www.hamarivani.com

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

अम्बेडकर जयंती !


आज अवकाश का दिन है क्योंकि आज भीम राव अम्बेडकर जी की जयंती हैअम्बेडकर जी भारत के गणतंत्र राष्ट्र के लिए संविधान निर्माताओं में प्रमुख स्थान रखते हें और इसके लिए देश उनके प्रति कृतज्ञ है
लेकिन आज कई वर्षों से अम्बेडकर जी के नाम को एक तमगा बना लिया गया है और वे जातिगत संपत्ति बन गए हेंचाहे वह उनके नाम को लेकर हो या फिर उनकी मूर्ति को लेकरचाहे वे जो उनकी मूर्ति के विभिन्न आकार में बनवा कर अपने घर या झोपड़ी के आगे लगा कर रहने लगते हें वह अवैध कब्जे के लिए एक साधन बना लिया गया हैहम कहते हें कि दलित और पिछड़ों को अपने अधिकार और उससे जुड़े कानूनों की जानकारी नहीं है इस लिए वे शोषित होते रहते हेंऐसा कुछ भी नहीं है वे जो इससे अनभिज्ञ है वे तो इस बात के लिए जाने जा सकते हें लेकिन वे जो यह जानते हें कि वे अम्बेडकर जी की मूर्ति लगा कर खुद को सुरक्षित कर लेंगे क्योंकि प्रशासन ही अगर उस मूर्ति के नाम पर कब्जाई गयी जमीन को मुक्त करने के लिए कार्यवाही करेगा तो जरूर ही कुछ राजनीतिक दल वाले और कुछ अपने को उनका प्रतिनिधि कहने वाले लोग दंगा फसाद करने से नहीं चूकेंगेराजीनीति के तवे पर तुरंत ही अफवाहों की रोटियां सिंकनी शुरू हो जायेंगी
मैं इस बात के लिए खुद गवाह हूँ की घर से निकल कर ऑफिस जाने तक या कहीं भी शहर में जाने तक अगर सबसे अधिक मूर्तियाँ किसी की दिखेंगी तो वे अम्बेडकर जी की होंगीक्या उनकी पूजा की जाती है या रोज उस पर फूलमालाएं चढ़ा जाती हें ऐसा कुछ भी नहीं है बल्कि ये सिर्फ इस बात का प्रतीक है कि इसके पीछे जो घर बने हें वे अवैध हेंहर आकार की छोटे से लेकर बड़े तक मूर्तियाँ आपको सड़क के किनारे मिल जायेंगीजो इसको लगाकर कब्ज़ा किये बैठे हें उन्हें ये नहीं मालूम है कि इस व्यक्तित्व ने देश के लिए या फिर जाति के लिए क्या किया था? हाँ ये जरूर कहेंगे कि ये हमार मसीहा हेंशायद वे इस मसीहा शब्द के पूर्ण अर्थ से भी वाकिफ नहीं होंगेहाँ इससे जरूर परिचित हें कि इसको लगा लेने से हम सुरक्षित हें और हमारा कब्ज़ा कल वैध हो जाएगा
अम्बेडकर जी के नाम और उनकी मूर्ति को भुनाने का धंधा करने वाले कुछ स्वार्थी तत्व निजी स्वार्थ के लिए प्रयोग कर रहे हेंकोई गाँधी जी , नेहरु या किसी भी शहीद की मूर्ति नहीं लगाएगा. सबसे अधिक श्रद्धा स्वार्थ की होती है और वही बनी हुई हैइस विषय में भी आचार संहिता बनायीं जानी चाहिए कि अवैध कब्जों को वैध बनाने के लिए मूर्तियों या फिर मंदिरों को प्रयोग किया जायअगर किया जाय तो फिर उसकी अनुमति स्थानीय सरकार द्वारा लेना आवश्यक कर दिया जायसंविधान में दी गयी स्वतंत्रता के अधिकार का दुरूपयोग जो बढ़ता चला जा रहा है उस पर अंकुश भी लगाना उतना ही जरूरी है

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

ये कैसे संरक्षा गृह ?

