www.hamarivani.com

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

ये बौखलाए हुए नेता जी !

                            ये लोकसभा चुनाव न हुए लगता है कि सारे दलों के नेता बौखला उठे हैं।  उनको सिर्फ और सिर्फ संसद में अपना बहुमत चाहिए चाहे इसके लिए वे अपने देश की महिलाओं को सूली पर चढ़ा दें या फिर उनकी इज्जत की धज्जियाँ उड़ाने वालों के लिए नए क़ानून बना कर उन्हें देश के रक्षकों में स्थान दे दें। 
               संसद में महिलाओं को ३३ % आरक्षण के विषय पर सबसे अधिक विरोध आप ही कर रहे थे न।  यही सपा महिलाओं को आदर देती हैं।   इस कदर बौखलाए हुए हैं कि सिर्फ एक ही पार्टी नहीं बल्कि सभी में रोज नए नए वक्तव्य सामने आते चले जा रहे हैं।  चुनाव की आचार संहिता को ताक पर इसलिए रख चुके हैं क्योंकि कहाँ तक प्रतिबन्ध लगाएगा  चुनाव आयोग ? एक बोलेगा तो दूसरा समर्थन करेगा और तीसरा पीठ थपथपाने के लिए तैयार खड़ा है।  
                              बस वो नहीं मैं ही सबसे अच्छा का नारा लिए हुए शहर शहर भाग रहे हैं।  सीधे सीधे काम न चला तो दूसरों के चरित्र पर कीचड उछाल कर अपने को अच्छा सिद्ध करने की चाल चलने लगे।  ये आज भी बिना पढ़े लिखे और पिछड़े इलाके लोगों के बल पर अपनी राजनीति करना चाहते हैं और नयी पीढ़ी को ऐसे लुभावने तोहफों का लालच देकर उन्हें अपने तरफ करना चाह रहे हैं . ये वही नेताजी हैं जिन्होंने अपने शासन काल में उत्तर प्रदेश में छात्रों को नक़ल करने की अनुमति देकर उनके खिलवाड़ किया था।  ऐसे बच्चों से किस भविष्य की वे कामना कर रहे थे।  फिर तो उन्हें ऐसे बच्चों को नौकरी भी लैपटॉप की तरह से बांटने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए, हो सकता है की युवा वर्ग उनके झांसों में आकर उन्हें बहुमत दिला दे. इन्होने साफ साफ कहा था कि आपके शहर से हमें जीत नहीं मिली तो आपको बिजली क्यों दी जाय ? जो एक प्रदेश के स्तर पर मुखिया होने पर ऐसा बोल सकता है वो देश का मुखिया बन कर क्या करेगा? सोच सकते हैं जिसकी सोच इतनी महान हो ? उससे देश को गर्त में जाना है।  वो इतने जिम्मेदार पद को संभालने की क्षमता रखता ही नहीं है। 

                                 उनका कहना की सपा सबसे अधिक महिलाओं का आदर करती हैं बिलकुल नेता जी - तभी आप ने अपनी पहली पत्नी के रहते हुए दूसरी शादी की थी।  सबसे बड़ी मिसाल है आपके आदर देने की।  दूसरी मिसाल आप दे रहे हैं कि उनकी इज्जत से खेलने वालों के लिए माफी लाने का कानून बनाएंगे क्योंकि लड़कों से कभी कभी गलतियां हो जाती हैं।  कभी कभी नहीं बल्कि आपके शासन काल में उत्तर प्रदेश में अख़बार में प्रतिदिन ४-६  दुष्कर्म के सामने आ रहे हैं और  अधिकतर राजनैतिक रसूख वालों की छत्रछाया में पालने वाले लोग होते हैं।  आप ऐसे वक्तव्य देकर क्या साबित कर रहे हैं ? अगर भटके हुए लोगों के मत आप को मिल जाएंगे तो आधी आबादी आपको सिरे से नकार देगी।  
                                  आप सारे  आम धमकी देते हैं की अगर सपा को नहीं जिताया तो शिक्षक बनाने का सपना देखना भूल जाएँ।  हम उस अध्यादेश को वापस ले लेंगे।  नेता जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मालूम है कि आपके हाथ की कठपुतली है लेकिन आपकी ये बयानबाजी कहीं महँगी न पड़ जाय। अगर आप जैसे लोग सरकार बनाने लगेंगे तो जरूर ही देश का भविष्य अंधकार में डूबने वाला है क्योंकि जहाँ नेता में शालीनता , समदृष्टि और देश के प्रति प्रतिबद्धता न हो वह देश तो क्या एक प्रदेश चलने के काबिल भी नहीं समझा जा सकता है।  
                 आप तो अपने अपराधों की स्वीकारोक्ति खुले आम कर रहे है - 

