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रविवार, 19 दिसंबर 2010

संसद के कारनामे !

                     
प्रजातंत्र में संसद देश के नीति निमार्ण और देश के शासन का  आधार होती है और सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी सांसद इसमें प्रतिनिधि बन कर बैठे होते हैं. देश की जनता जिन्हें चुन  कर भेजती है उनसे ये आशा करती है कि वे उसके विश्वास की रक्षा करेंगे जिस विश्वास पर उन लोगों ने उन्हें संसद में पहुँचाया है. उन्हें देश के जनप्रतिनिधियों के तौर पर सर्वाधिक वेतन और भत्ते मिल रहे हैं. सारा राष्ट्र संसद की कार्यवाही पर अपनी निगाहें टिकाये रखता है. कई बार सांसदों ने संसद की गरिमा को शर्मसार किया और देश के आम लोगों के सामने अपनी छवि जाहिल और गंवार लोगों से भी गई गुजरी बना कर दिखाई है. वह भी स्वीकार कर लिया और सब चुप रहे. लेकिन दिन पर दिन बढती जा रही संसद की बाधित कार्यवाही और सत्र के कार्यदिवसों का बहिष्कार कुछ सोचने पर मजबूर कर रहा है. 
         हमारी संसद के कार्यवाही एक वित्त वर्ष में तीन सत्रों - बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र में सम्पन्न होती है. इसमें कुल बैठके क्रमश ३५, २४ ,२४ होनी चाहिए. इस सभी बैठकों में नियमानुसार सभी सांसदों की उपस्थिति अपेक्षित है - चाहे वे एक मूक दर्शक के रूप में बैठे रहें. चूँकि संसद सत्र के लिए आवंटित कुल बजट में सभी का हिस्सा होता है. जिन दिनों  में सत्र नहीं होता सांसद स्वतन्त्र होते हैं, यह भी नहीं नजर आता कि  ये जन प्रतिनिधि कभी जनता के बीच आ ही गए हों या फिर उनकी समस्याओं  से अवगत ही हो जाएँ. .
                         इन सभी सांसदों के वेतन और भत्ते बढ़ाने के लिए बिल सर्वसम्मति से पास हो जाता है और अन्य विषयों पर विपक्ष का बहिर्गमन सत्र को धो कर रख देता है. सत्तारूढ़ दल अपनी गलतियों की स्वीकृति से बचता है क्योंकि सिद्ध होने पर वे अयोग्य घोषित कर दिए जायेंगे , जब पानी सिर से गुजर जाता है तब मंत्री अपने पद से इस्तीफा देते हैं. इस दिशा में असफल सत्रों के लिए कोई भी सांसद अपेन वेतन और भत्तों से तो वंचित होता नहीं है कि उनको इस कार्यवाही  के चलने या बाधित होने से कोई भय प्रतीत हो. उनकी उपस्थिति का भी कोई प्रश्न नहीं उठता है. वे स्वतन्त्र शासक हैं , इस दौरान भी कहीं भी रहे कोई उत्तरदायित्व उनके ऊपर नहीं आता है. इसी जगह अगर किसी सरकारी या निजी कर्मचारी की बात करें तो वे अपने  निर्धारित कार्य दिवसों पर कार्य के लिए अपने कार्यालय जाते हैं ( कार्य न भी करें तो भी कोई बात नहीं , वह विषय इतर  है.) उनकी उपस्थिति का आकलन होता है. उन्हें इस तरह की कोई भी छूट नहीं मिलती है. निर्धारित छुट्टियों से अधिक लेने का कोई प्राविधान नहीं होता है. उन्हें हड़ताल का अधिकार नहीं है - कार्य बंद करने का हक़ नहीं है और करते हैं तो वेतन कट जाता है - ठीक भी है काम नहीं तो वेतन किस बात का ?  फिर ये बात सांसदों पर लागू क्यों नहीं होती है? वर्ष में कुल ८३ दिन संसद का सत्र चलता है और उसमें भी उनको उसकी कोई चिंता नहीं है. 
                       इस बार शीतकालीन सत्र की कार्यवाही ने अपने अलग रिकार्ड कायम कर लिया है. इसमें सदन की २४ बैठकें होनी चाहिए और हर बैठक लगभग साढ़े पांच घंटे की होती है. इस तरह से १३२ घंटे इस सत्र में कार्यवाही चलनी चाहिए जिसमें १२४ घंटे ४० मिनट कार्यवाही हुई ही नहीं या बाधित रखी गयी. कुल सात घंटे और २० मिनट  लोकसभा की बैठक हुई. इसमें कम से कम ४८० तारांकित प्रश्न सूचित थे जिनमें से महज ५ प्रश्नों के उत्तर मौखिक तौर पर दिए गए. १० विधेयक  पेश किये गए जिनमें से ६ पारित हुए और १ वापस लिया गया. शेष अपना निर्णय न ले सके. 
                     राज्य सभा की कार्यवाही में बिना किसी काम के १०० घंटे गवाए सिर्फ २ घंटे तीस मिनट  काम हुआ. 
          यहाँ पर संसद के कामकाज में आने वाला औसत दैनिक खर्च ६.३५ करोड़ रुपये होता है और २३ दिन बिना काम काज के बीते. इस तरह से कुल १४६.०५ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ - प्रश्न काल, चर्चा और अन्य विधायी कार्यों के बगैर हुआ.
                   ये तस्वीर है हमारे प्रजातान्त्रिक शासन की - क्या ऐसा नहीं होना  चाहिए कि अगर सदन की कार्यवाही बाधित की जाती है तो सभी सांसदों को उनके दैनिक भत्तों से वंचित कर दिया जाय. उनकी उपस्थिति को सुनिश्चित किया जाय . ये धन आता कहाँ से है? देश वासियों की गाढ़ी कमाई इसी तरह से ये लूटते रहेंगे और हम हाथ मलते रह जायेंगे. संसद में अगर सांसदों के हित का कोई विधेयक होगा तो सर्वसम्मति से पारित हो जाएगा लेकिन इस तरह के विधेयक लाएगा कौन ? फिर पारित क्यों होंगे ? वहाँ तो वही होता है जो मंजूरे सांसद होगा. फिर इसका निदान क्या है? इसके कुछ तो प्राविधान होना चाहिए नहीं तो अनुशासन खो चुकी संसद सिर्फ नाममात्र की रह जायेगी. 
             इस सत्र में महानुभावों की उपस्थिति कुछ इस प्रकार थी. जिनमें देश के दिग्गज काहे जाने वाले सांसद ही वर्णित हैं --
ए राजा - १ दिन