चित्र गूगल के साभार : बालिका संरक्षा गृह




सरंक्षा गृह अपने नाम को कितना सार्थक कर रहे हें ? इस बात को सिर्फ एक घटना के प्रकाश में आने से ही सिद्ध हो गया है। बाकी और गृहों के बारे में भी छानबीन जरूरी है। सरकार इनके पोषण के लिए पर्याप्त अनुदान देती है और पर्याप्त कर्मचारी होते हें । शेष सभी सुविधाएँ भी दी जाती हें । वह बात और है कि वहाँ के जिम्मेदार अधिकारी उन सुविधाओं को कितना उनको उपलब्ध कराते हें और शेष कहाँ उपयोग में लाते हें?
इलाहबाद के तेलियर गंज स्थित बाल संरक्षा गृह शिवकुटी में जो बात सामने आई है वह शर्म से डूबने वाली होने के साथ साथ बच्चियों के साथ हो रही अनदेखी या फिर जानबूझ कर की गयी अनदेखी को प्रकाश में लगा रही है। वहाँ के एक चौकीदार द्वारा बच्चियों के साथ दिन में लगातार कर रहे दुराचार की घटना ने मानवता का सिर नीचे तो किया है वहाँ के प्रशासन के ऊपर भी सवालिया निशान लगा दिया है। वहाँ दिन में ड्यूटी पर रहने वाले चौकीदार के द्वारा एक नहीं कई बच्चियों के साथ दुराचार होता रहा और वहाँ की अधीक्षिका जो कि दिन भर वहाँ रहती हें और शेष महिला कर्मचारी इस बात से बेखबर कैसी रही ? इस तरह के लोगों के हावभाव और गतिविधियाँ संदिग्ध रहती हें और उसे अगर एक महिला न भांप पाए तो शर्म की बात है या फिर सिर्फ अपने पद और वेतन के लिए वहाँ उपस्थिति दर्ज करने वाली बात कही जायेगी।
अधीक्षिका महोदया वह सिर्फ अपने चैम्बर में या कमरे में बैठ कर क्या करती रहती थी ? कभी उन्होंने उन बच्चियों से उनका हालचाल पूछा होता तो शायद वे कुछ बता पाती वे बच्चियां जो दस साल से काम उम्र की हैं इसका अर्थ नहीं जानती हें , वे क्या शिकायत करेंगी ? और अधीक्षिका महोदया इस बात के इन्तजार में रही कि जब तक बच्चियां शिकायत नहीं करेंगी तो वे जांच कैसी करवाती ? उनके पास कोई शिकायत आई ही नहीं।
उनसे एक सवाल क्या वे अपनी बेटियों को भी इसी तरह आँखें मूँद कर नौकरों के सहारे छोड़ कर आती हें और लौट कर अपने बच्चियों से कुछ भी नहीं पूछती हें? या फिर उनसे शिकायत के लिए इन्तजार में रहती हें और आँखें मूँद कर रहती हें। क्या वे अपने बच्चों को आया के सहारे भी छोडती हें तो अपनी सारी इन्द्रियां सक्रिय नहीं रखती हें?
कहीं के भी हॉस्टल या संरक्षा गृह की बच्चियां वहाँ की अधीक्षिका के लिए अपने बच्चों के समान ही होती हें। वे अनाथ या तिरस्कृत बच्चियां अपनापन और प्यार कहाँ से खोजेंगी? फिर इतना गैर जिम्मेदाराना काम क्यों?
इसके साथ तमाम प्रश्न खड़े हो जाते हें --
- क्या वहाँ के किसी भी कर्मचारी ने ये नहीं देखा कि इस चौकीदार का बच्चियों के प्रति क्या हाव भाव और गतिविधियाँ हैं? एक नहीं दो नहीं वहाँ पर पूरे ९ कर्मचारी काम करते हें और सब के सब बेखबर रहते हें या फिर सब की जानकारी में बच्चियों के साथ दुराचार होता रहा ?
--जहाँ पर बच्चियां रहती हों वहाँ पर संरक्षा गृह में अन्दर खाने या सफाई का काम करने वाले कर्मचारी महिला ही होनी चाहिए। पुरुषों की आवश्यक हो तो उन्हें बाहर तक ही रखा जाय।
--संरक्षिका को सिर्फ दिन में नहीं बल्कि पूर्णकालिक रहना चाहिए , रात की सुरक्षा को अनदेखी न किया जाय।
--सरकारी संस्थान क्या सिर्फ कागजों पर सुविधाओं और सुरक्षा के दावे करते हें?
--ऐसे संरक्षा गृहों में औचक निरिक्षण ही होना चाहिए जैसे कि अभी कानपुर में भी एक महिला संरक्षा गृह में हुआ कि वहाँ पर रहने वाली युवतियों में आधे से अधिक बीमार थीं और उनके रहने की व्यवस्था सबके साथ ही थी। न तो वहाँ के प्रशासन को फैलाने वाले संक्रमण की चिंता थी और न ही उन सबके स्वास्थ्य की।
इन सवालिया निशानों को सिर्फ एक संरक्षा गृह के कर्मचारियों के निलंबन से उत्तर नहीं खोजा जा सकता है बल्कि लगाम ऐसी सभी संस्थानों पर कासी जानी चाहिए ताकि भविष्य में इसकी कहीं भी पुनरावृत्ति न हो।

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष भरे वे दिन (१७)




पल्लवी सक्सेना :

संघर्ष एक ऐसा शब्द है जिससे रूबरू कमोबेश सभी को जीवन में होना ही पड़ता है वह बात और है कि कभी लम्बा होता है और कभी छोटा । होता तो जरूर है । ये तो जन्म के बाद से ही शुरू हो जाता है क्योंकि कहते हें न कि बगैर रोये तो माँ भी बच्चे को दूध नहीं पिलाती है । बस इसी तरह से अपनी जरूरतों को न बोलने तक वह पूरी करने के लिए रोने का सहारा लेता है ये भी एक संघर्ष है लेकिन उसके बड़े होने के साथ साथ ही उसकी बुद्धि का विकास होता है और संघर्ष के स्वरूपों का भी। आखिर में जब सही अर्थों में वह अपने जीवन को जीने के लिए प्रयास करने लगता है तब उसको पता चलता है कि इस में कितना संघर्ष किया। आज की प्रस्तुति पल्लवी सक्सेना की है भले ही उनकी अपनी न सही लेकिन उन्होंने किसी के संघर्ष को स्वीकार कर प्रस्तुति के लिए अनुशंसा की है और कुछ न कुछ हमें सीखने को तो हर पाठ से मिलता है।