  ऐसे नेता जो अपने को संविधान का रक्षक घोषित कर रहे हैं खुद को सेकुलर बताते हैं किस तानाशाह की बराबरी करने में कम दिख रहे हैं . उनकी इस स्वीकारोक्ति ने उन्हें निर्दोषों की हत्यारा घोषित कर रही है।  ऐसे लोगों को देश की बागडोर चली गयी तो सिर्फ वाही जीवित रह पाएंगे जो नेता जी के गुण गाएंगे। 
                                      उम्र के इस पड़ाव पर अमर सिंह जी कह रहे हैं कि देखो देखो हेमा मालिनी देखने की चीज हैं।  आप चुनाव के लिए प्रचार कर रहे हैं या फिर किसी नौटंकी में जुमला उछाल रहे हैं। देखने की चीज तो हर इंसान होता है बस उसमें वैसे गुण  होने चाहिए। जयाप्रदा जी भी देखने की चीज है , अपने समय में फिल्मों में एक खूबसूरत अभिनेत्रियों में से रही हैं।  उनके लिए भी ये जुमला बोला होता।  
                                       अपने अपने दल का प्रचार कीजिये न किसी पर कीचड उछालिये और न अपशब्दों का प्रयोग कीजिये।  जिन्हें बताने के लिए आप यह सब सुनते हैं वो मतदाता अपना बुद्धि विवेक रखता है।  आज हर वर्ग जागरूक है चिंता न कीजिये।  आप लोग खरीदते रहे और मतदाता बिकते रहे नतीजा ये है कि देश  कौड़ियों  के मोल बिकने की कगार पर आ गया।  
                                      वैसे मैं बता दूँ मेरी किसी भी नेता से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है लेकिन सब कुछ अपनी आँखों से देखते हुए कुछ न कर पाने की विवशता इंसान को पागल बना देती है।  अभी हमारे इलाके में रामनवमी पर दंगा होने की स्थिति बन गयी और उसमें किसकी क्या भूमिका थी ?  लेकिन प्रशासन ने सब कुछ दबा दिया और दोष निर्दोषों के सर मढ़ दिया और उन्हें अंदर कर दिया।  सच्चाई किसने और किससे पूछी है ? सब चुप हैं वे भी जिन्होंने अपने को खोया है।  कहीं न अखबार न समाचार में उसका कोई जिक्र नहीं और तो और वे खुल कर रो भी नहीं सके क्योंकि प्रशासन गला दबाने के लिए तैयार जो खड़ा है।  
                                  

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

दहशत के बीच : दोषी कौन ?

                        हम इस इलाके में पिछले २४ साल से रह रहे हैं और जब यहाँ आये थे तब भी एक तरफ मुस्लिम बाहुल्य इलाका था और दूसरी और मिले जुले लोग रहते हैं और हम बड़ी शांति से रह रहे थे।  वर्षों से यहाँ ताजिए उठते हैं तो साथ में हिन्दू जाते हैं और रामनवमी के रथ के साथ मुस्लिम भी होते हैं।  कभी इसमें साउंड बॉक्स हिन्दू ले कर जाते हैं और कभी मुस्लिम।  कभी कोई शिकायत नहीं थी।  एक दूसरे के सुख में हम शामिल भी होते रहे हैं।  चाहे उनके यहाँ गम हो या ख़ुशी या हमारे यहाँ।  
                        फिर अचानक इतने सालों के बाद परसों एकदम क्या हुआ कि यहाँ पर रामनवमी की शोभा यात्रा ख़राब सड़क के कारण  दूसरी सड़क से ले जा रहे थे तो एक बुजुर्ग सज्जन रास्ते में लेट गए कि हम यहाँ से ये जुलूस  नहीं निकलने देंगे क्योंकि हमारे ताजिये यहाँ से गुजरते हैं और दूसरे कई लोग जुलूस के पीछे की तरफ से रास्ता रोक रहे थेकि यहाँ से वापस नहीं गुजरने देगें । फिर पत्थरबाजी और मकानों से गरम पानी नीचे लोगों के ऊपर फेंकने लगी घरों की महिलायें।  फिर हालात बिगड़ने में देर  कहाँ लगती है ? यद्यपि कुछ पुलिस के सिपाही उस रथयात्रा के साथ थे लेकिन वे अपर्याप्त थे। खबर आग की तरह तेजी से पूरे इलाके में फैल गयी और वह भी फैलते फैलते  कुछ से कुछ बन गयी । खबर उस जुलूस में दो बच्चों की हत्या तक पहुँच चुकी थी और सारा इलाका सन्नाटे में था।  अफवाह फैलाने के लिए अब तो हमारे पास मोबाइल का सबसे तेज साधन भी है और आप उसे पकड़ भी नहीं सकते हैं।   आनन फानन में पुलिस के आला अफसर डी एम , एस पी सब आकर स्थिति को सम्भालने में लग गए।  उनके रहते भी उस दिन जहाँ भी मौका मिला गरीबों की दुकाने जला दी गयीं।  जानते हैं किन लोगों की -- एक विकलांग जो साइकिल के पंचर जोड़ कर अपना परिवार पाल रहा था।  उसकी दुकान बांस के टट्टर के नीचे लगा रखी थी . एक गरीब ने बैंक से कर्ज लेकर बक्शे बनाने की दुकान खोल रखी थी , अपनी दो बेटियों के साथ घर में चैन से रह कर नमक रोटी ही सही खा रहा था ।  पुलिस की एक गाड़ी में आग लगा दी। 
                        हम इस दहशत में जी रहे थे - क्योंकि घर के पुरुष लोग अपने काम से बाहर ही थे।  सबको आगाह  किया गया कि दूसरे रास्ते से आइये लेकिन आना तो अपने घर ही था न।  जब तक घर पहुंचे नहीं जान गले में अटकी थी और आने पर बताया कि थोड़ी दूर पर जोर की आग भड़क रही थी।  उस समय तो अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था कि किसी गरीब के पेट बुझाने के साधन धू धू कर जला दिए थे।  