जयाप्रदा - १ दिन
मधु कोड़ा - १ दिन
बाबूलाल मरांडी - ३ दिन
कल्याण सिंह - ३ दिन 
राहुल गाँधी - ४ दिन
सोनिया गाँधी - ६ दिन
नवजोत सिंह सिद्धू - ८ दिन
लालू प्रसाद यादव - ८ दिन
मु. अजहरुद्दीन - १० 
             यहाँ बताते चलें की शीतकालीन सत्र २४ दिन का होता है. ये सांसद सत्र  कालीन भत्तों के शत प्रतिशत हक़दार हैं और रहेंगे भले ही उसके दौरान कहीं भी रहें? उनका कोई नैतिक उत्तरदायित्व न संसद के प्रति है और न ही जनता के प्रति. 

*समस्त आंकड़े  दैनिक जागरण के साभार

बुधवार, 17 नवंबर 2010

बड़े घराने बनाम सरकार !

   जब रतन टाटा ने घूस माँगने के मामले का खुलासा किया तो सरकार के कान खड़े हो गए और तुरंत ही सरकार नतमस्तक हो गयी. उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने रतन टाटा के घाव पर मरहम लगाते हुए उन्हें इस क्षेत्र में आने के लिए निमंत्रण दे डाला. ये एक बड़े घराने का आरोप था और खुलासा करते ही रास्ता साफ हो गया. जब सरकार के मंत्रालय स्तर इतना भ्रष्ट  है जहाँ करोड़ों की सौदा होती है और सतर्कता विभाग कभी कदार  अपनी तत्परता और निष्पक्षता के लिए कुछ एक अधिकारियों पर हाथ डाल कर वाह वही लूट लेती है और  ये बड़े करार होते हैं उन तक पहुँचने की हिम्मत उनमें नहीं है.

                        अब आम आदमी के बात करें तो वह तो इसके बिना कुछ करवा ही नहीं पाता है. समर्थ और सक्षम के लिए तो फिर भी ये बातें कोई मायने नहीं रखती हैं. हम बात करते हैं कोषागार की - जहाँ से अवकाश प्राप्त अपनी पेंशन पाते हैं. वहाँ चलें और देखें कि वे वृद्ध जो स्वयं चलने में असमर्थ है फिर भी घंटों लाइन में खड़े हैं, जिसको चक्कर आ गया तो वही बैठ गया. पेंशन लेने के बाद वहीं रखी एक भगवान की तस्वीर के आगे कुछ चढ़ावा चढ़ाना होता है. यहाँ कोई नहीं ले रहा और कोई नहीं दे रहा. श्रद्धा जाग्रत करवाकर कुछ चढ़वाया जा रहा है. शाम को वह चढ़ावा सबकी जेबों में चला जाता है.
                  
   'जीवित प्रमाण पत्र' हर वर्ष पेंशनर को जमा करना होता है. अगर उसको पेंशन लेनी है तो जमा करना  ही पड़ेगा. इस प्रक्रिया में अगर आपको निर्बाध पेंशन चाहिए है तो उस फार्म के साथ हर महीने के १०० रुपये के हिसाब से एक साल तक का चार्ज देना होगा तभी ये कार्य संभव है और यहाँ लाखों की संख्या में पेंशनर होते हैं. हो गयी न करोड़ों की कमाई. यहाँ कोई रिश्ता या परिचय काम नहीं आता है भले ही आप उसी कोषागार से अवकाशप्राप्त कर्मी क्यों न हों? अब नियम है तो है. ये पेंशनर जो अपने पैरों पर चल नहीं पाते , कुछ को तो दिखाई भी कम पड़ता है , कुछ मोहल्ले वालों के हाथ पैर जोड़ कर साथ लेकर आते हैं. वे कहाँ गुहार लगायें? किससे करें अपनी फरियाद और करने से भी क्या मिलेगा? उनकी पेंशन लटका दी जाएगी. वे कांपते हाथों से ये रकम देने के लिए मजबूर होते हैं लेकिन लेने वालों के हाथ नहीं कांपते है. ऐसा इस लिए भी होता है कि अब अधिकांश पेंशनर की पेंशन बैंक में जाने लगी है तो कोषागार वालों को तो साल में एक बार ही मौका मिलता है. धर्म की कमाई है. जो मांग रहे हैं वे अपनी मेहनत की कमाई मांग रहे हैं और जो देने वाले हैं उनकी तो मुफ्त की कमाई है इसलिए उनको देना होता है. चलिए आगे और विभागों में सेंध लगायेंगे .
*सभी चित्र गूगल के साभार *

सोमवार, 8 नवंबर 2010

सामाजिक दायित्व और आप !

