www.hamarivani.com

शनिवार, 21 सितंबर 2019

ब्लॉगिंग के 11 वर्ष !

ब्लॉगिंग के 11 वर्ष !

                                     वह साल 2008 का था जब मेरा ब्लॉगिंग से परिचय हुआ था और वहीँ से दिशा मिली थी खुद को अपनी मर्जी से प्रकाशित करने की सुविधा।  इसमें ये कोई चिंता नहीं थी कि कोई पढ़ेगा या नहीं फिर भी धीरे धीरे लोग पढ़ने लगे और उस समय चल रहे ब्लॉग की सूचना देने वाले एग्रीगेटर थे और आज भी है जो  ब्लॉग के लिखने और उसके प्रकाशित होने की सूचना सबको देते थी। "हमारी वाणी" ने बहुत काम किया।
                      कई वर्षों तक ब्लॉग अपने चरम पर थे, हमारे पास समय भी था और सब  नियमित लिखते थे।  आलोचना , समालोचना , बहस से लेकर सब कुछ होता था फिर भी वह एक मंच है , जहाँ पर सब एक दूसरे को पढ़ते थे और नहीं भी पढ़ पाते थे तो कोई शिकायत जैसी  बीच नहीं थी।  एक परिवार की तरह से थे हम और आज भी ब्लोगर्स के बीच वही भावना है।  कभी भी किसी को पुकारों उत्तर जरूर देता है।  वह रिश्ते क्यों इतने गहरे थे क्योंकि उसे समय तू मुझे दे और मैं तुझे दूँ ऐसा नहीं था।  जब जिसको जहाँ समय मिला पढ़ लिया और नहीं मिला तो नहीं पढ़ पाए।  फेसबुक का मंच आया तो इसने सेंध लगा दी ब्लॉग में।  तुरंत लिखना और तुरंत पाठकों की प्रतिक्रिया मिलाने का खेल सबको अधिक भाया और फिर वही मंच पकड़ लिया।  हजारों की संख्या में मित्र बन गए लेकिन वे कितना आपसे जुड़े हैं इसके लिए आप अंदाज नहीं लगा सकते हैं।  नाम के मित्रों का मजमा लगा रहता है। उससे बड़ा झटका तब लगा जब हर हाथ में स्मार्ट फोन आ गया और फिर उसमें हिंदी लिखने की सुविधा भी मिल गयी।  इस हालत में ब्लॉग पर कौन जाए ? एक बार में फेसबुक खोली और चेप दिया।  हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में फेसबुक ने ब्लॉग को बुरी तरह से झटका दिया।  ब्लॉग पर सभी अर्थ पूर्ण पढ़ने के आदी थे और वहां लिखा भी वही जाता था। सही अर्थों में ब्लॉग में फेसबुक ने सेंध लगायी और हम उससे खुद ब खुद दूर होते गए।  कुछ समर्पित ब्लॉगर आज भी उतनी ही लगन से अपने ब्लॉग को चला रहे हैं और फेसबुक को भी भी दे रहे हैं।
                         अरे मैं फेसबुक की आलोचना करने में लग गयी।  हमारे ब्लॉग ने हमें जितना बड़ा संसार दिया उसके लिए मैं शुक्रगुजार हूँ।  डायरियों में बंद पड़ी रचनाएँ , जो खो चुकी थी पन्नों के ढेरों में, फिर से मंच पर आ गयी।  सबने मुझे दिशा दी , सिखाया क्योंकि मैं काम जरूर कंप्यूटर साइंस विभाग में थी और सारे दिन सिर्फ डेस्कटॉप पर होते थे और तब हमें नेट सुविधा उपलब्ध नहीं थी।  ईमेल आई डी जरूर थी और मैं से काम चल जाता था।  बाद में नेट सुविधा मिलने पर जुडी , लेकिन इस ब्लॉग के टिप्स से मैं अपरिचित थी।  धीरे धीरे हमारी मित्रों ने मुझे दिशानिर्देश दिया और फिर धीरे धीरे सब तो नहीं हाँ कुछ तो करना आ ही गया।
                         बीच में साथ छूट गया था लेकिन फिर उस मंच की गरिमा और उसके महत्व को स्वीकार करते हुए , उस पर लिखना शुरू कर दिया है।  बहुत सारी  सामग्री है जिसको अभी लिखना शेष है। अपने ब्लॉग का महत्व समझें तो ये एक ऑनलाइन डायरी है , किताब है जो सबके लिए उपलब्ध है।  जो ब्लॉग़र बंधु और बहने इससे दूर हैं वो वापस आ  जाय और फेसबुक को मंच बनाने वाले भी अपने को इसा पर संचित रख सकते हैं।
                       ग्यारह वर्ष में एक काम २०१२ में किया था और वह भी अपने सभी ब्लॉगर साथियों के सहयोग से , उसको पुस्तकाकार देने का कार्य चल रहा है , जो मेरे ब्लॉगर होने के नाते ब्लॉगर साथियों के संस्मरण को संचित कर सबके सामने लाने का प्रयास है।  "अधूरे सपनों की कसक " विषय को लेकर अंदर पलने वाली कसक को उजागर किया है।  भले ही वो कसक अब कोई मायने नहीं रखती लेकिन जीवन के लिए देखे सपने एक धरोहर तो हैं ही इस जीवन के।  मेरे उस सपने को साकार करने में भी हमारे ब्लॉगर साथियों का सहयोग है और उनकी मैं शुक्रगुजार हूँ।

रविवार, 15 सितंबर 2019

बेटियों का दंश (५) !

        लोगों ने जीना हराम कर दिया।  तरह तरह के सवाल कभी कभी हमें खुद अपराधबोध कराने लगे थे।
--पांच पांच लड़कियां है कब  करेंगे शादी ?
--अरे बेटियों की कमाई खा रहे हैं पैसा किसे बुरा लगता है ?
--हमें लगता है कि इन लोगों के पास पैसा नहीं है , लड़कियां कमा कर इकठ्ठा कर लेंगी तो कर देंगे।
-- इन लोगों को रात में नींद कैसे आती है ? जवान लड़कियां घर में बैठी हैं। 

                 कोई किसी से कहता तो दूसरा आकर हमें बताता या फिर खुद अपने मन से गढ़ कर बताता।  जो भी हो हम बहुत शांत भाव से सुन लेते और कह देते कि कुछ चीजें इंसान के वश में नहीं होती , जब भाग्य साथ देगा तो सब हो जाएगा। अंदर ही अंदर ये बातें सुन मन कभी कभी खुद को दोषी ठहराने लगता.।
                 फरवरी २०१० में बड़ी  बेटी की शादी पक्की हुई। अंतर्जातीय थी कर्नाटक के रहने वाले थे।   प्रश्न उठे और सिर  पटक कर दम तोड़ गए। हमने वहीँ जाकर शादी की थी और फिर अनुभव किया कि हमारे उत्तर भारत में जैसे लड़की का पिता और उसके पक्ष के लोग "बेचारे " बने लडके  वालों के नखरे उठाया करते हैं।  वहां ऐसा कुछ भी न था।  सारा इंतजाम उन्होंने ही किया था और सम्मान भी पूरा किया।