                         इस के पीछे कौन है ? एक फेरी वाला , कबाड़ वाला , या फिर रोज के रोज कमाने वाले लोग क्या ऐसे कदम उठा सकता है ? नहीं इनको भड़काने वाले और इनके पीछे के मास्टर माइंड कोई और हैं।  आखिर ये लोग चाहते क्या हैं ? एक दिन गुजर गया और पुलिस के साये में पूरा का पूरा इलाका जी रहा था और फिर देखिये हिम्मत पुलिस की तलाशी के दौरान उन पर बम फोड़े गए।  पथराव किया गया , डीएम तो बाल बाल बच गयी लेकिन वे भी अपने दायित्व के साथ वहाँ पर डटी ही रहीं।  दूसरे दिन भी छुटपुट वारदात होती रहीं। दुकाने भी जलाई गयीं और बमबाजी भी की गयी।   वो सड़कें जो सारे दिन गुलजार रहती थीं सुनसान रहीं।  कोई सब्जी वाला नहीं , दूध की गाड़ी नहीं और मार्किट ही नहीं बल्कि छोटी बड़ी दुकानों के साथ बाज़ार बंद कर दी गयीं।  १४४ धारा लगा दी गयी।  
                           ये चुनाव के पहले दहशत फैलाने से किसका फायदा होने वाला है ? ये जातिवाद की आग भड़काने वाले कौन हैं ? स्थानीय लोग तो बिलकुल भी नहीं है।  जरूरी सेवाओं वाले लोग घर में नहीं बैठ सकते हैं - फिर उनके घर वाले कैसे रह रहे हैं ? स्थिति नियंत्रण में है , लेकिन हमारे मन नियंत्रण में कब रहते हैं ?  हम एक दूसरे के लिए अपने मन में एक छुपा हुआ शक देख रहे हैं।  एक चोर हमारे मन में है कि कहीं दूसरा इसमें हमें भी तो दोषी नहीं समझ रहा है ? हम कब इन दंगों से मुक्त हो पाएंगे और ये अराजकतत्व कब तक गरीबों के मुंह से निवाला छीनने की साजिश रचते रहेंगे ? नहीं मालूम फिलहाल अभी भी स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में होने की घोषणा कर रही है।  

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

मतदाता इच्छापत्र !

                                        
 