                    फिल्मों में दिखाए जाने वाले स्टंट आज के युवाओं को कितना आकर्षित कर रहे हैं , इस विषय में कई बार खबरें मिल चुकी हैं. कुछ दिन पहले दिल्ली की सड़कों पर लड़के बाइक पर स्टंट करते रहे और लोग देखते रह गए. वे कोई अपराध नहीं कर रहे थे इस लिए उनके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता . लेकिन ये फिल्मी स्टंट अगर युवाओं को भटकने वाला बन जाएँ तो फिर किस श्रेणी में रखना चाहेंगे हम?
                    ठीक दिवाली के दिन किसी के घर का दीपक बुझ गया और फिर चीत्कार और सिसकियों से भरे माहौल  में क्या कोई  सहृदय व्यक्ति ख़ुशी मना सकता है. पूरे मोहल्ले का माहौल खामोश रहा. दिए जले लेकिन आतिशबाजी का शोर नहीं था. दिवाली तो थी लेकिन दीपकों से निकलने वाली रोशनी उजली न लग रही थी. शर्मा जी ने अपने बेटे को अभी हाल में ही बाइक खरीद कर दी थी और वह अभी सिर्फ १८ वर्ष का बी टेक का छात्र था. फिल्मों में स्टंट करने के लिए वह घर वालों से चुपचाप किसी कोचिंग सेंटर को उसने ज्वाइन कर रखा था. इस लिए ही उसने बाइक खरीदने के लिए पिता को मजबूर कर दिया था. उसके इंस्टिट्यूट के घर से दूर होने के कारण पिता ने भी बाइक दिला दी थी. दोस्तों के सोहबत में और स्टंट के आकर्षण ने उसको सड़क पर स्टंट करते समय किसी भारी वाहन  से टकरा कर उसके नीचे आ जाने से उसके सिर को कटे तरबूज के तरह से खोल दिया था. उसके शरीर का कोई भी अंग सही सलामत नहीं बचा और १ हफ्ते  आई सी यूं में जीवन और मौत के साथ संघर्ष करने के बाद उसने दिवाली के दिन अंतिम सांस ली.
                     अभी तक तो सुना था एक्टिंग स्कूल, ड्रामा स्कूल, डांस स्कूल लेकिन ये स्टंट सिखाने वाले स्कूल के बारे में अभी तक न सुना था. जल्दी धनवान बनने के लालच ने और टीवी और सिनेमा के आकर्षण ने एक अच्छे खासे भावी इंजीनियर को उसको  जीवन और घर वालों से जुदा कर दिया.
                      अगर इस मृत्यु या हादसे को हम विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो इसमें हम किसे दोषी पाते हैं? क्या माँ बाप को जिसने बेटे को बी.टेक में एडमीशन तो दिला दिया और फिर जुटा दी उसके लिए सारी सुविधाएँ. ये उम्र ऐसी है कि बच्चे सोहबत में बहुत जल्दी भटक जाते हैं. इसलिए उनको अनभिज्ञ रखते हुए उनके बारे में सचेत रहने की जरूरत होती है. अभी उनको ग्लैमर की दुनियाँ की चकाचौंध अपनी तरफ खीचने के लिए काफी होती है. जब वे अपनी पढ़ाई के एक या दो साल संजीदगी के साथ गुजार लेते हैं और उनकी उपलब्धि भी हमें हमारे और उसके अनुरुप होती है तब बच्चे की ओर से बेफिक्र होना चाहिए. हमारा दायित्व सिर्फ बच्चे के लिए पैसा जुटाना ही नहीं होता है बल्कि उसको सही सांचे में ढालने की भी जरूरत होती है. आधे रास्ते जब वे हमारे साए में तय कर लें तब उनके हाथ को छोड़ा जा सकता है. अक्सर यह कहते हुए सुना है कि हम सिर्फ पैसे दे सकते हैं बाकी तो ये खुद देखें लेकिन वे अभी क्या देखेंगे? आपके दिए पैसे का दुरूपयोग भी कर सकते हैं. अपनी झूठी शान को दिखाने के लिए वे आपसे पैसे लेकर दोस्तों के साथ उड़ा सकते हैं. . इस लिए एक अच्छे और जिम्मेदार अभिभावक तभी बन सकते हैं जब कि उसके पीछे साए की तरह नहीं बल्कि उस  जासूस की तरह लगे रहिये जब तक कि आपको इस बात का यकीन न आ जाये कि अब उसके भटकने  की गुंजाइश नहीं रह गयी है.
                    कुछ दिन पहले एक लेख आया था कि क्या हम अपनी रिश्तेदार  या पड़ोसी के बच्चे को गलत दिशा में जाता हुआ देखें तो उनको आगाह कर दें या नहीं क्योंकि इसमें अपने पर आरोप लगने का भी डर रहता है. ऐसे झूठे आरोपों से मत डरिये आपका दृष्टिकोण सही है तो फिर जरूर बतलाइए. अगर माँ बाप आपको सही समझें तो ठीक है नहीं तो कल उसका परिणाम उनके सामने आ ही जाएगा. भले हमारे बच्चे न हों लेकिन किसी के बच्चे तो होते हैं और कोई भी माँ बाप ये नहीं चाहता कि उसके बच्चे किसी गलत दिशा में चले जाएँ. हमें अपने सामाजिक दायित्व  से विमुख नहीं होना चाहिए.

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

मानसिक अपंगता क्यों?