संघर्ष
संघर्ष की यदि बात करें तो यह एक ऐसा शब्द है जो शायद पैदा होते ही मानव जीवन से जुड़ जाता है। जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि बच्चा जब पैदा होता है तब से अपनी बात दूसरों को समझाने के लिए संघर्ष करता है और उसके जीवन का यह संघर्ष निरंतर उसके जीवन में आने वाले पड़ावों के हिसाब से चलता रहता है जैसे जब वह शिशु अवस्था से निकलता है तो उसके बाद आता है विद्यार्थी जीवन उसमें भी नित नई चीजों से उसका संघर्ष चला करता है, जैसे -जैसे उसकी जानकारी बढ़ती जाती है वैसे-वैसे उसका संघर्ष भी बढ़ता जाता है। पहले स्कूल में होने वाली परीक्षा में पहले नंबर आने के लिए, अपने सहपाठियों से संघर्ष, फिर यदि अच्छे नंबरों से पास हो गया तो ठीक वरना अच्छे अंकों से उत्तीर्ण न होने के कारण पहले स्कूल वालों से, फिर घर पर माता-पिता के सवालों के और समझाने के कारणो को लेकर संघर्ष। इन सब से जैसे तैसे निजात मिल भी जाये तो फिर कॉलेज की पढ़ाई के दौरान फिर वही संघर्ष की कोन सा विषय चुने कि आगे उसे अपने जीवन में जीविका चलाने हेतु फिर कोई और संघर्ष ना करना पड़े। किन्तु उस अवस्था में उसे दोहरा संघर्ष करना पड़ता है क्यूंकि पढ़ाई के साथ सामाजिक दबाव भी बढ़ने लगता है और लोग क्या कहेंगे जैसे प्रश्न खड़े होना प्रारंभ हो जाते हैं, जिसके दबाव में आकर जीवन का संघर्ष जीवन लक्ष्य प्राप्त करने हेतु और भी ज्यादा बढ़ जाता है।

ऐसे ना जाने कितने संघर्ष है इस एक मानव जीवन में जिन्हें एक व्यक्ति को कभी खुद को स्थापित करने के लिए, तो कभी अपने परिवार के लिए, तो कभी समाज के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। यह संघर्ष सभी के जीवन में होते हैं चाहे वह लड़की हो या लड़का दोनों के अपने-अपने दायित्वों पर निर्भर रहता है उनके जीवन से जुड़ा संघर्ष विद्यार्थी जीवन में तो लगभग दोनों के संघर्ष एक से ही होते हैं। बदलाव आता है शादी के बाद, शादी के बाद यदि कोई लड़की अपने जीवन को कोई नया मोड देना चाहे तो उसे अपने ही परिवार के साथ ही संघर्ष करना पड़ता है, नई-नई शादी में दूसरे परिवार से आने के बाद ससुराल में आकर खुद को स्थापित करने के लिए भी हर एक लड़की को थोड़े बहुत छोटे-मोटे संघर्ष करने पड़ते हैं जो कि पहले तो बहुत ही ज्यादा हुआ करते थे मगर अब ज्यादातर लोग पढे लिखे होते हैं इसलिए अब यह संघर्ष, संघर्ष न रहकर समझोतों में बदल गए है। ऐसी ही एक संघर्ष की एक छोटी सी कहानी आज मैं आपको बताती हूँ।