बड़ी बेटी ऋतु  और दामाद विनय केशव

                अभी तो चार बाकी हैं , फिर वही एक से गिनती गिनना शुरू करना था।  दूसरे नंबर की बेटी लम्बे समय के लिए यू एस में रही  कंपनी के काम से , और लोगों को लगा कि हम चुपचाप बैठे हैं।  खोज जारी थी दूसरे और तीसरे नंबर की बेटियों के लिए।  तीसरी भी तब तक  अपनी पढाई पूरी करके दिल्ली में जॉब करने लगी थी।शायद विवाह की कोई भी ऐसी साइट नहीं थी जिस पर मैंने उसका विज्ञापन न दे रखा हो।  आज भी वह डायरी मेन्टेन करके रखी है। 
             इसी बीच मेरी छोटी बेटी का चयन भी IPH   दिल्ली में ही हो गया और उससे बड़ी वाली की इंटर्नशिप चल रही थी । 
                    दिल्ली में लडके देखने की जिम्मेदारी मैंने अपने मानस पुत्र हरीश को दे रखी थी। चूँकि वह दिल्ली में जॉब कर रही थी तो मेरी प्राथमिकता यही थी कि वही एनसीआर में कोई लड़का मिले तो अच्छा है। फिर हरीश ने एक लड़का बताया जो महाराष्ट्रीय था और ये बात मेरे पतिदेव को बिलकुल भी पसंद न थी। हरीश ने बहुत समझाया क्योंकि वह कई रिश्तों के लिए दौड़ रहा था और हर जगह कभी मेरी बेटी की पांच फुट लम्बाई और कभी उसका रंग आड़े आ रहा था।  कोई बीस लाख की शादी करने पर समझौता करने को तैयार था।  पहली दो चीजों को तो हम बदल नहीं सकते थे।हमारे पास इतने सारे पैसे भी नहीं थे कि हम लाखों दहेज़ में देकर शादी कर पाते।  
                     वह लड़का उसके पापा के विभाग एनपीएल से डॉक्ट्रेट करके पुर्तगाल में पोस्ट डॉक्ट्रेट फ़ेलोशिप लेकर काम कर रहा था।  उससे भी हरीश ने संपर्क साध रखा था और फिर हम लोगों से कहा।  किसी तरह से पतिदेव नागपुर लडके के घर वालों से मिलने को तैयार हुए।  उससे पहले उन्होंने अपने सभी मित्रों और रिश्तेदारों से इस पर चर्चा कर ली और सब से पॉजिटिव उत्तर मिलने के बाद वह तैयार हुए।  
                         उसके बाद  सब कुछ ठीक रहा और शादी पक्की हो गयी।  शादी की तिथि हमने करीब ग्यारह महीने  के बाद रखी क्योंकि इससे पहले पवन को छुट्टी भी न मिलती और हमारी दूसरे नंबर की बेटी के लिए वर खोजने समय भी मिल जाता क्योंकि संयुक्त परिवार में बड़ी बैठी रहे और छोटी की शादी जो जाए एक बड़ा प्रश्न बन जाता है।  उसको यूएस से वापस आने को कहा गया और फिर खोज शुरू हुई।  भाग्य ने साथ दिया और उसकी भी शादी पक्की हो गयी। 
                 मेरी बेटी की शादी के लिए पवन के परिवार ने हमें पूरा पूरा सहयोग किया बल्कि वहां पर मेरे चचेरे भाई के होने से सारी जिम्मेदारी उसने संभाल रखी थी। हमें बड़ा आश्चर्य हुआ और बड़े सुखद अनुभव भी हुए और अहसास हुआ कि लड़की वाले भी इज्जत पाने के हक़दार होते हैं।  हमें कहीं न लगा कि हम निरीह बेटी वाले हाथ जोड़े खड़े हैं ।
      दहेज़ हमारे पास देने को न था और न उन्होंने कुछ माँगा। मन से बड़े ही सहृदय लोग हमने पाये। शादी हम दोनों की रस्मों के अनुसार नवम्बर 2011 सम्पन्न हो गयी। दूसरे नं की बेटी की फरवरी 2012 में हुई ।
                         तीन बेटियों की शादी दो साल के अंदर हो गयी तो लोगों के मुंह बंद हो गए।  बाद की दोनों छोटी थी अभी पढ़ रही थीं सो कुछ दिन के लिए सब कुछ शांत हो गया।  एक बात और कि तीनों बड़ी के बीच दो दो साल का अंतर था और चौथी पाँच साल छोटी थी

             चौथी बेटी की शादी 2014 फरवरी में हो गई । सब कुछ ऊपर वाले की मर्जी से हो रहा था । उसकी जॉब भी दिल्ली में ही थी और दामाद की गुड़गांव में । बस अब एक रह गई थी । वह मुम्बई के सरकारी संस्थान से BSLP .का कोर्स कर रही थी । उसके वहीं से मास्टर्स के दौरान ही डॉक्टर लड़का मिल गया और उसकी पढ़ाई पूरी होते है 2016 में उसकी भी शादी हो गई ।

     आज बड़ी अपने पति व बेटे के साथ यूएस में , उससे छोटी अपने परिवार के साथ आस्ट्रेलिया , तीसरी नागपुर , चौथी दिल्ली और पाँचवी झाँसी में अपना क्लीनिक चला रही है । हमें बेटियाँ देकर दामाद नहीं पाँच बेटे मिले और पाँच नाती भी मिल गये । 
            जमाने का दंश जी लिया , अब चिंतामुक्त हूँ।

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

राजभाषा हिंदी का सफर : संविधान से प्रयोग तक !

राजभाषा हिंदी का सफर : संविधान से प्रयोग तक !

                                       हिंदी को संविधान में राजभाषा का स्थान प्राप्त हुए 69 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं और अगर हम गंभीरता से इस बार विचार करें तो ये पायेंगे कि इतने वर्षों में अगर इस लक्ष्य की और हमने एक कदम भी बढ़ाया होता तो मंजिल के बहुत करीब होते।  हमने तो सिर्फ दशकों में उसे अधिनियम में परिवर्तन किया और कुछ परिवर्तन भी नहीं किया बल्कि उसको गोल गोल घुमा कर वहीँ ला कर रख दिया गया।  हमने इसको इतने वर्षों में इस दिशा में कार्य करने सितम्बर माह की 14 तारीख , प्रथम पखवारा , अंतिम पखवारे तक सीमित कर दिया है।  प्रयास चाहे सरकारी हों या  संस्थानीय , अगर निरंतर प्रयास किया गया होता या फिर हम आज भी करें तो सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।  अच्छे कार्य  के लिए देर कभी भी नहीं होती है।  अब भी सिर्फ राजभाषा के लिए नहीं अपितु हिंदी भाषा के लिए प्रगति और उसको गतिमान बनाये रखने की दिशा में हम बहुत काम कर चुके होते।
                       सरकार ने नीतियां बनाई लेकिन राजभाषा के साथ अंग्रेजी को हमेशा जोड़े रखा , आखिर क्यों ? अंग्रेजी हमारी देश की किसी भी राज्य की मातृभाषा नहीं है।  इसको तमिलनाडु की राजभाषा घोषित क्यों गया ? वहां की अपनी मातृभाषा है।  संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं पास करके   समस्त  राज्यों से अधिकारी बनते हैं तो फिर उन समस्त विषयों के साथ राजभाषा की परीक्षा अनिवार्य क्यों नहीं रखा गया क्योकि नौकरशाही और राजनीतिक महत्वाकांक्षा हिंदी को उसका   समुचित स्थान देने के लिए प्रतिबद्ध हुए ही नहीं है।
                           