           देश इस समय एक परिवर्तन के मोड़ पर , परिवर्तन की आस में खड़ा है और इस परिवर्तन के परिवर्तक बनेंगे  - हमारे देश के मतदाता।  वर्षों से देश की स्थिति जैसी चल  रही है , उससे आम आदमी या कहिये देश का मतदाता जो कभी कपडे, पैसे या अन्य भौतिक चीजों से खरीद लिया जाता था -  अब जागरूक हो चूका  है। सत्तारूढ़ दल अपनी उपलब्धियों को बढ़ाचढ़ा कर गिना रहे हैं , उनकी पोल मतदाता जान रहा है  इसी लिए वे मन ही मन घबराये हुए हैं।  कुछ दलों की हवा भरते ही फुस्स हो गयी , उनके वादे और इरादे अब समझने की जरूरत ही नहीं रह गयी है।  जो विपक्षी हैं, वे अपने को काबिल समझाने  की कोशिश कर रहे हैं जैसे मतदाता ६७ सालों में उन्हें समझ नहीं पाया है।  फिर भी लोकतंत्र है तो सरकार तो इन्ही दलों में से किसी की बनानी पड़ेगी फिर  हम मतदाता उनके घोषणा पत्रों के साथ अपना इच्छा पत्र उनके सामने रखें और पूछें कि क्या उनमें से कोई भी हमारे इच्छा पत्र को सम्मान देगा या फिर इसको पूरा करने का वादा करता है?  अगर हाँ तो फिर हम उसे चुनने को राजी हैं --
१. चुनाव में अपने घोषणा पत्र में दिए गए आश्वासनों को वे कितने दिनों में पूरा करने का वादा करते हैं।  कहीं सब्ज बाग़ दिखा करआगे  एक बार और चुनने का अवसर  तो नहीं चाहिए । 
२. आरोपी नेताओं को पार्टी से हटाने के बारे में उनके क्या विचार हैं ?
३. हर बड़ी पार्टी के पास अपनी संपत्ति करोड़ों में है , उसे देश में आयी किसी भी विपत्ति पर कितने प्रतिशत व्यय करने के लिए प्रतिबद्ध हैं ? 
४. सांसदों और विधायकों के लिए शिक्षा और आयु सीमा निश्चित की जानी  चाहिए। 
५ महिला आरक्षित सीट पर सुयोग्य महिला को टिकट मिलना चाहिए न कि बिहार की तरह बागडोर पत्नी  थमा कर पीछे से पतिदेव हांक रहे हैं।  
६. नेताओं के परिवार के किसी न किसी सदस्य को सेना में जरूर जाना चाहिए तभी ये सैनिकों के घर वालों के मन की उहापोह और विकलता को अनुभव कर पाएंगे और अनर्गल बयानबाजी कभी नहीं करेंगे। 
७. जिस क्षेत्र से ये चुनाव लड़े वहाँ पर इन्हें संसद सत्र के दिनों को छोड़ कर कुछ दिनों रहना अनिवार्य किया जाय और जन समस्याओं को सुनने का समय देना होगा।  
८. उनके घोषणा पत्र के किसी भी घोषणा के पूर्ण न होने पर उस विषय में मतदाता को उनसे सवाल पूछने का अधिकार होना चाहिए।  
९. उनके पद का लाभ सिर्फ उनकी पत्नी और नाबालिग बच्चों को प्राप्त होना चाहिए बालिग़ और आत्मनिभर बच्चों को सांसद या विधायक कोटे का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
१० जो जन प्रतिनिधि है - वह सिर्फ व्यक्तिगत तौर पर चुने गए हैं अतः उनको प्राप्त सरकारी सुविधाओं का वहन  सिर्फ वही करेंगे। 
११. सांसद निधि या विधायक निधि प्राप्त होने के बाद उसको विकास कार्यों में लगाने की समय सीमा तय की जाए और कार्यों की प्राथमिकता तय की जाय न कि शहर की सड़कें खस्ता हाल हैं और सुंदरीकरण के लिए करोड़ों की धनराशि जारी कर दी जाय। 
१२. स्थानीय मूलभूत आवश्यकताओं के प्रति उन्हें उत्तरदायी माना जाएगा।  
 १३.  अपने कार्यकाल में उनकी बढती हुई संपत्ति का उन्हें व्योरा देना होगा कि किन स्रोतों से ये धन बढ़ा है और उसके लिए वे नियमानुसार आयकर दे रहे हैं या नहीं।  
१४.  किसी भी अपराधिक मामले में वे अपने प्रभाव का  अपराधी को छुड़ाने के लिए प्रयोग नहीं करेंगे और अगर ऐसा होता है तो मतदाता स्थानीय लोगों के चरित्र से भलीभांति परिचित होता है तो माननीय के लिए भी कोई धारा  निश्चित होनी चाहिए।
१५. सरकार या नेता जो दल हित या फिर अपने समूह ( सांसद , विधायक ) हित के लिए क़ानून में परिवर्तन कर विधेयक लाते हैं तो उस पर किसी न किसी तरीके से मतदाताओं की राय जाननी होगी।  कोई भी विधेयक जनप्रतिनिधि होते ही उनकी मर्जी से नहीं थोपा जाएगा।  
१६  लोकतंत्र के तीनों स्वतन्त्र स्तम्भ एक दूसरे का सम्मान करेंगे - कई मामलों में सर्वोच्च न्यायलय के निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए सत्तारूढ़ दल के प्रयास से पहले जनमत संग्रह का कोई उपाय खोज कर आगे की प्रक्रिया की जाय। 
१७. जो दल के वरिष्ठ नेता है , उन्हें एक समय के बाद नए लोगों को राजनीति  के लिए प्रशिक्षित कर उन्हें अवसर देने के लिए स्थान स्वयं छोड़ देना चाहिए न कि विद्रोह के स्वर सुनाई देने लगें। सत्तामोह से दूर रहकर भी देश हित में कार्य हो सकता है। 
१८. दलबदल में विश्वास रखने वाले नेताओं को कभी भी विश्वनीय नहीं समझा जाएगा।  
१९  ग्लैमर की दुनियां के सितारों को मतदाता के मध्य लाकर खड़ा करने वाले दल उनके लिए विश्वास दिलाएंगे कि वे खास लोग जनप्रतिनिधि बनेंगे तो ये सारे नियम उनपर भी लागू होने।  उनके छवि को भुना कर संसद में सीटों पर काबिज नहीं होंगे। 
२०. सांसदों की संसद में उपस्थिति पर भी नियमानुसार कार्यवाही होगी।  सरकारी सेवाओं के नियमों  के अनुसार ही निश्चित अनुपस्थिति का प्रावधान रखा जाएगा उसका उल्लंघन करने पर उत्तर देना होगा।  

                              इच्छाओं का कोई अंत नहीं है लेकिन मतदाताओं की इच्छानुसार ही ये तैयार किया है।  इसके आगे और बहुत सी बातें हैं लेकिन एक आम मतदाता - घरेलु महिलायें , छात्र , दुकानदार , श्रमजीवी वर्ग की इसमें सहमति  है। वे बड़ी बड़ी बातें नहीं जानते लेकिन अपने दैनिक जीवन से जुडी बातें जानते हैं और ऐसे लोगों से हर पांच साल बाद दो चार होते हैं।    

मंगलवार, 25 मार्च 2014

अरब देशों का भम !