      
व्यावसायिक चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत हमने बहुत से प्रकार से अपंग बच्चों के बारे में जाना था . अब प्रश्न यह उठता है कि ये सारी कमियां पहले भी हुआ करती थी लेकिन उनकी संख्या इतनी अधिक न हुआ करती थी. तब तो गाँव में और घर में ही प्रसव हुआ करते थे और उनकी संख्या भी बहुत अधिक होती थी. सभी बच्चे चाहे कम अन्तराल पर हुए हों या फिर अधिक स्वस्थ होते थे.
              अधिक सुविधायों ने अगर हमको इस क्षेत्र में अधिक सक्षम बनाया है तो हमें उससे अधिक समस्याओं की जानकारी भी होने लगी है. उससे जनित समस्याओं के कारणों और उनके निराकरण पर भी विचार होने लगा है . पहले हम इससे वाकिफ नहीं थे क्योंकि उपचार की इन शाखाओं का विकास ही नहीं हुआ था बल्कि आज भी लोगों को इस चिकित्सा पद्धति के विषय में अधिक जानकारी नहीं है.
               आज मैं पहले के समय की बात देखती हूँ तो समझ आता है. मेरे पड़ोस में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार रहते थे और उनके पहले तीन लड़कियाँ थी और स्वस्थ थी. लड़के की चाह ने उनको सबसे अंत में पुत्र प्राप्त करने का सुयोग भी दिया  किन्तु लड़का मानसिक तौर पर अपंग था. ऐसे एक उनका ही मामला नहीं देखा बल्कि और कई मामले देखे और लोगों को कहते सुना - 'भगवान का अन्याय तो देखो कि लड़कियाँ सब भली चंगी और लड़का कैसा दिया? इस कैसा के पीछे क्यों को किसी ने न जाना और न ही जानने कि कोशिश की, ये कहिये कि तब इस प्रकार कि जानकारी हासिल भी नहीं हुई थी. 
              आज आमतौर पर लड़कियों की पढ़ाई और करियर के चलते विवाह कि उम्र बढ़ गयी है , हम इसको अच्छा मानते हैं या बुरा अपना अपना दृष्टिकोण है और कुछ तो शादी के बाद भी करियर के पीछे संतान का बोझ नहीं उठना चाहती हैं और बाद में प्लान करेंगे की तर्ज पर इस विषय को महत्व नहीं देती हैं. इन सब चीजों से शत प्रतिशत तो नहीं फिर भी मानसिक अपंगता के कारणों में प्रमुख बन रहे हैं. आइये उन कारणों पर विचार करें कि ये क्यों बढ़ रही है और इसमें कितनी सत्यता है?

 १. उम्र -- इसमें माँ की उम्र का बहुत अधिक महत्व है अगर माँ कि उम्र बहुत अधिक या बहुत कम होती है तब भी इस तरह के बच्चे होने की संभावना में वृद्धि हो जाती है. 
२. बेमेल विवाह -- बच्चे की मानसिक अपंगता में बेमेल विवाह की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. पति या पत्नी दोनों की आयु के बीच अधिक अंतर होना भी भावी बच्चे के पूर्ण विकास पर प्रश्नचिह्न लगा देता है.
३. माँ की शारीरिक स्थिति --  वर्तमान समय में मधुमेह, रक्ताल्पता, उच्च रक्तचाप या निम्न रक्तचाप आम बीमारी बन चुकी हैं लेकिन इन बीमारियों के रहते अगर वे गर्भ धारण करती हैं तो उसका प्रभाव बच्चे पर पड़ता है जिससे कि उसके सामान्य होने के रास्ते में कई अवरोध खड़े हो जाते हैं. 
४. मद्यपान/ ध्रूमपान --माँ का मद्यपान या ध्रूमपान दोनों ही बच्चे के मानसिक अपंग होने के लिए जिम्मेदार होते हैं. माँ के शरीर में अल्कोहल का जाना और ध्रूमपान से फेफड़ों पर पड़ने वाला दबाव बच्चे को प्रभावित करता है क्योंकि वह गर्भ में हवा पानी और भोजन सब माँ से ही ग्रहण करता है तो इन चीजों को जो भ्रूण ग्रहण करेगा उसके लिए कैसे सोचा जा सकता है कि वह एक सामान्य बच्चा हो सकता है. 
५. असामान्य प्रसव - नारी की शारीरिक रचना के अनुसार सामान्य प्रसव होना एक प्राकृतिक गुण है किन्तु जब ये सामान्य नहीं हो पाता है तो इसके लिए डॉक्टर को कुछ और तरीके अपनाने पड़ते हैं . उन तरीकों का प्रभाव अगर गलत हो गया तो बच्चे के मानसिक अपंग होने के अवसर बढ़ जाते हैं.