                  हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में १४ सितम्बर सन् १९४९ को स्वीकार किया गया। इसके बाद संविधान में अनुच्छेद ३४३ से ३५१ तक राजभाषा के साम्बन्ध में व्यवस्था की गयी। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये १४ सितम्बर का दिन प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। केंद्रीय स्तर पर भारत में दूसरी सह राजभाषा अंग्रेजी है।

धारा ३४३(१) के अनुसार भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी एवं लिपिदेवनागरी है। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप (अर्थात 1, 2, 3 आदि) है।

              हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है क्योंकि भारत का संविधान में कोई भी भाषा को ऐसा दर्जा नहीं दिया गया था।[2][3] संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है। परन्तु राज्यसभा के सभापति महोदय या लोकसभा के अध्यक्ष महोदय विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। {संविधान का अनुच्छेद 120} किन प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का प्रयोग किया जाना है, किन के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग आवश्यक है और किन कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाना है, यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा नियम 1976 और उनके अंतर्गत समय समय पर राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए निदेशों द्वारा निर्धारित किया गया है।
        
हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किये जाने का औचित्य

हिन्दी को राजभाषा का सम्मान कृपापूर्वक नहीं दिया गया, बल्कि यह उसका अधिकार है। यहां अधिक विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है, केवल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा बताये गये निम्नलिखित लक्षणों पर दृष्टि डाल लेना ही पर्याप्त रहेगा, जो उन्होंने एक ‘राजभाषा’ के लिए बताये थे-

(१) अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।(२) उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवहार हो सकना चाहिए।(३) यह जरूरी है कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हों।(४) राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।(५) उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्प स्थायी स्थिति पर जोर नहीं देना चाहिए।

इन लक्षणों पर हिन्दी भाषा बिल्कुल खरी उतरती है।
           
अनुच्छेद 343 संघ की राजभाषा

(१) संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।(२) खंड (१) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था, परन्तु राष्ट्रपति उक्त अवधि के दौरान, आदेश द्वारा, संघ के शासकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का और भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप के अतिरिक्त देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।(३) इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, संसद उक्त पन्द्रह वर्ष की अवधि के पश्चात्‌, विधि द्वारा(क) अंग्रेजी भाषा का, या(ख) अंकों के देवनागरी रूप का,

ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट किए जाएं।

अनुच्छेद 351 हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश

संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्थानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।

राजभाषा संकल्प, 1968

भारतीय संसद के दोनों सदनों (राज्यसभा और लोकसभा) ने १९६८ में 'राजभाषा संकल्प' के नाम से निम्नलिखित संकल्प लिया-

1. जबकि संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी रहेगी और उसके अनुच्छेद 351 के अनुसार हिंदी भाषा का प्रसार, वृद्धि करना और उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके, संघ का कर्तव्य है :

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी के प्रसार एंव विकास की गति बढ़ाने के हेतु तथा संघ के विभिन्न राजकीय प्रयोजनों के लिए उत्तरोत्तर इसके प्रयोग हेतु भारत सरकार द्वारा एक अधिक गहन एवं व्यापक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा और किए जाने वाले उपायों एवं की जाने वाली प्रगति की विस्तृत वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट संसद की दोनों सभाओं के पटल पर रखी जाएगी और सब राज्य सरकारों को भेजी जाएगी।

2. जबकि संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी के अतिरिक्त भारत की 21 मुख्य भाषाओं का उल्लेख किया गया है , और देश की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि इन भाषाओं के पूर्ण विकास हेतु सामूहिक उपाए किए जाने चाहिए :

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी के साथ-साथ इन सब भाषाओं के समन्वित विकास हेतु भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से एक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा ताकि वे शीघ्र समृद्ध हो और आधुनिक ज्ञान के संचार का प्रभावी माध्यम बनें।

3. जबकि एकता की भावना के संवर्धन तथा देश के विभिन्न भागों में जनता में संचार की सुविधा हेतु यह आवश्यक है कि भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के परामर्श से तैयार किए गए त्रि-भाषा सूत्र को सभी राज्यों में पूर्णत कार्यान्वित करने के लिए प्रभावी किया जाना चाहिए :

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी तथा अंग्रेजी के अतिरिक्त एक आधुनिक भारतीय भाषा के, दक्षिण भारत की भाषाओं में से किसी एक को तरजीह देते हुए, और अहिंदी भाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषाओं एवं अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी के अध्ययन के लिए उस सूत्र के अनुसार प्रबन्ध किया जाना चाहिए।

4. और जबकि यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि संघ की लोक सेवाओं के विषय में देश के विभिन्न भागों के लोगों के न्यायोचित दावों और हितों का पूर्ण परित्राण किया जाए

यह सभा संकल्प करती है कि-(क) कि उन विशेष सेवाओं अथवा पदों को छोड़कर जिनके लिए ऐसी किसी सेवा अथवा पद के कर्त्तव्यों के संतोषजनक निष्पादन हेतु केवल अंग्रेजी अथवा केवल हिंदी अथवा दोनों जैसी कि स्थिति हो, का उच्च स्तर का ज्ञान आवश्यक समझा जाए, संघ सेवाओं अथवा पदों के लिए भर्ती करने हेतु उम्मीदवारों के चयन के समय हिंदी अथवा अंग्रेजी में से किसी एक का ज्ञान अनिवार्यत होगा; और(ख) कि परीक्षाओं की भावी योजना, प्रक्रिया संबंधी पहलुओं एवं समय के विषय में संघ लोक सेवा आयोग के विचार जानने के पश्चात अखिल भारतीय एवं उच्चतर केन्द्रीय सेवाओं संबंधी परीक्षाओं के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित सभी भाषाओं तथा अंग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में रखने की अनुमति होगी।
                  
                    
संगोष्ठी के उद्देश्य - 
• राजभाषा को दस्तावेजों से उठाकर वास्तव में प्रयोग करने की दिशा में कार्ययोजना तैयार करना
• ‎प्राथमिक स्तर से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक हिंदी की अनिवार्यता पर विचार किया जाय।
• ‎शिक्षा के स्तर का समय समय और परीक्षण होना ज़रूरी है।
• ‎प्राथमिक शिक्षकों के हिंदी के ज्ञान के स्तर का परीक्षण के पश्चात नियुक्ति की जाय। अथवा नियुक्ति से पहले एक परीक्षा हिंदी व्याकरण आदि के ज्ञान पर आधारित पास करना अनिवार्य हो।
• ‎अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भी स्कूलों में हिन्दी का पाठ्यक्रम सतही ना होकर सभी शिक्षा बोर्डों में समान हो, ताकि हिंदी को दोयम दर्जे का ना समझ जाये।
• ‎राजभाषा को इतने वर्षों में पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका है, संविधान में परिभाषित इसके सफर को इतने वर्ष बाद गति देने के विषय में विमर्श किया जाए।
• ‎अंग्रेजी को हिन्दी के स्थान और कुछ वर्षों तक रहने का प्राविधान किया गया था लेकिन आज भी अंग्रेजी ऊपर और हिन्दी नीचे है।
• ‎हिन्दी को समुचित स्थान पर लाने का प्रयत्न करना है।
• ‎अभिजात्य वर्ग की राजभाषा को उसके स्थान से चित्त रखने में भूमिका पर विचार।
• ‎विश्व के पटल पर छायी रहने वाली हिन्दी और देश में प्रयोग होने वाली हिन्दी का स्थान सुनिश्चित कैसे हो। सोशल मीडिया द्वारा हिन्दी को विकृत करने की दिशा में उसकी भूमिका पर विमर्श एवं अंकयश पर प्रस्ताव।
• ‎राजभाषा को मिलने वाले अनुदान पुरस्कार तथा अन्य सहायता का समुचित प्रयोग।