                                 अपने घर की आधी रोटी परदेश की पूरी से भली ! ऐसी बातें मैंने बचपन से सुनी हैं और आगे जीवन में अनुभव भी करने लगी लेकिन सिर्फ अपने देश में ही  इसको अनुभव किया।  जैसे जैसे उम्र और अनुभव के साथ साथ सरोकार का दायर बढ़ना शुरू हुआ तब पता चला कि विदेश जाने का चस्का लोगों को किस लिए होता है ? सिर्फ कमाई के लिए - उच्च शिक्षा लेकर भी लोग वहीँ  पर रहना पसंद करने लगे।  मेधा पलायन के रूप बनकर फिर ये हर जगह दिखलाई देने लगा।
                               मेरे घर के आसपास में वर्तमान समय में एक वर्ग विशेष का बाहुल्य है और करीब हर परिवार के  एक या दो बेटे अरब देश में है और वहाँ से पैसे  कमा कर घर  भेज रहे हैं और   परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है।  इस  परिदृश्य से और युवाओं का इस ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है क्योंकि देश में जो सामाजिक , राजनैतिक और आर्थिक हालत है - उससे वे उतनी उन्नति की उम्मीद नहीं कर पाते हैं और वे भी ऐसे स्रोतों के द्वारा अरब देशों में जाकर ढेरों धन कमाने की आकांक्षा में वहाँ चले जाते हैं लेकिन वहाँ पर उन्हें बंधुआ मजदूर बना दिया जाता है।  वे अकुशल , अर्धशिक्षित या फिर अशिक्षित युवा वहाँ की मृग मरीचिका में फंस जाते हैं।  वहाँ पर काम देने से पहले उनके सारे प्रमाणपत्र जिनमें शिक्षा , पासपोर्ट और वीजा सब कुछ जब्त कर लिया जाता है।  उनको सिर्फ खाने और पीने की व्यवस्था के जाती है और वह भी कार्य प्रदान करने वाले की मर्जी के अनुसार होती है।  न भर पेट खाना और न सोने देना।  अधिक से अधिक काम लेने का प्रयास किया जाता है।  वहाँ पर बाहर से आये हुए युवकों के लिए को सुरक्षात्मक क़ानून नहीं होते और न ही उसके बारे में इन जाने वालों को कोई जानकारी होती है।
                                इस आशय की खबरे अख़बार में पढ़ रही  हूँ , वह सिर्फ मैं ही क्यों सभी लोग पढ़ रहे हैं लेकिन इसके विरुद्ध आवाज को धार  देने की जरूरत है।  कोई युवक किसी तरह से जागरण अखबार के ऑफिस में फ़ोन करता है और इस बारे में सब कुछ बयान किया जो वहाँ रह रहे युवक झेल रहे हैं।  फिर दूसरे दिन खबर ५ युवकों को जिन्दा गाड़ दिया गया।  उनको पहले इतना मारा गया कि वे मरणासन्न हो गए और फिर उनको दफन कर दिया गया।  ये खबरें कभी एक या दो सामने आती हैं वह भी कब ? जब कि किसी भी तरीके से वह ऐसी खबरे चुपचाप दे पाते  हैं। 
वे युवक कौन थे?
उनके घर वालों को इस विषय में कुछ भी पता है या नहीं ?
उन्हें ले जाने वाला या फिर उनको यहाँ से भेजने वाला इसके लिए कितना जिम्मेदार है ?
उनके बारे में कौन पता लगा पायेगा ?
                             ये अरब देश ही है जहाँ पर बड़ी संख्या में अकुशल श्रम , घरेलू  काम या फिर छोटे मोटे काम के लिए  नौकरी का प्रलोभन दे कर वहाँ भेजा या बुलाया जाता है।  हम सिर्फ पैसे की चकाचौध तो देखते  हैं और वह भी औरों के घरों में, लेकिन उसकी वास्तविकता के बारे में नहीं जानते क्योंकि कुछ को कहते हुए सुना है कि घर की चोरी  और परदेश की भीख  बराबर है यानि कि अगर अपनी झूठी  शान को बरकरार भी रखना है और अपने काम के विषय में किसी को पता भी नहीं लगना चाहिए।  अगर सरकार इसा दिशा में क़ानून बनाती जा रही है तो उन कानूनों को  ताक पर रख कर चोरी छिपे लोगों को भेजने के काम में कम लोग सम्मिलित नहीं है।  कितनी बार समूह में बच्चों को ले जाते हुए लोग पकड़े जाते हैं ( जिनमें लड़कियां भी शामिल है ) . गरीब घरों से उनके बच्चों और बच्चियों को झांसा देकर लोग ले जाते हैं कुछ रुपये पेशगी लेकर फिर उन बच्चों के विषय में जानकारी मिलना भी मुश्किल होता है।  वे बच्चे कहाँ गए ? इसको जानना बहुत मुश्किल होता है और इसा विषय में कोई भी जानकारी नहीं दी जाती है।  
                             इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ गरीबी और अशिक्षा होती है और उसका फायदा ऐसे लोग उठा रहे हैं।  इस भ्रम को तोड़ने के लिए और जाने के लिए जरूरी जानकारी प्राप्त करने के अधिकार के विषय में ऐसे लोगों को जागरूक बनाना होगा।  

                                

रविवार, 23 मार्च 2014

शहीद दिवस !

                     
          शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ,   
       वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा !


                       भगत सिंह , सुख देव और राजगुरु  -- आजादी के इन दीवानों ने खुद को होम कर दिया और उनकी आहुति की तपन से ही अंग्रेजों के इरादे जल कर राख हुए , वह बात और है कि इन मरने वालों को श्रेय कितना दिया जाता है ? नहीं जानते हैं कि इस वर्ष चुनाव की आंधी में उड़ रहे नेताओं को ये सुधि भी होगी कि नहीं आज जिस चुनाव में वे जीतने का सपना देख रहे हैं उस की जमीन जिन्होंने तैयार की थी -- वे आज के दिन ही फाँसी चढ़ा दिए गए थे . उनको  श्रद्धा से स्मरण  करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए गर्व महसूस होता है कि हम उस जमीन पर रहते हैं जहाँ पर ऐसे देशभक्त हुए हैं।  

        आज के दिन किसी भी अखबार में देखा कि किसी मंत्रालय ने या किसी सरकार ने इन तीनों वीरों भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव की शहादत के दिन को याद करते हुए कुछ ही शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित की हो। हाँ एक अख़बार "अमर उजाला " में जरूर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा दिया गया एक श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए तीनों के चित्र सहित मिला।  ये पत्र पत्रिका में कुछ संवेदनशील लेखक और मीडिया इसको याद कर लेती हें . हो सकता है कि हमारे सांसदों और विधायकों को ये पता भी न हो कि आज के दिन को शहीद दिवस कहा क्यों जाता है? आने वाले समय में हमारी भावी पीढ़ी इस बात को बिल्कुल ही याद नहीं कर पायेगी क्योंकि कभी स्कूलों में ऐसे दिन कोई याद करने जैसी बात तो होती ही नहीं है कि प्रारंभिक कक्षाओं में ही बच्चों को शिक्षक इन शहीदों के बलिदान दिवस पर कुछ मौखिक ही बता में भी कभी लघु कथा के रूप में और कभी पूरे पाठ के रूप में देश के इन शहीदों की कहानी होनी चाहिए। इस देश की स्वतंत्रता के इतिहास के ये नायक गुमनाम न रह जाएँ।
इन्होने किस जुल्म में अपने को फाँसी पर चढ़ा दिया ये भी तो बच्चों को पता होना चाहिए। कहीं ये सब कालातीत तो नहीं हो चुका  है । ऐसा विचार मेरे मन में क्यों आया? क्योंकि अब तो  पब्लिक स्कूल की संस्कृति में ऐसा कुछ बताने की जरूरत नहीं समझी  जाती है।  उनके बलिदान को जब हम भूल रहे हैं तो फिर आने वाले समय में इतिहास से वह पन्ने कब निकल कर रद्दी का हिस्सा बन  जाएगा कोई नहीं जानता। हम जो यह सब जानते हैं इस विरासत को अपने घर के बच्चों को जरूर बताएं।  देश के प्रति और हमारी स्वतंत्रता के लिए बलिदान करने वालों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि  यही होगी। 


सोमवार, 25 नवंबर 2013

अंतर्राष्टीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस २५ नवम्बर !

             सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि महिला हिंसा आज इतने विकराल रूप में सामने आ रही है कि  विश्व  पटल पर लाने वाली समस्या बन  खड़ी हो चुकी है . बड़े बड़े प्रगतिशील देश , आधुनिकता और समानता  हुंकार भरने वाले देश और इसी के लिए आगे बढ़कर भाषण देने वाले बड़े बड़े लोग इस काम को करने में पीछे नहीं रहते हैं।
                         डॉक्टर , वकील , जज , नेता, साधू-संत और मंत्री तक महिला हिंसा में लिप्त पाये जा रहे हैं।  ऐसा तब हो रहा है जब कि हमारे जैसे देश की नारी चुप रहना अधिक पसंद करती है कि व्यर्थ में उसकी ही बदनामी होगी।  वह चुपचाप सब कुछ सहती रहती है।  ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ गाँव , गरीब और अशिक्षित महिलाओं के बीच होने वाली भावना है बल्कि ये बड़े बड़े परिवारों में , अच्छा खासा कमाने वाली , समाज में अपना एक अलग रुतबा रखने वाली , उच्च  शिक्षित महिलायों के साथ भी हो रहा है . वह अपने संस्कारों के चलते , अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए और फिर पति की प्रतिष्ठा को ठेस लगेगी - ये सब  सोच कर सारी  हिंसा सहन करती रहती है।
                        महिला  हिंसा से मतलब सिर्फ शारीरिक हिंसा नहीं  है बल्कि बल्कि इसके अंतर्गत आती कई स्थितियां और जिनको आज भी नारी सह रही है क्योंकि हमारा समाज भी इस हिंसा को सहते रहने वाली महिला को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखता है और इसमें पुरुषों से अधिक महिलाएं भी शामिल होती है।  ये जरूरी नहीं कि महिला हिंसा सिर्फ ससुराल में , पति से या  कार्यक्षेत्र में ही सह रही हो।  वह सिर्फ महिला होने के भी रूप में भुगत सकती है।
                       महिला हिंसा  अंतर्गत किसी भी प्रकार की हिंसा या प्रताड़ना को शामिल किया गया है फिर चाहे  वह शारीरिक , मानसिक , भावात्मक या फिर आर्थिक किसी भी रूप में  क्यों न हो ? उसे महिला हिंसा ही कहा जाएगा। हमारे समाज की जो भावनाएं महिलाओं के प्रति है , वे कितनी ही प्रगतिशील होने के दावे का ढिंढोरा क्यों न पीटें , वह इसमें सबसे पहले कारक बनती हैं। हमारी सामाजिक व्यवस्था ( पता नहीं कौन इसके जिम्मेदार  है ?) प्रताड़ित , परित्यक्त , तलाकशुदा , संतानहीन या फिर सिर्फ लड़कियों की माँ के प्रति अपना एक अलग रुख रखता है।  इस काम के लिए जिम्मेदार भी वही है और फिर महिला आयोग , महिला संगठन के प्रति लोगों के विचार सुने हैं - वे इनको महिलाओं को भड़काने वाला ,  घर तोड़ने वाला और समाज विरोधी करार देते हैं।  क्योंकि औरत की अपनी कोई पहचान नहीं होती - वह तो जिस कुलबहू बनती है उसी कीबन जाती है उसी के नाम से जानी जाती है।  फिर उसका अपना स्वतन्त्र अस्तित्व कहाँ है ?
                        हम विश्व की नहीं सिर्फ भारत की बात करें तो आज भी ३५ प्रतिशत महिलायें ( इसमें बचपन से लेकर बात की जा रही है ) अपने माता-पिता के घर में भी हिंसा का शिकार होती हैं।  एक तो जन्म से ही उनको परिवार में दोयम दर्जे का स्थान देना अभी भी ८० प्रतिशत परिवारों की परंपरा में शामिल है। लड़कों की तुलना में उनकी जो उपेक्षा होती है वह उनको भावात्मक रूप से आहात करती है।  बड़े होने पर भी शिक्षा की दृष्टि से उनकी शिक्षा पर कम खर्च करने की सोची जाती है।  घर के अंदर के कामों में साडी जिम्मेदारी उनके सिर पर डाल  दी जाती है। उनके जन्म से ही परिवार वाले ही नहीं बल्कि  दूसरे लोग भी पराया धन , परायी अमानत कह कर परिचय करते हैं।
                    इस महिला हिंसा को सहने के लिए मजबूर क्यों है आज की नारी क्योंकि हमारी सामाजिक व्यवस्था और उसकी आर्थिक परतंत्रता या फिर अगर वह कमाती भी है तो जरूरी नहीं कि वह अपनी कमाई को अपने मन से खर्च कर ले।  ऐसा नहीं है कि आत्मनिर्भर महिलायें को प्रताड़ित नहीं किया जाता।  अभी तक तो एक सोच थी कि ज्यादातर घरों में काम करने वाली महिलाओं के पति ही उनके पैसे छीन कर उनको प्रताड़ित करते हैं लेकिन ऐसा नहीं है -  नौकरी वाली लड़की से शादी करना पसंद करते हैं क्योंकि उनके घर में दोहरी कमाई आएगी और एक कामधेनु उन्हें मिल रही होती है लेकिन कुछ घरों में तो सिर्फ कामधेनु ही समझी जाती है।  उसकी कमाई पर पति और सास ससुर का हक़ होता है।
                            एक अध्ययन के अनुसार ५० प्रतिशत महिलायें पति के द्वारा मार खा चुकी हैं।  रोज न सही लेकिन उनके मन का काम न होने पर हाथ उठाने में गुरेज नहीं करते और इसको वे सामान्य बात मानती है फिर इस हिंसा का तो कोई उपाय नहीं नहीं है। ५० प्रतिशत महिलायें और पुरुष इस बात को बुरा नहीं समझते हैं।
                           ये सब बातें तो तब की हैं जब कि वह एक परिवार में उसके सदस्य होने के नाते सह रही होती है और जी रही होती है।  ऐसा नहीं है कि उसकी आत्मा इस हिंसा के बाद रोती नहीं है लेकिन कभी बच्चों का मुंह देख कर , कभी माता पिता की इज्जत का हवाला देने के बाद और कभी छोटे भाई बहनों के भविष्य को देख कर आपने आंसुओं के गले के नीचे उतार कर सब कुछ सह लेती हैं।
                         इसके अलावा भी परित्यक्ता होने पर वह जिस हिंसा का शिकार होती है उसका जिम्मेदार भी हमारा समाज अधिक जिम्मेदार है।  उसके दर्द को समझने के स्थान पर उस पर परोक्ष रूप से लांछन लगाये जाते हैं क्योंकि पुरुष हर हाल में सही समझा जाता है।  इस का उन्मूलन कैसे हो सकेगा ? इस पर विचार भी होना चाहिए।
                        संतानहीन महिला भी समाज की दृष्टि में पूर्णरूप से दोषी समझी जाती है बगैर से जाने की इसका कारण क्या है ? ससुराल में उसका विकल्प लाने की बात भी सोची जाने  लगती है .  वंश तो उसको ही बढ़ाना होगा।  इस कारण के उन्मूलन की बात सोचने की पहल होनी चाहिए।  चाहे गोद लेकर या फिर और आधुनिक विकल्प भी सोचे जा सकते हैं और उस मानसिक प्रताड़ना से बचाया जा सकता है।
                         सिर्फ लड़कियों की माँ और लडके की माँ को अलग अलग तरीके से व्यवहृत होती है . इसके लिए भी परिवार वाले उनके प्रति विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित करने के अवसर खोजते रहते हैं और कभी कभी तो लड़की होने पर घर से भी निकाल देते है।
                        घर से लेकर बाहर तक किसी भी जगह वह यौन शोषण का शिकार तो बनती ही रही है और जैसे जैसे हमारे समाज ने प्रगति की है वैसे वैसे उसकी असुरक्षा जा रही है।  वह सिर्फ एक सामान समझी जाती है।  घर में पुरुष सदस्यों में अब कोई सीमा रेखा नहीं रह गयी है , पास पड़ोस में चाचा और भाई कहे जाने वाले लोग , स्कूल में सहपाठी ,   कार्य स्थल पर बॉस , सहकर्मी , इसके बाद उसके लिए संसार की कोई भी जगह महफूज़ नहीं है।  रोज रोज घटने वाली घटनाओं ने एक आतक का भाव उसके मन में भर दिया है।  अब पुरुष वर्ग इतना उदंड और वहशी हो चूका है कि उसके न उम्र का लिहाज रहा है और न ही किसी का खौफ बचा है।  जैसे जैसे क़ानून सख्त होने का प्रयास कर रहा है वैसे वैसे ही अपराधों की संख्या बढ़ रही है।  इसके पीछे एक कारन यह भी है कि अब निर्भीक होकर महिलायें अपने प्रति होने वाले हिंसा के मामलों को सामने लाने लगी हैं और इससे जो बेनकाब हो रहे हैं वे दुनियां में बहुत प्रतिष्ठित और सम्मानीय व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं .
                             आज के दिन हम अपने नारी वर्ग से जो इस बात के प्रति सजग है , न हिंसा को सहन करें और न औरों के सहते हुए देखें।  जरूरत बगावत की ही नहीं है बल्कि शांत और सौम्य तरीके से उससे जुड़े हुए लोगों को समझने की भी है।  अगर लोगों की सोच में सकारात्मक बदलाव आएगा तो वास्तव में महिला हिंसा उन्मूलन की दिशा में एक सफल कदम कहा जाएगा।

