं. ये मनोविज्ञान की भाषा में सेडिस्ट होते हैं. दूसरे को कष्ट देने में इनको सुख मिलता है और इस बीमारी से ग्रसित लोग खुद बहुत मजबूत नहीं होते हैं. अब हर स्तर पर ये लड़ाई लड़ने की जरूरत है. बच्चियों को पूरी सुरक्षा मिले और उससे आप घर में भी स्कूल के माहौल के बारे में जानकारी लेती रहें. क्योंकि इस तरह के लोग किसी न किसी तरीके से बच्चियों पर पहले से ही नजर रखते हैं और मौका पा कर ऐसा कृत्य कर बैठते हैं.
                   घर में अच्छे संस्कार सिर्फ लड़कियों को ही देने की जरूरत नहीं होती है बल्कि अपने लड़कों को भी अच्छे संस्कार दें ताकि वे सोहबत में भी ऐसे घिनौने कामों में लिप्त न पाए जाएँ. अपने घरों से शुरू करेंगे तो बहुत से घर इस स्वस्थ माहौल को बनाने में सक्षम होंगे. हम अपने स्तर पर प्रयास कर सकते हैं और फिर पूरे समाज को सुधारना तो सबके वश में ही है क्योंकि ये वहशी भी किसी माँ बाप के बेटे होते हैं और पता नहीं उनको कम से कम कोई माता पिता तो ऐसी शिक्षा नहीं दे सकता है हाँ उनकी सोहबत ही उन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकती है.