मेरे जीवन में भी एक ऐसी नारी है जिसने अपने जीवन में कड़ा संघर्ष करके अपने परिवार को बखूबी चलाया अपना नाम बनाया, अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के साथ-साथ बहुत ही अच्छे संस्कार सिखाये, उस महान महिला का नाम है उषा श्रीवास्तव जो कि मेरी सासु माँ हैं। उनका विवाह 18 वर्ष की आयू में एक संयुक्त परिवार में हुआ था और उस जमाने में सासों की क्या भूमिका होती है, यह मुझे आप सब को शायद बताने की जरूरत नहीं है। उनकी सासु माँ यानि मेरे पति देव की दादी का स्वभाव उन दिनों बहुत ही कठोर हुआ करता था ,ऐसे में घर की सबसे बड़ी बहू होने के नाते पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी केवल मेरी सासु माँ पर आ गयी थी। यहाँ तक की अपने दोनों छोटे देवरों की शादी तक मेरे सास-ससुर जी ने मिलकर ही कारवाई थी और फिर वही हुआ जैसा फिल्मों में होता है किसी कारणवश आपसी मतभेद बढ़े और नौबत यहाँ तक आ गई, कि सब अलग-अलग हो गए। जिस वक्त हमारा परिवार अलग हुआ उस वक्त बहुत ही बुरे हालात थे, तीन बच्चों का साथ ऊपर से उस वक्त पापा जी (ससुर जी) की नौकरी भी नहीं थी, ऐसे में किसी नए शहर में जाकर एक नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करना आसान बात नहीं होती। मगर उन्होने शुरुआत की, पहले सब सिंगरोली रहे और फिर जबलपुर आ गये, मगर और तो और कम पढ़े लिखे होने के बावजूद भी वहाँ आने के बाद मम्मी जी (सासु माँ) ने शहनाज़ बियूटी पार्लर का कोर्स किया जिसकी परीक्षा उन्होने दिल्ली जाकर दी, ऐसे हालातों में कम शिक्षित होते हुए भी इतने मनोबल के साथ आगे बढ़ना भी कम बड़ी बात नहीं है जिसके अंतर्गत उन्हे पापा जी का भी पूर्ण सहयोग मिला इसलिए उनकी कामयाबी का जितना श्रेय मम्मी जी को जाता है उतना ही पापा जी को भी जाता है, यह पापा जी की ही होंसला अफ़ज़ाई थी जिसके बल पर मम्मी जी को कामयाबी का यह मुक़ाम हांसिल हो सका। खैर फिर उन्होने वह परीक्षा देने के बाद, कुछ दिन किसी दूसरे के पार्लर में काम किया, इस दौरान घर में सुबह जल्दी उठकर बच्चों को तैयार करना, उनका टिफिन ही नहीं बल्कि पूरा खाना बनाकर टाइम पर पार्लर जाना और टाइम से आकर फिर घर का सारा काम निपटाना। क्यूँकि उन दिनों पैसे की तंगी के कारण बाई रखना भी संभव नहीं था। इस सबके चलते उनको सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिल पाती थी, फिर भी उन्होने हार नहीं मानी और अपने बच्चों को जहां तक हो सका अच्छे से अच्छा खाना-पीना, शिक्षा दिलवाई क्यूँकि यही वो उनका संघर्ष का समय था, फिर धीरे-धीरे एक-एक पैसा जोड़कर मम्मी जी ने वही पार्लर खरीद लिया तब तो ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गई थी। क्यूंकि शुरुआत में मम्मी जी को ही सारा काम संभालना पड़ता था, फिर जब धीरे-धीरे उनका नाम बनना शुरू हुआ तब जाकर एक-एक करके उन्होने अपने पार्लर में दूसरी नई लड़कियों को सीखा कर तैयार किया और उन्हें वहीं नौकरी दी। क्यूंकि व्यापार में अपना नाम बनाने के लिए आपकी भूमिका के साथ साथ आपके काम करने वालों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जिनका सहयोग ही आपके व्यापार को कामयाब बना सकता है। उनके मीठे स्वभाव के कारण उनको अपने कर्मचारियों का पूर्ण सहयोग मिला। दिन रात यूं ही मेहनत करने के बाद उनको वो मुकाम मिला कि आज आपने इलाके में उनका आपना एक नाम है अपनी एक पहचान है, हर कोई उन्हें उनके काम के साथ नाम से जानता है, उनके स्वभाव से जानता है। इतने सालों व्यापार करने के बाद भी उनका स्वभाव में वो व्यापारियों वाला छल कपट नहीं आया जिसके आधार पर व्यापारी का व्यापार चलता है और शायद यही वो वजह है जो उनकी एक अलग पहचान का कारण है।

रविवार, 1 अप्रैल 2012

वर्ल्ड ऑटिज्म एवेयरनेस डे !

इस विषय में लिखने से पहले मैं बता दूं कि इस बारे में सारी जानकारी मेरी बेटी सोनू ने दी है जो कि औक्यूपेशनल थेरेपिस्ट है और ऑटिज्म के बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ही काम कर रही है

वैसे तो ऐसे बच्चे सदियों से पाए जाते हें लेकिन इधर ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती चली जा रही है इस रोग का सीधा सम्बन्ध बच्चे की मष्तिष्क में स्थित नर्वस सिस्टम से होता है जो जन्मजात होता है और इसके लिए कोई भी स्थायी इलाज नहीं होता है , हाँ इतना अवश्य है कि उस बच्चे को इस काबिल बनाया जा सकता है कि वह अपने कामों को खुद कर सके और यह भी उसके ऑटिज्म के प्रकार पर निभर करता है कि उसको किस तरह की थेरेपी की जरूरत हैइसका निर्धारण उसको चिकित्सा देने वाला खुद ही निश्चित करता है सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि अब इस तरह के बच्चों में बढ़ोत्तरी का कारण क्या है?