   इतने वर्षों में यदि शिक्षा के स्तर पर हिंदी को देखा जाय तो मीडिया , मोबाइल और नेट से उपलब्ध सामग्री ने गहन ज्ञान में सेंध लगाई है । हिंदी का स्वरूप बिगड़ रहा है । न स्कूली शिक्षा में , न कार्यालयीन कार्यों में । जितने वर्ष हमने  हिंदी माह , पखवाड़ा, सप्ताह और दिवस मना रहे हैं , उतना ही हिंदी को प्राथमिकता देते तो ये दिवस बेमानी हो चुका होता ।
            

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

ओणम्

ओणम्
---------

                 भारत भूमि पर अनेक धर्म और मतों के लोग रहते हैं और सबके अपने अपने त्यौहार हैं । कुछ त्यौहार सम्पूर्ण देश में मनाये जाते हैं और कुछ राज्य विशेष में अपनी अपनी आस्था के अनुरूप भी मनाये जाते हैं । ओणम् एक ऐसा ही त्यौहार है , जो केरल राज्य में मनाया जाता है और जो प्राचीन पौराणिक कथा के कथानक को जीवंत करते हुए मनाते हैं ।
                 ओणम् मलियाली पंचांग के अनुसार वर्ष के पहले महीने चिंगम में जब थिरुवोनम नक्षत्र आता है तभी मनाया जाता है । यह दस दिनों का त्यौहार होता है और इसमें दीपावली के समान ही कुछ परम्परायें होती हैं ।

                 ओणम पर्व कृषि से सम्बंधित है और यह खेतों की समृद्ध फसल  के लिए प्रसिद्ध है। यह दक्षिण भारत में हर साल बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस साल ओणम की आरम्भ 6 सितम्बर से हुई  वहीं इसका समापन 15 सितंबर हुआ है। इस दिन को लेकर लोगों की अपनी-अपनी मान्यताएं हैं।

         
   पौराणिक कथा 
   -------------------
          
                राजा महाबली , हिरण्याकश्यप के बेटे प्रह्लाद के पोते थे  । महादानी महाबली का शासन पृथ्वी और स्वर्ग लोक तक फैला था । प्रजा अपने राजा को पराक्रमी ,न्यायप्रिय , प्रजा पालक होने के करण भगवान का स्थान देती थी । इसी से राजा में अहंकार बढ़ने लगा और उसकी आसुरी शक्तियों से देवता भी घबड़ाने लगे, जिससे व्याकुल होकर उन्होंने भगवान विष्णु से इससे बचाने के लिए गुहार लगायी । भगवान विष्णु ने महाबली के अहंकार को भंग करने के लिए माता अदिति के पुत्र के रूप में वामन अवतार लिया । 
 
                जब राजा महाबली इन्द्र से अपने सबसे शक्तिशाली शस्त्र को बचाने के लिए नर्मदा नदी के तट पर अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे , जिसके पूर्ण होने पर तीनों लोक में आसुरी शक्तियाँ प्रबल हो जातीं । महाबली ने निश्चय किया कि वे यज्ञ के दौरान जो कोई कुछ भी माँगेगा मैं दूँगा । यह सुनकर वामन रूपी विष्णु यज्ञशाला में आये और उन्होंने तीन पग जमीन माँगी । वामन की इस माँग से राजा के गुरु को सशंकित हुए  और उन्होंने राजा को ऐसा करने से मना किया किन्तु राजा अपने वचन के पक्के थे तो अपने वचन पर अडिग रहे ।
 
          वामन अपने विशालकाय रूप में आ गये और उन्होंने एक पग में धरती , दूसरे में स्वर्ग नाप लिया और तीसरे पग के लिए राजा ने अपना सिर रख दिया और पग रखते ही राजा पाताल में चले गये । पाताल में जाने से पूर्व उनसे उनकी एक इच्छा पूरी करने के लिए पूछा गया तो उन्होंने  भगवान विष्णु से जो वर माँगा वह था - हर वर्ष धरती पर ओणम् उनकी याद में मनाया जाय और उस दिन उन्हें पृथ्वी पर आने की अनुमति दी जाय ताकि वे अपनी प्रजा का सुख दुःख जान सकें ।
            
              यही मान्यता है कि ओणम् के दौरान राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने और उनकी खुशहाली देखने के लिए आते हैं । उन्हीं के सम्मान में यह मनाया जाता है ।
 
       
       ओणम् के दस दिनों के नाम --
 
              ओणम् के दस दिनों को विशेष नामों से जाना जाता है और प्रत्येक दिन अलग अलग कार्य सम्पादित किये जाते हैं । इन दस दिनों तक केरल राज्य में बहुत ही धूमधाम होती है।  यह वहां का राष्ट्रीय त्यौहार के रूप में मनाया जाता है और केरल में इसके लिए चार दिनों का अवकाश रखा जाता है। सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि जहाँ पर भी मलयाली लोग रहते हैं, वहां पर अपना पर्व पूरे उत्साह और श्रद्धा से मानते हैं।

 
1. अथं - यह पहला दिन होता है , जब राजा महाबली पाताल से केरल आने के लिए तैयार होते हैं ।
 
2 - चिथिरा - फूलों का कालीन बनाना शुरू किया जाता है, जिसे पूवक्लम कहा जाता है ।
 
3 - चोधी - पूवक्लम में विभिन्न फूलों की अगली परत चढा़ते हैं ।
 
4 - विशाका - इस दिन से विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएं शुरू होती हैं ।
 
5 - अनिज्हम - नौका दौड़ की तैयारी शुरू होती है ।
 
6 - थ्रिकेता - छुट्टियाँ आरम्भ हो जाती हैं ।
 
7 - मूलम - मंदिरों में विशेष पूजा शुरू होती है ।
 
8 - पूरादम - महाबली और वामन की प्रतिमा स्थापित की जाती हैं ।
 
 9 - उठ्रादोम - इस दिन महाबली केरल में प्रवेश करते हैं ।
 
 10 - थिरुवोनम - मुख्य त्यौहार होता है ।
 
 
ओणम मनाने की पद्धति --
 
                इस पर्व की मुख्य धूम कोच्चि के थ्रिक्कारा मंदिर में रहती है । इसके विशेष आयोजन पूरे दस दिन तक होते रहते है , जिनमें नाच गाना , पूजा आरती , मेला आदि होता है । इसको देखने के लिए देश - विदेश से सैलानी आते हैं ।
    ओणम में फूलों का विशेष कालीन बनाया जाता है  - जिसे पूवक्लम पहते हैं , इसमें फूलों की परत रोज चढ़ाई जाती है । 
 
          ओणम के दिन नारियल के दूध व गुड़ से पायसम, केले का हलवा, नारियल चटनी, चावल के आटे को भाप में पका कर और कई तरह की सब्जियां मिलाकर अवियल, आदि बनाकर 64 प्रकार के पकवान बनाने की परंपरा है।
             