६. अल्ट्रा साउंड   / एक्स  रे -- गर्भावस्था के दौरान माँ के अल्ट्रा साउंड या एक्स रे अधिक होते हैं तो इससे बच्चे के स्वस्थ पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. देखने में ये एक सामान्य प्रक्रिया होती है लेकिन अधिक होने पर यही घातक बन जाती है और बच्चे के लिए मानसिक अपंगता का कारण भी बन सकते हैं.
७. माँ की चोट -- गर्भावस्था में अगर किसी कारणवश माँ को चोट लग जाती है तो हमेशा तो नहीं लेकिन ये भी बच्चे के लिए मानसिक अपंगता का कारण सिद्ध होती है क्योंकि ऊपरी   तौर पर यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि बच्चे कि मानसिक स्थिति क्या है? डॉक्टर बच्चे कि शारीरिक स्थिति विभिन्न तरीके से पता लगा लेते हैं लेकिन मानसिक अपंगता तो उसके कुछ बड़े होने पर ही पता लगती है.. 
८. नाल फँसना - कई बार बच्चे कि नाल उसके गले में फँस जाती है और इसका पता लगने में यदि देर हो जाती है तो बच्चे कि मौत तक हो जाती है लेकिन अगर नाल फंसने के बाद उसका जन्म होता है तो उस दौरान उसके जिन नसों पर उसका दबाव बना रहता है वे सामान्य तौर पर कार्य करें ये आवश्यक नहीं होता है और यही उसके मानसिक अपंग होने कि संभावना को बढ़ा देता है.
९. गन्दा पानी - कई बार डॉक्टर कहते हैं कि बच्चे के मुँह में या फिर पेट में भी गन्दा पानी चला गया है, उसके लिए कई उपाय किये जाते हैं कि उसको निकला जाय लेकिन जन्म से पूर्व ऐसा होना उनके सामान्य जीवन पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर सकता है.
१०. बच्चे का रोना - बच्चे का पैदा होते ही रोना बहुत जरूरी होता है क्योंकि माँ के गर्भ में तो वह सारी चीजें माँ से ग्रहण कर्ता है उसको बाहर के वातावरण या फिर अपनी शारीरिक क्रियाओं के लिए माँ पर निर्भर रहना पड़ता है लेकिन जैसे ही वह गर्भ से बाहर आता और जोर से रोता है तो वह बाहर से आक्सीजन ग्रहण कर्ता है और उसके उसके मष्तिष्क की नसों में रक्त प्रवाह आरम्भ होता है और वे  सामान्यतौर  पर कार्य करती हैं . यही अगर विपरीत होता है तो सबसे पहले डॉक्टर बच्चे को मार कर रुलाने का प्रयास करते हैं और तब भी नहीं रोता है तो उसको कृत्रिम तरीके से आक्सीजन देने कि व्यवस्था करते हैं . लेकिन जो इस बीच में देर होती है उससे मष्तिष्क कि नसे आपस में जुड़ जाती हैं और फिर कृत्रिम ढंग से आक्सीजन देने पर भी यदि नहीं खुल पति हैं तो उन नसों का जिन अंगों से सम्बन्ध होता है वे अंग सामान्य तौर पर कार्य नहीं कर पाते हैं इसमें अपंगता मानसिक और शारीरिक दोनों ही हो सकती हैं.
११. सिर में औजार लगना --  प्रसव के दौरान कई बार ऐसे स्थितियां आ जाती हैं कि बच्चे के जन्म के लिए कुछ औजारों का प्रयोग करना जरूरी होता है और यदि ये औजार बच्चे के सिर में कहीं भी लग जाते हैं तो वे घातक सिद्ध होते हैं. क्योंकि बच्चे का सिर सबसे महत्वपूर्ण अंग होता है उससे उसके सारे शरीर कि प्रक्रिया जुड़ी होती है और औजार लगने पर यदि कोई भी रक्तवाहिनी क्षतिगस्त हो गयी तो उसका मानसिकतौर अपार अपंग होना निश्चित हो जाता है.
१२. सिर की चोट - बच्चे के सिर में यदि जन्म के कुछ दिनों के अंतर में ही चोट लग जाती है तो ये उसके लिए अच्छा नहीं होता है. उस समय तो पता नहीं चलता है लेकिन बाद में उसके लक्षण प्रकट होने लगते हैं.
१३. उल्टा पैदा होना - सामान्य अवस्था में प्रसव में बच्चे का सिर पहले बाहर आता है और पैर बाद में , लेकिन कभी कभी बच्चे के उल्टे  पैदा होने से पहले पैर बाहर आते हैं और फिर उसका सिर फँस भी सकता है या फिर बाहर की  हवा उसके सिर को बाद में मिलती है तो उसके जो कार्य सिर से आरम्भ होते हैं उनमें विलम्ब होता है और फिर उसके लिए यह घातक हो सकता है.


                        इन स्थितियों से बचाने का प्रयास तो किया ही जा सकता है ताकि माँ एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे. इन कारणों को शत प्रतिशत बच्चे कि मानसिक अपंगता के लिए जिम्मेदार नहीं मना जाता है लेकिन ऐसी परिस्थिति में हम बहुत हद तक ऐसे ही बच्चों को पा रहे हैं. इससे भावी को माँ को सतर्क करना या फिर स्वयं माँ का सावधानी बरतना अच्छा ही हो सकता है. इस प्रकार के बच्चे कभी भी पूरी तरह से सामान्य नहीं हो पाते हैं इनके लिए ही व्यावसायिक चिकित्सा उनको अपने कार्यों के लिए आत्मनिर्भर बनाने कि दिशा में सकारात्मक रास्ता दिखाती है और उनको उस ओर ले भी जाती है. 

बुधवार, 29 सितंबर 2010

इतिहास की पुनरावृत्ति !