--
इस तरह के बच्चों की बढती संख्या के पीछे आज अपने करियर के लिए संघर्ष कर रहे माँ बाप अपने की चिंता में बच्चे को जन्म देने के बारे में देर से सोचते हें
--
वैसे भी पढ़ाई और करियर के सेट होते होते आज कल विवाह की उम्र बढ़ रही है और विवाह की बढ़ती हुई उम्र इसका एक बड़ा कारण बन गया है
--
अगर परिवार में ऐसे सदस्य पहले से हों तब भी ऑटिज्मग्रस्त बच्चे हो सकते हें
--
जन्म के समय बच्चे का सामान्य व्यवहार होना भी इस तरह की स्थिति को जन्म दे सकती है जैसे कि बच्चे का पैदा होते ही रोनाबच्चे का गर्भ से बाहर आते ही रोने से उसके मष्तिष्क में रक्त का संचार पूरी तरह होने लगता है और सके मष्तिष्क में स्थित सारी रक्तवाहिनियाँ सुचारू रूप से है
-- -- कभी कभी देखने में आता है कि बच्चा एकदम सामान्य होता है लेकिन अचानक तेज बुखार आ जाने से उसके बाद उसके व्यवहार या फिर शारीरिक और मानसिक क्रियायों में बदलाव आ जाता है . ऐसा भी संभव है तेज बुखार की स्थिति में मष्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है और कभी कभी इससे ब्रेन हैमरेज और पक्षाघात तक हो जाता है.
ऑटिज्म के शिकार बच्चों के क्या लक्षण हो सकते हें . पहले ही बता दूं कि ऑटिज्म के कई प्रकार हो सकते हें और इनमें से कुछ तो ऐसे भी हो सकते हें --

१.
अति सक्रिय -- इसमें बच्चे जरूरत से अधिक शोर करने वाले , उठापटक करने वाले , चीखने और चिल्लाने वाले हो सकते हें .
२ .अति निष्क्रिय - इसमें बच्चे खामोश प्रवृत्ति के होते हें , वे बात सुन लेते हें तब भी कोई रूचि नहीं दिखाते हें या फिर आप उनसे कोई बात कहें तो आपके कहने के कई मिनट बाद वे उस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हें.
बच्चों के लक्षण ---
कुछ इस प्रकार के भी हो सकते हें कि एकांत में रहना पसंद करते हों. उन्हें समूह में रहना पसंद नहीं होता है. किसी से अधिक मिलना जुलना भी वे पसंद नहीं करते हें.
--कभी कभी उन्हें किसी का अपने को छूना भी पसंद नहीं होता है.
--अँधेरे से डरते हें, अकेले से डरते हें.
--किसी विशेष वस्तु प्रेम भी हो सकता है , जैसे कि कोई भी चीज मैंने एक बच्चे को देखा उसको ढक्कन से विशेष प्रेम था किसी भी चीज का ढक्कन हो. अगर आप उसको हटा देंगे तो वह किसी और चीज के ढक्कन खोल कर ले लेगा.
--ऐसे बच्चे कभी कभी गले लगा लेने पर बहुत खुश हो जाते हें.
--कुछ अपने सामने वाले को मारने पीटने में भी आनंद लेते हें, ऐसे में सामान्य छोटे भाई बहन उनके कहर का शिकार बन जाते हें. माता पिता भी इसके शिकार हो जाते हें. ऐसे बच्चों को बहुत ही धैर्यपूर्वक सभांलने की जरूरत होती हें. .
--बुलाने पर बच्चे कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं करते हें या अनसुना कर देते हें.
--अक्सर ऐसे बच्चे आँखें मिलने में कतराते हें
--समूह में खेलने या पढ़ाने में उनको उलझन होती है और वे अधिक लोगों के बीच रहना पसंद नहीं करते हें.
--अपनी रूचि स्वयं कभी जाहिर नहीं करते हें. आपके पूछने पर भी बतलाने में कोई रूचि नहीं दिखलाते हें.
--अपनी दिनचर्या में समरसता चाहते हें , उन्हें कोई परिवर्तन पसंद नहीं होता है और परिवर्तन करने पर वे चीखने चिल्लाने भी लगते हें.
--
अभिभावकों के लिए :
ऐसे बच्चों के विषय में माता पिता को जल्दी ही निर्णय ले लेना चाहिए. जैसे ही उन्हें लगे कि उनका बच्चा सामान्य से अलग है , उसको डॉक्टर को दिखा कर राय ले लेनी चाहिए. अब इस तरह के बच्चों के लिए अलग से सेंटर खुल गए हें और इसके लिए सरकारी तौर पर भी कई संस्थान हें जहाँ पर इसके लिए ओ पी डी खुले हुए हें और इसके लिए विशेष प्रशिक्षण देकर ओकुपेशनल थेरेपिस्ट तैयार किये जाते हें.
नई दिल्ली में इसके लिए - पं दीन दयाल उपाध्याय विकलांग संस्थान , ४ विष्णु दिगंबर मार्ग पर है. जहाँ पर जाकर अपने बच्चे का परीक्षण करवा कर आप उसके भविष्य के प्रति जागरूक होकर उन्हें एक बेहतर जीवन जीने के लिए तैयार कर सकते हें. इन बच्चों के इलाज की दिशा इनके व्यवहार के अध्ययन के पश्चात् ही निश्चित की जाती हें क्योंकि उनके लक्षणों के अनुसार ही उन्हें थेरेपी दी जाती है.
--इसके ठीक होने का कोई एक उपाय नहीं है बल्कि इसका सुनिश्चित इलाज भी नहीं है बस आपके बच्चे को अपने कार्यों के लिए जो वे खुद नहीं कर सकते हें आत्मनिर्भर होने लायक बनाने के लिए प्रशिक्षण और थेरेपी दी जा सकती है.
--अलग अलग बच्चों में ऑटिज्म की डिग्री अलग अलग होती है, अतः इसके लिए उनके आत्मनिर्भर होने में कुछ समय लग सकता है. वैसे तो सारे जीवन ही इसकी जरूरत हो सकती है लेकिन उचित प्रशिशन और शिक्षा उनको बहुत कुछ सामान्य जीवन जीने योग्य बना देती है.
--इसके शिकार बच्चे कभी कभी स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो जाते हें लेकिन इसके लिए उनके माता पिता को बहुत ही मेहनत करनी पड़ती है. इसका एक उदाहरण मेरे सामने है. मेरी एक कलीग की बड़ी बच्ची उसके जन्म के समय उन्होंने गर्भपात के लिए कोई दवा खाई थी और उससे गर्भपात तो नहीं हुआ बल्कि होने वाली बच्ची ऑटिज्म का शिकार हो गयी. उसको याद बहुत देर में होता था. खाने में रूचि नहीं लेती थी. उसका चेहरा भी उसके असामान्य होने का प्रभाव दिखलाता था. लेकिन उनकी माँ के परिश्रम के चलते उन्होंने अपनी बेटी के साथ खुद भी घंटों मेहनत करके उसको बी. कॉम तक शिक्षा दिलवाने में सफल हुई और उसके बाद आगे की तैयारी में हें. ऐसे जागरूक माता पिता नमन के काबिल हें.
अगर किसी का भी बच्चा इस तरह से ऑटिज्म का शिकार है तो उसके लिए हताश न हों बल्कि उसके लिए बेहतर प्रयास करें कि वह बच्चा पूरे जीवन औरों पर निर्भर न होकर अपने कामों के लिए आत्मनिर्भर हो सके तभी आपका दायित्व पूर्ण होता है.

चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष भरे वे दिन ........

ये यथार्थ की मिट्टी में सने संस्मरण जीवन के उस पक्ष को उजागर करने वाले हें जो सहने वाले की हिम्मत की दाद तो देते ही हें साथ ही एक प्रेरणा का आधार भी बन जाते हेंमैंने अपने ब्लोगर साथियों से इस दिशा में अपने संस्मरण भेजने का आग्रह किया था लेकिन कुछ लोगों ने तो कह दिया कि जीवन में कभी संघर्ष करना ही नहीं पड़ा और कुछ लोगों ने उत्तर हाँ या में भी देने के काबिल नहीं समझा (क्षमा याचना सहित) क्योंकि उनके स्तर को देखते हुए शायद इस ब्लोगर जगत में मेरी उनसे कोई बराबरी नहीं है लेकिन मैं तो झुक ही सहयोग का अनुरोध कर रही थीखैर जिनका मुझे सहयोग मिला और जिनका आश्वासन लिए आज भी मैं इन्तजार कर रही हूँ सब को मेरा हार्दिक धन्यवाद
ये श्रंखला मैं बंद नहीं कर रही हूँएक काउंसलर होने के नाते और जीवन की गहराई को देखते हुए एक नहीं बहुत से लोगों से मुलाकात हुई जो इस संघर्ष से जूझते हुए आगे बढे या फिर आज भी जूझ रहे हें उनकी हिम्मत को दाद देनी पड़ेगीबहुत नामी सही लेकिन जीवन जीने का हक तो सभी को एक जैसा है और फिर संघर्ष चाहे किसी सेलिब्रिटी ने किया हो या फिर आम आदमी ने उसकी शिद्दत कम नहीं हो जाती है और उससे मिलनी वाला संबल भी कम नहीं होता हैइसलिए इसको मैं आगे चलाना चाहती हूँ और इस दिशा में आप सभी से पूछना चाहती हूँ कि क्या मेरा ये प्रयास मेरे पाठक बंधुओं को पसंद आएगा या फिर सभी अपने ब्लोगर साथियों के संस्मरण तक ही सीमित रखना चाहते हेंइस दिशा में आपसे सुझाव मांग रही हूँ आशा करती हूँ कि आप सभी इस दिशा में अपने विचारों से अवगत कराएँगे
संघर्ष तो उनका भी वन्दनीय है, जो साठ के बाद भी ढो रहे हें बोझ,
कहते हैं कि ये बोझ वह खुद नहीं ढोते हें पेट की आग ढ़ोती है

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

अर्थ आवर डे !