              इसमें विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जाता है । इनमें केरल के लोक नृत्यों जैसे -- थिरुवातिराकाली , कुम्मात्तिकाली,कथकली , पुलिकाली आदि का विशेष आयोजन होता है ।
 
              इस त्यौहार में नौका दौड़ प्रतियोगिता  , जिसे वल्लाम्काली कहते है, की तैयारी जोर शोर से होती है । यह ओणम के बाद होती है लेकिन तैयारियाँ शुरू हो जाती है । यह विश्व प्रसिद्ध नौका दौड़ सिर्फ केरल में होती है और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र होती है ।
 
        ओणम्  में चावल के घोल से घर के बाहर सजाया जाता है , घर को दीपावली की तरह रोशनी से सजाया जाता है ।
       ओणम चूंकि महाबली से जुड़ा त्यौहार है इस लिए दान का विशेष महत्व होता है । गरीबों को दान दिया जाता है ।
       ओणम के आठवें दिन महाबली और वामन की प्रतिमायें स्थापित की जाती हैं । उनकी पूजा अर्चना की जाती है ।
       ओणम के आखिरी दिन बनने वाले व्यंजनों को 'ओणम सद्या' कहते हैं , इसमें 26 प्रकार के व्यंजन बनाये जाते हैं और केले के पत्तों में परोसे जाते हैं ।
             वैसे तो ओणम दस दिनों का त्यौहार होता है किन्तु इसके बाद दो दिन और मनाया जाता है । इन दिनों में पहले दिन महाबली और वामन की प्रतिमाओं का विसर्जन होता है और दूसरे दिन पूवक्लम को साफ किया जाता है ।
             

शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

जरा याद उन्हें भी कर लो .!

                            1957 की क्रांति की कानपुर की वीरांगनाएँ !


                        हमारा देश सिर्फ वीरों का ही नहीं अपितु वीरांगनाओं की भी कर्मस्थली रहा है । उसने माँ बनकर, बेटी बनकर, शासक बनकर और वीरांगना बनकर प्रत्येक क्षेत्र में विजय पताका  फहराई है। अगर विजयश्री न पा सकीं तो संघर्ष करते करते अपने को मातृभूमि पर न्योछावर करके इतिहास में पृष्ठों पर अपना नाम  अंकित कर गयीं। नव जागरण काल से लेकर संघर्ष की पूरी स्वातंत्र्य अवधि में भारतीय नारियाँ सुधी एवं मनीषी पुरुषों के दिग्दर्शन में उनके कंधे से कन्धा मिलाकर देश की गुलामी के विरुद्ध लड़ती रहीं.
                          कुछ  ऐसी वीरांगनाएं भी हैं, जिन्हें हम आमतौर पर अपने अब तक के अध्ययन में किसी भी विषय के पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ सके हैं और यह कार्य यदि शोध की दृष्टि से न किया गया होता तो शायद आज भी मैं अनभिज्ञ होती. हम लोगों में कुछ कुछ इतिहासकारों को इसका ज्ञान अवश्य ही होगा क्योंकि जिनका ये शोध विषय रहा है - वे मनीषी ही इस दिशा में मुझे वहाँ तक पहुँचने में सहायक सिद्ध हुए।                          इस दिशा में पहल करने के लिए 1857  की क्रांति में महारानी लक्ष्मी बाई का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा है । उन पर कुछ भी लिखना कुछ नया नहीं होगा. वे स्वयं इतिहास है।  इस क्रांति का सूत्रपात जब 1857  में मेरठ में हुआ, तब मेरठ छावनी में अंग्रेजों द्वारा प्रयोग करने के लिए दिए गए कारतूसों के प्रयोग को लेकर हुए विरोध पर 85  सैनिकों का कोर्ट मार्शल हुआ और उनको १०-१० वर्ष का कठोर कारावास हुआ। उन्हें बेड़ियाँ डालकर कारगर में बंद कर दिया गया. उसी शाम कुछ सैनिक मेरठ बाजार में घूमने गए तो मेरठ की महिलाओं ने उनको इस शब्दों में धिक्कारा - आपके भाई जेल में है। आप यहाँ मक्खी मार रहे हैं. आपके जीने को धिक्कार है." ( इन शब्दों का प्रयोग एक अंग्रेज ने अपनी डायरी में किया था.) ये गुमनाम किन्तु देशभक्ति  से भरी नारियाँ इस क्रांति कि एक सुलगती हुई चिंगारी थीं.
                          इस काल की कुछ वीरांगनाओं की, जो उत्तर प्रदेश से ही थीं, भूमिका प्रस्तुत करने कि इच्छा है। अगर इस विषय को आप लोगों ने सार्थक समझा तो इससे जुड़े और गुमनाम व्यक्तित्वों  से परिचय अवश्य कराऊंगी  अन्यथा फिर कभी प्रस्तुत करूंगी।

                                         
कुमारी मैना बाई


                     स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाओं में नाना साहब की अल्पवयस्क दत्तक पुत्री मैना को भी नहीं भुलाया जा सकता है. चिता में जिन्दा जल जाने के बावजूद उसने अपने साथियों के बारे में जानकारी देने से इंकार कर दिया और बिना चिल्लाये स्वतंत्रता की वेदी पर बलि चढ़ गयी।
                      मैना शरणागतों को लेकर और एक अंगरक्षक माधव को लेकर गंगातट पर पहुँची , जहाँ उसे खबर मिली कि अंग्रेज कानपुर में महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ कर रहे हैं और दुधमुंहे बच्चों तक को नहीं बक्श रहे हैं.  मैना का यह सुनकर खून खौल उठा , वह फिरंगियों से बदला लेने की सोचती ही रहती थी। उसको अपने पिता का ये आदेश कि 'शरणागतों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाना है.' याद आ गया। वह कर्त्तव्य से विमुख नहीं होना चाहती थी और वे फिरंगियों कि परवाह किये बिना अपने काम को अंजाम देने में लगी रही। इस बात की खबर अंग्रेजों को भी लग गयी और अंग्रेज भी वहाँ पंहुच गए। अंग्रेजों ने मैना के अंगरक्षक माधव को मारकर मैना को गिरफ्तार कर लिया। उनको  मैना  से  स्वतंत्रता  सेनानियों  के  बारे  में  जानकारी  चाहिए थी। इसके लिए उसे पेड़ से बाँध कर भीषण यातनाएँ  दी गयीं। लेकिन मैना को देश के साथ जीने और मरने की शहादत याद थी और पिता की हिदायत भी। जब अंग्रेज इससे संतुष्ट न हुए तो  उसको उन्होंने  जिन्दा चिता में जलाया और अधजला शरीर  निकाल कर फिर पूछताछ की लेकिन भारत माँ की  उस पुत्री ने अपना मुँह नहीं खोला और उसको पूरा ही जल दिया गया।
                        मैना चिता में जल गयी लेकिन अंग्रेजों को ये सबक सिखा गयी कि भारतीय युवतियाँ भी किसी से पीछे नहीं है। भारत को इस बहादुर बेटी पर सदा गर्व रहेगा।