                        क्या हमें फिर से अतीत के इतिहास को दुहराने का जरूरत आ पड़ी है. इस विषय को नहीं छूना चाह रही थी लेकिन आज की इस घटना ने झकझोर दिया. अब इंसां की वहाशियत ने हदें पर कर दीं हैं और वह भी आँखों के सामने जब देखा तो रोना आ गया उस माँ के रोने पर जिसने बेटी को स्कूल ही तो भेजा था पढ़ने के लिए और लौट कर तो उसे बेटी की लाश ही मिली और वह भी दरिंदों की नोची हुई अपनी बेटी की लाश.
                       कानपुर नगर - अब अखबारों में इस काम के लिए बहुत चर्चित हो रहा है. कुछ दिन पहले एक नामी गिरामी डॉ. के नर्सिंग होम के आई सी यूं में भर्ती एक लड़की के साथ बलात्कार के बाद इंजेक्शन लगा कर उसे मौत की नीद सुला दिया गया क्योंकि एक दिन पहले ही उसने अपने माँ बाप से कहा था कि मुझे यहाँ से निकाल ले चलो नहीं तो मैं नहीं बचूंगी और नर्सिंग होम वालों ने छुट्टी नहीं दी. दूसरे ही दिन उन्हें बेटी के लाश मिल गयी.
                      पुलिस बलात्कार के जरूरी साक्ष्य भी नहीं जुटा पाई , पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट से पुष्टि के बाद साक्ष्य कहाँ से लाये? यद्यपि संचालिका अभी जेल में हैं लेकिन उन पर लगी धाराएँ पुलिस बदल कर हल्की कर रही है क्योंकि मालदार पार्टी है और बेटी किसी गरीब की.
                       कल स्कूल गयी १० वर्षीया दिव्या को लहूलुहान हालत में स्कूल कर्मियों द्वारा घर छोड़ा गया और जब माँ उसे अस्पताल ले गयी तो डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया. उस बच्ची के साथ जो व्यवहार किया गया है उसने अब तक के सारे वहशीपन के रिकार्ड तोड़ दिए थे. डॉक्टर खुद हतप्रभ थे कि इस नन्ही सी बच्ची के साथ क्या हुआ है?  डाक्टरी रिपोर्ट के अनुसार जो समय तय है उस समय बच्ची स्कूल में थी.
                       ये समाज क्या चाहता है , पहले तो इन मासूमों को होने से पहले ही ख़त्म करने की साजिश रची जाती है और अगर वह दुनियाँ में आ भी गयी तो दोयम दर्जे के व्यवहार का शिकार हो जाती है. अब तो उनकी उम्र का भी कोई लिहाज नहीं  बचा क्या फिर से बाल विवाह की प्रथा शुरू कर दी जाय या फिर उनकी शिक्षा को बंद कर दिया जाय. कोई भी माता पिता अपने बेटी के साथ साए की तरह से नहीं रह सकता है. उसको घर की देहलीज तो लांघ कर बाहर निकलना ही पड़ेगा.
                       पहले यही होता था न, कि किसी की सुन्दर बेटी पर अगर बूढ़े जमींदार की नजर भी पड़ गयी या सुल्तान की नजर पड़ गयी तो उसकी जिन्दगी उसकी नजर हो जाती थी. इसी लिए तो बेटियों को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था या फिर जल्दी शादी करके उसको ससुराल वाली बना दिया जाता है और तब भी वह कम उम्र में ही माँ बनने के अभिशाप से ग्रसित होकर मृत्यु के मुँह में चली जाती थी. नसीब उसका मृत्यु  ही होती थी. या फिर बाल विधवा बनकर लोगों की इस गलत नजर का शिकार होकर अपनी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष करती फिरती थी.
                         अब हमारे पास क्या रास्ता है? क्या करें हम? बेटियों को सिर्फ सीने से लगा कर रखे और विदा कर दें. अगर उनको घर से बाहर निकालेंगे तो फिर किसी वहशी की नजर न पड़ जाए. किसका विश्वास करें-- डॉक्टर, पड़ोसी, रिश्तेदार, स्कूल, रिक्शेवाला, बसवाला और फिर शिक्षक ? अगर किसी का नहीं तो फिर ये कौन सा जीवन जीने की हक़दार हैं?  इस बात को मैंने अपने एक लेख में पहले भी जिक्र किया था कि अब लड़कियों को खुद में इतना सक्षम बनाना होगा कि वे अपनी सुरक्षा खुद कर सकें. उनको मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग आरम्भ से देने की जरूरत अब आ पड़ी है. इसको स्कूल के स्तर पर ही अनिवार्य करना होगा. कम से कम वे संघर्ष कर अपना बचाव तो कर सकें. ये वहशी दरिन्दे कुछ भी नहीं सिर्फ मानसिक बीमारी से ग्रसित होते हैं. ये मनोविज्ञान की भाषा में सेडिस्ट होते हैं. दूसरे को कष्ट देने में इनको सुख मिलता है और इस बीमारी से ग्रसित लोग खुद बहुत मजबूत नहीं होते हैं. अब हर स्तर पर ये लड़ाई लड़ने की जरूरत है. बच्चियों को पूरी सुरक्षा मिले और उससे आप घर में भी स्कूल के माहौल के बारे में जानकारी लेती रहें. क्योंकि इस तरह के लोग किसी न किसी तरीके से बच्चियों पर पहले से ही नजर रखते हैं और मौका पा कर ऐसा कृत्य कर बैठते हैं.
                   घर में अच्छे संस्कार सिर्फ लड़कियों को ही देने की जरूरत नहीं होती है बल्कि अपने लड़कों को भी अच्छे संस्कार दें ताकि वे सोहबत में भी ऐसे घिनौने कामों में लिप्त न पाए जाएँ. अपने घरों से शुरू करेंगे तो बहुत से घर इस स्वस्थ माहौल को बनाने में सक्षम होंगे. हम अपने स्तर पर प्रयास कर सकते हैं और फिर पूरे समाज को सुधारना तो सबके वश में ही है क्योंकि ये वहशी भी किसी माँ बाप के बेटे होते हैं और पता नहीं उनको कम से कम कोई माता पिता तो ऐसी शिक्षा नहीं दे सकता है हाँ उनकी सोहबत ही उन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकती है.

सोमवार, 27 सितंबर 2010

लगेंगे हर बरस मेले (शहीद भगत सिंह )!