धरती पर रहते हुए हमने रोशनी सूर्य से पायी थी और रात में आग जला कर उससे जलने वाले विविध उपकरण से रोशनी पाईहमारी सभ्यता का विकास हुआ और फिर धीरे धीरे जब विद्युत् का आविष्कार हुआ तो फिर हमने उससे पहले रोशनी पायी और फिर उससे चलने वाले उपकरणों का विकास किया और सब को उसी से चलाना शुरू कर दिया . विश्व की आबादी निरंतर बढ़ती रही और उसके साथ ही ऊर्जा का प्रयोग भी बढ़ता चला गयाअब ये हालात खड़े हो गए हें कि ये ऊर्जा जो निरंतर हमारी जरूरत बढ़ चुकी है और उसके लिए उसकी खपत से अधिक उत्पादन कब तक हो सकता हैजल जैसे ऊर्जा भी एक दिन ख़त्म हो जाएगीहमारी विद्युत् उपकरणों पर निर्भरता ने उसके प्रयोग को और बढ़ा दिया है और उससे भी अधिक है हमारी विलासिता की बढ़ती हुई वस्तुएं जो ऊर्जा से ही चलती हेंहम ये सोचे बगैर के हमारी विलासिता किसी की जरूरत को भी पूरा होने से रोक सकती हैकुछ लोग जो झुग्गी झोपड़ी में रहते हें और एक बल्ब जला कर अपने अँधेरे झोपड़े में रोशनी कर लेते हें और जब ऊर्जा की कमी होने लगती है तो वही रोशनी से वंचित कर दिए जाते हें क्योंकि उनके पास को जेनरेटर या इनवर्टर नहीं होता हैसमर्थ लोग अपने इन साधनों से अपने घर गुलज़ार कर ही लेते हें
आज रात :३० से :३० तक विद्युत् से चलने वाले सभी उपकरण और रोशनी करने वाले सभी साधन बंद रखे जायेंगे इससे एक साथ बंद होने से हम कुछ पर्यावरण और ऊर्जा के संरक्षण में अपना योगदान दे सकेंगेजैसे बूँद बूँद से सागर बनता है उसी तरह से अगर एक साथ सम्पूर्ण विश्व में एक घंटे के लिए विद्युत् का उपयोग बंद रखा जाएगा तो बहुत कुछ बचाया जा सकता है
इसके उपयोग से सिर्फ ऊर्जा की बचत होगी ऐसा नहीं है बल्कि हम जिन उपकरणों को प्रयोग करते हें उनसे कुछ ऐसी गैस उत्सर्जित होती है जो कि पर्यावरण के लिए घातक है और ये पर्यावरण का प्रदूषित होना मानव जीवन के लिए महा घातक सिद्ध होने वाला हैबड़े बड़े बंगलों में घर को सजाने के लिए रोशनी से नहाये हुए टैरेस और बालकनी देखे जा सकते हेंशादी विवाह के मौके पर घर को पूरा का पूरा पावर हॉउस बना कर रख दिया जाता हैवह भी एक दिन के लिए नहीं दो चार दिन पहले से लेकर दो चार दिन बाद तकइस दिशा में सोचने के लिए हमारे पास वक्त ही कहाँ होता है ?
विश्व में मानव जीवन को सुगम और सुरक्षित बनाने के लिए इस दिवस की महत्ता को स्वीकार करते हुए हमें सहयोग करना चाहिएएक जागरूक नागरिक बनने की जरूरत भी हैमैं रोज देखती हूँ कि सड़क पर जलने वाले हैलोजेन रोशनी होने के बाद तक जलते रहते हें उन्हें कोई बुझाने वाला नहीं होता है क्योंकि इतनी जहमत उठाये कौन कि स्विच ऑफ करेघर के सामने पोल पर जल रहा है तो जलता रहे मैं ही क्यों? जब हम इस मैं से निकल कर हम की ओर बढ़ेंगे तो कुछ सार्थक सोच पायेंगे और कर भी पायेंगे
जब मैं मोर्निंग वॉक निकलती हूँ तो अपने घर के सामने वाले पोल से लेकर जहाँ भी जलते हुए हैलोजेन मिल जाते हें तो बंद करती जाती हूँआदत से मजबूर साथ वालों को बोलती जाती हूँ कि और लोगों को भी ऐसा सोचना चाहिए कि दिन में जिसकी जरूरत नहीं है उसको बंद कर देंसभी से एक अपील है कि अपने ही घर में सिर्फ एक ही दिन क्यों रोज अगर हम घर के सारे उपकरणों को कुछ समय के लिए बंद रखने का संकल्प लें तो ये अर्थ आवर अपने अर्थ और महत्व को बढ़ा सकते हेंचलिए हम लोग ही संकल्प ले लेते हें कि बेवजह ऊर्जा उपकरणों को चलाये नहीं रखेंगे

रविवार, 25 मार्च 2012

एक खामोश देशभक्त !