 महारानी तपस्विनी


                  महारानी लक्ष्मी बाई की भतीजी  और उनके  एक सरदार पेशवा नारायण राव की पुत्री महारानी तपस्विनी का भी योगदान अविस्मरनीय है.   उन्होंने सांसारिक मोहमाया का त्याग कर पूजापाठ में लीन रहने वालों को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए प्रेरित  किया और उनके हाथ में अस्त्र-शस्त्र पकडाए।
                 बाल विधवा होने के बावजूद उन्होंने योगासन के साथ साथ शस्त्र  चालन , घुड़सवारी का भी प्रशिक्षण लिया. पेशवा खानदान की होने के कारण ही उनको देशप्रेम विरासत में मिला था। अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने की इच्छा  ने उन्हें शस्त्र विद्या में निपुण बनाया।
                        अंग्रेजों को धोखा देने के लिए वे संत गौरीशंकर की शिष्या बन गयीं और शांति और प्रेम के भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान देने के साथ साथ देशभक्ति का उपदेश भी दिया करती थी। उन्होंने विद्रोह का प्रतीक लाल कमल दे कर क्रांतिकारी साधुओं का दल बनाया। इन्होंने लोगों में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति करने के लिए सोयी हुई भावनाओं  को जगाने का कार्य सम्पन्न करना शुरू कर दिया। ये साधु दल अस्त्र शस्त्रों से पूरी तरह से लैस होते थे । युद्ध के समय  तपस्विनी घोड़े पर सवार होकर मुठभेड़ों से जूझते हुए सारी व्यवस्था का निरीक्षण  स्वयं ही देखती थीं। अंग्रेजों की योजनायें जब असफल होने लगीं तो अंग्रेज हाथ धोकर महारानी के पीछे पड़  गए। वह नाना साहेब के साथ नेपाल चली गयीं लेकिन वे वहाँ भी निष्क्रिय नहीं रहीं और वहाँ भी अंग्रेजों के खिलाफ देशप्रेम की भावना पैदा की और वहाँ पर  'महाकाली पाठशाला' खोल दी । वहीं से स्वतन्त्रता यज्ञ आरम्भ किया। जब तक जीवित रहीं क्रांति योजना की बार बार असफलता के बावजूद इसे जारी रखे रहीं। १८५७ की क्रांति असफल होने के बाद भी क्रांति के ज्वाला जलाये रखने वाली महारानी तपस्विनी का नाम भारत की वीरांगनाओं  में अग्रणी रहेगा.


                                                         *अजीज़न बाई*


                   जैसा इस नाम से अनुमान लगाया जा सकता है कि ये नाम किसी नाचने वाली से सम्बन्ध रखता होगा। घुंघरुओं की झंकार  से  लेकर  तलवार  की  खनक  तक अजीज़न का जीवन इस प्रकार का रहा जो अपने आप में देशभक्ति और राष्ट्र की स्वतंत्रता का एक बहुत बड़ा पथ है।
                  जब कानपुर पर अंग्रेजों ने पुनः अधिकार कर लिया तो कानपुर की  हिन्दू और मुस्लिम महिलायें अपने घरों से निकल कर गोला बारूद इधर से उधर ले जाने  और सैनिकों को भोजन पहुँचने एवं और भी प्रकार की  सहायता का काम ठीक अंग्रेजी किले की  दीवार के नीचे कर रहीं थीं। इन सब स्त्रियों में कानपुर की महान स्वतंत्रता सेनानी, कूटनीतिज्ञ   एवं समर दक्ष अजीज़न ने वीर महिलाओं का एक दल संगठित किया और वीरांगनाओं की इस टुकड़ी का नेतृत्व किया। वीरांगना अजीज़न का यह संगठित दल मरदाने वेश में हाथ में तलवार लेकर घोड़े  पर सवार होकर नगर में लोगों को क्रांति का सन्देश सुनाता  हुआ घूमता  था। युद्ध के समय यह दल अपने सिपहियों को दूध , फल, मेवा, मिठाई  बांटता, घायलों की  सेवा करता था, समय पड़ने पर यह दल अपने साथियों को हथियार , गोला बारूद पहुंचता था। अजीज़न सैनिक वेशभूषा में तथा हाथ में पिस्तौल लिए अंग्रेजी सैनिकों को रौंदती चली जाती थी। उनके वीरत्व के कारण ही कानपुर की महिलाओं में चेतना जाग्रत हुई।
                    नाना साहब की  पराजय का समाचार पाते ही अजीज़न प्रतिशोध की  भावना से प्रेरित होकर मोहम्मद के होटल से ५ कातिल ले आई और बीबीघर  के अंग्रेज कैदियों को मारकर कुँए में डलवा दिया। यह कुआँ आज नाना राव पार्क में तात्या टोपे की प्रतिमा के समक्ष वृत्ताकार चबूतरा बना  हुआ है। अजीज़न इस कांड से शांत नहीं बैठी वरन उसने अंग्रेजी सेना से अपनी टुकड़ी और क्रांतिकारी सेना के साथ मिलकर छापामार युद्ध आरम्भ कर दिया।
                   एक बार हैरी और वाटसन नामक सैनिक इस लड़ाई में अपनी टुकड़ी से बिछुड़ कर  पानी की  खोज में जंगल में भटक गए थे और एक कुँए की  ओर बढे। इधर अजीज़न  भी इनकी ताक  में पिस्तौल लिए पेड़ की  आड़ में खड़ी थी. इन दोनों को बढ़ता देखकर उसने गोली चलाई  परन्तु गोली चलते ही दोनों जमीं पर लेट गए और अजीज़न की  गोलियां बेकार गयी. हैरी और वाटसन शस्त्रास्त्रों से लैस थे और उन्होंने इन सैनिकों को पकड़ना चाहा। आदमी समझ कर धर दबोचा उससे अजीज़न की  पिस्तौल दूर जा गिरी, सिर का साफा  खुल गया और वह जमीन पर गिर पड़ी। तब वे समझे कि जिसे वे युवक समझ रहे थे वह तो वीरांगना नारी अजीज़न है। अजीज़न ने जमीन से उठने का प्रयास किया तो पुनः गिर पड़, किन्तु पिस्तौल उनके हाथ में आ गयी। हैरी पानी पीने गया था। अजीज़न वाटसन के सीने में गोली उतार दी। हैरी जब तक कुछ समझे तब दूसरी गोली उसके सीने में उतार दी और वह परलोक सिधार गया.
                  अजीज़न निश्चिन्त होकर आगे बढ़ना चाह रही थी किन्तु वह सैनिकों से घिर चुकी थी। इस पर भी उसने साहस का परिचय दिया और एक सैनिक की बन्दूक छीन कर उस पर कुंदों से प्रहार कर दिया, किन्तु इतने सैनिकों से निपटना आसन नहीं था। अतः पकड़ी  गयीं फिर हैवलाक  के पास लाई गयीं। हैवलाक  ने अजीज़न से कहा कि क्षमा मांग लो तो तुम्हारे प्राणों कि रक्षा हो  सकती  है। अजीज़न  ने  उत्तर  दिया  - "अत्याचारी  से  क्षमा  माँगने के लिए मैं तैयार नहीं ।"
फिर हैवलाक ने पूछा - "तुम क्या चाहती हो?"
उसने कहा कि "अंग्रेजी राज्य का विनाश।" इस पर हैवलाक के संकेत पर एक गोली उसके सीने पर जा लगी और गोली लगते ही वह "नाना साहब की जय" चिल्ला उठी। गोलियां चलती रहीं और वह अंतिम साँस तक नाना साहब की जय बोलती रहीं और अंत में वीरगति को प्राप्त हुई।

शनिवार, 10 अगस्त 2019

कहाँ आ गये हम ?