           आजादी जिनके सिर पर जूनून बन कर बोली , वे उसकी तमन्ना में फाँसी पर झूल गए  और फिर गुलामी की  कड़ियों को एक के बाद एक शहीद अपनी शहादत से कमजोर करते चले गए. जब आजादी मिली तो शहीदों की कहानी इतिहास लिख चुकी थी और आजादी का सेहरा बांध कर जश्न कुछ और लोगों ने मना लिया और देश के भाग्य विधाता बन गए. इतिहास आज भी ये प्रश्न उठाता है कि अगर कुछ लोग चाहते तो भगत सिंह और कुछ लोगों की  फाँसी को रोका जा सकता था लेकिन उन लोगों ने नहीं चाहा.
                                   इस भारत के लाल का जन्म अखंड भारत के लायलपुर जिले के बंगा गाँव में २७ सितम्बर १९०७ को हुआ था. (अब पाकिस्तान में है.) उनका परिवार क्रांतिकारियों का ही परिवार था , घर में चाचा और पिता में कोई न कोई जेल में ही बना रहता था. भगत सिंह के पिता किशन सिंह और माता विद्यावती थी. उनकी रगों में देशभक्ति लहू बन कर दौड़ रही थी.
                   भगत डी ए वी कॉलेज में पढ़ रहे थे, तभी लाला लाजपत राय, रास बिहारी बोस के संपर्क में आये. उनके संपर्क में आने का मतलब था कि देश के अतिरिक्त कुछ सोचना ही नहीं था. १९१९ में जब जलियाँवाला काण्ड हुआ तब भगत सिंह मात्र  १२ बरस के थे और इस गोलीकांड ने उनको इतना विचलित कर दिया था कि वे अगले दिन जलियाँवाला बाग़  जाकर उसकी मिट्टी उठा कर लाये और अपने जीवन में उसको यादगार के रूप में रखे रहे. इस काण्ड ने ही उनके मन में अंग्रेजों को भारत से भागने की भावना को दृढ बनाया.
                        गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन से प्रेरित हो कर हो उन्होंने स्कूल छोड़ा और आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने लगे, किन्तु चौरी-चौरा काण्ड के बाद जब गाँधी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो वे क्षुब्ध हुए और तब उन्हें लगा कि ये अहिंसा का सिद्धांत उनके मनोबल और लड़ाई को कमजोर बनाने वाला है. इसके बाद उन्होंने आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष को अपना लक्ष्य बना लिया कि इसके बगैर वे अंग्रेजों को यहाँ से नहीं निकाल सकते हैं.
                     उन्होंने लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित नॅशनल स्कूल , लाहौर  में प्रवेश लिया और अपनी शिक्षा जारी रखी. ये स्कूल मात्र शिक्षा का केंद्र ही नहीं था अपितु वह क्रांतिकारी गतिविधियों का गढ़ था. वही उनकी मुलाकात भगवती चरण बोहरा, सुखदेव आदि से हुई.
                     विवाह से बचने के लिए वे घर से भाग कर कानपुर आ गए और यहाँ पर उनकी मुलाकात गणेश शंकर विद्यार्थी से हुई. क्रांति का आगे का पाठ  उन्होंने यही पढ़ा और पारिवारिक कारणों से घर वापस लौट गए. वहाँ पर उन्होंने "नौजवान भारत सभा" का गठन किया और  क्रांति का सन्देश फैलाना आरम्भ कर दिया. १९२८ में उनकी मुलाकात दिल्ली में चन्द्र शेखर आजाद से हुई और दोनों ने मिलकर "हिंदुस्तान  समाजवादी प्रजातंत्र संघ" नाम की संस्था का गठन किया और इसका उद्देश्य सशस्त्र क्रांति से देश को आजादी दिलाना रखा.
                     जब साइमन कमीशन भारत आया तो उसके विरोध में पुलिस द्वारा उसमें लाला लाजपत राय के ऊपर जो बेरहमी से लाठी चार्ज किया गया. भगत उसके साक्षी थे और उसमें घायल होकर ही बाद में वे स्वर्ग सिधार गए. उन्होंने चन्द्र शेखर , राजगुरु, सुखदेव से मिलकर इस काण्ड के पुलिस प्रमुख स्कॉट को मारने कि योजना बनाई लेकिन भूलवश वह उसके सहायक सांडर्स को मार बैठे और लाहौर  से भाग निकले. इसके बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली का ध्यानाकर्षित करने के लिए बिना किसी को नुक्सान पहुंचाए असेम्बली में बम फोड़ा और इन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगाये . इस अपराध में उनको गिरफ्तार कर लिया गया.भगत सिंह के कुछ गद्दार मित्रों ने सांडर्स काण्ड के लिए पुलिस के साथ मिलकर इन लोगों के खिलाफ गवाही दी. भगत सिंह और उनके मित्र चाहते थे कि उनको गोली मार दी जाय लेकिन उन्हें राजगुरु और सुखदेव के साथ फाँसी की सजा सुनाई गयी  और २३ मार्च १९३१ को उन लोगों को  फाँसी दी गयी.
                       वे अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित थे और अपनी मातृभूमि  के लिए शहीद हो गए. जब तक इस भारत भूमि का अस्तित्व है, वे सदैव नमनीय रहेंगे. आज उनके १०३ वें जन्म दिन पर हमारी उनको श्रद्धांजलि के रूप में ये लेख अर्पित है.

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

व्यावसायिक चिकित्सा पद्धति (३) !