ये लेख पुराना है लेकिन इस क्रांतिकारी को नमन करने के लिए हम इतिहास नहीं बदल सकते हें। बस हम उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हें।

आज २५ मार्च उनकी पुण्य तिथि है. वह खामोश क्रांतिकारी - बहुत शोर शराबे से नहीं बने थे. उन्हें मूक क्रांतिकारी के नाम से भी जाना जा सकता है. अपने बलिदान तक वे सिर्फ कर्म करते रहे और उन्हीं कर्मों के दौरान वे अपने प्राणों कि आहुति देकर नाम अमर कर गए.
वे इलाहबाद में एक शिक्षक जय नारायण श्रीवास्तव के यहाँ २६ अक्तूबर १८९० को पैदा हुए. शिक्षक परिवार गरीबी से जूझता हुआ आदर्शों के मार्ग पर चलने वाला था और यही आदर्श उनके लिए संस्कार बने थे. हाई स्कूल की परीक्षा प्राइवेट तौर पर पास की और आगे की शिक्षा गरीबी की भेंट चढ़ गयी. करेंसी ऑफिस में नौकरी कर ली. बाद में कानपुर में एक हाई स्कूल में शिक्षक के तौर पर नौकरी की.
वे पत्रकारिता में रूचि रखते थे, अन्याय और अत्याचार के खिलाफ उमड़ते विचारों ने उन्हें कलम का सिपाही बना दिया. उन्होंने हिंदी और उर्दू - दोनों के प्रतिनिधि पत्रों 'कर्मयोगी और स्वराज्य ' के लिए कार्य करना आरम्भ किया.
उस समय 'महावीर प्रसाद द्विवेदी' जो हिंदी साहित्य के स्तम्भ बने हैं, ने उन्हें अपने पत्र 'सरस्वती' में उपसंपादन के लिए प्रस्ताव रखा और उन्होंने १९११-१३ तक ये पद संभाला. वे साहित्य और राजनीति दोनों के प्रति समर्पित थे अतः उन्होंने सरस्वती के साथ-साथ 'अभ्युदय' पत्र भी अपना लिया जो कि राजनैतिक गतिविधियों से जुड़ा था.
१९१३ में उन्होंने कानपुर वापस आकर 'प्रताप ' नामक अखबार का संपादन आरम्भ किया. यहाँ उनका परिचय एक क्रांतिकारी पत्रकार के रूप में उदित हुआ. 'प्रताप' क्रांतिकारी पत्र के रूप में जाना जाता था. पत्रकारिता के माध्यम से अंग्रेजों की खिलाफत का खामियाजा उन्होंने भी भुगता.
१९१६ में पहली बार लखनऊ में उनकी मुलाकात महात्मा गाँधी से हुई, उन्होंने १९१७-१८ में होम रुल मूवमेंट में भाग लिया और कानपुर कपड़ा मिल मजदूरों के साथ हड़ताल में उनके साथ रहे . १९२० में 'प्रताप ' का दैनिक संस्करण उन्होंने उतारा. इसी वर्ष उन्हें रायबरेली के किसानों का नेतृत्व करने के आरोप में दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गयी. १९२२ में बाहर आये और पुनः उनको जेल भेज दिया गया. १९२४ में जब बाहर आये तो उनका स्वास्थ्य ख़राब हो चुका था लेकिन उन्होंने १९२५ के कांग्रेस सत्र के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया.
१९२५ में कांग्रेस ने प्रांतीय कार्यकारिणी कौंसिल के लिए चुनाव का निर्णय लिया तो उन्होंने स्वराज्य पार्टी का गठन किया और यह चुनाव कानपुर से जीत कर उ. प्र. प्रांतीय कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य १९२९ तक रहे और कांग्रेस पार्टी के निर्देश पर त्यागपत्र भी दे दिया. १९२९ में वह उ.प्र. कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष निर्वाचित हुए और १९३० में सत्याग्रह आन्दोलन ' की अगुआई की. इसी के तहत उन्हें जेल भेजा गया और ९ मार्च १९३१ को गाँधी-इरविन पैक्ट के अंतर्गत बाहर आये.
१९३१ में जब वह कराची जाने के लिए तैयार थे. कानपुर में सांप्रदायिक दंगों का शिकार हो गया और विद्यार्थी जी ने अपने को उसमें झोंक दिया. वे हजारों बेकुसूर हिन्दू और मुसलमानों के खून खराबे के विरोध में खड़े हो गए . उनके इस मानवीय कृत्य के लिए अमानवीय कृत्यों ने अपना शिकार बना दिया और एक अनियंत्रित भीड़ ने उनकी हत्या कर दी. सबसे दुखद बात ये थी कि उनके मृत शरीर को मृतकों के ढेर से निकला गया. इस देश की सुख और शांति के लिए अपने ही घर में अपने ही घर वालों की हिंसा का शिकार हुए.
उनके निधन पर गाँधी जी ने 'यंग' में लिखा था - 'गणेश का निधन हम सब की ईर्ष्या का परिणाम है. उनका रक्त दो समुदायों को जोड़ने के लिए सीमेंट का कार्य करेगा. कोई भी संधि हमारे हृदयों को नहीं बाँध सकती है.'
उनकी मृत्यु से सब पिघल गए और जब वे होश में आये तो एक ही आकार में थे - वह था मानव. लेकिन एक महामानव अपनी बलि देकर उन्हें मानव होने का पाठ पढ़ा गया था.
कानपुर में उनकी स्मृति में - गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक चिकित्सा महाविद्यालय और गणेश उद्यान बना हुआ है. आज के दिन उनके प्रति मेरे यही श्रद्धा सुमन अर्पित हैं.