                       सदियों से चली आ रही सृष्टि और उसकी संस्कृति  को हम बरकरार  न रख पाए। हमने छोड़ते छोड़ते सब छोड़ दिया पर दिखाई किसी को न दिया।  आज जब खाली हाथ इंसान जानवर से भी बदतर होकर इंसानियत और खून  रिश्तों का लिहाज भी भूल गया। क्या बहन , क्या बेटी और क्या माँ ? सिर्फ और सिर्फ एक औरत उसमें दिखलाए देने लगी है। और उसकी सोच रोज किसी न किसी बेटी को दुष्कर्म का शिकार बना डालता है और हम बार बार सिर मारते हुए सोचते है कि इसमें गलत कहाँ हुआ ? इंसानी सोच अब उम्र  की मुहताज नहीं रही है। अपनी नानी दादियों के मुँह से सुना था  कि जब बाप बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बनाने लगेगा और इंसान इंसान को खाने लगेगा तब घोर कलयुग समझना कि आ गया । सब कुछ हो रहा है लेकिन कहीं कलयुग की पराकाष्ठा को देखा है और प्रकृति  सका ह्रास हम देख रहे हैं । अब प्रलय में क्या शेष है ? हर साल प्रकृति अपना भयावह रूप दिखा देती है । 

        हमारे बुजुर्गों में जो संस्कार और संस्कृति थी , उसमें सिर्फ और सिर्फ मानवता थी , तब हर इंसान चाहे गरीब हो , चाहे अमीर हों -- एक सम्मान , एक अदब और एक रिश्ते का नाम दिया गया था।  सारा गाँव एक परिवार था क्योंकि तब हम गाँव में ही बसते थे।  उससे आगे आने वाली पीढ़ी घर से बाहर निकली शिक्षा के लिए और ज्ञान के लिए।  वह तो उन्होंने ग्रहण की लेकिन वो अपनी संस्कृति से दूर होते गए और उन्होंने उन संस्कारों को अपनी सहूलियत के अनुसार ग्रहण किया।  सब कुछ न ले पाए क्योंकि उनमें कुछ शिक्षित हुए तो उन्हें वे संस्कार बेमानी लगने लगे। हमारे घर में काम करें और हमसे ही पैसे लेकर गुजारा करें और हम उन्हें काका और बाबा का दर्जा दें। ये तो नयी सभ्यता ने सिखाया ही नहीं है।  बुजुर्गों को दुःख हुआ कि ये नयी पीढ़ी हमारे बनाये संस्कारों को छोड़ती जा रही है लेकिन उन पर बस किसी का भी नहीं चल सकता है।
                            वह  पीढ़ी शहर में आ बसी और गाँव आती रही क्योंकि अभी संस्कारों का असर बाकी था और तीज त्यौहार घर और गाँव में ही मनाने का मन बना रहता था क्योंकि उनकी दूरी गाँव से बहुत अधिक दूर तक न बन पायी थी ,  लेकिन  आधुनिकता के रंग में रंगी यह पीढ़ी गाँव वालों को भी प्रभावित करती रही। वे शिक्षा के लिए गाँव से दूर हुए थे और नए बच्चों ने उनकी चमक धमक से प्रभावित होकर शहर का रुख कर लिया।  शहर में कुछ तो काम करने को मिलने लगा और शहर की ओर दौड़ लगने लगी संस्कारों की कमी क्या हुई ? वहां भी रिश्तों की गरिमा ख़त्म होने लगी।  जब ऊपर की पीढ़ी विदा होने लगी तो कुछ ही घरों पर छतें रह गयी बाकि ढह गयी और कुछ सालों बाद वो खंडहर बन बिकने लगे। जो संस्कार गाँवों से लाये थे वे चुकने लगे थे।  शिक्षा की चमक दमक ने संस्कारों पर कुठाराघात किया और उनकी आने वाली पीढ़ी डैड और ममी वाली रह गयी। सारे  रिश्ते अंकल और आंटी में सिमट गए।  मामा , मामी , बुआ , चाचा चाची दादी बाबा सब ख़त्म हो गए।  नयी पीढ़ी के हाथ क्या आया ? फ़िल्टर किये हुए संस्कार और रिश्ते और वे भी इतना कम थे कि अगली पीढ़ी को देने के लिए कुछ बचा ही नहीं था और क्या पता सृष्टि इन्हीं के लिए आगे चलकर दम तोड़ देगी ।
               यौन विकृतियों ने किशोर , युवा , वयस्क और प्रौढ़ों तक को अपनी गिरफ्त में ले लिया । कन्या शब्द खत्म हो चुका है क्योंकि इन लोगों को सिर्फ औरत और भोग्या नजर आने लगी ।
            माँएंं चिंतित हैंं कि बेटियों को कैसे बचायें ? बेटे को इस हवा से कैसे बचायें ? अबशिक्षित माँँओंंं की यही चिंता है । आओ मंथन करें और खोजें संस्कृति के पुनर्स्थापन की राह । तभी बच सकेगी ये सृष्टि, अन्यथा बिना प्रलय के नाश निश्चित है ।

मंगलवार, 4 जून 2019

विश्व पर्यावरण दिवस !

विश्व पर्यावरण दिवस !

   विश्व पर्यावरण दिवस की आवश्यकता संयुक्त राष्ट्र संघ ने महसूस की और इसी लिए प्रतिवर्ष 5 जून को इस दिवस को मनाने के लिए निश्चित किया गया । विश्व में लगभग 100 देश विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं । धरती से हरियाली के स्थान पर बड़ी बड़ी बहुमंजिली इमारतें दिखाई दे रहीं हैं ।
         नेशनल हाईवे के निर्माण के नाम पर मीलों लंबे रास्ते एक कतरा छाँव से रहित है। पथिक पहले तो पैदल ही चलते थे पेड़ों के नीचे सुस्ताकर कुँए का शीतल जल पीकर आगे की रास्ता लेते थे । अब तो कुछ शेष नहीं तो अगर हम उन्हें नहीं रहने देंगे तो वह हमें कैसे जीने देंगे?

      *मानव सुख की कीमत*

                               दिन पर दिन बढ़ती जा रही  हमारी वैज्ञानिक प्रगति और नए संसाधनों से हम सुख तो उठा रहे हैं, लेकिन अपने लिए पर्यावरण में विष भी घोल रहे हैं। हाँ हम ही घोल रहे हैं। प्रकृति के कहर से बचने के लिए हम अब कूलर को छोड़ कर किसी तरह से ए सी खरीद कर ठंडक का सुख उठाने लगे हैं, लेकिन उस ए सी  से निकलने वाली विपरीत दिशा में जाने वाली गैस के उत्सर्जन  से पर्यावरण को और प्रदूषित कर रहे हैं। सभी तो एसी नहीं लगवा  सकते हैं। लेकिन इससे उत्सर्जित होने वाली गैसें दूर दूर तक लगे पोधों को सुखाने के लिए बहुत है । पेड़ों पर शरण न मिली तो पक्षी कहाँ जायेंगे । इस भयंकर गर्मी से और वृक्षों के लगातार कम होने से पशु और पक्षी भी अपने जीवन से हाथ धोते चले जा रहे हैं।