                   मनोरोग और मानसिक अपंगता दोनों अलग अलग व्याधियां है. इनके बारे में हम सामान्य व्यक्ति नहीं जान पाते हैं और हम इसके इलाज के लिए गलत जगह या गलत व्यक्ति के संपर्क में आकर अपना समय और धन दोनों नष्ट करते हैं और हमें उससे फायदा कुछ भी नहीं मिलता है.
                 एक मनोरोगी वह स्वस्थ व्यक्ति होता है , जो मानसिक और शारीरिक दोनों  दृष्टि से सामान्य होता है और उसके शरीर के सम्पूर्ण अवयव सही ढंग से काम करते हैं. अपने स्वभाव और वातावरण के अनुरुप वह मनोरोग से ग्रसित हो जाता है - जैसे यदि वह अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाला है तो वह अपनी बात किसी से शेयर नहीं करता और अंदर ही अन्दर सोचता रहता है . उसके जीवन में तमाम ऐसी स्थितियां आती है कि वह उनसे अकेले लड़ नहीं पाता है और किसी को वह साझीदार बना नहीं पाता है. जिसका परिणाम ये होता है कि वह किसी न किसी प्रकार की मानसिक व्याधि से ग्रसित हो जाता है. एक कमजोर व्यक्तित्व वाला व्यक्ति अपनी परिस्थितियों  से भी नहीं लड़ पाता है और वह जीवन के उतार चढाव में आने वाले तनावों से अनिद्रा, अवसाद, कुंठा का शिकार हो जाता है और कई बार इनसे बचने के लिए वह नशीले पदार्थ तक लेने लगता है. ऐसे लोग मनोरोगी कहे जाते हैं . उनकी इन व्याधियों  का इलाज मनोचिकित्सक के पास होता है,  वे उसे काउंसलिंग, व्यावहारिक चिकित्सा  और विभिन्न दवाओं के द्वारा सामान्य स्थिति में ले आते हैं. ऐसे मनोरोगी ही आत्महत्या या दूसरों की हत्या करने तक का कृत्य कर डालते हैं.
                     मानसिक अपंगता वह स्थिति है , जब व्यक्ति अपनी उम्र के अनुसार कृत्य  नहीं कर पाता है. ये जन्मजात भी हो सकती है और किसी दुर्घटना के बाद भी. अक्सर इन लोगों की शारीरिक और मानसिक उम्र बराबर नहीं होती. जिसको हम I .Q के द्वारा चेक करते हैं. चाहे वे जन्मजात अपंगता के ग्रसित हो, किसी दुर्घटना के कारण या फिर पक्षाघात के बाद . इन लोगों को उनकी अधिकतम क्षमता तक पहुँचाना व अपने दैनिक कार्यों के लिए आत्मनिर्भर बनाना ही व्यावसायिक चिकित्सक का कार्य होता है.  उसके कार्य में धैर्य और सहानुभूति प्रमुख आधार होती है क्योंकि ऐसे रोगियों में सुधार बहुत धीमी गति से होता है और यही धैर्य और रोगी में आने वाला सुधार उनकी सफलता का द्योतक होता है.
                    इस विषय में जानकारी के अभाव में बच्चे के माता पिता या परिजन डॉक्टर के पास जाते हैं क्योंकि चिकित्सा की  ये शाखा अभी प्रत्येक अस्पताल में उपलब्ध नहीं है , हाँ इसके लिए विशेष अस्पताल या एन जी ओ अवश्य ही  कार्य कर रहे हैं. कुछ लोग उनको मनोचिकित्सक  के पास भेज देते हैं और मनोचिकित्सक भी अपने स्वार्थवश और पैसे की चाह में उन्हें भ्रमित कर देते हैं . ये मामला मेरे संज्ञान में आया है इसलिए उल्लेख कर रही हूँ. एक बच्चे को जो हाइपर एक्टिव था, मनोचिकित्सक ने उसको ब्लड प्रेशर लो करने की दवा देनी शुरू कर दी और उससे वह बच्चा सुस्त हो गया. जो सारे दिन घर में दौड़ता और तोड़ फोड़ करता था उसके सुस्त हो जाने से माता पिता को लगा कि मेरे बच्चे में सुधार आ रहा है जो  कि ये उनकी भूल थी क्योंकि वे इस बात से वाकिफ ही नहीं थे कि उनके बच्चे के साथ क्या हो रहा है? ऐसे ही बच्चों को व्यावसायिक चिकित्सक नियंत्रित करते हैं. जब उस बच्चे को और उसके पर्चे और दवा को एक व्यावसायिक चिकित्सक ने देखा तो बताया कि इसको गलत दवा दी जा रही है बस सिर्फ इस लिए कि माता पिता इस भुलावे में रहें कि  बच्चा अब कम परेशान कर रहा है और उसका इलाज जारी रखें.
                      इसका एक और उदाहरण भी सामने आया कि एक मनोचिकित्सक ऐसे रोगियों की बुलाती है और माता पिता को बाहर निकाल कर बच्चे  को कमरे में छोड़ देती है और वह अपनी गतिविधियाँ करता रहता है. आधे घंटे बाद वह माता पिता को बुलाती है और कहेगी कि आज मैंने ये observe किया है, दो दिन बाद फिर आइयेगा तब और देखूँगी. इसको बिहेवियर थेरेपी की जरूरत है. इस तरह से एक दिन के observation पर चार बार फीस वसूल लेती है. इसी बहाने होम विजिट पर भी आने की बात करेगी और उसकी फीस और अधिक होती है. माँ बाप इससे अनभिज्ञ होते हैं  और बच्चे के लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं. इलाज के लिए वह अपने साथ व्यावसायिक चिकित्सक को रखती है और फिर उससे पूछ कर माता पिता को संतुष्ट कर देती है बस उसका इलाज नहीं कर पाती है हाँ पैसे जरूर ऐंठ लेती है.
                   इसको बताने का मेरा सिर्फ यह आशय है की ये व्याधियां तो इंसां के वश की बात नहीं है, जो मिली हैं उनसे मुक्ति या राहत के लिए सही दिशा में जाकर ही निदान मिल सकता है. आप हों या आपके परिचित हों, उन्हें सही दिशा का भान कराइए कि  उनको कैसे और कहाँ इसकी चिकित्सा के लिए प्रयास करना चाहिए.
                  ऐसे कई सेंटर भी होते हैं जहाँ पर ऐसे बच्चों को रखा जाता है और उनके चिकित्सा भी दी जाती है लेकिन अपने बच्चे को डालने से पहले वहाँ का वातावरण और वहाँ बच्चों के देख रेख के लिए रखे गए लोगों के विषय में जानकारी जरूर ले लें क्योंकि इस बारे में भी लोग मूर्ख बना कर पैसे ऐंठते रहते हैं. मेरे एक परिचित अपने बच्चे को एक डे  केयर सेंटर में रखते हैं और भरोसा उनको इसलिए हुआ क्योंकि उस सेंटर के संचालिका एक डॉक्टर हैं और उसमें उनका बच्चा भी रहता है. वे दिन में खुद अपने क्लिनिक जाती हैं और उनके सेंटर को कोई दूसरी लड़की देखती है. इस सेंटर में वह और भी बच्चों को रखती हैं. प्रति बच्चे वे कोई ३ हजार रुपये लेती हैं और एक लड़की रखी हुई है जो मात्र बी. ए पास है. उसको १ हजार रुपये देती हैं क्योंकि उन्होंने खुद कहा कि मैं Occupation Therapist को नहीं अफोर्ड कर सकती हूँ. हाँ ये उनकी एक आमदनी का साधन भी है और अपना बच्चा भी ठीक से रहता है.