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

सावधान हो जाइये !

                   सावधान हो जाइये बगैर आपकी जानकारी के और आपके डिटेल्स कहीं  से भी प्राप्त करके कोई भी आपके नाम से बैंक में अकाउंट खोल सकता है।  मनचाहा पता और मनचाही जगह पर और  फिर उसके आधार पर क्रेडिट कार्ड भी ले सकता है और  लाखों की खरीदारी भी कर सकता है। पता तब चलेगा   चलेगा जब बैंक के रिकवरी नोटिस आपके पास आएगा।  
                                     कल मेरे पास एक फ़ोन दिल्ली से आया कि आपकी बेटी प्रज्ञा श्रीवास्तवा के ऊपर स्टेट बैंक का दो लाख सत्तर हजार  लोन है और मैं तीस हजारी कोर्ट से रोहित त्यागी बोल रहा हूँ।  रिकवेरी के लिए उनका वारंट निकला हुआ है।  मैंने डिटेल जानना चाहा तो उसके द्वारा दिया गया वर्किंग प्लेस और रेजिडेंस एड्रेस गलत था।  मैंने कहा कि  बेटी ने कभी यहाँ पर जॉब नहीं की और न ही वह इस एड्रेस पर रही है।  फिर उसने उसका पेन कार्ड नंबर और नॉमिनी में माँ का नाम रेखा देवी (जबकि मैं अपना नाम सिर्फ रेखा श्रीवास्तव ही प्रयोग करती हूँ ) और पिता का नाम आदित्य श्रीवास्तव बताया।  फिर बताया कि उसने इतने रुपये की खरीदारी की है। 
                                     मैंने उसको बताया कि मेरी बेटी यहाँ पर नहीं रहती है वह पुर्तगाल में है और न ही उसने कोई खरीदारी की है।  जो डेट्स खरीदारी की थी उस समय वह इंडिया में भी नहीं थी।  फिर भी वह बेटी का कांटेक्ट नम्बर मांग रहा था जो मैंने नहीं दिया।  लेकिन एक प्रश्न मेरे सामने छोड़ गया कि क्या ऐसे भी सम्भव है।  इस को किस क्राइम में रखा जा सकता है।  लेकिन हो बहुत कुछ सकता है इसलिए आप लोग भी सावधान रहिये।  पेन कार्ड नं हम कई जगह इस्तेमाल करते हैं और  माता पिता के नाम तो हर जगह पर इस्तेमाल होते हैं।  फ़ोटो आपकी नेट से किसी भी तरीके से ली जा सकती है।  इससे कैसे बचा जा सकता है ? 
ठीक वैसे ही जैसे अकाउंट हैक करके रुपये निकले जा सकते हैं वैसे ही नकली अकाउंट खोल कर कुछ भी किया जा सकता है।