   *खेतों का व्यावसायिक प्रयोग*

    जिन खेतों में लहलहाती फसलें ,
     अब उन पर इमारतें उग रही हैं ।
                                   - अज्ञात
          ये पंक्तिया हमें आइना दिखा रही हैं ।
                        हम  लम्बे लम्बे भाषणों को सुनते चले आ रहे हैं और सरकार भी प्रकृति को बचाने के लिए मीटिंग करती है , लम्बे चौड़े प्लान बनाती है और फिर वह फाइलों में दब कर दम तोड़ जाते है क्योंकि शहर और गाँव से लगे हुए खेत और बाग़ अब अपार्टमेंट और फैक्ट्री लगाने के लिए उजाड़े  जाने लगे हैं।  अगर उनका मालिक नहीं भी बेचता है तो उनको इसके लिए विभिन्न तरीकों  से मजबूर कर दिया जाता है कि वे उनको बेच दें और मुआवजा लेकर हमेशा के लिए अपनी रोजी-रोटी और अपनी धरती माँ से नाता तोड़ लें. कुछ ख़ुशी से और कुछ मजबूर हो कर ऐसा कर रहे है। ऊंची ऊंची इमारतें और इन इमारतों में जितने भी हिस्से या फ्लैट बने होते हैं उतने ही ए सी लगे होते हैं , कभी कभी तो एक फ्लैट में दो से लेकर चार तक एएसी होते हैं । उनकी क्षमता के अनुरूप उनसे गैस उत्सर्जित होती है और वायुमंडल में फैल जाती है । हम सौदा करते हैं अपने फायदे के लिए, लेकिन ये भूल रहे है कि हम उसी पर्यावरण में  विष घोल रहे है ,जिसमें उन्हें ही नहीं बल्कि हमें भी रहना है। उन्हें गर्मी से दो चार नहीं होना पड़ता है क्योंकि घर में एसी , कार में एसी और फिर ऑफिस में भी एसी । गर्मी से बचने के लिए वे ठंडक खरीद सकते हैं लेकिन एक गर्मी से मरते हुए प्राणी को जीवन नहीं दे सकते हैं ।
               
    *मोबाइल टावर*

         मोबाइल के लिए टावर लगवाने का धंधा भी खूब तेजी से पनपा  और प्लाट , खेत और घर की छतों पर काबिज हो गए लोग बगैर ये जाने कि इसका जन सामान्य के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है ? उससे मिलने वाले लाभ को देखते हैं और फिर रोते भी हैं कि  ये गर्मी पता नहीं क्या करेगी ? इन टावरों निकलने वाली तरंगें स्वास्थ्य के लिए कितनी घातक है ? ये भी हर इंसान नहीं जानता है लेकिन जब इन टावरों में आग लगने लगी तो पूरी की पूरी बिल्डिंग के लोगों का जीवन दांव पर लग जाता है . इन बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में पेड़ पौधे लगाने के बारे में कुछ ही लोग सोचते हैं और जो सोचते हैं वे छतों पर ही बगीचा  बना कर हरियाली  फैला रहे है।

      *जैविक चिकित्सकीय कचरा :-*     
          पर्यावरण को दूषित करने वाला आज सर्वाधिक जैविक चिकित्सकीय कचरा बन रहा है । जिस तेजी से नर्सिंग होम खुलते चले जा रहे है , उतना ही कचरे का निष्कासन बढ़ रहा है । उसके निस्तारण के प्रति कोई भी सजग नहीं है । सिर्फ कुछ सौ रूपयों के पीछे ये कचरा निस्तारण करने वाली संस्थाओं को न देकर अस्पतालों के पीछे या थोड़ी दूर पर फेंक दिया जाता है । इसमें घातक बीमारियों के फैलाने वाले तत्व भी होते हैं । जानवर इनको इधर उधर फैला देते हैं और वह वाहनों में फँस कर मीलों तक फैला होता है ।

                     हम औरों को दोष क्यों दें ? अगर हम बहुत बारीकी से देखें तो ये पायेंगे कि  हम पर्यावरण को किस तरह प्रदूषित कर रहे हैं और इसको कैसे रोक सकते हैं ? सिर्फ और सिर्फ अपने ही प्रयास से कुछ तो कर ही सकते हैं . यहाँ ये सोचने की जरूरत नहीं है कि  और लोगों को चिंता नहीं है तो फिर हम ही क्यों करें? क्योंकि आपका घर और वातावरण आप ही देखेंगे न . चलिए कुछ सामान्य से प्रयास कर पर्यावरण दिवस पर उसको सार्थक बना ही लें ------

* अगर हमारे घर में जगह है तो वहां नहीं तो जहाँ पर बेकार जमीन दिखे वहां पर पौधे लगाने के बारे में सोचें . सरकार वृक्षारोपण के नाम पर बहुत कुछ करती है लेकिन वे सिर्फ खाना पूरी करते हैं और सिर्फ फाइलों में आंकड़े दिखने के लिए . आप लगे हुए वृक्षों को सुरक्षित रखने के लिए प्रयास कर सकते है .
* अगर आपके पास खुली जगह है तो फिर गर्मियों में ए सी चला कर सोने के स्थान पर बाहर  खुले में सोने का आनंद लेना सीखें तो फिर कितनी ऊर्जा और गैस उत्सर्जन से प्रकृति और पर्यावरण को बचाया जा सकता है .
*  डिस्पोजल वस्तुओं का प्रयोग करने से बेहतर होगा कि  पहले की तरह से धातु बर्तनों का प्रयोग किया जाए या फिर मिट्टी से बने पात्रों को , जो वास्तव में शुद्धता को कायम रखते हैं,  प्रयोग कर सकते हैं . वे प्रयोग के बाद भी पर्यावरण के लिए घातक नहीं होते हैं .
* अगर संभव है तो सौर ऊर्जा का प्रयोग करने का प्रयास किया जाय, जिससे हमारी जरूरत तो पूरी होती ही है और साथ ही प्राकृतिक ऊर्जा का सदुपयोग भी होता है।
* फल और सब्जी के छिलकों को बाहृर सड़ने  के लिए नहीं बल्कि उन्हें एक बर्तन में इकठ्ठा कर जानवरों को खिला दें . या फिर उनको एक बड़े गमले में मिट्टी  के साथ डालती जाएँ कुछ दिनों में वह खाद बन कर हमारे हमारे पौधों को जीवन देने लगेगा .
* गाड़ी जहाँ तक हो डीजल और पेट्रोल के साथ CNG और LPG से चलने के विकल्प वाली लें ताकि कुछ प्रदूषण को रोक जा सके .  अगर थोड़े दूर जाने के लिए पैदल या फिर सार्वजनिक साधनों का प्रयोग करें तो पर्यावरण के हित में होगा और आपके हित में भी .
* अपने घर के आस पास अगर पार्क हो तो उसको हरा भरा बनाये रखने में सहयोग दें न कि  उन्हें उजाड़ने में . पौधे सूख रहे हों तो उनके स्थान पर आप पौधे लगा दें . सुबह शाम टहलने के साथ उनमें पानी भी डालने का काम कर सकते हैं .
          इस पर्यावरण दिवस को सार्धक बनाने के लिए जल संरक्षण दिवस , पृथ्वी दिवस , प्राकृतिक संपदा संरक्षण , वृक्षारोपण , कृषि योग्य भूमि की बिक्री निषेध को भी अपनाना होगा ।